फरवरी 2019

कूपमंडूकता की विशेषताएं

कविता कृष्णपल्लवी

कूपमंडूकता एक सार्वभौमिक परिघटना है, पर अलग-अलग देशों में इसकी अलग विशिष्टताएँ होती हैं। उन्नीसवीं शताब्दी में जर्मन महाकवि हाइने ने और युवा मार्क्स-एंगेल्स ने जर्मन कूपमंडूकता की खूब खिल्ली उड़ाई थी और हर्ज़ेन, चेर्नीशेव्स्की, दोब्रोलुबोव जैसे क्रांतिकारी जनवादी दार्शनिकों ने रूसी कूपमंडूकता से जमकर लोहा लिया था, पर इन महापुरुषों ने अगर भारतीय कूपमंडूकता, विशेषकर "हिन्दू" कूपमंडूकता के दर्शन किये होते तो उसके आगे उन्हें दुनिया की हर कूपमंडूकता पानी भरती नज़र आती ।

कूपमंडूक के मानस का निर्माण निम्न-बुर्जुआ आत्मतुष्टि, पाखंडपूर्ण पारम्परिक नैतिकता, और चाटुकारिता की दासतापूर्ण वृत्ति से होता है। कूपमंडूक महानगरीय जीवन की अच्छाई-बुराई के विराट फलक से डरता और चिढ़ता है और अपने भीतर कस्बाई सुस्ती और आत्मतुष्ट गँवारपन को लिए हुए मुम्बई-बैंगलुरु ही नहीं, बल्कि पश्चिम के शहरों तक में जी आता है। कूपमंडूक हरदम अपने निजी अनुभवों की दुहाई देता है और तर्क और विज्ञान की बातों से नफ़रत करता है। कूपमंडूक हर जगह अपने हित ताड़ता रहता है, लेकिन कोई भी कदम उठाने से पहले नेवले की तरह सर उठाकर हवा को सूँघते हुए चौकन्नी निगाहों से चारों ओर देखता है कि कहीं कोई जोखिम तो नहीं! कूपमंडूक हमेशा सोचता है कि नयी पीढ़ी बर्बाद हो गयी है और उससे कोई उम्मीद नहीं की जा सकती। वह अपने बाल-बच्चों से हरदम असंतुष्ट रहता है और चाहता है कि जीवन में वह जो कुछ भी नहीं कर पाया, वह सब कुछ उसके बच्चे कर डालें । वह हमेशा वर्तमान से खिन्न रहता है, भविष्य उसे अंधकारमय दीखता है और सारी अच्छाइयाँ अतीत में नज़र आती हैं! वह हमेशा नैतिकता के बारे में बातें करता है, पर खुद हमेशा अनैतिक ख्यालों में डूबा रहता है, पर डर के मारे अनैतिक काम करने से बचता है और कल्पना करता है कि काश, उसे ऐसी जगह जाने का अवसर मिले, जहाँ वह जमकर लम्पटपना करे और उसे पहचानने वाला कोई न हो, कूपमंडूक धर्म को मनुष्यता के लिए अनिवार्य और विज्ञान को विनाशकारी मानता है। कूपमंडूक अपने को आदर्शवादी बताता है और भौतिकवाद से घोर घृणा का प्रदर्शन करता है। उसके लिए भौतिकवाद का मतलब है, पेटूपन, पियक्कड़पन, दुर्वासनाएँ, दंभ, धनलिप्सा, लोलुपता, तृष्णा, मुनाफाखोरी आदि! और आदर्शवाद शब्द का अर्थ वह सदाचार, लोकोपकार, संयम आदि समझता है, जिसकी औरों के सामने वह खूब डींगें हाँकता है, पर उनमें विश्वास तभी करता है जब ज्यादा पीने से उसके सिर में दर्द हो जाता है, या वह दिवालिया हो जाता है, यानी हर उस स्थिति में जिसे वह अपनी "भौतिकवादी" ज्यादतियों का नतीज़ा समझता है। कूपमंडूक नाना प्रकार के अनुभवों से गुजरने वाली उन मोटी तोंदों के प्रति काफ़ी श्रद्धाभाव रखता है, जो कांट के अनुसार, पिचकती हैं तो अश्लीलता बन जाती हैं, और यदि फूलती हैं तो धार्मिक प्रेरणा बन जाती हैं। कूपमंडूक हमेशा झुककर मजबूत के शासन को स्वीकार करता है और फिर उतनी ही निर्मम निरंकुशता के साथ अपने से कमजोर और बेबस को, जैसे कि अपनी पत्नी और बच्चों को दबाता है। कूपमंडूक अपने घर में एक छोटी सी रियासत के राजा जैसा होता है। वह सत्ता को देवत्व-मंडित जैसा कुछ मानता है, सत्ता से पुरस्कृत-सम्मानित होने को मोक्ष-प्राप्ति सरीखा समझता है। कूपमंडूक यदि वामपंथी भी हो तो सरकारी अफसरों के आगे झुक कर कोर्निश बजाता है। सरकारी अफसर अगर लेखक हों तो उनके दरबार में पहुँचकर वह स्वयं को इन्द्रसभा में बैठा हुआ महसूस करता है और उस अफसर लेखक को प्रेमचंद और निराला का वारिस बताता रहता है। कूपमंडूक ज्ञान से हमेशा आतंकित रहता है, पर उसकी कुंठा यह होती है कि वह लोगों के बीच ज्ञानी के रूप में प्रतिष्ठा भी चाहता है। वह इस स्थायी भय में जीता रहता है कि लोग उसकी मूर्खता पकड़ लेंगे, इसलिए वह विद्वानों की बातों पर जोर-जोर से सिर हिलाता है। कूपमंडूक को चुटकुले सुनने-सुनाने में बहुत मज़ा आता है। वह बेहद गैर-ज़रूरी बातें भी बेहद गंभीर मुद्रा में करता है। कूपमंडूक हर तरह के आन्दोलन और सामाजिक अशांति से नफ़रत करता है। वह डंडे के अनुशासन से श्वानवत प्यार करता है और यह कहता रहता है कि लोगों के पिछवाड़े डंडे लगाकर सबकुछ ठीक कर देना चाहिए, पर अपना पिछवाड़ा वह हर सूरत में बचा लेना चाहता है। कूपमंडूक अपने परिष्कृत और प्रांजल रूप में भी विवेकशील नागरिक का प्रहसन होता है। वह हमेशा मूल की जगह नक़ल को या कार्टून को तरजीह देता है। तूफ़ान से वह भय खाता है, लेकिन तूफ़ान अपने पीछे जो कीचड़-कचरा छोड़ जाता है, उसमें उसे स्वर्गिक सुख की अनुभूति होती है। कूपमंडूक विचारों की जटिलता और अमूर्तता से घबराता है, हर चीज़ को सरल-संक्षिप्त रूप में जानना चाहता है और अपनी बात करने की जगह हरदम ऐसे जुमले बोलता रहता है कि यह बात आम लोगों की समझ में नहीं आयेगी। मार्क्स ने कहीं लिखा था कि जर्मन कूपमंडूकता का दलदल इतना विराट है कि गोएठे और हेगेल जैसी महान हस्तियों के पैर भी कभी-कभी उस दलदल में फँस गए। भारतीय कूपमंडूकता का दलदल उससे भी कई गुना अधिक विराट है। यहाँ तो प्रसिद्ध लेकिन बौने क़द के ज्यादातर वाम बुद्धिजीवी और साहित्यकार भी इसी दलदल में लोटपोट होते रहते हैं और सत्ता उनके सामने चारा फेंकती रहती है। मार्क्स ने 1863 में लिखा था :"यह सही है कि पुरानी दुनिया कूपमंडूक की है। लेकिन हमें कूपमंडूक को ऐसा भूत नहीं मानना चाहिए, जिससे भय खाकर पीछे हट जाएँ। इसके विपरीत, हमें उस पर नज़र रखनी चाहिए। दुनिया के इस मालिक का अध्ययन करना उपयोगी है।" पुरानी दुनिया को नष्ट करने का प्रोजेक्ट सिर्फ़ अभाव, अत्याचार, शोषण, युद्ध, भुखमरी, व्यभिचार, विलासिता और अमानवीयता की दुनिया को नष्ट करने का ही प्रोजेक्ट नहीं है, बल्कि यह कूपमंडूक के साम्राज्य को तहस-नहस करने का भी प्रोजेक्ट है! (लेखिका अध्ययनशील सामाजिक कार्यकर्ता हैं)