मार्च 2019

विद्रोही महानायक

सुभाष रानडे

जिंदगीभर दस से पांच तक नौकरी कर सुरक्षित जीवन जीने वाले पापभीरुओं को विद्रोही व्यक्तित्वों के प्रति हमेशा एक ख़ास आकर्षण होता है। दुनियाभर के ऐसे तमाम लोगों को आकर्षित करने वाला चेहरा था चेग्वेवारा। भारत में निर्विवाद रूप से यह सम्मान हासिल करने वाले एकमात्र नेता रहे जार्ज फर्नांडीस।

जार्ज फर्नांडीस की पहचान आम तौर पर एक मजदूर नेता के रूप में रही, लेकिन वे सिर्फ एक मजदूर नेता नहीं थे। किसी एक पहचान में अटकना उनका स्वभाव ही नहीं था। मंगलोरी ईसाई परिवार में जन्मे जार्ज ने चुनाव लड़े मुंबई और बिहार में। उनका कार्यक्षेत्र रहा पहले मुंबई और बाद में संपूर्ण भारत। जार्ज की जिंदगी के दो भाग किए जा सकते हैं। एक 1977 का मुंबई का और दूसरा दिल्लीवासी होने के बाद का। उनके पिता ने उन्हें पादरी बनाने के लिए सेमिनरी में भर्ती किया था। टीबी होने के संदेह में उन्हें वापस भेज दिया गया। डॉक्टरी जांच करवा कर पिता ने फिर सेमिनरी में भेजा, लेकिन जार्ज के मन में सेमिनरी के प्रति इतना गुस्सा था कि वहां से भागकर वे सीधे मुंबई पहुंच गए। बाद में उन्होंने धर्म नामक चीज की तरफ कभी मुड़कर भी नहीं देखा। वे जन्म से ईसाई थे, लेकिन राजनीति में अपने अल्पसंख्यक होने का उन्होंने कभी उपयोग नहीं किया। जाति, धर्म, भाषा और राज्य की सीमा लांघकर सच्चे अर्थ में भारतीय बना ऐसा दूसरा समकालीन नेता नजर नहीं आता। जार्ज धर्मनिरेपक्षता के एक जीवंत प्रतीक थे। मुंबई में जार्ज का संघर्ष किसी फिल्म की कथा की तरह दिखाई देता है। अपने सपनों के लिए संघर्ष करने की जिद रखने वाले किसी भी व्यक्ति को यह शहर निराश नहीं करता। जार्ज को भी इस शहर ने सफलता की राह दिखाई। 1950 के आसपास मुंबई में दो बड़े मजदूर नेता थे, पी. डिमेलो और कॉमरेड श्रीपाद अमृत डांगे। सोशलिस्ट डिमेलो डॉ. राममनोहर लोहिया के साथी थे। डिमेलो ने जार्ज के गुणों को पहचाना और उन्हें अपने साथ ले लिया। शुरुआत में होटल मजदूर के रूप में काम करने वाले और फुटपाथ पर सोने वाले जार्ज ने इन असंगठित मजदूरों की ओर अपना ध्यान केंद्रित किया। होटल मजदूरों ने कभी सोचा भी नहीं था कि उनकी भी यूनियन हो सकती है। यही स्थिति टैक्सी चालकों और नगर निगम कर्मचारियों कि भी थी। उन्हें अपने अधिकारों का अहसास सबसे पहले जार्ज ने ही करवाया। लगभग दो लाख मजदूरों की यह ताकत थी। उनका संगठन बनाने के लिए जार्ज ने जो मेहनत की, वह बेमिसाल थी। रात-बेरात होटल कामगारों की सभाएं लेकर अल सुबह पहली पाली से पहले वे बेस्ट कामगारों की सभा के लिए डिपो में हाजिर हो जाते। सब से उपेक्षित सफाई कामगारों को उन्होंने आवाज दी। जब गरीब टैक्सी वालों को बैंकों से कर्ज नहीं मिलता था, तब उन्होंने सहकारी बैंक बनाई। आगे चलकर इन टैक्सी वालों के लिए उन्होंने पेट्रोल पंप भी कायम किए। इन प्रभावी यूनियनों से देश की आर्थिक राजधानी की नब्ज जार्ज के हाथ आई। वे कभी भी मुंबई के चक्के जाम कर सकते थे। अखबारों ने उन्हें 'बंद सम्राट' नाम दिया, लेकिन उन्होंने कभी भी अपनी ताकत का दुरुपयोग नहीं किया। उनके बंद में हिंसा के लिए कोई जगह नहीं थी। हड़ताल या आंदोलन को कितना खींचना चाहिए, इसकी उन्हें अचूक समझ थी। कई बार उनकी हड़तालों में फूट डालने के प्रयास किए गए। उन्हें कई बार जेल में भी बंद किया गया, लेकिन कभी फूट नहीं पड़ी। मजदूरों से उनका रिश्ता मजबूत था। बंद में हिंसा बाद में घुसी, बाल ठाकरे के उदय के बाद। जार्ज फर्नांडीस का लड़ाकू व्यक्तित्व हर किसी को आकर्षित करने वाला था। पुलिस की लाठी खाने वाला, फुटपाथ पर सोने वाला, मुंबई जैसे शहर के मेहनकश मजदूरों की संघर्षमय जिंदगी से परिचित, अनेक भाषाओं में सहज संवाद साधने वाला, सीधे सादे रहन-सहन और भारतीय राजनीति का अंतरंग समझने वाला जार्ज फर्नांडीस मुंबई के आम लोगों का अपना नेता बन गया । 1967 के लोकसभा चुनाव के बाद जार्ज फर्नांडीस सिर्फ मुंबई के ही नहीं, पूरे देश के हीरो बन गए। उन्होंने उस ज़माने में मुंबई के बेताज बादशाह कहलाने वाले एस.के. पाटिल को हराया था। पाटिल तब कांग्रेस के कोषाध्यक्ष थे। नेहरू के ज़माने से उनका प्रभाव अबाधित था। धन और गुंडों की बदौलत मुंबई पर उनकी जबर्दस्त पकड़ थी। तब एक अखबार को इंटरव्यू देते हुए पाटिल ने शेखी बघारी थी कि प्रत्यक्ष परमात्मा भी उनको हरा नहीं सकता। राजनीतिक पंडित भी मानते थे कि दक्षिण मुंबई से उनको हराना असंभव है। जार्ज ने कहा कि परमात्मा चाहे उनको पराजित न कर पाए, जनता उनको हरा सकती है। जार्ज ने उनके और राजनीतिक पंडितों के मुगालते ध्वस्त कर दिए और बता दिया कि जनता के बल पर चुनाव कैसे लड़ा जाता है। इस चुनाव में जार्ज का नेतृत्व और निखर गया। उनके प्रचार, संगठन कौशल और भाषण की कहानियां इसी चुनाव में देशभर में फैली। इस शानदार कामयाबी से उनकी आगामी राजनीतिक यात्रा का मार्ग प्रशस्त हुआ। वे 'जायंट किलर' कहलाए। भारतीय मानसिकता में सादगी का बड़ा महत्व है। यह विनम्र कथानायक ताजिंदगी सादगी की एक अनोखी मिसाल बना रहा। अपने कपड़े वे खुद धोते थे। खादी का कुरता और पायजामा और बाल ऐसे मानो उन्हें कंघे का स्पर्श कभी हुआ ही न हो। उनकी इस मूरत पर लोग मुग्ध थे। अपनी इस सादगी को उन्होंने जीवनभर कायम रखा। केंद्रीय मंत्री बनने के बाद भी कई बार वे अपनी कार खुद चलाते थे। उनकी जिंदगी एक खुली किताब थी। उनका साथ आनंददायी लगता था। कोई साधारण मजदूर हो या कोई बड़ा बुद्धिजीवी, जार्ज सभी के साथ सहज संवाद करते थे। उनके व्यक्तित्व की यह खासियत थी कि हरेक को वे अपने लगते थे। राष्ट्रीय स्तर पर जार्ज का सितारा चमका अभूतपूर्व रेल हड़ताल में। जून 1973 में वे नेशनल रेलवे मजदूर यूनियन के अध्यक्ष चुने गए। रेलवे कामगार लगातार लड़ रहे थे, लेकिन उनकी बुनियादी मांगें बार-बार ठुकराई जा रही थीं। 1960 की हड़ताल में पठानकोट में नौ कामगार शहीद हुए थे। 1968 की हड़ताल भी सत्ताधारियों ने कुचल दी थी। एनआरयूएम के अध्यक्ष चुने जाने के बाद जार्ज ने रेलवे कामगारों के देशभर के 52 सगठनों को राष्ट्रीय समन्वय समिति बनाकर एक जाजम पर एकजुट किया। 1974 में 22 लाख रेलवे कामगारों की अभूतपूर्व रेल-हड़ताल हुई, जिसने तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार की चूलें हिला दीं। कहा जाता है कि यह रेल हड़ताल ही इंदिरा गांधी के इमरजेंसी के फैसले का कारण बनी। लेकिन यह एकमात्र कारण नहीं था। 1973 से ही हालत बेकाबू हो रहे थे। गुजरात और बिहार के आन्दोलनों और जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में गोलबंद हो रहे देशव्यापी विरोध प्रदर्शनों से इंदिराजी बुरी तरह घिर चुकी थीं। संजय गांधी की युवा कांग्रेस ने उत्पात मचाया था। कोलकाता में जेपी की गाड़ी पर हमला किया गया। इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले से वे और असुरक्षित हो गईं और इन्होंने इमरजेंसी का ऐलान कर दिया । विपक्ष के तमाम नेता गिरफ्तार हुए, लेकिन जार्ज भूमिगत हो गए। उनकी योजना 1942 जैसा आंदोलन छेड़ने की थी, जिसकी परिणति बड़ोदा डायनामाइट कांड में हुई। लोकतंत्र को बचाने के लिए किसी भी हद तक जाने की उनकी तैयारी थी। उनका कहना था कि यह 'समय की मांग' है। अपवादात्मक परिस्थितियों में ऐसे फैसले करने पड़ते हैं। 1977 में यदि जनता पार्टी सत्ता में नहीं आती तो जार्ज को फांसी दी जाती, वे शहीद हो गए होते। राजद्रोह सहित कई गंभीर आरोप उन पर लगाए गए थे। इंदिरा गांधी ने इस बात का पूरा बंदोबस्त कर रखा था कि वे किसी भी तरह बच नहीं पाएं। जार्ज के मन में यह बात घर कर गई। इंदिराजी की मृत्यु के बाद भी उनके मन में बसा शत्रुत्व का विष कायम रहा। सिर्फ इंदिरा की जगह सोनिया ने ली। संघ परिवार ने इसी का भरपूर फायदा उठाया। 1977 के बाद जार्ज के जीवन में नया मोड़ आया जब वे जेल में होते हुए चुनाव जीते। तब उनकी लोकप्रियता आसमान छू रही थी। जनता पार्टी की सरकार में वे मंत्री बने ।1979 में जब जनता सरकार गिरी, तब वे लोगों की निगाह में खलनायक बन गए। लोकसभा में उन्होंने मोरारजी सरकार के पक्ष में भाषण किया और दूसरे दिन ही पलटी मारकर विरोधी खेमे में शामिल हो गए। जया जेटली ने अपने आत्मचरित्र में लिखा है कि ऐसा करने के लिए उन्हें मधु लिमये ने बाध्य किया था। यह सही भी हो तो भी निर्णय लेने की जवाबदारी जार्ज की ही थी। जनता पार्टी के गठन के समय जार्ज सोशलिस्ट पार्टी का उसमें विलय करने के पक्ष में नहीं थे। मंत्री बनने को लेकर भी उनका विरोध था। आगे चलकर वे तीन बार मंत्री बने। पहले जनता सरकार में उद्योग, वीपी सिंह सरकार में रेलवे और वाजपेयी सरकार में वे रक्षा मंत्री बने। इन सभी मंत्रालयों में उन्होंने अपनी छाप छोड़ी। कोकाकोला और आईबीएम को देश से बाहर करने का उनका फैसला साहसिक था तो कोंकण रेलवे के निर्माण का फैसला रचनात्मक। रक्षामंत्री के रूप में वे जवानों में भारी लोकप्रिय थे, लेकिन नौकरशाहों में उनके प्रति नाराजी थी। लीक से हटकर काम करने वाला व्यक्ति यथास्थितिवादियों को कभी रास नहीं आता। जार्ज को बदनाम करने के लिए एक बड़ा अभियान चलाया गया। तहलका और ताबूतों के मामले में उन्हें फंसाया गया। इन बातों से उनके मन में बेचैनी थी। वे अजीब उलझन में फंसे थे। एक तरफ सत्ता में उनका मन नहीं लगा रहा था तो दूसरी ओर वे उसे छोड़ भी नहीं पा रहे थे। मंत्री होने के बावजूद उन्होंने म्यांमार के मानवाधिकारवादियों को अपने घर में आसरा दिया था। यह आपत्तिजनक था, लेकिन यही असली जार्ज थे। भाजपा के साथ गठजोड़ करना जार्ज की राजनीतिक जरूरत थी। बिहार की मंडलोत्तर राजनीति में वे अप्रासंगिक हो गए थे। लालू यादव से पंगा लेकर उन्होंने नीतीश कुमार का पक्ष लिया। लालू लगातार तीन विधानसभा चुनाव जीते थे। नितीश के साथ उन्होंने समता पार्टी बनाई। उन्होंने कहा था कि यदि समता पार्टी भाजपा के साथ नहीं जाती तो लालू हमें ख़त्म कर देता। भाजपा के साथ गठजोड़ कर जार्ज ने अपनी राजनीतिक उम्र दस साल और बढ़ा ली। कई बार वे एनडीए के संकटमोचक भी बने, लेकिन इस कालखंड में उनके भीतर का समाजवादी लड़ाकूपन ख़त्म हो गया। जार्ज के चाहने वालों में उनकी छवि तब ध्वस्त हो गई, जब उन्होंने ग्रैहम स्टेन्स हत्याकांड में संघ परिवार को बचाने का प्रयास किया। 2002 के गुजरात दंगों के दौरान उन्होंने जिस तरह नरेंद्र मोदी का समर्थन किया, उससे भी उनके प्रशंसकों को झटका लगा। बाबरी मस्जिद को गिराने की उन्होंने निंदा की थी। 1993 के मुंबई दंगों के वक्त वे शांति कायम करने के लिए बस्तियों में उन्होंने पदयात्रा भी की थी। उनसे स्पष्ट भूमिका निभाने की अपेक्षा थी, लेकिन उन्होंने धर्माध तत्वों का साथ दिया। असली जार्ज तभी समाप्त हो गए थे। जार्ज फर्नांडीस का लगभग एक दशक स्मृतिलोप अवस्था में बीता। सतत लोगों के बीच रहने वाला यह ऊर्जावान नेता अपने अंतिम समय में अकेला था। विनम्र श्रद्धांजलि।