मार्च 2019

देश के मौजूदा हालात में दो प्रासंगिक कविताएं

रविवार डेस्क

युद्ध होना चाहिए

मंजुल भारद्वाज युद्ध होना चाहिए क्योंकि युद्ध से वीरता प्रमाणित होती है युद्ध होना चाहिए कायरता का दाग मिटाने के लिए युद्ध होना चाहिए क्योंकि युद्ध से राष्ट्रभक्ति सिद्द होती है युद्ध होना चाहिए क्योंकि दुश्मन को मिटाना है युद्ध होना चाहिए क्योंकि सत्ता हासिल करनी युद्ध होना चाहिए क्योंकि हथियार बनाने वाले देशों को हथियार बेचने हैं युद्ध होना चाहिए क्योंकि मेरे अंदर का पशु चाहता है युद्ध तब तक होते रहना चाहिए जब तक मेरे भीतर इंसान होने की चेतना परास्त ना हो जाए युद्ध तब तक होना चाहिए जब तक मेरे भीतर का पशु हिंसा की जय जयकार में पागल हो दुनिया को नेस्तनाबूद ना कर दे युद्ध होना चाहिए जब तक सत्ता अपनी कमजोरियां छुपा ना ले युद्ध होना चाहिए जब तक माताएं सन्तान पैदा करती रहें युद्ध होना चाहिए जब तक बच्चे भूखे मरते रहें युद्ध होना चाहिए जब तक माथे का सिंदूर उजड़ता रहे युद्ध होना चाहिए जब तक एक भी सर जिंदा है युद्ध होना चाहिए क्योंकि दुश्मन चाहता है युद्ध होना चाहिए बदला लेने के लिए युद्ध होना चाहिए क्योंकि भीड़ चाहती है युद्ध हो युद्ध पराक्रम,शौर्य की गाथा है युद्ध हो क्योंकि कुरुक्षेत्र हुआ था युद्ध हो क्योंकि 'कलिंग'हुआ था युद्ध हो क्योंकि मानवता हार गई है युद्ध हो क्योंकि सभ्यताएं पाखंड हैं युद्ध हो क्योंकि अहिंसा,शांति,पाखंड हैं युद्ध हो जब तक एक भी जीवित है युद्ध हो... युद्ध होना चाहिए? -- देश कागज पर बना नक्शा नहीं होता सर्वेश्वर दयाल सक्सेना 'यदि तुम्हारे घर के एक कमरे में आग लगी हो तो क्या तुम दूसरे कमरे में सो सकते हो? यदि तुम्हारे घर के एक कमरे में लाशें सड़ रहीं हों तो क्या तुम दूसरे कमरे में प्रार्थना कर सकते हो? यदि हाँ तो मुझे तुम से कुछ नहीं कहना है। देश काग़ज़ पर बना नक्शा नहीं होता कि एक हिस्से के फट जाने पर बाकी हिस्से उसी तरह साबुत बने रहें और नदियाँ, पर्वत, शहर, गाँव वैसे ही अपनी-अपनी जगह दिखें अनमने रहे। यदि तुम यह नहीं मानते तो मुझे तुम्हारे साथ नहीं रहना है। इस दुनिया में आदमी की जान से बड़ा कुछ भी नहीं है न ईश्वर न ज्ञान न चुनाव काग़ज़ पर लिखी कोई भी इबारत फाड़ी जा सकती है और ज़मीन की सात परतों के भीतर गाड़ी जा सकती है। जो विवेक खड़ा हो लाशों को टेक वह अन्धा है जो शासन चल रहा हो बन्दूक की नली से हत्यारों का धन्धा है यदि तुम यह नहीं मानते तो मुझे अब एक क्षण भी तुम्हें नहीं सहना है। याद रखो एक बच्चे की हत्या एक औरत की मौत एक आदमी का गोलियों से चिथड़ा तन किसी शासन का ही नहीं सम्पूर्ण राष्ट्र का है पतन। ऐसा ख़ून बहकर धरती में जज़्ब नहीं होता आकाश में फहराते झंडों को काला करता है। जिस धरती पर फौजी बूटों के निशान हों और उन पर लाशें गिर रही हों वह धरती यदि तुम्हारे ख़ून में आग बन कर नहीं दौड़ती तो समझ लो तुम बंजर हो गये हो – तुम्हें यहाँ साँस लेने तक का नहीं है अधिकार तुम्हारे लिए नहीं रहा अब यह संसार। आख़िरी बात बिल्कुल साफ़ किसी हत्यारे को कभी मत करो माफ़ चाहे हो वह तुम्हारा यार धर्म का ठेकेदार , चाहे लोकतंत्र का स्वनामधन्य पहरेदार।'