मार्च 2019

बल या छल से नहीं निकलेगा हल

अशोक कुमार पाण्डेय

Intro तीस साल से लगातार इतनी बड़ी संख्या में सेना और अर्द्धसैनिक बलों की तैनाती के बावजूद अगर कश्मीर में आतंकवाद पर नियंत्रण नहीं पाया जा सका तो कश्मीर समस्या के समाधान के लिए सैन्य रणनीति पर भरोसा कैसे और कब तक किया जाना चाहिए? अभी मीडिया में राज्यपाल बदलने और मलिक की जगह किसी सैन्याधिकारी को राज्यपाल बनाने की योजना की जो सुगबुगाहट मिल रही है, वह नब्बे के दशक की उन नीतियों की ही याद दिलाती है, जिनकी सफलता हद से हद फौरी साबित हुई।

पुलवामा में हुए हमले और उसके बाद देशभर में कश्मीरियों के साथ दुर्व्यवहार के बीच पूरे मसले को पाकिस्तान के सहारे जिस तरह एक मुस्लिम विरोधी माहौल बनाने की कोशिश की जा रही है, वह 1947 में विभाजन के संदर्भ में जिन्ना-सावरकर को सही तथा गाँधी-शेख़ अब्दुल्लाह को ग़लत साबित करने की कोशिश सी लग रही है। विभाजन के बाद जब पूरा देश साम्प्रदायिक दंगों की आग में सुलग रहा था तो गाँधी ने कश्मीर घाटी को उम्मीद की एक किरण कहा था। वजह स्पष्ट थी कि जहाँ जम्मू में लाखों मुसलमानों को या तो मार दिया गया या फिर घर छोड़ने को मज़बूर किया गया, वहीं कश्मीर घाटी में किसी हिन्दू या सिख पर कोई आँच नहीं आई। यही नहीं, जब क़बायली हमले की आड़ में पाकिस्तान ने अपने सैनिक और संसाधन झोंक दिए, कश्मीर पर कब्ज़ा करने के लिए तो भी शेख़ अब्दुल्ला के नेतृत्व में कश्मीरियों ने भारतीय सेना के आने तक उनका मुक़ाबला किया और शहादत दी। सन पैंसठ के युद्ध में भी जब पाकिस्तान को यह भरोसा था कि कश्मीरी उसका साथ देंगे, कश्मीरी जनता ने भारत का साथ दिया और पाकिस्तान की हार सुनिश्चित की। इसलिए भक्ति और द्रोह की बायनरी में देश को बाँटकर सड़क पर फ़ैसला सुनाने और सोशल मीडिया पर भद्दी गालियों के भरोसे हर असहमत आवाज़ को दबाने की कोशिशों के बीच एक बार रुककर देख लेना बेहतर होगा कि आख़िर क्या हुआ ऐसा कि शांतिप्रिय कश्मीर में नब्बे के दशक में शुरू हुआ आतंकवादी आन्दोलन अब तक शांत नहीं हो सका है। कश्मीर की भौगोलिक अवस्थिति और जनांकिक हक़ीक़त कुछ ऐसी रही कि हैदराबाद और जूनागढ़ की तरह शासक और बहुसंख्यक जनता का धर्म ही अलग नहीं था, बल्कि भारत और पाकिस्तान दोनों नए बने देशों से उसकी सीमाएँ लगी हुई थीं। जिन्ना के लिए विभाजन शुद्ध धार्मिक मसला था और इसीलिए उन्हें कश्मीर पर पाकिस्तान का स्वाभाविक हक़ लगता था। नेहरू और गाँधी के लिए यह सेक्युलरिज्म का एक मॉडल था कि हिन्दू बहुल देश में एक मुस्लिम बहुल राज्य सुख-शान्ति से रहे। शेख़ अब्दुल्लाह पाकिस्तान के सामन्तवादी प्रभुत्व वाले शासन में न जाकर भारत के साथ स्वायत्तता बनाए हुए रहना चाहते थे, ताकि सदियों से उत्पीड़ित कश्मीरी किसानों को उनका हक़ मिल सके लेकिन हरि सिंह अमृतसर संधि में जम्मू और कश्मीर पर मिले अनन्य अधिकार को बनाए रख स्वतन्त्र राज्य चाहते थे। इधर हिन्दू और मुस्लिम कट्टरपंथ के हिमायती अपनी स्वाभाविक गतिविधियों में मसरूफ़ थे और ऐसे में जब पाकिस्तान की ओर से क़बायली आक्रमण हुआ तो हरि सिंह के पास भारत से मदद मांगने और इसके लिए विलय को स्वीकार करने के अलावा कोई चारा नहीं बचा। लेकिन इस विलय में स्पष्ट शर्तें थीं और वे यह कि वाह्य सुरक्षा, अर्थव्यवस्था तथा डाक एवं संचार को छोड़कर बाक़ी मामलों में राज्य का प्रभुत्व होगा। बाद में जब संविधान बना तो इसी शर्त को 370 के तहत स्वीकार किया गया। आगे के लिए जनमत संग्रह का प्रस्ताव था। जनता की राय आ जाने पर सबको उम्मीद थी कि 370 की ज़रूरत ख़त्म हो जाएगी। जब मौलाना हसरत मोहानी ने संविधान सभा में 370 पर सवाल उठाया तो आयंगर ने इसी निहितार्थ का जवाब दिया था। पटेल हों कि श्यामाप्रसाद मुखर्जी सब इस पर राज़ी थे। पुराना है गलतियों का सिलसिला लेकिन दुर्भाग्य से संविधान सभा से शुरू हुए अविश्वास के बाद कुछ ऐसा घटित होता गया कि कश्मीर और शेष भारत के बीच लगातार अविश्वास ही बढ़ा। जम्मू में आरएसएस की कार्रवाईयों ने माहौल विषाक्त किया तो मुखर्जी के नेतृत्व में देश भर में 370 को लेकर चलाई गई मुहिम ने कश्मीर में भारत के बहुसंख्यक समाज को लेकर एक भय और आशंका का वातावरण बना। भूमि सुधारों के बाद डोगरा और कश्मीरी पंडितों की ज़मीन छिनी तो शेख़ के ख़िलाफ़ हमले तेज़ हुए। शेख़ आक्रामक हुए, देश भर की मीडिया ने उसे हेडलाइन बनाया और अंततः वह जब गिरफ्तार हुए तो इस अविश्वास की गिरहें बड़ी होती गईं। चीन युद्ध के बुरे अनुभव के बाद नेहरू कश्मीर का कोई स्थाई हल ढूंढ लेना चाहते थे, उन्होंने शेख़ को रिहा कर पाकिस्तान भेजा भी लेकिन जीवन ने उन्हें यह मौक़ा नहीं दिया। फिर उसके बाद शास्त्री हों या इंदिरा, सबका ज़ोर इस विवाद को सुलझाने की जगह कश्मीर के अधिक से अधिक एकीकरण पर रहा और कश्मीर में गद्दी पर बिठाए गए उनके पसंदीदा लोगों ने इसमें पूरा सहयोग दिया। उधर शिक्षा के विस्तार के साथ नौकरियों और बेहतर करियर की जो आकांक्षा जागी उसे पूरा करने के संसाधन नहीं थे राज्य के पास, न ही उस गुस्से को अभिव्यक्त करने की लोकतांत्रिक आज़ादी दी गई। घाटी की राजनीति को नियंत्रित कर उस पर प्रत्यक्ष-परोक्ष आधिपत्य बनाये रखने की कोशिश ने चुनावों को धीरे-धीरे बेमानी कर दिया। नौकरी की लड़ाई हिन्दू-मुस्लिम का रूप लेती गई और इसने कट्टरपंथ को जड़ जमाने का जो मौका दिया, उसने कश्मीर के अहिंसक सूफी इस्लाम की जड़ें खोद दीं। शेख़ लगातार गिरफ्तार रहे और अंततः 1971 में पाकिस्तान की हार और शिमला समझौते के बाद जब लौटे भी तो वह बूढ़े हो चुके थे, थक चुके थे जबकि उनके बाद की पीढ़ी के नेता तैयार हो चुके थे, वे नेता जिन्होंने इस्लाम और पकिस्तान में भविष्य तलाशना शुरू कर दिया था। दक्षिणी एशिया के नेताओं की परम्परा में जब वह फारूक अब्दुल्ला को विरासत देकर रुखसत हुए तो हालात बदतर होने लगे थे। फ़ारूक़ ने शुरुआत तो बड़े उत्साह से की और चुनावों में इंदिरा गाँधी के साझेदारी का प्रस्ताव ही नहीं ठुकराया, बल्कि जीतने के बाद देशभर के विपक्ष के नेताओं से सम्पर्क स्थापित किये। किसी और राज्य में यह सामान्य होता लेकिन कश्मीर में इंदिरा ने यह बर्दाश्त करने की जगह उन्हें बर्खास्त किया जगमोहन को भेजकर। एक बार फिर अपने कठपुतली नेताओं के हाथ कमान सौंपी गई। लेकिन 1986 के चुनाव में फ़ारूक़ ने राजीव के साथ समझौता कर लिया तो उन्हें चुनौती देने के लिए अलग-अलग इस्लामी संगठनों के नेताओं ने साझा मोर्चा बनाया। उसे रोकने के लिए हर तरह की धांधली की गई और अंततः कश्मीरी युवा ने लोकतंत्र पर भरोसा पूरी तरह खो दिया। हिज्बुल मुजाहिदीन का नेता सैयद सलाहुद्दीन उसी चुनाव में धांधली से हराये जाने के बाद सीमा पार कर पाकिस्तान चला गया था उसी चुनाव में सलाहुद्दीन के पोलिंग एजेंट रहे यासीन मलिक ने कुछ दूसरे युवाओं के साथ मिलकर जब जेकेएलएफ बनाई तो पाकिस्तान से भरपूर मदद मिली। 1989 आते-आते कश्मीर ज्वालामुखी के दहाने पर बैठा था और भारतीय राज्य का इंटेलिजेंस पूरी तरह फेल हो चुका था। डाउनटाउन में बसें "पिंडी पिंडी रावलपिंडी" का नारा लगाते हुए युवाओं को बॉर्डर के उस पार ट्रेनिंग के लिए ले जाती थीं और वे ग्रेनेड तथा एके-47 लेकर लौटते थे। उस समय भी एक किस्म की पॉलिसी पैरालिसिस देखने को मिला था। पहले हार्डलाइनर माने जाने वाले जगमोहन और फिर रॉ के प्रमुख रहे जी के सक्सेना और फिर जनरल वीके कृष्णराव को राज्यपाल बनाया गया जिनका ज़ोर समस्या के सैन्य समाधान पर ही रहा। अगले दस-पंद्रह साल तक कश्मीर युद्ध स्थल बना रहा, कश्मीरी पंडितों का बड़े पैमाने पर पलायन हुआ। नतीजतन कश्मीर का राजनैतिक माहौल और वहाँ की अर्थव्यवस्था तहस-नहस हो गई। अपने अंतिम दौर यानी 2002 से 04 के बीच में यह आंदोलन फिदाईन हमलों के रूप में चला। याद कीजिए उमर अब्दुल्ला ने पुलवामा हमले की तीखी निंदा करते हुए इसे "2004-05 के पहले के दौर की याद दिलाने वाला" वाकया बताया था। यहां रुककर नब्बे के आतंकवाद का इतिहास देखें तो शुरुआत में जेकेएलएफ का दबदबा था, जो आज़ादी की बात करता था और पाकिस्तान तथा भारत से अलग एक स्वतंत्र कश्मीर राष्ट्र की मांग करता था। लेकिन धीरे-धीरे इस आंदोलन पर हिजबुल मुजाहिदीन जैसे संगठनों का कब्ज़ा होता गया जो नारे भले आज़ादी के लगाते हों, लेकिन स्पष्ट तौर पर पाकिस्तान के समर्थक थे। गिलानी इस समूह का वैचारिक लीडर बना और न केवल आतंकवादी कार्रवाइयों में भारतीय सेना को निशाना बनाया गया, बल्कि जेकेएलएफ जैसे संगठनों और उन कश्मीरी नेताओं को भी नहीं बख़्शा गया जो पाकिस्तान विरोधी या कम से कम भारत से बातचीत के पक्षधर थे। हुर्रियत के बेहद शुरुआती नेताओं में से एक फ़ज़ल हक़ कुरैशी पर जब जानलेवा हमला किया गया तो वह बाजपेयी के साथ बातचीत में सबसे आगे थे। वह बच तो गए लेकिन शरीर का एक हिस्सा अपाहिज हो गया। अब्दुल गनी लोन को जब मारा गया तो सबका शक गिलानी पर था। इसके पहले जब वर्तमान मीरवाइज़ के पिता की हत्या हुई थी तो भी कई लोगों का मानना था कि यह पाकिस्तान समर्थक ग्रुप की ही कार्रवाई है। अब्दुल गनी बट ने इन सभी हत्याओं में पाकिस्तान परस्त संगठनों का हाथ होने की बात सार्वजनिक रूप से की थी। हाल में ही पत्रकार शुजात बुखारी की हत्या भी बातचीत की प्रक्रिया में शामिल होने के कारण ही की गई। भारत की एक बड़ी नाकामयाबी कश्मीर में अपने करीबियों की हत्या को न रोक पाना भी है। सुरक्षा वापस लेने का निर्णय यह भय बढ़ाएगा ही, याद कीजिये पिछले साल वार्ताकार नियुक्त किये गए दिनेश्वर शर्मा से बात करने के लिए राज़ी हुए इकलौते हुर्रियत नेता अब्दुल गनी बट को उनके संगठन ने पार्टी से निकाल दिया था। असल में सुरक्षा वैसे भी नरमपंथी नेताओं ने ही स्वीकार की थी, गीलानी और यासीन मलिक ने तो कभी सुरक्षा ली ही नहीं। ख़ैर, पाकिस्तान के सीधे दख़ल और बड़ी संख्या में अफगानी और पाकिस्तानी लड़ाकों का कश्मीर में आना भी लोगों के मोहभंग का कारण बना। दस साल से ज़्यादा चले आतंकवाद के दौर से लोग ऊब भी गए थे और इसमें इन लड़ाकों के स्थानीय लोगों के प्रति व्यवहार ने उन्हें आतंकवाद से दूर कर दिया। एक बार स्थानीय सपोर्ट ख़त्म हुआ तो आतंकवाद की चमक फीकी पड़ने लगी। इस दौर में बीसियों आतंकवादी संगठन बन गए थे और आपस में भी खूनखराबा चलता रहता था। जैश ए मोहम्मद का मुखिया अज़हर मसूद भी ऐसे ही एक संगठन हरक़त उल मुजाहिदीन से जुड़ा था और जब अपहृत भारतीय जहाज के यात्रियों के बदले 1999 में उसे छोड़ा गया तो माना जाता है कि अल-कायदा की मदद से पाकिस्तान में उसने यह तहरीक बनाई। वाजपेयी के दौर में उम्मीद बंधी थी वाजपेयी के शासन काल में सैन्य नीति को बदलते हुए बातचीत की पहल के चलते उम्मीद का माहौल बना। यह नीति इतनी असरकारी हुई कि न केवल कश्मीर में एक बेहतर माहौल बना, बल्कि 2007-08 के विधानसभा चुनावों में हुर्रियत के बहिष्कार के बावजूद जब बड़ी संख्या में लोग वोट देने निकले तो मीरवाइज़ की टिप्पणी थी कि हमें अपने तरीके बदलने होंगे। दुर्भाग्य यह कि न तो वाजपेयी ही उस प्रक्रिया को किसी मुकाम तक पहुंचा सके, न ही उनके बाद कोई बड़ी प्रक्रिया शुरू हुई। फिर भी 2004-05 के बाद का एक दशक लगभग शांति का दशक रहा। छिटपुट घटनाओं के अलावा कोई बड़ी वारदात नहीं हुई और सेना ने कई कल्याणकारी योजनाएं लागू कीं, जिससे एक बेहतर माहौल बनता दिखाई दिया। लेकिन 2016 में बुरहान वानी परिघटना के बाद से माहौल फिर से विस्फोटक होने लगा। बातचीत की किसी प्रक्रिया के अभाव में इसे हल करने की जिम्मेदारी पूरी तरह से सेना और अर्द्धसैनिक बलों को दे दी गई और हालात ऐसे बने कि एक तरफ़ तो स्थानीय लड़के लगातार बंदूक उठा रहे हैं तो दूसरी तरफ़ उनके जनाज़ों में भीड़ उमड़ रही है। चौंकाने वाली बात इनका दूर-दराज़ के गांवों तक फैल जाना है। पिछले दिनों श्रीनगर में हुए ग्रेनेड हमलों और अब हाईवे पर हुई इस भयानक घटना के बाद यह डर बढ़ गया है कि यह एक और लंबे ख़ूनी दौर को जन्म न दे। इस बार एक जो सबसे बड़ा अंतर देखने में आ रहा है, वह है स्थानीय लड़कों की इसमें भागीदारी। माना जाता था कि फिदाईन हमलों में कश्मीर के स्थानीय लड़कों ने कभी भागीदारी नहीं की। यह काम पाकिस्तान से रेडिक्लाइज़ करके लाये गए लड़कों से ही कराया जाता था। इसके अलावा नब्बे के दौर में पाकिस्तान और अफगानिस्तान से भारी संख्या में मिलिटेंट्स आये थे और उनकी वजह से भी स्थानीय जनता में रोष पैदा हुआ था। आज हालात यह हैं कि जैश के मुखिया भले ही पाकिस्तान से नियंत्रित कर रहे हों लेकिन प्रत्यक्ष भागीदारी स्थानीय मिलिटेंट्स की है। जैश का ही उदाहरण लें तो 2013 में अफज़ल गुरु की फांसी के बाद जब इसे फिर से एक्टिव किया गया तो भर्ती स्थानीय ही हुई। 2017 में हिजबुल और लश्कर के 20 से अधिक कमांडर्स को मार देने के बाद जब सुरक्षाबल थोड़ा निश्चिंत हुए तो मुफ़्ती वक़ास, यासिर, अली भाई और नूर मोहम्मद तांत्रे जैसे जैश के कमाण्डरों ने मोर्चा संभाला। 2018 बीतते बीतते इन सभी के अलावा मसूद अज़हर के दो भतीजों को मारने के बाद जब लग रहा था कि यह ग्रुप कमज़ोर हो गया है तो अब आदिल अहमद दार ने यह भयावह कार्रवाई कर इस आशंका को जन्म दे दिया है कि कहीं जैश फिर से फिदाईन हमले की कड़ियां न शुरू कर दे। जिस तरह ये लड़के सोशल मीडिया पर फोटो अपलोड कर रहे हैं और इनके जनाज़े में भीड़ उमड़ रही है, साफ है कि स्थानीय समर्थन भी इन्हें मिल रहा है। साथ ही फिदाईन हमलों के लिए स्थानीय लड़कों का तैयार होना कश्मीर के भीतर रेडिक्लाइजेशन की ओर भी इशारा कर रहा है। दूसरी तरफ़ यह भी सम्भावना है कि अपने प्रमुख कमांडरों को खो चुका आतंकवादी आंदोलन इस तरह के हमलों से ख़ुद को खबरों में बनाये रखने के साथ एक ओर पाकिस्तान के आकाओं से अधिक धन और समर्थन की मांग करना चाहते हैं तो दूसरी तरफ घाटी के अपने समर्थकों का उत्साह बढ़ाना चाहते हैं। देश हर में कश्मीरी छात्रों और अन्य कश्मीरियों पर हमले इन्हें अपना प्रोपेगेंडा मज़बूत करने में ही मदद देंगे। वैसे जिस तरह से यह हमला हुआ है वह अपने आप मे बेहद चौंकाने वाला है। सवाल यह है कि इतने बड़े काफिले को एक साथ क्यों भेजा गया और उनके रूट की जानकारी आख़िर आतंकवादियों तक पहुंची कैसे? आख़िर यह कोई दो चार दिन की तैयारी में किया गया हमला भी नहीं था। फिर जिस सड़क पर आमतौर पर हर गाड़ी चेक की जाती हैं, वहां इतने विस्फोटक से भरी गाड़ी कैसे जा सकी? इंटेलिजेंस वार्निंग के बावजूद गहन जांच क्यों नहीं की गई? सीमाओं के इस क़दर संवेदनशील होने के बावजूद इतना विस्फोटक आया कैसे? और इससे बड़े सवाल भी हैं। तीस साल से लगातार इतनी बड़ी संख्या में सेना और अर्द्धसैनिक बलों की तैनाती के बावजूद अगर कश्मीर में आतंकवाद पर नियंत्रण नहीं पाया जा सका तो कश्मीर समस्या के समाधान के लिए सैन्य रणनीति पर भरोसा कैसे और कब तक किया जाना चाहिए? अभी मीडिया में राज्यपाल बदलने और मलिक की जगह किसी सैन्याधिकारी को राज्यपाल बनाने की योजना की जो सुगबुगाहट मिल रही है वह नब्बे के दशक की उन नीतियों की ही याद दिलाती है,जिनकी सफलता हद से हद फौरी साबित हुई। कश्मीर की आजादी का मतलब हुर्रियत के दोनों धड़ों और जेकेएलएफ के यासीन मलिक को मिलाकर बनी ज्वाइंट रेजिस्टेंस लीग ने इस हमले की कड़ी निंदा करते हुए कश्मीर समस्या के किसी स्थायी समाधान के लिए बातचीत की प्रक्रिया की शुरुआत की जो बात की है, क्या उसके बिना शांति की कोई उम्मीद है? इतने संसाधनों और इतनी जानों को क़ुर्बान कर आख़िर हमें क्या मिल रहा है? शौरा में अपने घर पर बात करते हुए फ़ज़ल उल हक़ साहब ने मुझसे कहा था, "आज़ादी का मतलब है, इस मसले का कोई ऐसा हल जो हिंदुस्तान के लिए भी सम्मानजनक हो और कश्मीरियों के लिए भी।" बदले की हुंकार और युद्ध के पागलपन में फंसे मध्यवर्ग और मीडिया को समझाना तो मुश्किल है, लेकिन सरकार को यह समझना होगा कि बातचीत और मरहम की नीति से राजनीतिक प्रक्रिया की शुरुआत ही है जो ऐसे किसी हल तक पहुंचने में मदद कर सकती है। (लेखक जाने-माने कवि हैं। कश्मीर के अतीत और वर्तमान को समझने के लिए कुछ समय पहले आई इनकी चर्चित पुस्तक कश्मीरनामा को जरूर पढ़ा जाना चाहिए)