फरवरी 2019

देश-दुनिया की सुर्खियां : कोटा, कॅरिअर और खुदकुशी

रविवार डेस्क

भविष्य संवारने या कॅरिअर बनाने के मकसद से की जाने वाली पढ़ाई क्या ऐसी होड़ में तब्दील हो जानी चाहिए कि उससे छात्रों का न सिर्फ वर्तमान, बल्कि जीवन भी खत्म हो जाए? मेडिकल और इंजीनियरिंग के छात्रों आत्महत्या करने की खबरें कुछ इसी तरह की होड़ की जमीन तैयार कर रही हैं। इस सिलसिले में राजस्थान का कोटा शहर तो मानो एक तरह से 'सुसाइड सिटी' ही बन चुका है। हाल के दिनों में वहां आत्महत्या की चार घटनाओं ने एक बार फिर इस सवाल को शिद्दत से रेखांकित किया है कि पढ़ाई के दबाव को इस कदर जानलेवा बनाकर आखिर किस तरह की शैक्षणिक क्रांति की जा रही है? कोटा में हाल के दिनों में हुई आत्महत्या की घटनाएं कोई नई बात नहीं हैं। उपलब्ध आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक वहां सात वर्षों के दौरान अपनी आंखों में सुनहरे भविष्य के सपने सजाकर आए 125 से अधिक प्रतियोगी छात्र मौत को गले लगा चुके हैं। यानी हर साल औसतन 18 छात्रों ने आत्महत्या की है। इन सभी घटनाओं में एक ही तथ्य मोटे तौर पर उभरकर आया है कि पाठ्यक्रम की पढ़ाई और उसमें फेल हो जाने के डर से उपजे तनाव या परीक्षा में नंबर कम आने से पैदा हुई हताशा के चलते बच्चों के सामने ऐसा अंधेरा पसर गया कि आखिरकार उन्होंने जीवन से गुम हो जाने का ही रास्ता चुन लिया। कोटा को किसी समय औद्योगिक शहर के रूप में जाना जाता था लेकिन जब से वहां पुराने उद्योग एक-एक करके बंद होते गए तो वहां से बेरोजगार हुए इंजीनियरों ने अपना जीवनयापन करने के लिए ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया और धीरे-धीरे यहां कोचिंग संस्थान खुलना शुरू हो गए। आज कोटा की पहचान इंजीनियर-डॉक्टर बनाने की गारंटी देने वाले शहर के रूप में हो गई है। कोटा के हर चौक-चौराहों की ऊंची-ऊंची इमारतें कोचिंग संस्थानों के बड़े-बड़े उन होर्डिंग्स से ढंकी हैं, जिन पर खुशी मनाते उन छात्रों की तस्वीरें होती हैं, जिन्होंने प्रवेश परीक्षाओं में कामयाबी हासिल की है। यहां तक कि स्थानीय मॉल और बड़े रेस्त्रांओं में भी कोचिंग संस्थानों के विज्ञापन लगे होते हैं, जिन पर उन संस्थानों के स्टार अध्यातपकों की तस्वीरें होती हैं, जो स्थानीय स्तर पर सेलिब्रिटीज की तरह होते हैं। कुल मिलाकर ये होर्डिंग्स बताते हैं कि कोटा में कोचिंग ही सब कुछ है। यहां छोटे-मोटे करीब 200 कोचिंग संस्थान यहां चल रहे हैं। इन संस्थानों में देश के विभिन्न हिस्सों से आए कोई डेढ़ से दो लाख छात्र कोचिंग लेते हैं। यह सच है कि प्रतियोगी परीक्षाओं में कोटा के कोचिंग संस्थानों में पढ़ने वाले छात्रों की सफलता का स्ट्राइक तीस फीसदी से तक रहता है और इंजीनियरिग और मेडिकल की प्रतियोगी परीक्षाओं में टॉप10 में से कम से पांच छात्र कोटा के इन्हीं संस्थानों के ही रहते हैं। लेकिन इस चमकदार तस्वीर का दूसरा पहलू बेहद भयावह है, जो आए दिन छात्रों की आत्महत्या के रूप में सामने आता रहता है। दरअसल, हमारे समाज में मेडिकल और इंजीनियरिंग की पढ़ाई को जिस तरह प्रतिष्ठा और प्रभाव से जोड़ दिया गया है, उसके चलते अधिकांश अभिभावक अपने बच्चों की रुचियों और क्षमताओं को समझने की कोशिश ही नहीं करते और उन्हें इन विषयों की तैयारी में झोंक देते हैं। इस सिलसिले में कोचिंग संस्थानों से संपर्क करने पर वहां उन्हें बिना किसी आधार के सफलता की गारंटी दे दी जाती है। लेकिन इसके बाद पाठ्यक्रम, तैयारी और दबाव के जो दौर शुरू होते हैं, उसमें सामान्य मानवीय पहलुओं की सिरे से अनदेखी होती है। मनोविज्ञान के लिहाज से देखें तो ज्यादातर बच्चों को एक मशीन की तरह बना दिया जाता है। ऐसे में कई बच्चे पढ़ाई की दिनचर्या और कामयाबी की शर्त की चक्की में पिसने के लिए अभिशप्त हो जाते हैं। इस सबके चलते बच्चे नशीले पदार्थों, अनिद्रा, अवसाद और अकेलेपन के शिकार हो जाते हैं, जिसकी अंतिम परिणति आत्महत्या में होती है। अफसोस की बात यह है कि इस गंभीर समस्या की ओर न तो समाज का ध्यान है और न ही हमारी सरकारों का।