मार्च 2019

पुलवामा पर सवालों से मुंह चुराती सरकार

उर्मिलेश

तथ्य बताते हैं कि सरकार और सत्ताधारी पार्टी ने सिर्फ सीमित और संकीर्ण स्वार्थ के लिए कश्मीर को अपनी राजनीति का खिलौना बना दिया। अगला चुनाव जीतने के लिए मंदिर-मस्जिद से भी टेंपो नहीं बन रहा था, विपक्षियों पर थोपे जा रहे मुकदमों से भी बात नहीं बन रही थी, गोरक्षा और माब-लिंचर्स भी काम नहीं आ रहे थे, तो खोज लिया गया कश्मीर। पाकिस्तान-परस्त आतंकियों ने मौका भी दे दिया।

पुलवामा और उसके बाद के हालात पर अब तक काफी कुछ कहा और लिखा जा चुका है। पर सरकार और सत्ताधारी दल अब भी पुलवामा के आतंकी हमले के चुनावी इस्तेमाल में जुटे हुए हैं। भावनात्मक मुद्दों के राजनीतिक इस्तेमाल में मोदी-शाह की जोड़ी का कोई जोड़ नहीं। तीन तरह के मुद्दों के इस्तेमाल में इनकी खासतौर पर विशेषज्ञता है। पहला-धर्म-संप्रदाय से जुड़ा मुद्दों के इस्तेमाल में, दूसरा-अपनी विफलताओं को कामयाबी बताने के मामले में तीसरा, हिंसा-उग्रवाद-आतंक आदि के इस्तेमाल में। कोई घटना, चाहे वह दुर्घटना ही क्यों न हो, अगर उसमें कहीं से धर्म-संप्रदाय का कोई एंगल दिख जाये तो मौजूदा सत्ताधारी उसका फौरन इस्तेमाल करते हैं—उदाहरण गोधरा था, जिससे गुजरात में अभूतपूर्व दंगे करा दिये गए। गोधरा में ट्रेन के डिब्बे में आग लगने की घटना को वहां के तत्कालीन आयुक्त ने एक दुर्घटना बताया था। पर कुछ ही घंटे बाद सत्ताधारी दल ने उसे षड्यंत्र बताकर पूरे राज्य में मुसलमानों के खिलाफ हिंसा का तांडव शुरू करा दिया। अपनी विफलताओं को भी कोई नेता या दल कैसे अपनी कामयाबी का स्मारक बनाते हैं, इसका बेजोड़ उदाहरण है-नोटबंदी! तीसरा उदाहरण है, आतंक-उग्रवाद! दूर क्यों जायें--ताजा उदाहरण है-पुलवामा। आतंकी हमला होते ही उसका राजनीतिक इस्तेमाल शुरू आतंकी हमला 14 फरवरी को हुआ। तब से अब तक भाजपा और केंद्र सरकार के शीर्ष नेता कभी शोक की मुद्रा में नहीं दिखे। पहले दिन प्रधानमंत्री मोदी जिम कार्बेट पार्क में एक मशहूर कंपनी की किसी टीवी फिल्म की शूटिंग में व्यस्त बताए गए। इस शूटिंग की उनकी कुछ तस्वीरें भी सोशल मीडिया पर आ गईं। उत्तर प्रदेश-उत्तराखंड से छपने वाले एक प्रमुख हिन्दी अखबार में भी तस्वीर के साथ रिपोर्ट छपी। कुछ समय बाद हिन्दी-अंग्रेजी के कुछ चैनलों ने कांग्रेस पार्टी के प्रवक्ता की आधिकारिक प्रेस कॉन्फ्रें स के हवाले इस खबर को प्रसारित किया। खबर के मुताबिक पुलवामा आतंकी हमला 14 फरवरी को दोपहर बाद 3.10 बजे हो चुका था। फिर भी देश के प्रधानमंत्री उत्तराखंड स्थित जिम कार्बेट पार्क में नौकायन और फिल्म शूटिंग में व्यस्त रहे। शाम 5.32 बजे उन्होंने उत्तराखंड में ही आयोजित एक रैली को मोबाइल फोन के जरिये संबोधित किया। पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह दक्षिण की किसी रैली में थे। अब भाजपा प्रवक्ता बता रहे हैं कि प्रधानमंत्री को उस दिन पुलवामा आतंकी हमले की सूचना देरी से मिली, क्योंकि खराब मौसम के चलते संचार तंत्र ठीक से काम नहीं कर रहा था। बेचारे भारत संचार निगम लिमिटेड (बीएसएनएल) को दोषी ठहराया गया। लगता है, सरकारी फोन कंपनी को और चूना लगाया जायेगा! बहरहाल, उस दिन और उसके बाद पार्टी की सारी चुनावी रैलियां, सरकार के उद्घाटन-शिलान्यास समारोह, नेताओं के ठहाके और परदेस के नेताओं के साथ जलसे जारी रहे। कौन करे यह सवाल, क्या सत्ता वाकई शोक में थी? सरकार के मंत्रियों और सत्ताधारी दल के शीर्ष नेताओं ने मारे गये जवानों को बार-बार 'शहीद' कहा, जबकि सरकारी कागजात में वे शहीद कभी नहीं माने गए। कुछ महीने पहले, लखनऊ में एक पुलिस वाले की बदमिजाजी में मारे गए एपल कंपनी के एक एक्जीक्यूटिव विवेक तिवारी के परिजन के प्रति मेरी पूरी हमदर्दी है। पर मोदी साहब और शाह जी, क्या यह बताने का कष्ट करेंगे कि पुलवामा में मारे गये जिन जवानों को वे लगातार 'वीर शहीद' और 'देश का सपूत' बताते आ रहे हैं, उनके परिजन को दिवंगत विवेक तिवारी के परिजन को दिये गये सरकारी मुआवजे के बराबर का मुआवजा भी क्यों नहीं मिला? फिर बार-बार वीर जवानों की शहादत पर कर्मकांडी-विलाप क्या सिर्फ चुनाव के लिए नहीं है? ठीक वैसे ही जैसे सन् 1999 के 'करगिल युद्ध' में मारे गये हमारे जवानों के ताबूतों के जुलूस निकाले गये थे, खासकर देश के उत्तरी और मध्यवर्ती हिस्से में 'वीर सैनिकों की शहादत' को लेकर जबर्दस्त भावनात्मक माहौल बनाया गया। उसका नतीजा भी सामने आया। तत्कालीन प्रधानमंत्री वाजपेयी ने अगला लोकसभा चुनाव जीतकर फिर से अपनी सरकार बनाई और उसने कार्यकाल पूरा किया। जांच का क्या हुआ? आतंकी हमले के सप्ताह भर से ज्यादा हो गए। पर सरकार ने आज तक सीआरपीएफ काफिले की सुरक्षा में चूक के लिए किसी अफसर, मंत्री, सलाहकार या शासकीय इकाई को जिम्मेदार पाया? हमले की शाम ही, जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने मीडिया को बताया था कि सीआरपीएफ काफिले की सुरक्षा में ढील के अलावा खुफिया सूचना के नजरंदाज करने का मामला भी उनके संज्ञान में आया है। इसकी पड़ताल कराई जायेगी। आज तक कोई पड़ताल हुई कि नहीं, किसी को पता नहीं चला! किसी की जवाबदेही भी तय नहीं हुई। किसी ने नैतिकता के आधार पर भी अपने को जिम्मेदार नहीं माना। याद है न 26/11 कहे जाने वाले मुंबई के 2008 के आतंकी हमले के लिए केंद्रीय गृह मंत्री शिवराज पाटिल और महाराष्ट्र के तत्कालीन गृहमंत्री आर आर पाटिल सहित कइयों को इस्तीफा देना पड़ा था। आतंकी हमले और मुबंई स्थित उक्त होटल के अपने विजिट को लेकर उठे विवादों के बाद राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख को भी जाना पड़ा था। प्रधानमंत्री मोदी जी के शब्दों में उन दिनों देश के प्रधानमंत्री 'मौनमोहन' सिंह थे। अब हमारे प्रधानमंत्री मोदी हैं, जो काफी मुखर और बहुत गतिशील माने जाते हैं। पर उनकी सरकार में ऐसे बड़े आतंकी मामलों में सुरक्षा या खुफिया चूक पर किसी की जवाबदेही नहीं तय होती! आतंकवाद से लड़ रहे हैं या कश्मीर और कश्मीरियों से? 14 फरवरी को ही यह बात साफ हो गई कि आतंकी हमला जैश-ए-मोहम्मद नामक आतंकी संगठन ने कराया है। इस संगठन को पाकिस्तान की शह है। इसका कमांडर वही मसूद अजहर है, जिसे वाजपेयी सरकार ने एक अपह्रत भारतीय विमान को अपहरणकर्ताओं से छुड़ाने के एवज में अफगानिस्तान के कंधार में रिहा किया था। एक कश्मीरी युवक को फिदायीन हमलावर बताया गया। पूरे देश ने इसे सच माना। पर आज तक किसी को पता नहीं चला कि उक्त आतंकी हमले के लिए आम कश्मीरियों को उनके घरों, कॉलेजों-विश्वविद्यालयों-बाजारों में क्यों निशाना बनाया जा रहा है? यह किसके इशारे पर हो रहा है? आगरा सहित कई शहरों के होटलों में 'यहां कश्मीरियों के लिए कोई जगह नहीं है' की तख्तियां लग गईं हैं। सन् 1990 से आज तक कश्मीर में सभी तरह के लोगों को मिलाकर 40 हजार से अधिक मारे जा चुके हैं। क्या कभी कश्मीर के किसी होटल में ऐसी तख्ती लगी कि कश्मीर से बाहर के अन्य़ इंडियन्स- श्रीनगर, गुलमर्ग, पहलगांव, बारामूला के होटलों में 'एलाउड' नहीं हैं। फिर सोचिए, बदमिजाज, ज्यादा उग्र, ज्यादा प्रतिक्रियावादी कहां हैं? यूपी में इन्हें इतना उग्र और प्रतिक्रियावादी कौन बना रहा है? पहले तो ऐसा कभी नहीं होता था! यूपी,राजस्थान सहित कई प्रदेशों में ऐसे कॉलेजों-होटलों के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई, जो कश्मीरी छात्रों को अपने यहां से हटा रहे हैं या उत्पीड़ित कर रहे हैं? संघ-समर्थकों, बीएचपी और एबीवीपी के उन कार्यकर्ताओं के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई, जो बाजारों में कश्मीरी लोगों या होस्टलों-कालेजों में घुसकर कश्मीरी छात्रों को मार-पीट रहे हैं? राजनाथ जी, एक भी उदाहरण है-कार्रवाई का? आखिर भारत अब भी एक जवाबदेह संवैधानिक लोकतंत्र है या 'रामराज्य' आ चुका है या 'बनाना रिपब्लिक' बन चुका है? क्या सरकार ने कश्मीर को भारत से बाहर का इलाका मान लिया? कश्मीरियों पर हो रहे अन्याय पर किस देश की सरकार कार्रवाई करेगी? छत्तीसगढ़ में सन् 2010 में 76 सीआरपीएफ जवान मारे गये थे। देश के अन्य हिस्सों में वहां के लोगों के बारे में तो ऐसा रुख नहीं दिखा? आग की जरूरत है या समझ और कूटनीति की? पुलवामा हमले के कुछ दिन बाद एक रैली में पीएम मोदी ने लोगों को इंगित कर कहा, 'जो आग आपके सीने में है, वही आग में मेरे सीने में भी है।' मोदी जी, आप भारत जैसे बड़े देश के ऐसे प्रधानमंत्री हैं, जिसने संविधान की शपथ ली है। सड़क या गली में आग भड़काते लोगों की तरह आप अपने सीने में आग की बात क्यों कर रहे हैं? शुक्र मनाइए कि उस प्रदेश में कुछेक जगहों पर कश्मीरियों के खिलाफ हिंसा जरूर हुई, पर लोगों ने आग ज्यादा नहीं भड़कने दी। एक राज्यपाल हैं-मेघालय के। नाम है तथागत राय। इनके भड़काऊ भाषणों की लंबी फेहरिश्त है। पर केंद्र के चहेते इस राज्यपाल ने तो किसी सड़क-छाप उपद्रवी की तरह बयानबाजी की और केद्र मुस्कराता रहा। स्वस्थ आलोचना सुनकर बीते पांच सालों में न जाने कितने संपादकों-एंकरों की नौकरियां जा चुकी हैं, वे तो प्राइवेट सेक्टर के थे। दूसरी तरफ पर्दे पर दंगा और युद्ध सजाने वाले एंकरों की चांदी ही चांदी। पर यहां तो मैं संवैधानिक पद पर आसीन एक राज्यपाल की बात पूछ रहा हूं। इतने भयानक बयान के बाद भी वह पदासीन कैसे है? क्या इससे साबित नहीं होता कि सब गोलमाल है। संवैधानिकता का सत्यानाश किया जा चुका है! राजभवन संविधान से नहीं, 'गणवेश' से चल रहा है! अमन और शांति की तरफ बढ़ते कश्मीर को किसने पटरी से उतारा! सरकार के मंत्री और सरकारी आंकड़े भी मानते हैं कि सन 2004 से सन् 2013 के बीच कश्मीर आहिस्ते-आहिस्ते पटरी पर आया था। आतंक और हिंसा में कमी आई। कश्मीरी अवाम राष्ट्रीय मुख्यधारा से जुड़ती नजर आई। आज कश्मीर शांति और सद्भाव की पटरी से उतर चुका है। मुख्यधारा में शामिल अनेक चमकदार कश्मीरी सितारे दुखी होकर अलगाव में पड़ गये। शाह फैजल आईएएस में अपने बैच के टापर थे। पर उन्होंने आईएएस की नौकरी छोड़ दी। यह सब इसी राज में हुआ। समझ में नहीं आता, सरकार पाकिस्तान को अलग-थलग करना चाहती है या कश्मीर को और कश्मीरियों को? वह पाकिस्तान-परस्त आतंकियों से लड़ना चाहती है या एमबीए-एमटेक करके भारत की विशाल युवा शक्ति में शामिल होकर बेहतर जीवन जीने का सपना देखते कश्मीरी युवाओं से? यही वो पीढ़ी है, जो कश्मीर से आतंक मिटा सकती है, वहां जीवन को सहज, शांत और सुंदर बना सकती है। लेकिन सरकार की मौजूदा कश्मीर नीति ने ऐसी विशाल कश्मीरी युवा शक्ति को न केवल निऱाश किया है, अपितु भारतीय राष्ट्र-राज्य से नाराज भी किया है। आप सोचिए, इस सरकार ने भारत का भला किया या भारी नुकसान? मजे की बात है कि मौजूदा सरकार के कार्यकाल में सैन्य बजट के तहत कश्मीर पर होने वाले सुरक्षा सम्बन्धी खर्च के अलावा केंद्र सरकार ने बीते पौने पांच सालों में सुरक्षा बलों आदि पर बेतहाशा खर्च किया। सन् 2016-17 में बीते तीस सालों के दरमियान सबसे ज्यादा खर्च किया गया। उक्त अवधि में सुरक्षा बलों के लिए अतिरिक्त खर्च 1185 करोड़ रहा। सन् 2017-18 में यह रकम 660 करोड़ रही। राहत-पुनर्वास का बजट इसके अलावा है। पर सरकार की उपलब्धियां क्या रहीं? सन् 2014 से अब तक कश्मीर में 1513 लोग मारे जा चुके हैं। इनमें जवानों की संख्या 404 बताई गई है। करगिल युद्ध में मारे गए जवानों की संख्या अधिकृत तौर पर 527 बताई गई थी। कैसी विडम्बना है, किसी युद्ध के बगैर मोदी सरकार के कार्यकाल में अब तक कश्मीर में 404 जवान मारे जा चुके हैं। तथ्य बताते हैं कि सरकार और सत्ताधारी पार्टी ने सिर्फ सीमित और संकीर्ण स्वार्थ के लिए कश्मीर को अपनी पालिटिक्स का खिलौना बना दिया। अगला चुनाव जीतने के लिए मंदिर-मस्जिद से भी टेंपो नहीं बन रहा था, विपक्षियों पर थोपे जा रहे मुकदमों से भी बात नहीं बन रही थी, गोरक्षा और माब-लिंचर्स भी काम नहीं आ रहे थे। तो खोज लिया गया कश्मीर। पाकिस्तान-परस्त आतंकियों ने मौका भी दे दिया। हम अमेरिकी एकेडमिशियन क्रिस्टीन फेयर की तरह यह तो नहीं कहते कि 'कहीं पाकिस्तान की तरफ से अगले चुनाव में मौजूदा सत्ताधारी दल को जिताने की यह कोई व्यूह-रचना है', पर एक बात तो साफ दिख रही है कि सरकार, सत्ताधारी दल और संघ परिवार ने पुलवामा के बाद कश्मीर के खिलाफ देश के बड़े हिस्से(आमतौर पर दक्षिणी राज्यों की जनता इस तरह की बदमिजाजी नहीं दिखाती!) को खड़ा करने की हर संभव कोशिश की है। कश्मीर और कश्मीरियों के खिलाफ बोलना अब देशभक्त होने की बुनियादी शर्त बन गया है। हिन्दी-अंग्रेजी के तमाम चैनल इस विभाजनकारी एजेंडे के संवाहक और प्रचारक बने हुए हैं। देशद्रोही न कहलाने लगें, इस डर में हाल तक बहुत सारे विपक्षी दल खामोश थे। उऩकी खामोशी देश और समाज पर भारी पड़ी। अब वो धीरे-धीरे बोलने लगे हैं। आज बोलना जरूरी है, क्योंकि खामोश रहे तो जनतंत्र हमेशा के लिए खामोश कर दिया जायेगा। राजनीतिक समाधान की कितनी कोशिश हुई? सेना के जिस जनरल की अगुआई-देखरेख में सितम्बर, 2016 में वह बहुचर्चित सर्जिकल स्ट्राइक हुई थी, उन्हीं ले. जनरल (रिटा.) डी एस हुड्डा ने बार-बार कहा कि कश्मीर में सेना अपना काम करती आ रही है। पर कश्मीर का मसला बुनियादी तौर पर राजनीतिक है। इसके समाधान के लिए राजनीतिक स्तर पर प्रयास होने चाहिए। क्या कोई बता सकता है, मौजूदा सरकार ने कश्मीर के राजनीतिक समाधान के लिए बीते पौने पांच साल में क्या-क्या कदम उठाए? (लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राज्यसभा टीवी के पूर्व कार्यकारी संपादक हैं। कश्मीर पर उनकी दो पुस्तकें-झेलम किनारे दहकते चिनार और कश्मीरः विरासत और सियासत प्रकाशित हैं)