फरवरी 2019

आरक्षण की अवधारणा को भ्रष्ट करने का सुनियोजित प्रयास

अनिल जैन

हमारे संविधान निर्माताओं ने ऐतिहासिक कारणों से समाज के वंचित और शोषित जाति-समुदायों के सामाजिक व शैक्षणिक पिछड़ेपन को दूर कर उन्हें समाज की मुख्यधारा में शामिल करने के मकसद से संविधान में विशेष अवसर यानी आरक्षण की व्यवस्था की थी। लेकिन मोदी सरकार ने अपने फैसले को जिस तरह संवैधानिक जामा पहनाने की कवायद करते हुए आरक्षण के इस प्रावधान को गरीबी या बेरोजगारी उन्मूलन कार्यक्रम में बदल डाला है, वह हमारे स्वाधीनता आंदोलन के दौरान विकसित हुए मूल्यों, ऐतिहासिक पूना पैक्ट और फिर संविधान सभा में हुए आरक्षण संबंधी समूचे विमर्श से तैयार हुए संविधान के आरक्षण संबंधी प्रावधानों यानी संविधान की मूल आत्मा और आरक्षण की बुनियादी अवधारणा को भ्रष्ट करने वाली है।

करीब तीन साल पहले बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक रैली में जनता दल (यू) के नेता नीतीश कुमार के आरक्षण संबंधी एक बयान पर प्रतिक्रिया जताते हुए कहा था कि सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण की सीमा बांध दी है, जिसे कोई भी सरकार लांघ नहीं सकती.....अब जो कोई भी किसी को आरक्षण देना चाहेगा तो उसे कोई न कोई बेईमानी करनी पड़ेगी। अब तीन साल बाद उन्हीं नरेंद्र मोदी की सरकार ने अनारक्षित समुदायों के गरीबों को दस फीसदी आरक्षण देने का फैसला किया है। इस सिलसिले में संसद में संविधान संशोधन विधेयक पारित हो जाने पर प्रधानमंत्री ने कहा कि यह देश के इतिहास में ऐतिहासिक क्षण है। अब उनके इस फैसले को और ऐतिहासिक क्षण को उनके ही तीन साल पुराने बयान की रोशनी में क्या कहा जा सकता है! समझना मुश्किल नहीं है। सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में आर्थिक आधार पर आरक्षण दिए जाने के विभिन्न सरकारों के जो फैसले अब तक उच्च और सर्वोच्च न्यायिक समीक्षा में असंवैधानिक करार दिए जाते रहे हैं, अब केंद्र की मोदी सरकार ने उसी आशय के अपने फैसले को संवैधानिक जामा पहना दिया है। सरकार के इस फैसले का मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस सहित अन्य दलों ने भी 'किंतु-परंतु' के साथ समर्थन किया, जिससे इस सिलसिले में सरकार की ओर से पेश किया गया संविधान संशोधन विधेयक संसद ने आवश्यक दो तिहाई बहुमत से पारित कर दिया। अभी इस बात की न्यायिक समीक्षा होना शेष है कि सरकार की यह पूरी कवायद कितनी संविधान सम्मत रही। गौरतलब है कि हमारे संविधान में इस संविधान संशोधन के पारित होने से पहले तक आर्थिक आधार पर आरक्षण का कोई प्रावधान नहीं था। यही वजह रही कि 1991 में जब पहली बार पीवी नरसिंहराव सरकार ने आर्थिक पिछड़ेपन के आधार पर 10 फीसद आरक्षण देने का प्रस्ताव किया था तो सुप्रीम कोर्ट की नौ सदस्यीय पीठ ने उसे खारिज कर दिया था। अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा था कि संविधान में आरक्षण का प्रावधान सामाजिक गैर बराबरी दूर करने के मकसद से रखा गया है, लिहाजा इसका इस्तेमाल गरीबी या बेरोजगारी उन्मूलन कार्यक्रम के तौर पर नहीं किया जा सकता। 'इंदिरा साहनी बनाम भारत सरकार' के नाम से प्रसिद्ध इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि आर्थिक आधार पर आरक्षण दिया जाना संविधान में वर्णित समानता के मूल अधिकार का उल्लंघन है। अपने फैसले में आरक्षण के संवैधानिक प्रावधान की विस्तृत व्याख्या करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था- ''संविधान के अनुच्छेद 16 (4) में आरक्षण का प्रावधान समुदाय के लिए है, न कि व्यक्ति के लिए। आरक्षण का आधार आय और संपत्ति को नहीं माना जा सकता।'' सुप्रीम कोर्ट ने संविधान सभा में दिए गए डॉ. बीआर आंबेडकर के वक्तव्य का हवाला देते हुए सामाजिक बराबरी और अवसरों की समानता को सर्वोपरि बताया था। बाद में सुप्रीम कोर्ट के इसी फैसले की रोशनी में राजस्थान, गुजरात, हरियाणा आदि राज्यों की सरकारों के इसी तरह के फैसलों को उन राज्यों की हाई कोर्टों ने भी खारिज किया। इस आधार पर कहा जा सकता है कि अब मोदी सरकार अपने फैसले को जिस तरह संवैधानिक जामा पहनाने की कवायद की है, वह हमारे स्वाधीनता आंदोलन के दौरान विकसित हुए मूल्यों, ऐतिहासिक पूना पैक्ट और फिर संविधान सभा में हुए आरक्षण संबंधी समूचे विमर्श से तैयार हुए संविधान के अनुच्छेद 15,16, 340 आदि के प्रावधानों यानी संविधान की मूल आत्मा और आरक्षण की बुनियादी अवधारणा को भ्रष्ट करने वाली है। वैसे भाजपा का मातृ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) तो बुनियादी तौर पर आरक्षण की व्यवस्था के ही खिलाफ रहा है। उसके इस रुख का इजहार आरएसएस प्रमुख मोहन राव भागवत और संघ के अन्य पदाधिकारियों के बयानों के जरिए भी अक्सर होता रहता है। याद कीजिए, बिहार चुनाव के वक्त भागवत का आरक्षण की समीक्षा वाला बयान और रामनाथ कोविंद के राष्ट्रपति बनने के बाद भाजपा नेता सीपी ठाकुर का बयान कि अब आरक्षण की व्यवस्था खत्म करने पर विचार करना चाहिए, क्योंकि देश का राष्ट्रपति एक दलित व्यक्ति है। वैसे भाजपा भी मूल रूप से आरक्षण की व्यवस्था के खिलाफ रही है, लेकिन राजनीतिक तकाजों के मद्देनजर वह खुलकर तो उसका विरोध नहीं करती है, लेकिन उसका आग्रह आर्थिक आधार पर आरक्षण दिए जाने को लेकर रहता आया है, जो कि आरक्षण की मूल अवधारणा के खिलाफ है। भागवत के आरक्षण की समीक्षा वाले बयान के बाद मोदी का कहना कि ''मैं अपनी जान की कीमत पर भी आरक्षण की रक्षा करूंगा'', भाजपा की इसी ऊहापोह को दिखाता है। हालांकि नरेंद्र मोदी विभिन्न राज्यों में चुनाव के मौकों पर आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जाहिर करते रहे हैं, लेकिन अब आर्थिक आधार पर आरक्षण संबंधी उनकी सरकार का ताजा फैसला बताता है कि आरक्षण के मामले में उनका भी मूल नजरिया संघ और अपनी पार्टी के पारंपरिक सोच से जुदा नहीं है। दरअसल, मोदी सरकार इस समय नोटबंदी, जीएसटी, रॉफेल लड़ाकू विमान सौदे और मॉब लिंचिंग की घटनाओं को लेकर सवालों से बुरी तरह घिरी हुई है। रोजगार और खेती-किसानी के मोर्चे पर भी उसके खाते में नाकामी ही दर्ज है। इस सबके चलते पिछले दिनों हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में भाजपा को करारी हार का सामना करना पड़ा है। सर्जिकल स्ट्राइक, अर्बन नक्सल और प्रधानमंत्री की जान को खतरा जैसे मुद्दों से भी उसे चुनाव में कोई फायदा नहीं मिल पाया। अब तीन महीने बाद ही उसे आम चुनाव में भी उतरना है। ऐसे में आर्थिक आधार पर 10 फीसद आरक्षण के फैसले को मोदी सरकार के चुनावी दांव के रूप में देखा जाना लाजिमी है। दरअसल, सवर्ण जातियों को भाजपा का आधार वोट बैंक माना जाता है, लेकिन कुछ महीनों पहले दलित उत्पीडन निरोधक कानून (एट्रासिटी एक्ट) में संशोधन पारित करने के मोदी सरकार के फैसले की वजह से सवर्णों के एक बड़े हिस्से में भाजपा को लेकर काफी नाराजी है, जिसका खामियाजा उसे हिंदी पट्टी के तीन राज्यों मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनावों में उठाना पड़ा। नाराज सवर्ण वोटरों ने अपने गुस्से का इजहार करते हुए भाजपा को वोट देने के बजाय नोटा का विकल्प चुना। इसका नतीजा यह हुआ कि भाजपा ने कई ऐसी सीटें गंवा दीं, जहां उसकी हार के अंतर से ज्यादा वोट नोटा के पक्ष में पड़े थे। कहने की आवश्यकता नहीं कि भाजपा ने अपने से छिटके सवर्ण मतदाताओं को साधने के मकसद से ही 10 फीसदी आरक्षण का पैंतरा चला है। लेकिन यह पैंतरा बेहद जोखिम भरा है। इससे नाराज सवर्ण तो जरूर भाजपा की ओर लौट सकते हैं, लेकिन दलित, आदिवासी और अन्य पिछड़ी जातियों के वे मतदाता भाजपा से छिटक सकते हैं, जो पिछले कुछ वर्षों से भाजपा के साथ थे और जिनके समर्थन के बूते ही केंद्र सहित कई राज्यों में भाजपा अपनी सरकार बनाने में कामयाब हुई थी। हाल के वर्षों में राजस्थान में राजपूतों ने, महाराष्ट्र में मराठों ने, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और राजस्थान में जाटों ने तथा गुजरात में पटेलों ने आरक्षण की मांग को लेकर उग्र आंदोलन किए हैं। ये सभी सवर्ण समुदाय मोटे तौर पर भाजपा के समर्थक माने जाते हैं। मोदी सरकार ने अपने ताजा फैसले से इन सभी समुदायों को साधे रखने का प्रयास भी किया है, लेकिन उसका यह प्रयास उसके लिए भारी मुसीबत का सबब बन सकता है। देश की कुल आबादी में सवर्णों की संख्या महज 16-17 फीसद है और सरकार उन्हें 10 फीसद आरक्षण देने जा रही है। इस फैसले से देश में आरक्षण की आग फिर भड़क सकती है। दलित, आदिवासी और अन्य पिछड़ी जातियां भी अपने मौजूदा आरक्षण का प्रतिशत अपनी संख्या के आधार बढ़ाने की मांग कर सकती हैं। बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की नेता मायावती ने इस आशय की मांग कर भी दी है। वैसे भी बसपा, समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल आदि की तरफ से नारा लगाया ही जाता है- 'जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी भागीदारी।' अब उनकी तरफ से सवाल उठ सकता है कि जब सरकार सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित आरक्षण की सीमा को बढ़ाने और उसमें एक नई श्रेणी जोड़ने के लिए संविधान में संशोधन कर सकती है तो फिर इस मांग को पूरा करने के लिए क्यों नहीं कर सकती। इन सवालों का सरकार क्या जवाब देगी? सरकार ने अपने फैसले में आर्थिक पिछड़ेपन का जो पैमाना तय किया है, वह भी बेहद हास्यास्पद और विरोधाभासी है। फैसले के मुताबिक जिन लोगों की पारिवारिक सालाना आमदनी आठ लाख रुपए से कम है, उन्हें ही गरीब माना जाएगा और वे ही आरक्षण के इस प्रावधान का लाभ ले सकेंगे। सवाल है कि जब सरकार आठ लाख की सालाना आमदनी वाले लोगों को आर्थिक रूप से पिछड़ा मान रही है तो फिर इनकम टैक्स की सीमा ढाई लाख रुपए रखने का क्या औचित्य है? आठ लाख रुपए तक सालाना यानी लगभग 66 हजार रुपए महीने की आमदनी वाले गरीब हैं और आरक्षण के दायरे में आते हैं तो 10-12 हजार रुपए या इससे भी कम की मासिक आमदनी वाले गरीब सवर्णों के लिए तो आरक्षण का लाभ पाना एक सपना ही रहेगा। फिर इस बात की भी क्या गारंटी कि जिनकी सालाना आमदनी आठ लाख से ज्यादा है, वे अपने टैक्स सलाहकार वकील या चार्टर्ड अकाउंटेंट की मदद से खुद को गरीब साबित कर आरक्षण का लाभ लेने का उपक्रम नहीं करेंगे! अभी भी अखबारों में विज्ञापन तो छपते ही हैं कि -'टैक्स बचाने के उपाय जानने के लिए संपर्क करें।' सबसे अहम सवाल तो कुछ समय पहले मराठा आरक्षण आंदोलन के संदर्भ में इस सरकार के चंद वरिष्ठ और प्रभावशाली मंत्रियों में से एक नितिन गडकरी के दिए गए एक बयान से निकलता है। गडकरी ने कहा था कि जब नौकरियां ही नहीं हैं तो आरक्षण से क्या हासिल होगा? फिलहाल देश में बेरोजगारी दर 8-9 फीसद तक जा पहुंची है और शिक्षित बेरोजगारी दर 16 फीसद के आसपास है। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी ने हाल ही में अपनी रिपोर्ट में देश में बढ़ती बेरोजगारी के आंकड़े जारी करते हुए बताया है कि वर्ष 2018 में 1.10 करोड़ भारतीयों ने नौकरियां गंवाई हैं। इस सिलसिले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का वह अजीबोगरीब दावा भी याद किया जा सकता है, जो कुछ महीनों पहले एक इंटरव्यू में उन्होंने किया था। उन्होंने कहा था कि उनकी सरकार की नीतियों से देश में रोजगार के अवसर तो बढ़े हैं, लेकिन कितने लोगों को रोजगार मिला है, इस संबंध में सरकार के पास डाटा उपलब्ध नहीं है। बहरहाल, सरकार के आरक्षण संबंधी फैसले के तकनीकी पहलुओं और सियासी नफे-नुकसान से हट कर बात करें तो हमारे संविधान निर्माताओं ने ऐतिहासिक कारणों से समाज के वंचित और शोषित जाति-समुदायों के सामाजिक व शैक्षणिक पिछड़ेपन को दूर कर उन्हें समाज की मुख्यधारा में शामिल करने के मकसद से संविधान में विशेष अवसर यानी आरक्षण की व्यवस्था की थी, लेकिन यह व्यवस्था पिछले ढाई-तीन दशक से जहां एक ओर राजनीतिक दलों के लिए वोट बटोरने का औजार बनी हुई है, वहीं दूसरी ओर इस व्यवस्था ने विभिन्न जाति-समुदायों में भी नई महत्वाकांक्षाएं जगाई हैं। जो समुदाय या राजनीतिक दल कभी आरक्षण की इस व्यवस्था का मुखर होकर या दबे स्वरों में विरोध करते थे, वे भी कुछ वर्षों से इसके राजनीतिक फायदे देखकर इसके मुरीद हो गए हैं। लेकिन यह कैसी विडंबना है कि एक तरफ सरकारी नौकरियां लगातार कम होती जा रही हैं और दूसरी तरफ सरकारें आरक्षण पर आरक्षण दिए जा रही हैं। करीब तीन दशक पूर्व नव उदारीकृत आर्थिक नीतियां लागू होने के पहले तक देश के सकल रोजगार में सरकारी नौकरियों का हिस्सा दो फीसदी होता था, जिसमें उदारीकरण के बाद विभिन्न क्षेत्रों में निजीकरण के चलते लगातार कमी आती जा रही है। इसके बावजूद अलग-अलग जातीय समुदायों की ओर से आरक्षण की मांग उठती रहती है। चूंकि हमारी बेतरतीब विकास प्रक्रिया का फायदा समाज के कुछ ही तबकों तक पहुंचा है, इसलिए विभिन्न जातियां अपने को किसी न किसी तरह आरक्षित श्रेणी में शामिल कराना चाहती हैं। अफसोस की बात यह है कि उनके ऐसा करने में कामयाब हो जाने के बाद भी आरक्षण का फायदा चंद लोगों को ही मिल पाता है। दरअसल, आरक्षण से अगर सचमुच व्यापक तौर पर समाज का भला होता, तो कई आरक्षित जातियां अब भी पिछड़ेपन के चक्रव्यूह में न फंसी होतीं। आरक्षण की मांग और उसके विरोध के लगातार उग्र होते जाने की सबसे बड़ी वजह यही है कि हमारी सरकारों ने सर्वग्रासी विकास की जैसी नीतियां अपनाई हैं, जिसकी वजह से ऐसी अर्थव्यवस्था नहीं बन सकी है, जो सभी को रोजगार देने का सामर्थ्य रखती हो।