मार्च 2019

जीवन का आधुनिक मुहावरा

डॉ. रश्मि रावत

अर्चना वर्मा जैसी दायित्वबोध वाली उदात्त स्त्री, जिसे पद और प्रसिद्धि का प्रलोभन छू भी नहीं गया था। प्राप्तियों के लिए तिकड़म करना तो दूर, सहज प्रयास तक उनके लिए नहीं करती थीं। ऐसी व्यक्ति जीवन में अपने आचरण में विवेकपूर्ण और प्रगतिशील, आधुनिक जिंदगी जीती रहीं और पिछले कुछ समय से बयानों में यथास्थितिवादी।

साहित्य की दुनिया का एक और चमकता सितारा 16 फरवरी 2019 को डूब गया और पीछे छूट गईं कई अधूरी बातें, कई अधलिखी-अनलिखी रचनाएँ और जाने क्या-क्या। 'कथादेश' के 'प्रसंगवश' में प्रासंगिक मुद्दों पर संवेदनशील लेखन नहीं दिखा करेगा अब। देश के कोने-कोने से आई कहानियों को इतने परिश्रम और प्रेम से कौन पढ़ा करेगा, कौन चुना करेगा? नवरचनाकारों का हौसला बढ़ाने वाला, उन्हें गढ़ने वाला स्वर एकाएक मौन हो गया है। अर्चना वर्मा जैसी विदुषी, स्वाभिमानी, नि:स्वार्थ, व्यक्तित्व सम्पन्न स्त्री के सार्थक सम्पादकीय हस्तक्षेप ने यों तो पूरे साहित्य जगत को ही समृद्ध किया है, किंतु स्त्रियों के लिए तो उनका होना और ऐसी होना बहुत ही अधिक मायने रखता था। पता नहीं कितनी स्त्रियों की गढ़न उनके हाथों हुई है। उनके औदात्य और प्रेम का संस्पर्श व्यक्ति के भीतर के उज्ज्वल पक्ष को जाग्रत करता था। अंधेरे कोनों को रोशन करता था। वह रोशनी क्यों इतनी जल्दी खो गई? अभी तो बहुत कुछ बाकी था। अभी तो अर्चना दी आपको अपनी सबसे प्रिय रचना लिखनी थी। आप कहती रही हैं कि लिखने के दौरान तो आपको अपनी रचनाएँ भाती हैं। पर प्रकाशन के बाद उनमें बहुत कमियाँ नजर आती हैं इसलिए आप अपनी प्रिय रचना अब लिखेंगी और आपकी योजना थी भी लिखने की। सम्पादन जगत में स्त्रियों की संख्या यूँ ही बहुत कम है। इतने सशक्त, सार्थक स्वर का मौन हो जाना अपूरणीय क्षति है। उनका सबसे अधिक समय मिरांडा हाउस कॉलेज में अध्यापन एवं 'हंस' और 'कथादेश' पत्रिका के सम्पादन सहयोग में ही बीता। लिखने से कहीं ज्यादा उन्होंने लिखवाया है। अपने उत्कृष्ट अध्यापन और उदार व्यक्तित्व के साहचर्य में अनेक व्यक्तित्व गढ़े हैं। उनका काफी सारा लेखन पुस्तकाकार में आना अभी बाकी है। प्रकाशित रचनाओं में शामिल हैं दो कविता संग्रह, दो कहानी संग्रह, दो आलोचना पुस्तकें। स्त्री विमर्श की महत्वपूर्ण पुस्तकों – 'औरत : उत्तरकथा', 'अतीत होती सदी और स्त्री का भविष्य', तथा 'देहरि भई विदेस' के सम्पादन में उनका महत्वपूर्ण सहयोग रहा है। 12वीं में स्कूल की पत्रिका में लिखना शुरू करने से उनकी रचनायात्रा का आगाज होता है। स्नातकोत्तर में इलाहाबाद के परिवेश पर लिखी पहली कहानी 'रेंगता हुआ शहर' उनकी पहली कहानी थी और धर्मयुग में प्रकाशित 'बाकी रहा' दूसरी कहानी। व्यापक और गहन अध्ययन की तो उन्हें शुरू से ही लत लग गई थी, उनकी यह आदत अंत तक बनी रही। कहानी यात्रा भी धीमी गति से चलती रही। बिना रचनात्मक दबाव के वे लिखना चाहती नहीं थीं। 3-4 दशक सम्पादन से जुड़े रहने के कारण कुछ न कुछ लिखने के तात्कालिक दबाव के तहत कथेतर विधाओं में ही उनकी लेखनी चलती रही और कहानी, उपन्यास, आत्मकथा की उनकी योजनाएं पीछे सरकती रहीं। उनकी कहानियों में अर्थ की महीन परतें हैं। एकदम ठोस यथार्थ उनमें आया है, पर सीधे सपाट ढंग से नहीं। गहरे पैठ कर ही उनका भरपूर आस्वाद लिया जा सकता है। 'अस्मिता-विमर्श का स्त्री स्वर' स्त्री विषयक चिंतन की एक महत्वपूर्ण पुस्तक है। विचार की नई खिड़कियाँ इसमें खुलती हैं। जीवन के मूलभूत सवालों से स्त्री-विमर्श को जिस तरह उन्होंने जोड़ा है, मुझे किसी अन्य पुस्तक में नहीं दिखा है। हालांकि अर्चना वर्मा खुद को स्त्रीवादी नहीं मानतीं, मगर स्त्री के अस्तित्व और व्यक्तित्व के प्रश्न को बेहद बारीकी से उन्होंने उठाया है। यह स्त्री-विमर्श के नए आयाम खोलता है। इनके प्रेम और ज्ञान के साये में विकसित होने वाले लोगों की संख्या बहुत हैं। चंद बेटे और अनेकानेक बेटियाँ, भाई, बहन इनके प्यार से बिंधे हुए उनके पारिवारिक सदस्य रहे। किंतु मिरांडा हाउस कॉलेज में इनके साथ इतिहास पढ़ाने वाली प्रभा दीक्षित के बिना अर्चना वर्मा जी पर मुकम्मल बात नहीं की जा सकती। जिंदगी की धूप-छाँह एक घर में साथ रह कर जिसके साथ उन्होंने जी थी, वह तो इनकी जीवन सहचरी और इनके बच्चों की प्रिय मौसू प्रभाजी ही हैं। दोनों दो एकदम अलग तरह के व्यक्तित्व। एक-दूसरे की वैयक्तिक विशिष्टताओं को जस का तस स्वीकार करके जिस तरह से दोनों ने परस्पर संगति बिठायी और एक-दूसरे के व्यक्तित्व को विकसित किया। सम्बंधों की यह खूबसूरती और गहराई कम ही मिलती है। अगर घर हमारे हम होने को शरण न दे सके, विकसित होने का अवकाश न दे सके तो क्या फायदा ऐसे घर का। दिये की भित्ति ही उसके भीतर जलती लौ को ढाँप दे तो वह दीप कैसा? अग्निशिखा ऊपर और ऊपर उठे और वातावरण को आलोकित कर सके, ऐसे घर-परिवार कम मिलते हैं। हमारे समाज में विवाह एवं परिवार संस्थाओं का स्वरूप कुछ ऐसा है कि घर की संकीर्ण मगर दृढ़ दीवारों के बीच जूझती लौ कब हवा के अभाव में सिसक कर रह जाती है, पता तक नहीं चलता। हम दिये की भित्ति में ही खुद को शामिल मान कर उसे ही और मजबूत करने में लग जाते हैं। वर्तमान में नए तरह के लोकतांत्रिक परिवार को विकसित करने की सख्त जरूरत है जिसका हर सदस्य उसमें रहते हुए भरपूर जी सके, खिल सके। परम्परा की सख्त दीवारों में कुछ सेंध तो लगी है, पर फिर भी नयी आधुनिक ढंग की स्वस्थ संस्थाओं के विकास की दशाएँ अभी नहीं दिखतीं। उस समय के हिसाब से देखा जाए तो परिवार संस्था में न पर्याप्त लचक आई थी और न ही उसके बेहतर विकल्पों के विकसित होने की शुरुआत ही हुई थी। ऐसे में नितांत अलग तरह का परिवार बसाना और इस गरिमा से ताउम्र वहन करना कोई छोटी बात नहीं। स्वाभिमानी, अपने मूल्यों पर अडिग रहने वालीं, व्यक्तित्व सम्पन्न स्त्रियाँ ही ऐसा कर सकती थीं। उस दौर में इस आर्थिक और शैक्षणिक स्तर की स्त्रियों के लिए समाज में पारम्परिक स्पेस की कोई कमी नहीं थी। किंतु स्वत्वबोध के साथ लोकतांत्रिक जीवन जीने के लिए तो आज भी अनुकूल परिस्थितियाँ नहीं बनी हैं। ऐसे में कोई समझौता न करके ऐसा परिवार गढ़ना जिसके दरवाजे सबके लिए खुले हों और हर सदस्य लोकतांत्रिक जीवन जीते हुए अपना भरपूर विकास कर सके। विषमतामूलकता उस परिवार में कहीं थी ही नहीं इसलिए कोई काम छोटा-बड़ा, ऊँचा-नीचा नहीं था। तो लाजमी था कि अपने-अपने मिजाज के हिसाब से काम करते हुए अपना पूर्ण विकास किया जाए। धर्म, जाति, लिंग, वर्ग, क्षेत्रीयता, भाषा किसी भी तरह के भेदभाव की कोई छाया मुझे कभी उन दोनों और उनके साये में पले व्यक्तित्वों में नहीं दिखी। वे इन संकीर्णताओं से पूरी तरह मुक्त हो चुके थे। उनके घर में साधन-वंचित बच्चे होंठों में प्यारी-सी मुस्कान लिए चाव से उनसे पढ़ते हुए नजर आते हैं। घरेलू सहायिका के चेहरे की चमक देख कर पता चलता है कि उन्हें वहाँ कितना अपनापन और सम्मान मिलता है। प्रभाजी मृत्यु के बाद अपने शरीर को अस्पताल में दिए जाने का प्रबंध कर चुकी हैं और अर्चना दी करने को थीं कि अप्रत्याशित ढंग से हृदयाघात से उनका देहांत हो गया। इस बात का प्रभाजी को बड़ा अफसोस भी हुआ कि अर्चना यह काम पहले कर पाती काश। जीवन के दैनिक क्रियाकलापों में, आचरण की हर सलवट में मैंने आधुनिकता और औदात्य को ही उनके भीतर पाया है। कोई पैसा कैसे कमाता है और किस पर और किस तरह से खर्च करता है इससे भी उसका व्यक्तित्व का पता चलता है। धन के प्रति मोहासक्ति मुझे उनमें कभी नहीं दिखी, न भविष्य की सुरक्षा को लेकर कोई अतिरिक्त फिक्र। सादगी से जीने वालों के लिए भी वर्तमान दौर में पैसा केंद्रीय स्थान लेता जा रहा है। भविष्य का असुरक्षा बोध उन्हंा अधिक से अधिक जमा करने के लिए प्रेरित करता रहता है, कभी-कभी एक तरह की मानसिक बीमारी का रूप यह ले लेता है। इन दोनों का प्रगाढ़तम प्रेम और सम्पदा का वितरण खून के रिश्तों तक सीमित नहीं है। देना-पाना के सम्बंध पारम्परिक न होकर बौद्धिक तर्कों और व्यापक सरोकारों पर आधारित हैं। व्यक्तित्व को सीमित करने वाले तरह-तरह के जकड़ जालों से वे पूरी तरह मुक्त थीं। ज्ञान के अकूत खजाने के साथ-साथ अर्चना जी की पर्यवेक्षण और विश्लेषण क्षमता गजब थी। किसी भी विषय पर तार्किक ढंग से बौद्धिक बहस कर सकती थीं। अपने विरोधी व्यक्ति के प्रति पूरा सद्भाव कायम रखते हुए वे तर्क-वितर्क करती थीं और उनकी हमेशा यही गुजारिश होती थी कि तर्क का जवाब तर्क से, तथ्य से दिया जाए न कि व्यक्ति का नाम देख कर आघात-प्रत्याघात किया जाए। अपार धैर्य के कारण कभी तनिक भी झल्लाहट उन्हें विरोधी तर्कों की बौछारों से नहीं होती थी। इसलिए ये एक विचारणीय प्रश्न है कि तार्किक क्षमता से लैस, व्यापक सरोकारों वाली एक खुद्दार विदुषी स्त्री के तर्क उन्हें इन निष्कर्षों तक ले कर क्यों जा रहे थे जो हमने पिछले कुछ समय से उनके बयानों में पाया है। असहमति और भिन्नता के लिए उनके भीतर न केवल स्पेस था, बल्कि भरपूर प्यार और सम्मान भी था। उनसे अलग खुद के विचारों, अपने मिलने-जुलने वालों या किसी भी चीज के लिए उनकी आँखों में कभी भी कण भर भी सिकुड़न नहीं देखी। इसलिए अचरज मुझे इस बात का भी है कि विरोधी पक्ष उन्हें अपने तर्कों से लाजवाब क्यों न कर सका। आचरण और विचारों की गहरी खाई क्या आत्मविश्वास और धैर्य को लील जाती है? विचलन की महीन सी रेखा पर ही हम किसी को अपना दुश्मन समझ कर उसकी उपेक्षा या तिरस्कार करना शुरू कर देते हैं? मैं दावे के साथ कह सकती हूँ तर्क के उस ओर अर्चना जी होतीं और इस तरफ विरोधी पक्ष तो अब तक दोनों एक ही धरातल पर खड़े हो कर मिल-जुल कर समयोचित दिशा की ओर बढ़ रहे होते। परम्परा तो स्त्रियों के पक्ष में यों भी नहीं है। इसलिए कोई भी स्वचेतन स्त्री सदैव सहर्ष तैयार होती है प्रगतिशील दिशा की ओर बढ़ने के लिए। इस देश में दलितों, स्त्रियों और आदिवासियों के लिए है भी क्या? उनके तो हित में ही है संस्थाओं का आमूलचूल परिवर्तन और नवनिर्माण। फिर भी अगर प्रगतिशील विचारधाराएँ इन हाशिये के लोगों को अपने सरोकारों से जोड़ नहीं पा रही हैं और अपना पाट चौड़ा नहीं कर पा रही हैं तो ईमानदारी से आत्म-विश्लेषण करने की आवश्यकता है। विचारधाराएँ धर्म की तरह कट्टर रूप क्यों लेती जा रही हैं, समझ नहीं आता। मानवीय दुर्बलता या असमंजस के पलों में कोई छेद बराबर गलती करता है तो इतने प्रहार किए जाते हैं कि उस छेद को चौड़ा कर-कर के दो फाड़ कर दिया जाए। इतने टुकड़ों में बँट कर हम व्यवस्था का क्या ही बिगाड़ पाएंगे? कहीं ऐसा तो नहीं कि व्यवहार और आचरण में अग्रगामी विचारों को आत्मसात किए बिना बस शब्दों में ही हम प्रगतिशील हुए जा रहे हैं। क्योंकि आचरण की ईमानदार कोशिश अधिकांश लोगों ने की नहीं है तो उन्हें बीच-बीच में आने वाली दिक्कतों, चुनौतियों और भीतर सदियों से जड़ जमाए बैठे संस्कारों के साथ आंतरिक घर्षण का भी अनुमान नहीं है। सामाजिक गतिकी अपनी स्वाभाविक लय के साथ भी बढ़ते समय के अनुरूप व्यक्तित्व का जिस स्तर तक विकास करती जा रही है। प्रगतिशील विचारधाराओं के धारकों के आचरण का उतना विकास भी क्यों नहीं हो पा रहा होगा। सोचने की बात है। क्या हमने सरलीकृत ढंग से, सतही तौर पर विचारधाराओं का बाना पहन लिया और कभी उसके साथ अपने कम्फर्ट जोन से बाहर आ कर सीधी-सच्ची मुठभेड़ नहीं की? और ऐसे ही चंद लोगों को ही अग्रगामी विचारधाराओं पर अपना दावा ठोंकने का अधिकार प्राप्त है जो उसके लिए सच्ची कोशिश कभी नहीं करेंगे, पॉवर ऑफ सीट पर जो बैठे हैं। अर्चना वर्मा जैसी दायित्वबोध वाली उदात्त स्त्री, जिसे पद और प्रसिद्धि का प्रलोभन छू भी नहीं गया था। जिसके बारे में उनका हर परिचित दावे से जानता है कि उनकी दृष्टि भीतर की ओर नहीं बाहर की ओर रहती थीं। वह अपने से ज्यादा दूसरों के विकास के लिए फिक्रमंद रहती थीं। प्राप्तियों के लिए तिकड़म करना तो दूर, सहज प्रयास तक उनके लिए नहीं करती थीं। ऐसी व्यक्ति जीवन में अपने आचरण में विवेकपूर्ण और प्रगतिशील, आधुनिक जिंदगी जीती रहीं और पिछले कुछ समय से बयानों में यथास्थितिवादी। साहित्य और ज्ञान के क्षेत्र में प्रविष्ट होते ही औचित्यबोध से भरपूर, मानवीय मूल्यों की पैरोकार बन जाती थीं। मानो न्याय के सिंहासन पर जा बैठी हों। अपने प्रेम और औदात्य से, अपनी आंतरिक निर्मल रोशनी से उन्होंने आदम के न जाने कितने जीवंत, मजबूत साँचे गढ़ डाले हैं जो उचित के पक्ष में खड़े होने का विवेक भी रखते हैं और हौंसला भी। ऐसी हम सबकी प्रिय और परम आदरणीय अर्चना वर्माजी को प्रेम भरा प्रणाम। उनके बहाने से इस पूरे परिदृश्य का विश्लेषण मुझे आवश्यक लग रह है कि व्यक्ति के तर्कों की स्वाभाविक परिणति और आचरण दो अलग छोरों पर क्यों जा लगते हैं। (लेखिका दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापन के साथ ही विभिन्न साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं के लिए नियमित लिखती हैं)