मार्च 2019

एक अथक विद्रोही और मुक्तिकामी राजनेता

अनिल जैन

जॉर्ज फर्नांडीज मूल रूप से मजदूरों के बीच काम करने वाले राजनेता थे लेकिन उनकी पहचान यहीं तक सीमित नहीं थी। वे तेजतर्रार संसदविद, चिंतक, अध्येता, पत्रकार, लेखक और कुशल प्रशासक भी थे। जॉर्ज के बारे में यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि आजादी के बाद वे एकमात्र ऐसे राजनेता रहे जिनका समूचा राजनीतिक जीवन रोमांचक और दुस्साहस भरी घटनाओं से भरा रहा।

बात 1992-93 की है। केंद्र में पीवी नरसिंहराव की सरकार में शंकरराव चव्हाण गृह मंत्री हुआ करते थे। दिल्ली में कृष्ण मेनन मार्ग पर उनकी और जॉर्ज फर्नांडीज की सरकारी कोठी आमने-सामने हुआ करती थी। उस मार्ग पर और भी मंत्री और सांसद रहते थे, लेकिन गृह मंत्री के सुरक्षा में एनएसजी यानी नेशनल सिक्योरिटी गार्ड और दिल्ली पुलिस के जवानों की नजरें सबसे ज्यादा जॉर्ज की कोठी पर ही लगी रहती थीं, क्योंकि उनके यहां कश्मीर, पंजाब, उत्तर-पूर्व और अन्य कई राज्यों के उन आंदोलनकारियों का आना-जाना लगा रहता था, जिन्हें सरकार और मुख्यधारा का मीडिया बडी सहजता से उग्रवादी या नक्सली करार दे देता है। उनके यहां तिब्बत, नेपाल, म्यांमार, भूटान आदि देशों के आंदोलनकारी और मानवाधिकार कार्यकताã भी मदद और मार्गदर्शन लेने के लिए आते रहते थे। इसलिए गृह मंत्री चव्हाण जब भी अपने घर से निकल कर कहीं जाते थे या कहीं से घर लौटते थे तो उनके सुरक्षाकर्मी जॉर्ज की कोठी का मुख्य दरवाजा बंद कर देते थे। इस प्रकार जार्ज और उनके घर आने वालों को दिन में कई बार घर में कैद होकर रह जाना पडता था। नागरिक आजादी और लोकतंत्र के जान हथेली पर लेकर सत्ता से टकराने वाले जॉर्ज को यह सब बडा नागवार लगता था, लिहाजा एक दिन उन्होंने कुछ आवश्यक औजार मंगवाए और अपने हाथों से अपने घर का वह मुख्य दरवाजा ही उखाड फेंका। इसके बाद वे सीधे संसद भवन गए। उन्होंने लोकसभा में अपने घर का दरवाजा उखाडने की सूचना देते हुए कहा कि यह गृह मंत्री देश की सुरक्षा कैसे करेगा जो अपने घर के सामने रहने वाले सांसद से इतना डरता है कि आते-जाते वक्त उसे बाहर से कैद करवा देता है। सुरक्षाकर्मी तो उन्होंने कभी रखे ही नहीं और आमतौर पर अपनी गाडी भी वे खुद ही चलाते थे। ऐसे मुक्तिकामी जॉर्ज फर्नांडीज आखिरकार अब जीवन से भी मुक्त हो गए। वे करीब पिछले एक दशक से अल्जाइमर नामक लाइलाज बीमारी के बंधक बनकर जीवन से वंचित रहते हुए मेडिकल साइंस का टार्चर झेल रहे थे। ऐसा टार्चर कि जीवित होते हुए भी वे जीवन से वंचित थे और मृत्यु भी उन्हें स्वीकार नहीं कर रही थी। तीन जून 1930 को मंगलौर (कर्नाटक) में जन्मे जॉर्ज फर्नांडीज को उनके पिता पादरी बनाना चाहते थे। इसलिए जब वे 16 साल के हुए तो उन्हें धार्मिक शिक्षा के लिए भेजा गया। वे दो साल चर्च में रहे लेकिन वहां के पाखंड भरे माहौल को देखकर उनका मोहभंग हो गया। वे चर्च छोडकर कुछ और करने के मकसद से बंबई पहुंच गए। वहां कई रातें उन्होंने चौपाटी की बेंच पर सोकर गुजारी। कुछ दिन इधर-उधर भटकते हुए वे सोशलिस्ट पार्टी के ट्रेड यूनियन नेता पीटर डीमेलो के संपर्क में आए और पार्टी कार्यालय में रहकर ट्रेड यूनियन का काम करने लगे। उसी दौरान उनकी मुलाकात डॉ. राममनोहर लोहिया से भी हुई। लोहिया को जॉर्ज की प्रतिभा पहचानने में देर नहीं लगी। लोहिया ने अपने पार्टी साथियों के बीच कहा कि इस लडके में आग है, यह आगे चल कर बडा ट्रेड यूनियन नेता बनेगा। बंबई में रहते हुए महज दस-बारह वर्षों में ही जॉर्ज कई ट्रेड यूनियनों के जन्मदाता और नेता बन गए। उन्होंने बंबई महानगर पालिका के कामगारों, टैक्सी और ऑटो रिक्शा ड्राइवरों, बंबई राज्य परिवहन निगम के कर्मचारियों, कपडा मिल मजदूरों, बंदरगाह पर काम करने वालों आदि की यूनियनों को खडा करने का श्रेय जॉर्ज को ही जाता है। जॉर्ज की जूझारू स्वभाव, मेहनत और वक्तृत्व शैली का ही यह असर था कि उनके एक आह्वान पर बंबई का जनजीवन ठप हो जाता था। एक तरह से वे बंबई के बेताज बादशाह माने जाने लगे थे। बंबई का संभ्रात कहा जाने वाला उच्च और मध्यवर्गीय तबका भले ही उस वक्त जॉर्ज फर्नांडीज को तोडफोड करने कराने वाला लुच्चा-लफंगा मानता रहा हो मगर उस महानगर के लाखों मेहनकश कामगारों और उनके परिजनों के लिए तो वे हीरो थे, मसीहा थे। उनकी इसी छवि के चलते 1967 के आम चुनाव में सोशलिस्ट पार्टी ने उन्हें दक्षिण बंबई लोकसभा सीट से उस समय के दिग्गज कांग्रेसी नेता एसके पाटिल के मुकाबले अपना उम्मीदवार बनाया। उस समय जॉर्ज बंबई महानगर पालिका परिषद में पार्षद हुआ करते थे। एसके पाटिल का कद और प्रभाव इतना बडा था कि कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था कि वे चुनाव हार सकते हैं। खुद पाटिल को भी यही मुगालता था और इसी मुगालते के चलते उन्होंने चुनाव के दौरान एक पत्रकार परिषद में कह दिया- 'अगर भगवान भी आ जाए तो मुझे नहीं हरा सकते।' अगले दिन बंबई के अखबारों में उनका बयान सुर्खियों में छपा। तेजतर्रार जॉर्ज ने उनकी इस दंभोक्ति पर एक पोस्टर और पर्चे तैयार कराकर पूरे क्षेत्र में बंटवा दिए। पोस्टर और पर्चों पर लिखा था- 'पाटिल कहते हैं कि उनको भगवान भी नहीं हरा सकते, लेकिन मैं कहता हूं कि आप हरा सकते हैं इस शख्स को।' चुनाव नतीजा जॉर्ज के पक्ष में आया। 37 वर्षीय युवा जॉर्ज के हाथों कांग्रेस के कद्दावर एसके पाटिल 42 हजार वोटों से हार गए। पाटिल की राजनीति का सूर्यास्त हो गया और जॉर्ज को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली। जॉर्ज बंबई से बाहर निकलने लगे और पूरा देश उनका कार्यक्षेत्र बनने लगा। बंबई में सक्रियता कम होने से उनके चाहने वालों को लगने लगा कि उनका नेता उनसे दूर जा रहा है। लोगों के इस अहसास का असर 1971 के चुनाव में साफ दिखा जब जॉर्ज हार गए। जॉर्ज को अपनी हार का कारण में समझने में देर नहीं लगी। उन्होंने चुनाव नतीजा आने के दो दिन बाद ही 'बंबई बंद' का आह्वान किया और उनके आह्वान पर बंबई महानगर मुकम्मल बंद रहा। हालांकि जॉर्ज ने बाद में बंबई से फिर कभी चुनाव नहीं लडा। उनका कार्यक्षेत्र व्यापक हो चुका था और इसी सिलसिले में 1973 में वे ऑल इंडिया रेलवे मेन्स फेडरेशन के अध्यक्ष बने। आजादी के बाद तीन वेतन आयोगों की सिफारिशें आ चुकी थीं लेकिन रेल कर्मचारियों के वेतन में कोई राहतकारी इजाफा नहीं हुआ था। जॉर्ज ने इसी मुद्दे को लेकर रेल हडताल का फैसला किया। यह जॉर्ज का ही कमाल था कि टैक्सी ड्राइवर, बिजली कर्मचारी यूनियन और ट्रांसपोर्ट की यूनियनें भी इसमें शामिल हो गईं। मद्रास की कोच फेक्ट्री के दस हजार मजदूर भी हडताल के समर्थन में सडकों पर आ गए। इस ऐतिहासिक हडताल से देशभर का जनजीवन ठप हो गया। सरकार हिल उठी और उसने हडताल के प्रति सख्त रुख अपनाया। कई जगह रेलवे ट्रैक खुलवाने के लिए सेना को तैनात किया गया। एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट के मुताबिक, हडताल तोडने के लिए 30,000 से ज्यादा मजदूर नेताओं को जेल मे डाल दिया गया। इंदिरा गांधी की सरकार ने बेरहमी से इस हडताल को कुचल दिया। इस निर्ममता का असर दिखा और तीन हफ्ते के अंदर हडताल खत्म हो गई। इस हडताल के बारे में खुद जॉर्ज ने करीब दो दशक पहले इन पंक्तियों के लेखक से एक इंटरव्यू के दौरान कहा था- इस देश में रेल कर्मचारियों की ताकत को आज तक सिर्फ दो लोगों ने ही समझा है- एक मैं और दूसरी थीं इंदिरा गांधी। मैंने हडताल करवाई थी और इंदिरा गांधी ने हडताल तुडवाई। आपातकाल लगने की सूचना जॉर्ज को रेडियो के जरिए मिली थी। उस वक्त वे भुवनेश्वर में थे। उनको इस बात का अंदाजा था कि सबसे पहले सरकार के निशाने पर होने वालों में उनका भी नाम शामिल है, लिहाजा उन्होंने भूमिगत रहते हुए आपातकाल के विरुद्ध संघर्ष करने का फैसला किया। इस सिलसिले में वे कभी साधु का तो कभी मछुआरे का और कभी सिक्ख का वेश धारण कर देशभर में घूमते रहे और अपने अन्य विश्वस्त भूमिगत साथियों के साथ सरकार की तानाशाही के खिलाफ अभियान चलाते रहे। तमाम सुरक्षा एजेंसिया लंबे समय तक जॉर्ज और उनके साथियों को पकडने में नाकाम रहीं। जॉर्ज मानते थे कि अहिंसात्मक तरीके से किया जाना वाला सत्याग्रह ही न्याय के लिए लडने का एकमात्र तरीका नहीं है। उन्हें यह लग रहा था कि आपातकाल के खिलाफ शुरुआत मे संघर्ष करने वाले संगठन अपने नेताओं की गिरफ्तारी से डर गए है और लडना नहीं चाहते। इसलिए जॉर्ज ने ऐसे वक्त में तानाशाही हुकूमत की अवज्ञा करने तरीका यह खोजा कि कुछ सुनसान इमारतों, रेलवे लाइनों और पुलों पर डायनामाइट लगाकर विस्फोट करके दुनिया भर का ध्यान भारत की ओर खींचा जाए। अपने इस मकसद के लिए जॉर्ज उनके साथियों काफी तैयारी भी कर ली थी लेकिन एक-दो साथियों के पकडे जाने और उनके मुखबिर बन जाने के कारण योजना पर अमल नहीं हो सका। जॉर्ज और उनके अधिकांश साथियों को जून 1976 मे गिरफ्तार कर लिया गया। इसके बाद उनके सहित 25 लोगों के खिलाफ सीबीआई ने राजद्रोह का मामला दर्ज किया जिसे बडौदा डायनामाइट केस के नाम से जाना जाता है। जेल में जॉर्ज और उनके सहयोगियों को काफी शारीरिक यातनाएं दी गईं। इस दौरान जॉर्ज की सहयोगी और समाजवादी अभिनेत्री स्नेहलता रेड्डी की जेल में ही मौत हो गई और जॉर्ज के लॉरेंस की टांगे हमेशा के लिए खराब हो गईं। हालांकि जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद बडौदा डायनामाइट केस बंद कर दिया गया। जॉर्ज मूल रूप से मजदूरों के बीच काम करने वाले राजनेता थे लेकिन उनकी पहचान यहीं तक सीमित नहीं थी। वे तेजतर्रार संसदविद, चिंतक, अध्येता, पत्रकार, लेखक और कुशल प्रशासक भी थे। उनके घर पर विशाल पुस्तक कक्ष तो था ही, उनका शयनकक्ष भी किताबों से भरा रहता था। वे पढते भी खूब थे और लिखते भी खूब। उनके संपादकत्व में दो पत्रिकाएं प्रकाशित होती थीं- हिंदी में 'प्रतिपक्ष' और अंग्रेजी में 'द अदरसाइड।' वे इन पत्रिकाओं के कहने भर को संपादक नहीं थे बल्कि इनमें छपने वाली हर सामग्री का वे खुद चयन और संपादन करते थे तथा खुद भी नियमित लिखते थे। अपनी इसी पढाई-लिखाई के बूते वे संसद में भी हर मुद्दे पर अकाट्य तथ्यों और पैने तर्कों के साथ पेश होते थे। जॉर्ज अपने तूफानी राजनीतिक जीवन के उत्तरार्ध में अलग-अलग सरकारों में थोडे-थोडे समय के लिए मंत्री भी रहे। मोरारजी देसाई की सरकार में उद्योग, विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार में रेल तथा कश्मीर मामले और अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में विदेश जैसे अहम मंत्रालयों को उन्होंने संभाला और कई ऐतिहासिक फैसले लिए। उद्योग मंत्री के रूप में कोका कोला देश से बाहर निकालने का उनका ऐतिहासिक फैसला आज भी याद किया जाता है। इसी प्रकार रेल मंत्री के रूप में कोंकण रेलवे का विकास और रक्षा मंत्री के रूप में 6600 मीटर ऊंचे सियाचिन ग्लेशियर पर तैनात सैनिकों के बीच कई जाना भी उल्लेखनीय है। जॉर्ज के बारे में यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि आजादी के बाद वे एकमात्र ऐसे राजनेता रहे जिनका समूचा राजनीतिक जीवन रोमांचक और दुस्साहस भरी घटनाओं से भरा रहा।