फरवरी 2019

उम्मीदों की मानव-श्रृंखला

डॉ. रश्मि रावत

केरल में सबरीमाला के मंदिर में परम्परा द्वारा प्रतिबंधित आयु की दो स्त्रियों के प्रवेश के दौरान और उसके तुरंत पहले और बाद में जिस तरह का घटनाक्रम घटा है, वह कई दिशाओं में कई तरह से सोचने पर मजबूर करता है। लोकतांत्रिक भारत के नागरिक होने की हैसियत से स्त्रियों को आर्थिक, सामाजिक विकास के साथ ही आध्यात्मिक विकास करने का भी पूरा हक है। सामाजिक विकास का यह पड़ाव तो कभी आना ही था, जब देवता के साथ मनुष्य सीधे बिना किसी मध्यस्थ के सम्बंध जोड़ना चाहे।

कभी राजा को ईश्वर का प्रतिनिधि माना जाता था और ब्राह्मण को ईश्वर का प्रवक्ता। वह दौर नहीं रहा तो रजस्वला स्त्रियों को अशुद्ध मानते चले जाने की परम्पराएँ आधुनिक समाज में कैसे चलती रह सकती हैं? इसलिए यह तो सवाल है ही नहीं कि रजस्वला आयु की स्त्रियों को अयप्पा देव के दर्शन-पूजन करने देना चाहिए या नहीं। समान नागरिक अधिकारों के तहत स्त्री स्वयं तय कर सकती है कि उसे क्या और कब करना है। सर्वोच्च न्यायालय के आस्था के क्षेत्र में प्रवेश को अनुचित माने जाने के तर्क बेबुनियाद हैं। समुदायों के विभिन्न सांस्कृतिक, आध्यात्मिक अभ्यास के संवैधानिक नागरिकों के साथ टकराव होने की स्थिति में न्यायालयों का अब तक जो रुख रहा है, उस इतिहास में न जा कर सबरीमाला के मुद्दे तक ही खुद को सीमित रखें तो भी कोर्ट धर्म के क्षेत्र में प्रतिबंध लगा सकता है तो प्रतिबंध हटा क्यों नहीं सकता? इस मुद्दे से गरमाई बहसों ने एक महत्वपूर्ण काम यह किया कि समाज के बहुत बड़े टैबू को तोड़ दिया है। जो लोग बिना कुछ सोचे-विचारे मासिक स्राव के दिनों में किए जाने वाले भेदभाव की परम्परा को निभा रहे थे। इस पर पुनर्विचार करने के लिए प्रवृत्त हुए और बड़े पैमाने पर समाज की जड़ सोच में बदलाव आया और कई लड़कियों ने, स्त्रियों ने खुद को इस हीन स्थिति से बाहर निकालने के सिए स्टैंड लिए। केरल के पेरियार टाइगर रिजर्व की सबरीमाला की पहाड़ियों में स्थित इस मंदिर में अयप्पा देव की पूजा की जाती है, माना जाता है कि उन्होंने ब्रह्मचारी रहने का संकल्प किया था। इस मंदिर के परिसर में किसी भी तरह के यौन क्रिया-कलाप पूर्णतः वर्जित हैं और दर्शनार्थी 41 दिन के व्रत और नियत शुद्धाचरण का पालन करने के बाद ही दर्शन करते हैं। सन 1991 से पहले तक यदा-कदा 10 से 50 वर्ष तक की स्त्रियाँ इस मंदिर में चली जाया करती थीं। कन्नड़ अभिनेत्री जयमाला ने भी मंदिर में ब्रहमचारी देव अयप्पा को स्पर्श किए जाने का खुलासा किया था। तब भी मीडिया में सबरीमाला मंदिर पर खूब चर्चाएँ हुई थीं। 1991 में दायर याचिका की सुनवाई पर केरल हाई कोर्ट के निर्णय के तहत 10 से 50 वर्ष की उम्र की स्त्रियों का प्रवेश प्रतिबंधित हो गया। आश्चर्य कि सामान्य पुरुष हो या देव पुरुष अपने ब्रह्मचर्य के लिए स्त्रियों पर निर्भर करता है। कुछ साल पहले प्रवेश के अधिकार को लेकर फिर से याचिका दायर की गई। मंदिर की समिति का कहना था कि जाँच करने वाली मशीन जब आ जायेगी, जिससे पता चलाया जा सके कि प्रवेश के समय कोई स्त्री मासिक स्राव की प्रक्रिया से गुजर रही है, तब आयु का बंधन स्त्रियों के ऊपर से हटा लिया जाएगा। अशुद्धि और अस्पृश्यता की रूढ़ मानसिकता को बदलने की क्षीण कोशिश तक धर्म के इन पहरुओं की नहीं दिखती। थोड़ी देर के लिए आध्यात्मिक विकास के स्त्रियों के अधिकार को छोड़ भी दें तो धर्म द्वारा नियत की गई पूर्वशर्तों का पालन किया जा रहा है या नहीं, इसकी जाँच तो कभी भी नहीं की जाती। भक्तों की श्रद्धा पर भरोसा किया जाता है। आस्था में संदेह की गुंजाइश कहाँ होती है? स्त्री को अछूत और अपवित्र माने जाने के इस रवैये से क्षुब्ध हो कर बड़े पैमाने पर युवा लड़कियों ने सोशल मीडिया पर 'हैप्पी टू ब्लीड' मुहिम चलाई। इसे अच्छा-खासा समर्थन मिला और यह पता चला कि महानगरीय युवा स्त्रियों की चेतना में इन जैविक क्रियाओं को लेकर कोई ग्रंथि नहीं है। वे इसे सहज भाव से लेती हैं और इसके कारण किसी भी तरह का अलगाव उन्हें स्वीकार्य नहीं है। उनकी स्वाभाविक सोच थी कि मैं शुद्ध हूँ तो मेरे भीतर के सब हिस्से शुद्ध हैं और यह प्रक्रिया मुझे विराट सृजन की सृष्टि से जोड़ती है, जिसके लिए गौरव बोध हो सकता है, लज्जा तो कतई नहीं। 28 सितम्बर को सर्वोच्च न्यायालय ने खास उम्र की स्त्रियों पर लगे ये प्रतिबंध हटा लिए। संविधान के तहत स्त्रियों को मिले समानता और स्वतंत्रता के अधिकार को परम्पराएँ हानि नहीं पहुँचा सकतीं। अस्पृश्यता किसी के भी प्रति नहीं बरती जा सकती। उसके बाद से कई बार स्त्रियों ने प्रवेश की कोशिश की, पर इस निर्णय के विरोध में होने वाले प्रदर्शनों के कारण यह सम्भव नहीं हो पा रहा था। धार्मिक परम्पराओं की जड़ें आम जनता में इतनी गहरी हैं कि उसमें जरा भी बदलाव लोगों को असह्य होता है। भाजपा और कांग्रेस के न्यायालय के निर्णय के विरोध में होने ने स्थिति को और अधिक बिगाड़ दिया। देश के सर्वोच्च न्यायालय को सत्तासीन केंद्रीय सरकार और देश का विपक्ष ही न माने। यह एक भयावह संकेत है। निर्णयों के क्रियान्वयन की भूमिका जिनके पास है, वही अगर प्रतिगामी हो जाएँ। न केवल सामाजिक प्रगति के लिए उदासीन अपितु नकारात्मक भूमिका भी निभाने लगें तो यह स्थिति बेहद चिंताजनक है। सदियों पुराने विषमतामूलक रूढ़ मूल्यों को संविधान के ऊपर वरीयता दिए जाने की इच्छा समाज के लिए अशुभ संकेत है। इस इच्छा के मुखर हो कर सरेआम कोर्ट की अवमानना करने और विरोध प्रदर्शन करने की दिशा में सक्रिय हो जाने के नजारे देश-विदेश में देखे गए। संयुक्त राष्ट्र की ओर से भी कोर्ट के निर्देशों को पालन करने के सुझाव आए। राष्ट्रीय दलों का यह रवैया उनके विकास विरोधी नजरिए को उद्घाटित करता है। धर्म को राजनैतिक हितों की पूर्ति का साधन बनाए जाने की बढ़ती प्रवृत्ति पर भी रोशनी डालता है। ये रूढ़ परम्पराएँ लैंगिक और जातिगत विषमता को कायम रखने का जरिया बनती हैं। इससे एक ओर सामाजिक रूप से वर्चस्वशाली वर्ग की सत्तात्मकता अक्षुण्ण बने रहने की कुत्सित इच्छा पूरी होती है दूसरी ओर राजनीतिक दल अपने संकीर्ण हितों की पूर्ति के लिए भी विषमता की इस स्थिति को बनाए रखने का दाँव खेलते हैं। इससे बदलती सामाजिक गतिकी के साथ समतामूलक न्यायपूर्ण समाज की ओर बढ़ने की उम्मीद खंडित होती है। जिस देश में सब महत्वपूर्ण निर्णयों का आधार जाति और धर्म के समीकरण हों, उसमें विकास कैसे सम्भव हो भला। अस्पृश्यता की अपमानजनक स्थिति जिसने स्वयं झेली हो, वह किसी भी आधार पर किसी के भी साथ ऐसे भेदभाव को स्वीकार नहीं कर सकता। कनकदुर्गा और बिंदु अम्मीन नामक दो स्त्रियों के दर्शन करने के बाद मूर्ति की शुद्धिकरण की जो प्रक्रिया सम्पन्न की गई, वह गरिमाहीन तो है ही, उच्चतम न्यायालय की अवमानना भी है। हमारे समाज की विषमतामूलक मानसिक संरचना की परतें इससे उघड़ती हैं कि कैसे बहुसंख्य जनता को मानवीय गरिमा से हीन जीवन जीने के लिए विवश कर दिया जाता है। दो रजस्वला उम्र की स्त्रियों के मंदिर प्रवेश से पूरे राज्य में जो बवंडर मचा हुआ है, उनमें बहुसंख्य प्रतिशतता उच्च वर्ण के पुरुषों की है और स्वाभाविक ही है कि उन पुरुषों से सम्बंधित एवं उन पर आश्रित स्त्रियाँ तो इस विरोध प्रदर्शन में शामिल हों ही। धार्मिक और सामाजिक परम्पराओं ने स्त्रियों को स्वतंत्र व्यक्तित्व के रूप में विकसित होने ही कहाँ दिया कि वे खुद अपने लिए और अपने हित में निर्णय ले सकें। इसलिए पुरुषसत्तात्मकता को पुष्ट करने में स्त्रियों का भरपूर सहयोग पुरुषों को सरलता से मिल जाता है। यही तो सत्ता का चरित्र होता है कि ज्ञान की, शक्ति की हर संरचना पर वह अपना शिकंजा कसती जाती है और समय के साथ जटिल होती सामाजिक संरचना के साथ भी अपना सुविधाजनक तालमेल बना लेती है। आधुनिक समाजों में उसकी रणनीतियाँ बदल जाती हैं पर दबदबा बना रह जाता है। इसलिए आश्चर्य नहीं कि स्त्रियों के प्रवेश के इस फैसले के विरुद्ध स्त्रियाँ बड़े पैमाने पर लामबंद हुईं। प्रगतिशीलता के प्रतिरोध से भरी इन स्त्रियों का आवेश देखते बनता था। सुखद आश्चर्य तो हुआ फैसले के क्रियान्वयन के लिए लगभग 50 लाख स्त्रियों के द्वारा लगभग 600 किमी मानव श्रृंखला बनाने की ऐतिहासिक घटना से। केरल के राजमार्ग 2 जनवरी को इतिहास बनाने वाली स्त्रियों से अटे पड़े थे। स्त्रियाँ जो गरिमापूर्ण जीवन जीना चाहती हैं। स्त्रियाँ जो बराबरी के अधिकार को हासिल करने के लिए जागरूक हो गयी हैं। स्त्रियाँ जो स्त्रियों के पक्ष में खड़ा होना सीख चुकी हैं। बहनापे की एक ऐसी मिसाल इस घटना से कायम हो गई है कि इसका संवेग बहुत समय तक समाज को उचित दिशा में गतिशील होने की भूमिका निभाता रहेगा। इतनी बड़ी संख्या में स्त्री सरोकारों से लैस स्त्रियों को साथ देखने मात्र से पुरुष सत्तात्मकता को जायज समझे जाने की मानसिकता पर एक धक्का लगा होगा। जिन मानवीय दुर्बलताओं से रस ग्रहण कर पितृसत्तात्मकता अपने लिए नैतिक बल जाने-अनजाने खींचती है। उसमें सेंध तो निश्चित तौर पर इस घटना से लगी है। स्त्रियों के पक्ष में दिए गए निर्णय को स्त्रियों की सहायता से ही अभ्यास में लाया जाना सम्भव हुआ। इस अनुभव से स्त्रियों को अपनी ताकत का अहसास हुआ होगा। उम्मीद की जा सकती है कि आगे भी अपने अधिकारों के लिए वे घर की परिधि से बाहर निकल कर साथ आएंगी और आपस में एक वर्ग बनाएंगी। कानून पढ़ाने वाली बिंदु अम्मीन को उनके इस कदम के लिए पति, बच्चों और विद्यार्थियों से सहयोग प्राप्त है, इसलिए कुछ दिन छिप कर बिताने के बाद वे अपनी नियमित जीवन गतिविधियों निभाते हुए सामान्य जिंदगी जी रही हैं। उनसे सम्बद्ध लोगों को इनके इस कदम से नई ऊर्जा, गतिशीलता ही मिली होगी। कनकदुर्गा को अपने इस कदम के लिए पहले सास की हिंसा झेलनी पड़ी। अब मायके और ससुराल के दोनों परिवारों ने उन्हें छोड़ दिया है। जब तक वह समुदाय की भावना को आहत करने के लिए माफी नहीं मांग लेतीं और प्रायश्चित नहीं कर लेतीं, तब तक उनके पति और भाई उनसे कोई सम्बंध नहीं रखना चाहते। फिलहाल वे अपने परिवार से अलग सरकारी आश्रयगृह में दिन बिता रही हैं। शुभेच्छा तो यही है कि वे जल्द ही इच्छित जिंदगी को प्राप्त करें। वरन हमेशा की तरह यह सवाल रह ही जाएगा कि समाज के बदलाव की प्रतीकात्मक भूमिका निभाने वाले लोगों को जो कीमत अदा करनी पड़ती है। क्या चेतना का क्रमिक विकास इस तरह नहीं किया जा सकता कि व्यक्ति को यह या वह में से चुनना न पड़े? स्त्री के मामले में तो इतिहास ही रहा है कि प्रगतिशीलता के क्रिया-कलापों में जब भी उसने बढ़-चढ़ कर भाग लिया, उसे अपने सामान्य जीवन से विचलन झेलना पड़ा। इसलिए विकास की प्रक्रिया कुछ इस तरह की होनी चाहिए कि उसके लिए समाज की सामूहिक चेतना को पूरी प्रतिबद्धता के साथ तैयार किया जाए। बुद्धिजीवी इस भूमिका को पर्याप्त ईमानदारी से निभाने में सफल नहीं हुए हैं। उनकी इस असमर्थता का मूल कारण विचारधारा और आचरण में खाई का होना है। विचारों को साकार होने के लिए शब्द और अर्थ के बीच में जो सम्बंध स्थापित होना चाहिए, वह कथनी-करनी में भेद के कारण बन ही नहीं पाता। व्यक्ति के अपने खुद के अकेले के प्रयासों के कारण ही आध्यात्मिक मुक्ति मिल सकती है। सामाजिकता, सामूहिकता की किसी सहभागिता की दरकार इसके लिए व्यक्ति को नहीं है। घोर वैयक्तिकता के इस पक्ष के कारण भी आध्यात्मिकता को बौद्धिक विमर्श स्वीकार नहीं करते। इस पक्ष को नकार कर मानवीय विकास के वैकल्पिक सामाजिक तरीके आधुनिक विचारधाराओं ने अपनाए। पर उनकी वस्तु स्थिति भी कमोबेश यही है कि हर व्यक्ति केवल अपना हित देखता है। सैद्धांतिक तौर पर तो बहुत विकास हुआ है किंतु आचरण में इतनी फाँक है, इतनी स्वकेंद्रितता है कि समाज का बहुसंख्य वर्ग अपनी दिशाएँ जिन्हें देख कर यह करता है, उनसे उसका कोई सम्बंध ही नहीं बन पाता। बुद्धिजीवी वर्ग को अपनी भूमिका के प्रति सचेत हो कर ईमानदारी से काम करने की जरूरत है, ताकि विकास की वह स्थिति पैदा हो सके, जहाँ मशाल लेकर अगुआई करने वाला खुद अंधेरे में जाने के लिए अभिशप्त न हो। (लेखिका दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापन के साथ ही विभिन्न साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं के लिए नियमित लिखती हैं)