फरवरी 2019

यह कैसा मास्टर स्ट्रोक?

अभय कुमार दुबे

तीन राज्यों के विधानसभा चुनावों में हार के बाद बीजेपी को नई रणनीति अपनाने को मजबूर होना पड़ा। ऊँची जातियों को दस फ़ीसदी का आरक्षण भी इसी का नतीजा है। कुछ जानकारों ने दावा किया है कि मोदी ने इस आरक्षण से एक ऐसा मास्टर स्ट्रोक मार दिया है, जिससे 2019 के चुनाव के लिए पूरी हवा उनके पक्ष में बहने लगेगी, लेकिन क्या डरे हुए नेता मास्टर स्ट्रोक मार सकते हैं?

कुछ जानकारों ने दावा किया है कि मोदी ने ऊँची जातियों को दस फ़ीसदी का आरक्षण घोषित करके एक ऐसा मास्टर स्ट्रोक मार दिया है, जिससे 2019 के चुनाव के लिए पूरी हवा उनके पक्ष में बहने लगेगी। इस तरह का विश्लेषण ताज्जुब में डाल देता है। अभी पहली तारीख़ को ही मोदी ने एएनआई को दिये इंटरव्यू में कहा था कि बीजेपी को ब्राह्मण-बनिया पार्टी मानने वाले ग़लती पर हैं। ठीक एक हफ़्ते बाद ही अपनी इस बात को ग़लत साबित करते हुए उन्होंने दिखा दिया कि ब्राह्मण-बनिया पार्टी की छवि से मुक्ति पाना बीजेपी के लिए कितना मुश्किल है। केवल बीजेपी ही ब्राह्मण-बनियों को आरक्षण दे सकती थी। और, बीजेपी के एक ऐसे प्रधानमंत्री ने यह आरक्षण दिया है जो पिछले चार साल से पिछड़े वर्ग का राष्ट्रीय नेता बनने की कोशिश कर रहा था। इसके लिए आयोग बैठाये जा रहे थे, कमेटियाँ गठित की जा रही थीं। सोशल इंजीनियरिंग की योजनाएँ तैयार की जा रही थीं। लेकिन, ऊँची जातियों द्वारा पिछले विधानसभा चुनाव में बीजेपी को दिये गये मामूली से झटके ने इस दीर्घकालीन योजना को पृष्ठभूमि में धकेल दिया। मेरा मानना है कि अगर बीजेपी ने तीन राज्यों को जीत लिया होता तो दस फ़ीसदी का यह आरक्षण कतई नहीं दिया जाता। उस सूरत में बीजेपी इस आग्रह पर अड़ी रहती कि ऊँची जातियों को अपनी नाराज़गी के बावजूद अंततः उसी को वोट देना पड़ेगा। लेकिन जैसे ही उसने देखा कि ऊँची जातियाँ विभिन्न प्रदेशों में बीजेपी का विकल्प तलाश रही हैं, और जहाँ विकल्प नहीं मिल रहा है, वहाँ उनके वोटर या तो हताश हो कर घर बैठ रहे हैं या नोटा दबा रहे हैं- पार्टी के रणनीतिकारों की प्राथमिकता बदल गई। ज़ाहिर है कि यह कदम अपने पारम्परिक जनाधार के खिसकने डर से उठाया गया है। और, डरे हुए नेता मास्टर स्ट्रोक नहीं मारते। और तो और, पार्टी, सरकार और उसके नेता का दिल यह सोच-सोच कर धड़क रहा होगा कि आठ दिन बाद जब सीबीआई के चीफ़ आलोक वर्मा चयन समिति द्वारा अधिकार सम्पन्न कर दिये जाएँगे तो क्या वे प्रशांत भूषण, अरुण शौरी और यशवंत सिन्हा की शिकायत के आधार पर रफ़ाल मामले में एफ़आईआर तो रजिस्टर नहीं कर लेंगे! वर्मा के रिटायरमेंट में तब पंद्रह दिन बाक़ी होंगे, लेकिन रपट लिखने में तो बस घंटा भर लगता है। भारतीय राजनीति का निकट इतिहास बताता है कि चुनाव से ठीक पहले उठाये गये लोकलुभावन कदमों का वांछित असर नहीं होता। वोटर उन कदमों को रिश्वत की तरह देखते हैं, और उनसे प्रभावित होने के बजाय दबदबे के साथ कहते-मानते हैं कि आने वाली सरकार इस सुविधा को छीनने वाली नहीं है। उलटे वह तो कुछ और नयी सुविधाएँ देगी। इसलिए अगर उन्होंने बदलाव का मन बना लिया है तो वे उससे पलटने के लिए तैयार नहीं होते। अगर यह मान भी लिया जाए कि सब कुछ मोदी सरकार की मर्ज़ी से ही होता चला जाएगा (हालाँकि ऐसा होना राजनीति में नामुमकिन ही होता है), तो भी सोचने की बात यह है कि क्या ऊँची जातियों के वोटों की गारंटी मिलने से मोदी को 2014 में मिले 31 प्रतिशत वोटों में कोई बढ़ोतरी होगी? कौन नहीं जानता कि पाँच साल पहले मोदी को मिले वोटों में ऊँची जातियों का दिल खोल समर्थन शामिल था। इसलिए अगर मोदी की यह रणनीति कामयाब होती भी है, तो 31 प्रतिशत वोटों को अमित शाह के वांछित 50 प्रतिशत वोटों की तरफ़ ले जाने वाली नहीं है। अगर मोदी को पिछली बार जितने वोट ही मिले तो ग़ैर-बीजेपी चुनावी एकता के बेहतर सूचकांक की स्थिति में बीजेपी सत्ता की दौड़ में पिछड़ सकती है। ऊँची जातियों में बीजेपी से नाराज़गी क्यों? ऊँची जातियों की बीजेपी से नाराज़गी का कारण केवल एससी-एसटी एक्ट पर उसका रवैया नहीं है। दरअसल, बीजेपी का यह परम्परागत वोट बैंक पिछले पाँच साल से देख रहा है कि मोदी के नेतृत्व में पूरी पार्टी का जम कर ओबीसीकरण हुआ है। ब्राह्मण-बनिया पार्टी की छवि बदलने के लिए मोदी द्वारा किये गये प्रयासों के कारण बीजेपी ने वह संतुलन खो दिया, जिसके तहत वह दीनदयाल उपाध्याय के ज़माने से ही ऊँची जातियों और पिछड़ों के एक हिस्से का चुनावी गठजोड़ हासिल करती रही है। 2014 और फिर 2017 में बीजेपी ने ऊँची जातियों के साथ गैर-यादव पिछड़ों और गैर-जाटव दलितों की स्वादिष्ट खिचड़ी पका कर असाधारण चुनावी सफलता हासिल की थी। यह पूरा समीकरण आरक्षण के इस फ़ैसले से बिगड़ सकता है। पता नहीं ऊँची जातियाँ इससे कितनी खुश होंगी, लेकिन इसका विपरीत असर उन पिछड़े और दलित समुदायों पर पड़ सकता है जो बीजेपी के साथ हाल ही में जुड़े थे। उत्तर प्रदेश में ओम प्रकाश राजभर की मदद लेकर ही बीजेपी कमज़ोर जातियों के वोटों की गोलबंदी कर पाई थी। राजभर ने इस दस फ़ीसदी आरक्षण के कदम का विरोध किया है। ऊँची जातियों को पटाने के चक्कर में बीजेपी इस सोशल इंजीनियरिंग को अपने ही हाथों से भंग कर सकती है। दूसरे, वह उस शहरी और आधुनिक युवा वोटर को भी निराश कर सकती है जो बाज़ार अर्थव्यवस्था में प्रगति के मौक़ों की तलाश में है, और आरक्षण की नीति से चिढ़ता है। पचास की जगह साठ फ़ीसदी आरक्षण का अंदेशा इस बेरोज़गार युवा वर्ग को बीजेपी का विकल्प तलाशने की तरफ़ ले जा सकता है। चुनाव नज़दीक आने पर इस तरह कदम के उठा कर राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश मेंढक तौलने के समान होती है। पलड़े में एक मेंढक रखने पर दूसरा उछल कर नीचे गिर जाता है। इधर, बीजेपी ऊँची जातियों को पटाने में लगी थी, उधर राजभर और अनुप्रिया पटेल की पार्टियाँ उसे नोटिस दे रही थीं कि अगर उन्हें लोकसभा चुनाव की वांछित सीटें नहीं मिलीं तो वे एनडीए से किनाराकशी कर लेंगी। असम गण परिषद अलग हो ही चुकी है। महाराष्ट्र में शिव सेना से संबंध भंग होने की स्थित में है। राजनीति रोज़ बदल रही है, लेकिन एक भी परिवर्तन बीजेपी को लाभ पहुँचाता नहीं दिख रहा है। (लेखक राजनीतिक विश्लेषक और विकासशील समाज अध्ययन पीठ (सीएसडीएस) में भारतीय भाषा कार्यक्रम के निदेशक हैं)