फरवरी 2019

दिलचस्प हो गई उत्तर प्रदेश की सियासी जंग

जयशंकर गुप्त

कांग्रेस की राजनीति में आमतौर पर रायबरेली और अमेठी तक ही सीमित रहने वाली प्रियंका गांधी अब औपचारिक रूप से राजनीति में सक्रिय हो गई हैं। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने उन्हें पार्टी का महासचिव बनाकर आगामी लोकसभा चुनाव के लिए पूर्वी उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में तीन दशकों से हाशिए पर कांग्रेस प्रियंका के आने से भले ही कोई बड़ा चमत्कार न कर सके लेकिन इतना तय है कि उनके आने से उत्तर प्रदेश में लोकसभा का चुनावी मुकाबला दिलचस्प हो जाएगा।

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने कुछ दिन पहले कहा था कि उत्तर प्रदेश में वह सबको चौंका सकते हैं। वाकई, अपनी बहन प्रियंका (गांधी) वाड्रा को कांग्रेस में महासचिव के रूप में पूर्वी उत्तर प्रदेश और एक अन्य महासचिव के रूप में ज्योतिरादित्य सिंधिया को पश्चिमी उत्तर प्रदेश का प्रभार देकर उन्होंने चौंकाने वाला बहुप्रतीक्षित राजनीतिक फैसला कर साफ किया है कि अब वह बैकफुट पर नहीं, बल्कि फ्रंट फुट पर खेलेंगे। कयास उनके चचेरे भाई, भाजपा सांसद वरुण गांधी के भी साथ आने के लग रहे हैं। जाहिर है कि वह 2019 में सत्रहवीं लोकसभा के लिए चुनावी महाभारत में उत्तर प्रदेश की निर्णायक साबित होने वाली भूमिका को बखूबी समझ रहे हैं। इस लिहाज से ही तमाम दलों और गठबंधनों के बीच समीकरण बनने और बिगड़ने लगे हैं। कांग्रेस को बाहर रखकर समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल ने आपस में राजनीतिक गठजोड़ कर लोकसभा की अस्सी सीटों का बंटवारा कर लिया है। रायबरेली और अमेठी की सीटें कांग्रेस यानी सोनिया गांधी या प्रियंका तथा राहुल गांधी के लिए छोड़ी गई हैं। इस गठबंधन से बाहर रहने और यूपी की राजनीति में हासिए पर धकेल दिए जाने की कोशिशों के अहसास से परेशान कांग्रेस को मिलनसार, मेहनती और न सिर्फ कांग्रेसजनों बल्कि आम लोगों के साथ भी सीधा संवाद कायम करने में सक्षम हाजिर जवाब प्रियंका के रूप में राजनीतिक संजीवनी सी मिल गई लगती है। उसने साफ कर दिया है कि यूपी में सभी सीटों पर अकेले चुनाव लड़ेगी। इसकी एक वजह यह भी कि पिछले लोकसभा और विधानसभा चुनावों में उसकी खराब परफार्मेंस के मद्देनजर सपा-बसपा उसके लिए उसकी मर्जी के मुताबिक अधिक सीटें देने को तैयार नहीं थीं और फिर राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनावों में मिली सफलता के बाद कांग्रेस नेताओं का मनोबल और उत्साह कुछ ज्यादा ही बढ़ गया है। और फिर राहुल गांधी ने पिछले दिनों कहा भी कि भाजपा और नरेंद्र मोदी को हराने के लिए उनकी पार्टी सहयोगी दलों के साथ उन्हीं राज्यों में गठबंधन करेगी, जहां वह कमजोर है। जहां मजबूत है या पहले नंबर पर है, वहां अकेले चुनाव लड़ेगी। दरअसल, बदले राजनीतिक परिदृश्य और खासतौर से राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश विधानसभा के चुनाव में शानदार वापसी और राहुल गांधी को चहुंओर मिल रहे जनसमर्थन और प्रियंका-ज्योतिरादित्य के भरोसे कांग्रेस को लगता है कि अकेले लड़कर यूपी में वह 2009 में जीती 21 सीटों के आंकड़े को छू न भी सके तो भी उससे तो अधिक सीटें वह जीत ही सकती है, जितनी उसे सपा-बसपा गठबंधन देता। उसका फोकस अवध और पूर्वी उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण, गैर जाटव दलित और कुर्मी, सहित गैर यादव अन्य पिछड़ी जातियों तथा मुसलमानों पर होगा। 2009 में इन तबकों के समर्थन से ही कांग्रेस राज्य की 21 सीटें अपने बूते जीत सकी थी। हालांकि पिछले चुनावों के आंकड़े कांग्रेस की इस सोच का समर्थन नहीं करते। 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को महज 7।5 फीसदी वोट ही मिले थे और केवल सोनिया गांधी और राहुल गांधी ही रायबरेली और अमेठी से चुनाव जीत सके थे। इसके उम्मीदवार केवल छह सीटों-सहारनपुर, कानपुर, गाजियाबाद, कुशीनगर, बाराबंकी और लखनऊ में ही दूसरे नंबर पर थे। इनमें से भी कुशीनगर और सहारनपुर को छोड़ दें तो बाकी चार सीटों पर कांग्रेस के उम्मीदवार दो लाख से लेकर साढ़े पांच लाख से अधिक मतों के अंतर से हारे थे। 2017 के विधानसभा चुनाव में सपा के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ने के बावजूद केवल 6।2 फीसदी वोट लेकर कांग्रेस के सात उम्मीदवार ही जीत सके थे। हालांकि कांग्रेस के लोग अपनी सोच के समर्थन में कहते हैं कि 2009 में अकेले लड़ने पर वह 11।65 फीसदी वोट पाकर भी 21 सीटों पर जीत गई थी। लेकिन तब सपा और बसपा के अलग-अलग लड़ने के कारण मत विभाजन का लाभ कांग्रेस को मिला था। राहुल गांधी, प्रियंका और ज्योतिरादित्य सिंधिया के नेतृत्व में कांग्रेस के अलग चुनाव लड़ने पर एक संभावना तो यह भी बनती है कि उसके उम्मीदवार भाजपा के सवर्ण जनाधार में सेंध लगाकर उसे कमजोर कर सकते हैं, लेकिन अगर उसे अन्य पिछड़ी जातियों, गैर जाटव दलितों और मुसलमानों के बड़े तबके का समर्थन भी मिला तो इसका नुकसान सपा-बसपा गठबंधन को और लाभ भाजपा को मिल सकता है। हालांकि भाजपा ने पिछला चुनाव गैर जाटव दलितों और गैर यादव अन्य पिछड़ी जातियों को लामबंद करने की रणनीति के तहत ही लड़कर सफलता पाई थी। शायद इसलिए भी सपा-बसपा और रालोद का गठबंधन इससे ज्यादा परेशान नहीं है। 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी और भाजपा की लहर के बावजूद सपा को 22 तथा बसपा को 19।6 फीसदी यानी कुल 41।6 फीसदी वोट मिले थे। हालांकि सपा के केवल पांच उम्मीदवार ही जीत सके थे, जबकि बसपा का तो खाता भी नहीं खुल सका था। हालांकि 34 सीटों पर उसके और 31 सीटों पर सपा के उम्मीदवार दूसरे नंबर पर थे। भाजपानीत गठबंधन को 43।30 फीसदी वोट मिले थे जबकि सीटें मिल गई थीं 73। इसी तरह से विधानसभा के चुनाव में भी सपा और बसपा को क्रमशः 21।8 तथा 22।2 फीसदी यानी कुल 44 फीसदी वोट मिले थे लेकिन अलग-अलग लड़ने के कारण उन्हें सीटें केवल 47 और 19 ही मिल सकी थीं जबकि भाजपा गठबंधन 39।7 फीसदी मत लेकर 325 सीटों पर कब्जा जमा सका था। लोकसभा और विधानसभा के चुनाव में रालोद को भी एक डेढ़ फीसदी वोट मिले थे। सपा, बसपा और रालोद को इस बात का अहसास हुआ कि अगर वे साथ चुनाव लड़ें तो न सिर्फ लोकसभा की अधिकतम सीटों पर जीत सकते हैं, बल्कि प्रदेश में भी वे अपनी सरकार बना सकते हैं, क्योंकि मोदी-योगी और भाजपा लहर होने और अमित शाह के गैर यादव पिछड़ी जातियों और गैर जाटव दलितों की सोशल इंजीनियरिंग के बावजूद दोनों चुनावों में सपा-बसपा और रालोद को मिले मत प्रतिशत को जोड़कर देखें तो भाजपा गठबंधन पर भारी पड़ते हैं। इसका प्रयोग करके ही उन्होंने मुख्यमंत्री आदित्यनाथ और उपमुख्यमंत्री केशव मौर्य के त्यागपत्र से रिक्त गोरखपुर और फूलपुर के बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कैराना में हुए संसदीय उपचुनाव में भी भाजपा को पटखनी दे दी थी। फूलपुर और गोरखपुर में कांग्रेस ने भी उम्मीदवार खड़े किए थे, लेकिन उन्हें 20 हजार से भी कम मत मिले थे। सपा-बसपा और रालोद के बीच गठबंधन की नींव उत्तर प्रदेश के इन तीन संसदीय उपचुनावों तथा राज्यसभा और विधान परिषद के चुनाव के समय ही पड़ गई, जब तीनों ने आपसी सहयोग किया। इससे पहले, 1992 के बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद तथाकथित राम लहर के बावजूद 1993 में हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव में सपा और बसपा के बीच चुनावी गठबंधन हुआ था जिसके चलते उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व में सपा-बसपा की सरकार बनी थी। उस चुनाव में एक नारा बहुत लोकप्रिय हुआ था, ''मिले मुलायम, कांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्रीराम।' लेकिन सपा-बसपा गठबंधन का वह प्रयोग लंबा नहीं चल सका था। जून 1995 में लखनऊ के बदनाम 'स्टेट गेस्ट हाउस कांड' के बाद, जिसमें सपा के लोगों ने मायावती के साथ अभद्रता की थी, कांशीराम ने मुलायम सिंह यादव की सरकार से समर्थन वापस ले लिया था। उसके बाद ही भाजपा के सहयोग से मायावती के नेतृत्व में सरकार बनी थी। हालांकि वह गठबंधन भी टिकाऊ नहीं रह सका था। लेकिन लखनऊ गेस्ट हाउस कांड के बाद सपा और बसपा के बीच रिश्ते इतने कटु हो गए कि दोनों दलों के नेता आपस में आंख मिलाने से भी कतराते थे। शायद यह भी एक कारण था कि इस बार 12 जनवरी को सपा-बसपा गठबंधन की घोषणा करते समय संयुक्त संवाददाता सम्मेलन में टंगे बैनर पर कांशीराम और मुलायम सिंह यादव के बजाय बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर और समाजवादी नेता डॉ। राममनोहर लोहिया की तस्वीरें लगी थीं। मायावती ने इसका जिक्र भी किया कि किस तरह 1956 में डॉ। आंबेडकर और डॉ। लोहिया के बीच आपसी तालमेल बढ़ा था लेकिन दोनों दलों-भारतीय रिपब्लिकन पार्टी और सोशलिस्ट पार्टी के विलय का औपचारिक फैसला होने से पहले ही डॉ। आंबेडकर का निधन हो गया था। उन्होंने उसी कड़ी में 1993 में हुए सपा-बसपा गठबंधन को देखते हुए इस बात का जिक्र भी किया कि कैसे अप्रिय 'लखनऊ स्टेट गेस्ट हाउस कांड' के चलते वह गठबंधन टूट गया था। उन्होंने खुद ही साफ किया कि जनहित और देशहित के साथ ही सांप्रदायिक ताकतों को सत्ता में दोबारा आने से रोकने की गरज से ही उन्होंने जून 1995 के अप्रिय प्रकरण को भुलाकर यह गठबंधन किया है। बहरहाल, सपा-बसपा और रालोद के बीच चुनावी गठबंधन और फिर प्रियंका गांधी के सक्रिय होने के कारण सत्तारूढ़ भाजपा के भीतर बेचैनी और बौखलाहट बढ़ी है। यह बेचैनी प्रधानमंत्री मोदी, पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह, गृहमंत्री राजनाथ सिंह और वित मंत्री अरुण जेटली से लेकर मुख्यमंत्री आदित्यनाथ एवं अन्य कई नेताओं के भाषणों और बयानों में भी साफ दिख रही है। मोदी और शाह ने इसे अवसरवादी और भ्रष्ट नेताओं का सत्ता पाने के लिए गठबंधन करार दिया। अमित शाह ने कहा, ''कल तक एक दूसरे की शक्ल नहीं देखने वाले आज हार के डर से एक साथ आ गए हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि अकेले मोदी को हरा पाना मुमकिन नहीं है। उन्होंने दावा किया, ''यूपी में 73 से 74 होंगे, 72 नहीं'' गौरतलब है कि पिछली बार उत्तर प्रदेश से मिली 73 सीटों के बूते ही भाजपा केंद्र में सत्तारूढ़ हुई थी। स्वयं नरेंद्र मोदी पूर्वी उत्तर प्रदेश के वाराणसी से ही सांसद हैं। इसका लाभ भाजपा और उसके सहयोगी दलों को विधानसभा के चुनाव में 325 सीटें जीतने के रूप में मिला था। लेकिन समय बीतने और केंद्र तथा राज्य में भी भाजपानीत गठबंधन सरकार के विफल होते जाने, चुनाव पूर्व के वायदों के जुमला भर साबित होने, प्रधानमंत्री मोदी और उनकी सरकार के राफेल युद्धक विमानों की खरीद में कथित घोटाले में घिरते जाने, नोट बंदी, जीएसटी के कुप्रभावों, एससी एसटी ऐक्ट में संशोधन से सवर्णों, किसानों और बेरोजगार युवाओं की सरकार से नाराजगी आदि के कारण भाजपा का जनाधार इससे दूर छिटकने लगा है। राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में भाजपा के हाथ से सत्ता खिसक जाने के बाद सहयोगी दल आंखें तरेरते हुए बिहार की तर्ज पर अपनी राजनीतिक सौदेबाजी मजबूत करने में लगे हैं। नतीजतन भाजपा अपने बिदक रहे सहयोगी दलों को साधने और बिखर रहे जनाधार को समेटने में जुट गई है। भाजपा नेतृत्व को लगता है कि आठ लाख रु। से कम आमदनी वाले सामान्य वर्ग-सवर्णों-के लिए दस फीसदी आरक्षण एवं आने वाले दिनों में कुछ और जन लुभावन घोषणाओं तथा विपक्ष के नेताओं को भ्रष्टाचार के मामलों में बदनाम एवं गिरफ्तार करवाकर अपने छीजते जनाधार को बचाया जा सकता है। उत्तर प्रदेश में वह फिर एक बार गैर यादव पिछड़ी जातियों और गैर जाटव दलितों को अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर सकती है। हालांकि लगातार घट रही सरकारी नौकरियों के मद्देनजर चुनाव से ठीक पहले दस फीसदी आरक्षण के बेमानी साबित होने और इसके चलते दलितों-आदिवासियों और पिछड़ी जातियों में बढ़ने वाली आशंकित नाराजगी का खामियाजा भी उसे भुगतना पड़ सकता है। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं)