फरवरी 2019

ये कौन से गरीब हैं, जिन्हें आरक्षण मिलेगा?

प्रियदर्शन

- सरकार सरकारी नौकरियों में आर्थिक आधार पर 10 फीसदी आरक्षण को ऐतिहासिक फैसला बताने में लगी है। बेशक, यह ऐतिहासिक है - इस मायने में कि इससे बराबरी का आगे बढ़ने वाला रास्ता नहीं खुलता, बल्कि ऐतिहासिक अन्याय और गैरबराबरी की वह गली खुलती है, जिसने अब तक वंचित तबकों को वंचित रखा है। यह गरीबों को दिया जाने वाला आरक्षण नहीं है। अगर होता तो उसके लिए गरीबी रेखा के आसपास की कोई कसौटी नियत की जाती। यह अगड़ों को आर्थिक आधार पर दिया जाने वाला आरक्षण है। जो लोग महीने में 65,000 रुपये कमाते हैं, वे इस आरक्षण का लाभ ले सकते हैं। ज़ाहिर है, इन्हें गरीब मानना गरीबों का अपमान करना है।

आरक्षण को लेकर भाजपा और कांग्रेस जैसी मूलतः अगड़े वर्चस्व वाली पार्टियां हमेशा दुविधा में रहीं। लेफ्ट फ्रंट को भी जातिगत आधार पर आरक्षण के सिद्धांत का समर्थन करने में वक्त लगा। संघ परिवार खुलेआम आरक्षण का विरोध करता रहा। 1990 में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने पिछड़ी जातियों के आरक्षण के लिए मंडल आयोग की सिफारिशें लागू करने का ऐलान किया, तो देशभर में जो मंडल-विरोधी आंदोलन चल पड़ा, उसे इन राजनीतिक दलों की शह भी हासिल थी। मंडल की काट के लिए भाजपा ने कमंडल का दांव भी खेला। आरक्षण का अगर खुलकर किसी ने विरोध नहीं किया, तो उसके पीछे पिछड़े वोट खो देने का डर था, लेकिन आरक्षण के सवाल पर भारतीय समाज किस कदर बंटा रहा, यह विश्वनाथ प्रताप सिंह को लेकर भारतीय समाज की बंटी हुई राय बताती है। मंडल आयोग की सिफारिशों पर अमल के अपने फैसले के साथ वीपी सिंह एक वर्ग के लिए बिल्कुल मसीहा हो बैठे, तो दूसरे के लिए बिल्कुल खलनायक। लेकिन आरक्षण की राजनीति सारी अनिच्छाओं और दुविधाओं से ज़्यादा ताकतवर निकली। आने वाले वर्षों में आरक्षण के दायरे से बाहर खड़ी जातियां आरक्षण की मांग करती रहीं, जो इन वर्षों में कुछ और तेज़ और आक्रामक हो गई। गूजरों और जाटों से शुरू होकर अब यह मांग पटेलों और मराठों तक जा पहुंची है और उनके लिए राज्यों के स्तर पर आरक्षण के प्रावधान किए जाते रहे हैं। दिलचस्प यह है कि यह राजनीति उस दौर में सबसे ज़्यादा परवान चढ़ रही है, जब आरक्षण के विरोध में दलीलें बड़ी होती जा रही हैं। यह बार-बार कहा जा रहा है कि आरक्षण के फायदे इच्छित वर्गों तक नहीं जा रहे हैं। किसी न किसी ढंग से मलाईदार तबका इसका फायदा उठा ले रहा है। यह भी कहा जा रहा है कि जब सरकारी नौकरियां लगातार कम होती जा रही हैं, तब इस आरक्षण का क्या मतलब है...? अब इन सारे तर्कों के समानांतर सरकार ने आरक्षण के दरवाज़े सामान्य श्रेणी के लोगों के लिए भी खोल दिए हैं। ज़ाहिर है, यह 2019 से पहले उन सवर्णों को लुभाने की कोशिश है, जो हाल के दिनों में भाजपा सरकारों के खिलाफ आंदोलन और वोट करते नज़र आए। ख़ास बात यह भी है कि इस 10 फीसदी आरक्षण का जो आर्थिक आधार सरकार ने बनाया है, उसमें मोटे तौर पर पूरा मध्य वर्ग शामिल हो सकता है। 'Times of India' की रिपोर्ट बताती है कि सरकार द्वारा तय आर्थिक कसौटियों के आधार पर देश की 95 फीसदी आबादी अब आरक्षण के दायरे में आ जाएगी। दरअसल, यह गरीबों को दिया जाने वाला आरक्षण नहीं है। अगर होता, तो उसके लिए गरीबी रेखा के आसपास की कोई कसौटी नियत की जाती। यह अगड़ों को आर्थिक आधार पर दिया जाने वाला आरक्षण है। जो लोग महीने में 65,000 रुपये कमाते हैं, वे भी इस आरक्षण का लाभ ले सकते हैं। ज़ाहिर है, इन्हें गरीब मानना गरीबों का अपमान करना है। सवाल है, क्या सरकार यह बात नहीं समझती है...? दरअसल, यहां भारतीय गरीबी का एक और पेंच खुलता है। भारत के ज़्यादातर गरीब पिछड़े, दलित-आदिवासी और मुसलमान हैं। अगर गरीबी रेखा कसौटी बनी होती, तो वहां भी यही लोग मिलते, इसलिए इन्हें आरक्षण से बाहर कर अगड़ों का आरक्षण सुनिश्चित किया गया। लेकिन आरक्षण का यह शोशा क्या अपनी नाकामी छिपाने की सरकार की कोशिश है...? क्योंकि यहां भी वही सवाल उठ रहे हैं, जो पहले से आरक्षण विरोधी पूछते रहे हैं। जब सरकारी नौकरियां बची ही नहीं हैं, तो आरक्षण के वास्तविक फायदे किसे मिलेंगे...? लेकिन फिर जो समुदाय - पटेल, मराठा, जाट, गूजर - आरक्षण मांगते रहे हैं, वे क्यों मांगते रहे हैं...? क्योंकि आरक्षण के सैद्धांतिक विरोध की राजनीति को इन्हीं पार्टियों ने दो तरह से इस्तेमाल किया। आरक्षितों को बताया कि तुम्हारे लिए तो नौकरियां ही नहीं हैं, जो आरक्षण है, वह बस झुनझुना है, जबकि आरक्षण के दायरे से बाहर खड़े लोगों को बताया कि तुम्हारे हिस्से की नौकरियां आरक्षण वाले ले जा रहे हैं। दरअसल यह समाज में घटती नौकरियां और बढ़ती बेरोज़गारी है, जो अलग-अलग समुदायों को इस छीना-झपटी के लिए मजबूर कर रही है। पहले खेती या जमींदारी या कारोबार पर निर्भर जातियां भी अलग-अलग वजहों से आर्थिक संकट की चपेट में हैं और उन्हें लगता है कि उन्हें सरकारी नौकरी मिलेगी, तो उनके दिन सुधरेंगे। जिन लोगों को अपने लिए पिछड़ा कहा जाना अपनी मूंछ नीची करने के बराबर लगता था। वे सब पिछड़ी पहचान के लिए उतारू हैं - बिना यह जाने कि इससे भी नौकरी नहीं मिलेगी...? यानी सरकार नौकरियां नहीं दे पा रही, रोज़गार के नए इंतज़ाम नहीं कर पा रही, लेकिन आरक्षण दे रही है। देखने लायक बात यह है कि मायावती और जैसे नेता भी इस सवर्ण आरक्षण का समर्थन कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें मालूम है कि यह वह झुनझुना है, जो बजना नहीं है। तो फिर इस आर्थिक आरक्षण से क्या मिलेगा...? बस, यह संतोष कि इससे आरक्षण की मूल अवधारणा ही चौपट हो जाती है। आरक्षण नौकरियों में अवसर या गरीबी दूर करने का उपक्रम नहीं था, वह उस ऐतिहासिक अन्याय से पैदा फासले को पाटने की कोशिश था, जिसने कई तबकों को सामाजिक तौर पर बहुत पीछे छोड़ दिया था। यह आरक्षण न होता, तो सार्वजनिक जीवन में दलितों-आदिवासियों या पिछड़ों की वह प्रबल उपस्थिति न होती, जो आज दिखाई पड़ती है। वरना वर्चस्वशाली तबकों ने अपनी ओर से सामाजिक-आर्थिक समानता की किसी भी कोशिश को नाकाम करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। दरअसल, जो लोग अब बता रहे हैं कि आरक्षण की जगह शिक्षा और अवसरों में सबको बराबरी का अवसर दिया जाता, तो अच्छा होता, वे भूल जाते हैं कि सरकार और प्रशासन के स्तर पर उन्हीं के प्रतिनिधि थे, जिन्होंने लगातार इस बराबरी को स्थगित किया। दरअसल, आरक्षण सिर्फ नौकरियों में अवसर का मामला नहीं है, देश के संसाधनों में हिस्सेदारी का भी मामला है। धीरे-धीरे ये संसाधन ज़्यादातर निजी क्षेत्र में जा रहे हैं। इस निजी क्षेत्र की संरचना को ध्यान से देखें, तो आप पाएंगे कि वहां भारत के सामाजिक-सांस्कृतिक वैविध्य का ज़रा भी प्रतिनिधित्व नहीं होता है - उलटे वहां भारत की सामाजिक संरचना में व्याप्त आर्थिक गैरबराबरी बहुत बेशर्मी के साथ जमी हुई दिखाई पड़ती है। लगभग तमाम दफ़्तरों में ऊंचे और मलाईदार ओहदों पर सामान्य श्रेणी के लोग बैठे हैं, जबकि उन्हीं दफ्तरों में जो निचली श्रेणी के काम हैं - चाहे वह झाड़ू-पोंछा लगाने का हो, चाय पिलाने का हो, बाथरूम साफ़ रखने का हो - यह सब बिना आरक्षण के पिछड़ी और अनुसूचित जातियों के हिस्से चले आते हैं। निजी क्षेत्र में आरक्षण या सामाजिक वैविध्य के सिद्धांत को जगह दिलाने की मांग बरसों पुरानी है, लेकिन सरकार यह काम नहीं कर रही। निजी क्षेत्र को हर तरह की छूट हासिल है - आरक्षण से भी, श्रम कानूनों से भी, कर्मचारियों के हितों के लिए लागू की जाने वाली योजनाओं से भी, काम के घंटों से भी, और तो और भ्रष्टाचार से भी। लेकिन इन सबको दुरुस्त करने की जगह सरकार सरकारी नौकरियों में आर्थिक आधार पर 10 फीसदी आरक्षण को ऐतिहासिक फैसला बताने में लगी है। बेशक, यह ऐतिहासिक है - इस मायने में कि इससे बराबरी का आगे बढ़ने वाला रास्ता नहीं खुलता, बल्कि ऐतिहासिक अन्याय और गैरबराबरी की वह गली खुलती है, जिसने अब तक वंचित तबकों को वंचित रखा है।