फरवरी 2019

अखिलेश-मायावती: दोस्ती की कहानी

प्रदीप कुमार

आगामी लोकसभा चुनाव के मद्देनजर उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का गठबंधन कायम होना देश की राजनीति में एक बेहद महत्वपूर्ण और युगांतरकारी घटना है। हालांकि दोनों पार्टियों के बीच करीब ढाई दशक पहले भी एक बार गठबंधन हो चुका है, लेकिन इस बार जो गठबंधन कायम हुआ है उसका दूरगामी सामाजिक-राजनीतिक असर होने के आसार हैं। यही वजह है कि इस गठबंधन ने भाजपा की नींद उड़ा दी है।

यह नवंबर, 2016 की बात है। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बहुत ज़्यादा दिन नहीं बचे थे। सार्वजनिक तौर पर पहली बार बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती ने तबके उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को 'बबुआ' और इससे भी आगे 'समाजवादी बबुआ' कहा था। दरअसल अखिलेश यादव अपने संबोधनों में मायावती को बुआ कहते रहे थे और इसकी वजह भी देते थे। लेकिन चुनावी मौके पर उन्होंने मीडिया में मायावती की बढ़ती ख़बरों पर कहा था कि बुआ ब्रॉडकास्टिंग कॉरपोरेशन जैसे मीडिया हो गया है। हालांकि इससे करीब तीन साल पहले दिसंबर, 2016 में टीवी चैनल आजतक के एक प्रोग्राम में अखिलेश यादव ने एंकर को टोकते हुए कहा था कि मायावाती जी को 'हमलोग तो बहन जी नहीं कह सकते, बुआ जी कह सकते हैं।' चूंकि, अखिलेश यादव के पिता मुलायमसिंह यादव के साथ मायावती उत्तर प्रदेश में गठबंधन सरकार बना चुकी थीं, लिहाजा सामाजिकता के तकाजे के मुताबिक ही वे मायावती को बुआ कहते रहे। ऐसे में जब मायावती ने अखिलेश को बबुआ कहा तो एक तरह से इसने दोनों पार्टियों की आपसी तकरार को हवा दे दी। मीडिया में इसको लेकर ख़ूब हेडलाइंस बनीं। लेकिन देखते-देखते उत्तर प्रदेश का वो चुनाव हो गया, जिसमें नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता और अमित शाह की सोशल इंजीनियरिंग के बूते भारतीय जनता पार्टी अपने सहयोगी दलों के साथ 325 सीट जीतने में कामयाब रही। लेकिन उत्तर प्रदेश के चुनावी नतीजे आने से ठीक पहले अखिलेश यादव ने बीबीसी को दिए इंटरव्यूमें इस बात के संकेत दे दिए कि ज़रूरत पड़ने पर वे मायावती से भी समर्थन मांग सकते हैं। हालांकि, इसकी नौबत नहीं आई, लेकिन ये सुगबुगाहट शुरू हो चुकी थी कि क्या समाजवादी पार्टी-बहुजन समाज पार्टी एक साथ मंच पर आ सकती हैं। करीब एक साल के बाद गोरखपुर और फूलपुर सीट पर लोकसभा सीटों के उपचुनाव आ गए और इन दोनों सीटों पर समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार का मुक़ाबला सीधे भाजपा के उम्मीदवार से था। गोरखपुर योगी आदित्या नाथ की छोड़ी हुई सीट थी, जबकि फूलपुर सीट योगी के डिप्टी केशवचंद्र मौर्य की। बहुजन समाज पार्टी का इतिहास रहा है कि वह उपचुनाव में अपने उम्मीदवार खड़े नहीं करती। ऐसे में अखिलेश ने रणनीति अपनाते हुए गोरखपुर के लिए निषाद पार्टी से संपर्क साधा और दोनों जगह अपने उम्मीदवार उतारे। इस उपचुनाव में मायावती ने आधिकारिक तौर पर समाजवादी पार्टी को समर्थन देने की घोषणा नहीं की थी, लेकिन पार्टी ने अंदर-अंदर ही समाजवादी पार्टी को समर्थन देने की घोषणा कर दी। बहुजन समाज पार्टी के फूलपूर और गोरखपुर के संयोजक अशोक सिद्धार्थ और घनश्याम खड़वाड़ ने पार्टी का संदेश अपने मतदाताओं तक पहुंचा दिया था। दोनों जगहों पर समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने मिलकर वह आधार बना दिया, जिसने मोदी-शाह की बीजेपी को पहली बार चौंका दिया था। नतीजे जिस दिन आए, उसी दिन समाजवादी पार्टी के विधानमंडल के नेता रामगोविंद चौधरी और बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती की मुलाकात हुई। रामगोविंद चौधरी बताते हैं, "बसपा विधानमंडल के नेता लालजी वर्मा के पुत्र के निधन की शोक सभा थी, वहीं हम मिले थे और मायावती जी का संदेश हमने अपनी पार्टी के अध्यक्ष जी तक पहुंचा दिया था।" उस मुलाकात के दौरान रामगोविंद चौधरी और मायावती, एक दूसरे को हाथ जोड़कर मिलते हुए दिखाई दिए थे। ये मायावती की अपनी स्टाइल से बिलकुल अलग उदाहरण था, रामगोविंद चौधरी भी बसपा के आलोचकों में गिने जाते रहे थे। राम गोविंद चौधरी से मिले संदेश के बाद ही अखिलेश यादव 15 मार्च, 2018 को मायावती से लखनऊ स्थित उनके आवास पर मिलने पहुंचे। ये मुलाकात सवा घंटे चली, जिसमें अखिलेश यादव ने मायावती को समर्थन देने के लिए आभार जताया और यह भी याद दिलाया कि 1993 में मुलायम सिंह यादव और कांशीराम जब आपस में मिले थे, तब दोनों ने बीजेपी को रोक दिया था। इस मुलाकात के क़रीब एक सप्ताह बाद यह सवाल सामने था कि क्या अखिलेश, मायावती जी को रिटर्न गिफ्ट दे पाएंगे। राज्यसभा का चुनाव 23 मार्च को हुआ, जिसमें अखिलेश यादव तमाम कोशिशों के बाद भी बहुजन समाज पार्टी के उम्मीदवार भीमराव आंबेडकर को जीत नहीं दिला पाए। ऐसे में दोनों पार्टियों के बीच जो कॉन्फिडेंस बिल्ड अप हो रहा था, उसको धक्का लगा। राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने तब चुटकी लेते हुए कहा था, "समाजवादी पार्टी का अवसरवादी चेहरा लोगों ने देखा है, वह दूसरों से ले तो सकती है, दूसरों को दे नहीं सकती है।" समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव भी थोड़े चिंतित ज़रूर हुए थे, लेकिन मायावती की प्रेस कॉन्फ्रें स ने वह चिंता दूर कर दी। मायावती ने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंेस में कहा कि अपने उम्मीदवार की हार के बाद भी समाजवादी पार्टी पर उनका भरोसा कायम है और 'मेरी इस प्रेस कॉन्फ्रेंिस के बाद भाजपा के वालों को फिर नींद नहीं आएगी।' राज्यसभा चुनाव के नतीजे के बाद पहली प्रतिक्रिया देते हुए अखिलेश यादव ने कहा था, "जो परिणाम आया था, उससे यह लग रहा था कि कहीं वह नाराज़ तो नहीं हैं, लेकिन मुझे इस बात की खुशी है कि उन्होंने एक बार फिर से कॉन्फिडेंस बिल्ड अप कर दिया है कि एलायंस हो।" इस एलायंस पर अखिलेश यादव ने ये भी कहा था कि वे सीटों के बंटवारे में कोई अड़चन नहीं आएगी और गठबंधन के लिए वे दो क़दम पीछे हटने को भी तैयार हैं। रामगोविंद चौधरी बताते हैं, "हमारे नेता ने हमेशा यही कहा कि सीटों को लेकर कोई अड़चन नहीं आएगी। बीजेपी की ग़रीब, पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक विरोधी राजनीति के सामने जीत हासिल करना ही हमारा लक्ष्य था और यही लक्ष्य मायावती जी का भी था।" रामगोविंद चौधरी ये भी बताते हैं कि दरअसल पूरे प्रदेश में इन दोनों पार्टियों के कार्यकर्ताओं की ये आपसी समझ बन रही थी कि दोनों नेताओं को एक साथ आना चाहिए और ये बात शीर्ष नेतृत्व तक पहुंच भी रही थी। भारतीय जनता पार्टी के सामने दोनों पार्टियों को अपने अस्तित्व का संकट भी दिखाई दे रहा था। अस्तित्व के इस संकट में दूसरे कई सवाल भी थे। सबसे बड़ा सवाल यही था कि क्या मायावती अपने साथ हुआ गेस्ट हाउस कांड भुला पाएंगी, लेकिन अखिलेश यादव ने अपनी विनम्रता और सौम्य व्यवहार से मायावती को इस बात के लिए मना लिया, जिसकी झलक 12 जनवरी, 2019 को लखनऊ के ताज होटल में हुई प्रेस कॉन्फ्रें स में दिखी, जब उन्होंने कहा, "मायावती जी का कोई अपमान, समाजवादियों का अपमान होगा।" दूसरी ओर मायावती को भी अपने संयोजकों के माध्यम से ज़मीनी कार्यकर्ताओं की बात पता चल रही थी, जिससे अकेले चुनाव लड़ने की सूरत में बेहतर नतीजे नहीं आने की आशंका थी। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही था कि आख़िर में कितनी सीटों को लेकर आपसी सहमति बनेगी। एक दूसरा सवाल यह भी बना हुआ था कि सीबीआई और ईडी जैसी जांच एजेंसियों के रहते ये दोनों नेता एकजुट हो पाएंगे। हालांकि दोनों पार्टी के नेता इस दौरान कहते रहे कि शीर्ष स्तर पर दोनों नेता संपर्क में हैं। चार जनवरी, 2019 को दिल्ली में अखिलेश यादव मायावती के दिल्ली स्थित आवास पर मिले और इस मुलाकात में दोनों नेताओं ने गठबंधन को लेकर आपसी सहमति दे दी। जिसके बाद सीबीआई ने राज्य के खनन घोटाले में अखिलेश यादव से पूछताछ की बात कही। इस ख़बर के आते ही मायावती ने अखिलेश यादव को फ़ोन करके कहा कि घबराने की ज़रूरत नहीं है। इतना ही नहीं बहुजन समाज पार्टी ने बाकायदा प्रेस नोट जारी किया और अखिलेश यादव का साथ देने की बात कही। इस प्रेस नोट में पांच बार अखिलेश यादव का नाम लिखा हुआ था। इसके बाद अखिलेश यादव ने भी मीडिया से कहा कि वे सीबीआई से पूछताछ का सामना करने को तैयार हैं। लेकिन सीटों को लेकर असमंजस अब भी बना हुआ था। इस रहस्य पर से पर्दा तभी उठ पाया, जब मायावती ने इसकी घोषणा करते हुए कहा कि दोनों पार्टियां 38-38 सीटों पर चुनाव लड़ेंगी। ये बात इतनी गोपनीय थी कि दोनों तरफ के दूसरी कतार के नेताओं को भी इस बात की भनक नहीं थी। मायावती को सीटों के लिए मनाना कितना चुनौतीपूर्ण है, इसका अंदाज़ा मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमल नाथ के उस बयान से लगाया जा सकता है, जिसमें उन्होंने कहा था कि मायावती जी ने पचास सीटों की मांग कर दी थी, जिसके चलते मध्य प्रदेश में कांग्रेस-बीएसपी का गठबंधन नहीं बन सका था। समाजवादी रुझान वाली पत्रिका सोशलिस्ट फैक्टर के संपादक फ्रैंक हुजूर बताते हैं, "कई राजनीतिक विश्लेषक कह रहे थे कि समाजवादी पार्टी को कम सीटें मिलेंगी, लेकिन अखिलेश अपनी रणनीतिक समझ और समझदारी से इसे बराबर रखने में कामयाब हुए हैं। वे मायावती को भी इसके लिए कन्विंस कर पाए, ये दर्शाता है कि उनमें समझदारी और चतुराई दोनों हैं।" बहुजन समाज पार्टी का राजनीतिक आधार पूरे भारत में समाजवादी पार्टी से कहीं बड़ा है और मायावती का राजनीतिक अनुभव भी, अखिलेश की तुलना में कहीं ज़्यादा है। बावजूद इसके अखिलेश अपनी पार्टी को बहुजन समाज पार्टी की टक्कर में रख पाए, तो इसकी एक वजह यूपी की सभी सीटों को लेकर चुनावी गणित पर उनका अपना होम वर्क रहा। बहरहाल, अभी कौन सी पार्टी किस सीट पर लड़ेगी, इसकी घोषणा नहीं हुई है। कुछ सीटों पर अंतिम स्क्रूटनी का दौर चल रहा है, जिसके बाद ही पार्टी और उम्मीदवारों की सूची जारी होगी। बहुजन समाज पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव राम अचल राजभर बताते हैं, "बहन जी की घोषणा के बाद से हमारे समर्थकों का उत्साह कई गुना बढ़ चुका है। जल्द ही सीटों पर उम्मीदवारों के नामों का पता चल जाएगा। हम लोग समाजवादी पार्टी के साथ मिलकर 2019 में शानदार नतीजे देने वाले हैं।" बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी के प्रमुखों ने अपनी प्रेस कॉन्फ्रें स में साफ़ किया है कि उनका इरादा बीजेपी को हराना है। लेकिन अखिलेश यादव ने यूपी से ही अगले प्रधानमंत्री होने का दावा किया है। उन्होंने मायावती का नाम प्रधानमंत्री पद के लिए सीधे नहीं लिया है, लेकिन माना जा रहा है कि वे इसके लिए तैयार हैं। रामगोविंद चौधरी बताते हैं, "ये बात तो बहुत पहले ही अखिलेश जी कह चुके हैं कि उनका इरादा अभी प्रदेश के लोगों की सेवा ही है। हम चाहते हैं कि बहन जी पीएम बनें। हमारी पार्टी भी चाहती है कि कोई दलित भारत के शीर्ष पद तक पहुंचे। इससे पहले भी समाजवादियों ने जगजीवन राम को प्रधानमंत्री बनाने की कोशिश की थी, हम तब कामयाब नहीं हुए थे।" बात चाहे अपने अपने राजनीतिक क़िले बचाने की हो या फिर भारतीय जनता पार्टी को हराने की, लेकिन सबसे अहम बात ये है कि बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी की एकजुटता ने एक बार फिर सामाजिक न्याय की राजनीति को जीवंत कर दिया है लेकिन देखना होगा कि ये दोनों पार्टियों कितना कुछ कर पाती हैं और कब तक एकजुट रह पाती हैं। इसकी आशंका की वजह दोनों पार्टियों का अपना अतीत भी है और प्रदेश की राजनीति में विस्तार की जगह सिकुड़ने का विकल्प भी दोनों पार्टियों को रास आए, ये दावे से नहीं कहा जा सकता। वैसे लखनऊ की प्रेस कॉन्फ्रें स के दौरान मायावती और अखिलेश यादव की आपसी केमेस्ट्री से संकेत तो यही मिलता है कि दोनों कड़वे अतीत से आगे निकल आए हैं। इस फ्रेम में ना मायावती बुआ हैं और ना ही अखिलेश बबुआ। अखिलेश यादव उन्हें आदरणीय मायावती कह रहे हैं और मायावती भी बबुआ को श्री अखिलेश यादव कह रही हैं। (लेखक बीबीसी हिंदी के संवाददाता हैं)