मार्च 2019

सुरक्षा बलों को जय-जयकार से ज्यादा न्याय की दरकार

रोहन शर्मा

जब भी किसी मामले में सेना की किसी लापरवाही या गलती पर कोई सवाल उठाता है तो उसे नसीहत दी जाती है कि वह सेना का सम्मान करे। कभी-कभी तो सवाल करने वालों को देश-विरोधी करार देने में भी देर नहीं की जाती। लेकिन जब भी आतंकवादियों और माओवादियों के हमले में या सीमा पर छिटपुट झडपों में सुरक्षा बलों के जवान शहीद होते हैं तो उनके तथा उनके परिजनों के साथ होने वाला सरकारी सुलूक सारी सेना-भक्ति की कलई खोलना शुरू कर देता है।

दो साल पहले 9 जनवरी, 2017 को सीमा सुरक्षा बल यानी बीएसएफ के एक जवान तेज बहादुर यादव ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो अपलोड कर जवानों को घटिया भोजन दिए जाने की शिकायत की थी। उन्होंने कहा था कि सरकार तो सैनिकों के लिए आवश्यक वस्तुएं उपलब्ध करवाती है, लेकिन उच्चाधिकारी इन्हें अवैध ढंग से बाजार में बेच देते है और इसका ख़ामियाजा निचले स्तर पर जवानों को भुगतना पड़ता है। तेज बहादुर जम्मू कश्मीर के पुंछ सेक्टर में नियंत्रण रेखा यानी एलओसी पर तैनात बीएसएफ की टुकडी का हिस्सा थे। उन्होंने वीडियो में आरोप लगाया था कि उन्हें पानी जैसी पतली दाल परोसी जाती है, जिसमें सिर्फ हल्दी और नमक होता है तथा इसके साथ जली या अधपकी रोटियां दी जाती हैं। तेज बहादुर का यह वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुआ था। मामले इतना तूल पकडा था कि केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह को पूरे मामले की जांच का आदेश देना पडा था। इसी दौरान बीएसएफ के अफसरों की ओर से तेज बहादुर को प्रताडित करने का सिलसिला शुरू हुआ। तेज बहादुर ने परेशान होकर वीआरएस स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति के लिए आवेदन किया, जिसे खारिज कर दिया गया। बीएसएफ की ओर से कहा गया कि तेज बहादुर जांच का अहम हिस्सा हैं, लिहाजा जांच पूरी होने तक वे बीएसएफ नहीं छोड सकते। करीब तीन महीने बाद बीएसएफ की ओर से गृह मंत्रालय को जांच रिपोर्ट भेजी गई, जिसमें तेज बहादुर की खराब भोजन दिए जाने की शिकायत को गलत बताते हुए उसे गंभीर अनुशासनहीनता का दोषी करार दिया गया। चूंकि मामले की जांच करने वाले बीएसएफ के ही आला अफसर थे और तेज बहादुर का आरोप भी उन्हीं पर था, लिहाजा जांच का निष्कर्ष यही निकलना था। बहरहाल जांच पूरी होने के चंद दिनों बाद यानी 19 अप्रैल, 2017 को तेज बहादुर को बीएसएफ से बर्खास्त कर दिया गया। बर्खास्तगी संबंधी आदेश में कहा गया कि तेज बहादुर ने आधारहीन आरोपों से सेना की छवि को नुकसान पहुंचाया है। सरकारी तंत्र और सुरक्षा बलों के अफसरों ने यह संवेदनहीनता एक कार्यरत जवान के साथ बरती। ऐसे में अंदाजा लगाया जा सकता है कि सेवा निवृत्त हो चुके जवानों या शहीद जवानों के परिवारजनों को अपने जायज हकों को हासिल करने के लिए किस तरह की दुश्वारियों का सामना करना पडता होगा। उनके साथ सरकारी तंत्र और सैन्य बलों के आला अफसर किस तरह पेश आते होंगे। हमारी सरकारें और उनका राजनीतिक नेतृत्व वर्ग अपने भाषणों में तो सैन्य बलों को लेकर खूब चिंतित और संवेदनशील दिखाई देता है। खासकर मौजूदा सरकार और सत्तारूढ दल के नेता तो सेना से अपने लगाव को प्रदर्शित करने का कोई मौका नहीं गंवाते हैं। जब भी किसी मामले में सेना की किसी लापरवाही या गलती पर कोई सवाल उठाता है तो उसे नसीहत दी जाती है कि वह सेना का सम्मान करे और सवाल उठाकर उसका मनोबल कमजोर न करें। कभी-कभी तो सवाल करने वालों को देश-विरोधी करार देने में भी देर नहीं की जाती। मीडिया के एक बडे हिस्से से भी इसी तरह के सुर निकलते हैं। लेकिन जब भी आतंकवादियों और माओवादियों के हमले में या सीमा पर पाकिस्तानी और चीनी सेना के साथ होने वाली छिटपुट झडपों में सुरक्षा बलों के जवान शहीद होते हैं तो उनके तथा उनके परिजनों के साथ होने वाला सरकारी सुलूक सारी सेना-भक्ति की कलई खोलना शुरू कर देता है। कभी देखने में आता है कि शहीद जवानों के शव गत्ते के बक्सों में रखकर उनके घर तक पहुंचाए दिए जाते हैं तो कभी शहीद के परिजनों को तात्कालिक तौर पर राहत राशि और फिर मुआवजा राशि देने में कोताही बरती जाती है। शुरुआत होती है मारे गए जवानों को शहीद का दर्जा देने के मामले से। मौजूदा नियमों के तहत सिर्फ सेना के जवानों को ही मारे जाने पर आधिकारिक तौर पर शहीद का दर्जा दिया जाता है। सरकार श्रेणियों के तहत सेना के अलावा अन्य सुरक्षा बलों को अर्धसैनिक बल माना और कहा जाता है। हालांकि ये अर्धसैनिक बल भी लडते हैं पूर्ण सैनिकबलों यानी सेना की तरह ही। बल्कि एक तरह से ये तो हमेशा ही युद्धरत रहते हैं- कभी आतंकवादियों के खिलाफ तो कभी माओवादियों और कभी पूर्वोत्तर के उग्रवादी संगठनों के मुकाबिल। इस युद्ध में मारे जाने वाले जवानों को सरकार के मुखिया से लेकर मंत्री, तमाम राजनेता, मीडिया और आम लोग तक भले ही शहीद कहते-बताते रहे, मगर सरकारी तंत्र उन्हें शहीद नहीं मानता' इसीलिए उनके परिजनों को मुआवजा राशि सहित दूसरी सारी सुविधाएं भी शहीद माने जाने सैनिकों के परिजनों की तरह नहीं मिलतीं। यही नहीं, अर्धसैनिक बलों के सेवानिवृत्त जवानों और शहीदों के परिजनों को पहले जो पेंशन मिलती थी, वह भी केंद्र सरकार ने 2004 से बंद कर दी है। जहां तक शहीद जवानों के आश्रितों को मुआवजा राशि और उनके परिवार के किसी सदस्य को सरकारी नौकरी देने तथा उनके बच्चों की शिक्षा संबंधी व्यवस्था का सवाल है, इस बारे में राष्ट्रीय स्तर पर केंद्र और राज्य सरकारों के एकरुपता लिए हुए कोई तयशुदा मापदंड नहीं हैं। यही वजह है कि किसी राज्य में शहीद जवान के आश्रितों दस लाख रुपए तो किसी राज्य में 25-50 लाख और एक करोड रुपए तक दिए जाते हैं। किसी आश्रित परिजन को सरकारी नौकरी या बच्चों की शिक्षा आदि के बारे में भी कोई स्पष्ट नीति नहीं हैं। यह मामला सरकारों के विवेक और संवेदशीलता पर निर्भर रहता है। एक नंगी सचाई यह भी है कि इस मामले में शहीद की जाति, मजहब और क्षेत्रीयता की भी अहम भूमिका होती है। शहीदों के परिजनों की तरह ही सेवानिवृत्त जवान भी सरकारों की भेदपूर्ण नीतियों के शिकार हैं। उनकी वर्षों पुरानी मांग है कि मिलिट्री सर्विस-पे की तर्ज पर अर्ध सैनिक बलों के जवानों को भी पैरा मिलिट्री सर्विस-पे दी जाए, सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों के आधार पर वन रैंक वन पेंशन लागू की जाए, हर राज्य में केंद्रीय अर्धसैनिक कल्याण बोर्ड की स्थापना हो, शहीद के आश्रित परिवार को मुआवजे के तौर पर एक करोड रुपए तथा परिवार के पुनर्वास की व्यवस्था हो और पुणे के सैनिक स्कूल की तर्ज पर हर राज्य में अर्धसैनिक स्कूल, इंजीनियरिंग तथा मेडिकल कॉलेज और हर राज्य के तमाम जिलों में डिस्पेंसरी की स्थापना की जाए। अर्धसैनिक बलों के जवानों की तमाम दुश्वारियां और अपेक्षाएं पुरानी हैं लेकिन पुलवामा कांड ने उन्हें गहराई से रेखांकित किया है। सवाल यही है कि युद्धोन्माद के शोर में क्या सरकार इस ओर ध्यान देगी या सिर्फ सेना का मुंहजुबानी गुणगान ही करती रहेगी?