मार्च 2019

इन हालात के लिए मोदी हमेशा याद किए जाएंगे

अनिल सिन्हा

कश्मीर में सुरक्षा बल के 49 जवानों की मौत के बाद भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह देश में जगह-जगह चुनावी सभाएं कर रहे हैं और डींगे हांक रहे हैं। वे चाहे जो कहे लेकिन सच्चाई यही है कि शेष भारत ने कश्मीर के आम लोगों का भरोसा खो दिया है। यही नहीं, हम उन्हें देश की मुख्यधारा में लाने के रास्ते भी एक-एक करके बंद करते जा रहे हैं। कश्मीर के हालात को बद से बदतर बनाने के लिए सिर्फ और सिर्फ मोदी जिम्मेदार हैं। उन्हें इसके लिए हमेशा याद किया जाएगा।

पहली बार देश को ऐसे नेतृत्व से पाला पड़ा है, जिसे लोकलाज नहीं है। पहली बार ऐसा है कि देश का मीडिया सरकार से सवाल नहीं कर सकता है। पत्रकार तथा सत्ताधारी पार्टी या सरकार के प्रवक्ता में कोई फर्क नहीं रह गया है। मीडिया उन लोगों के हाथ में है, जो अगर चैनल और अखबार बंद हो जाएं तो कारपोरेट कंपनियों, नेताओं, सरकार, पार्टी या नेताओं के प्रचार अधिकारी बनने में कोई देर नहीं करेंगे। इस मीडिया के दम पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह सुरक्षा बल के 49 जवानों की मौत के बाद भी देश में जगह-जगह चुनावी सभाएं कर रहे हैं और डींगे हांकने की हिम्मत कर रहे हैं। लोगों को ध्यान नहीं है कि लोकसभा में तीन चौथाई बहुमत और आजादी के आंदोलन में गांधी के बाद सबसे बड़े नेता होने के बावजूद प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को 1962 की लड़ाई के दौरान मंत्रिमंडल और लोकसभा में तीव्र विरोध का सामना करना पड़ा था। नेहरू ने न केवल संसद का विशेष सत्र बुलाया, बल्कि संसद का सामना करने के ठीक पहले रक्षामंत्री वीके कृष्णमेनन का इस्तीफा ले लिया था। उन्होंने संसद के सत्र की कार्यवाही को सार्वजनिक नहीं करने की सलाह भी ठुकरा दी थी। संसद के विशेष-सत्र में नेहरू की विदेश नीति, रक्षा नीति ही नहीं उनकी आर्थिक नीतियों की भी धज्जियां उ़ड़ा दी गई, लेकिन किसी भी सांसद को बोलने से रोका नहीं गया। उन्हें पूरा समय दिया गया। उनकी निर्मम आलोचना करने वालों में सिर्फ कांग्रेस के वे लोग ही नहीं थे, जिन्होंने उनके साथ जेल की यातना झेली थी, बल्कि अटलबिहारी वाजपेयी जैसे लोग भी थे, जो आजादी के आंदोलन से अलग रहने वाले संगठनों से आए थे और सिर्फ डेढ़ दशक पहले जिनके संगठन पर महात्मा गांधी की हत्या से संबंधित होने का आरोप लगा था। नेहरू ने किसी से यह नहीं कहा कि वे देशद्रोही हैं। इतिहास की सच्चाई है कि बहुत हाथ-पांव मार कर भी मोदी नेहरू तो क्या देश के उस प्रधानमंत्री की बराबरी भी बराबरी नहीं कर सकते जिससे उन्होंने सत्ता छीनी है। असम में चीनी सेना के तेजपुर तक पहुंच जाने के बाद नेहरू ने रेडियो पर देश को यह जानकारी दी तो वह रो पड़े थे। सुरक्षा बल के जवानों के सीमा के देश की सीमा के भीतर मारे जाने की घटना के बाद प्रधानमंत्री मोदी शिलान्यास और उद्घाटन करते घूमते रहे, लेकिन उनके भाव में आहत होना या पछतावा नहीं दीखा। यही हाल है पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह का है। मोदी के रवैये का अंदाजा तो इसी से लगाया जा सकता है कि वह उस दिन पर्यटन तथा पर्यावरण मंत्रालयों के कार्यक्रम के लिए उत्तराखंड में थे। उन्होंने पुलवामा के हमले के बाद भी न केवल अपना कार्यक्रम जारी रखा, बल्कि उन्होंने डिस्कवरी चैनल के लिए एक प्रचार-फिल्म की शूटिंग भी पूरी की। शाम को रुद्रपुर में उनकी एक सभा थी, उसे भी उन्होंने रद्द नहीं किया बल्कि मोबाइल फोन के जरिये उसे संबोधित किया। दूसरे दिन भी, उन्होंने पहले से तय झांसी की सभा को संबोधित किया। अपने भाषणों में मोदी लगातार आम लोगों को भड़काने में लगे हैं। उनके कथन में राजनेता वाली गहराई तो दूर यह एक अनुभवी मंत्री की दृष्टि भी नहीं दिखाई देती है। वह लोगों को कह रहे हैं कि लोगों के दिल के गुस्से को समझते हैं। वह कह रहे है कि सुरक्षा बलों को खुली छूट दे दी गई है कि वे अपने हिसाब से जो ठीक लगे कर सकते हैं। यह राजनीतिक नेतृत्व के गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार को दिखाता है। टकराव का क्षेत्र होने के कारण सेना और सुरक्षा बलों को कार्रवाई के विशेष अधिकार पहले से मिले हैं। उन पर ज्यादती के आरोप भी लगते रहे हैं। आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट को हटाने की मांग वहां एक बड़ा मुद्दा रहा है। हालात ठीक होने पर कई इलाकों को इसके दायर से बाहर रखने की घोषणाएं भी होती रही हैं। लोकतांत्रिक शासन का बुनियादी तत्व यह है कि पुलिस-सेना की कार्रवाई के खिलाफ आप सरकार और न्यायालय के पास जा सकें। आर्म्ड स्पेशल पावर एक्ट के तहत की गई कार्रवाइयों के लिए छूट होने के बावजूद सरकार के पास जाने का लोकतांत्रिक अधिकार लोगों को है। मोदी का पूरी छूट की बात अलग से जोड़ना कश्मीर के संदर्भ में एक अलग ही मतलब देता है। वहां सरकार के विरोध के लिए लोग नारेबाजी और पत्थरबाजी से लेकर आतंकियों का समर्थन करने तक का तरीका अपनाते हैं। इन तमाम तरीकों से लोग अपनी निराशा जाहिर करते हैं। इस यथार्थ को फौजी या पुलिसिया चश्मे से नहीं देखा जा सकता है। एक लोकतांत्रिक मुल्क में इसे सहजता से लेना चाहिए। यह छूट अपने ही नागरिकों को उनके नागरिक अधिकारों से वंचित करने की ओर ले जाती है। यह सैनिकों के हाथ में शासन सौंपने जैसा है। इसका मतलब है कश्मीर की जनता सरकार से न्याय की गुहार नहीं लगा सकती है। कांग्रेस समेत सारी विपक्षी पार्टियों ने शुरू में मोदी सरकार को कश्मीर मामलों में बिना शर्त समर्थन दिया। यह व्यावहारिकता से ज्यादा मीडिया के दबावों से प्रेरित दिखाई देता था। यह मोदी के करीब पांच सालों के कार्यकाल का असर है। भाजपा से जुड़े बुद्धिजीवियों और पार्टी नेताओं ने अल्पसंख्यकों को लगातार निशाना बनाया और सरकार की पाकिस्तान या कश्मीर की नीतियों के विरोध को देशद्रोही गतिविधि का दर्जा दे दिया है। अगर गौर से देखें तो इस कथा में आम मुसलमान को ही साबित करना है कि वह देशद्रोही या जिहादी नहीं है। उस पर आरोप लगाने वालों को यह साबित नहीं करना है कि ये उनके आरोप सही हैं। गोरक्षकों के अत्याचारों के खिलाफ आवाज उठाने या पाकिस्तान से अमन की बात करने वाला नागरिक देशद्रोही बन गया है। भाजपा के नेता लगातार कोशिश करते रहते हैं कि कांग्रेस और दूसरी पार्टियों को पाकिस्तान के हितों को रक्षक साबित किया जाए। जब कांग्रेस ने पुलवामा की सूचना के बाद भी दिल्ली लौटने के बदले उत्तराखंड में फिल्म की शूटिंग करने का आरोप लगाया तो वरिष्ठ मंत्री रविशंकर प्रसाद ने पाकिस्तान की भाषा बोलने का आरोप लगा दिया। हालांकि देश की आजादी का नेतृत्व करने और पाकिस्तान के खिलाफ 1965 और 1971 के युद्ध जीतने वाली कांग्रेस को देशद्रोही साबित करना आसान नहीं है। वह भी ऐसी पार्टी की ओर से जिसका आजादी के आंदोलन में कोई योगदान नहीं है। मामला सिर्फ चुनावी फायदे या राजनीतिक अवसरवाद का नहीं है। भाजपा और आरएसएस की ओर से बुनी जा रही कथा सांप्रदायिक है और यह लोकतंत्र की जगह व्यक्ति-पूजा पर आधारित तंत्र में यकीन करने वाली विचारधारा को ताकत देती है। यही वजह है कि पुलवामा की घटना के बाद विपक्षी पार्टियों के बिना शर्त समर्थन को स्वीकार करने के लिए मोदी सरकार तैयार नहीं है। वह लोकतांत्रिक सहमति बनाने में उसका विश्वस नहीं है। प्रधानमंत्री ने सर्वदलीय बैठक की जगह एक सामान्य से सरकारी कार्यक्रम में जाना उचित समझा। यह संसद और विप़क्ष को नकारने की उनके राजनीतिक तरीके का ही हिस्सा है। लोकतंत्र के खंभों जिनमें मीडिया शामिल है, को उखाड़ने में वह लगातार लगे रहे हैं। वैसे भी, पहली बार ऐसा है कि सरकार जवानों की बहादुरी को अपनी बहादुरी बता रही है, लेकिन उनकी मौत की जिम्मेदारी नहीं ले रही है। लेकिन यह सच्चाई सामने आ गई है कि घटना के पीछे प्रशासनिक और खुफिया विफलता जिम्मेदार है। एक वरिष्ठ पत्रकार ने यह जानकारी भी बाहर ला दी है कि सुरक्षा को ध्यान में रख कर सीआरपीएफ अधिकारियों ने जवानों को तैनाती के लिए विमान से ले जाने का फैसला किया था। बहुत इंतजार के बाद भी गृह मंत्रालय की ओर से उन्हें यह सुविधा नहीं मिली तो उन्होंने जोखिम उठाने का फैसला किया। इसी तरह 60 किलोग्राम आरडीएक्स की तस्करी सारे सुरक्षा-तंत्र पर सवाल खड़े कर रहा है। हमले की आशंका से संबंधित सूचना को भी नजरअंदाज कर दिया गया। जवानों की मौत के शोक में लोग सवाल नहीं कर रहे थे। लेकिन ये सवाल उठने शुरू हो गए हैं। विफलताओें के बाद मीडिया या सांसदों ने नेहरू जैसे कद्दावर नेताओं को नहीं छोड़ा, लेकिन मोदी उससे आसानी से बच गए। उलटे, करीब पचास जवानों की मौत के बाद भी लोगों ने उनसे ये नहीं पूछा कि कश्मीर में सुरक्षा की इतनी बुरी हालत क्यों हुई। हिंदुत्व के कवच ने उन्हें इस तरह सुरक्षित कर दिया है मीडिया न तो सुरक्षा की बुरी हालत के बारे में सवाल कर रहा है और न ही कश्मीरियों को देश से दूर करने की उनकी नीति के बारे में। कश्मीर के बारे में भाजपा की पक्षपाती नीतियों के तहत ही सरकार ने हुर्रियत के नेताओं की सुरक्षा छीनने का फैसला लिया है। इसके पहले पुलवामा की घटना के तुरंत बाद प्रधानमंत्री कार्यालय के राज्यमंत्री जीतेंद्र सिंह ने कश्मीरी नेताओं को आतंकवादियों के समर्थन का आरोप लगा दिया। इसे लेकर उमर अब्दुला और महबूबा मुफ्ती ने कड़ा एतराज जताया। राजनीतिक पार्टियों और हुर्रियत को परिदृश्य से निकाल देने की रणनीति का क्या अर्थ हो सकता है? यह लोकतांत्रिक राज्य के सिद्धांत के विपरीत है। यह मालूम होने के बावजूद कि हुर्रियत और कश्मीर की राजनीतिक पार्टियों से बातचीत के बगैर कश्मीर समस्या का समाधान नहीं हो सकता, इस तरह के कदम क्या बताते हैं? ये यही बताते हैं कि अपने सांप्रदायिक एजेंडे को पूरा करने के लिए भाजपा कश्मीर जैसे संवेदनशील राज्य के साथ भी खिलवाड़ कर रही है। यह दुर्भाग्यै ही है कि देश के खिलाफ काम कर रही यह पार्टी देशभक्त होने का दावा कर पाती है। वैसे भी, राज्य का दायित्व है वह अपने उन नागरिकों की भी रक्षा करे जो उसके खिलाफ हैं। मीडिया के 'राष्ट्रवादी' शोर-शराबे के डर से पार्टियों ने चुप्पी साध ली है। कश्मीरियों को खलनायक बनाने का नतीजा है कि देश के अलग-अलग हिस्सों में रोजगार या पढ़ाई के लिए गए कश्मीरियों पर हमले किए जा रहे हैं। यह अभियान भी भाजपा समर्थकों के संरक्षण में चल रहा है। देश भर में कश्मीरी व्यापारियों और छात्रों को निशाना बनाया जा रहा है और इसमें हिंदुत्ववादी संगठनों का हाथ है। लेकिन केंद्र सरकार और भाजपा का नेतृत्व कोई कार्रवाई करने के बदले उसे नकार रहा है। इस मुद्दे को सिर्फ वामपंथी संगठन गंभीरता से उठा रहे हैं। बाकी पार्टियां भी इसे गंभीरता से नहीं ले रही हैं क्योंकि उन्हें हिंदू वोट खिसकने का डर है। बिहार की राजधानी पटना में ऐसी घटनाएं कभी नहीं हुई थीं, लेकिन इस बार वहां भी उन्हें निशाना बनाया गया। कोलकाता जैसी जगहों पर भी उन पर हमले की कोशिश की गई। मामले को नजरअंदाज करने के रयेए को देखकर सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ा। यह हमारी मर्जी है कि हम कश्मीर में अपनी नैतिक पराजय को स्वीकार न करें, लेकिन सच्चाई यही है कि हमने वहां के आम लोगों का भरोसा खो दिया है। यही नहीं, हम उन्हें देश की मुख्यधारा में लाने का रास्ता एक-एक कर बंद करते जा रहे हैं। मोदी कश्मीर की हालत बिगाड़ने के लिए याद किए जाएंगे।