फरवरी 2019

आपके आने से

डॉ. सुभाष खंडेलवाल

सन् 1963 में जब इंदिरा गांधी को तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने कांग्रेस का अखिल भारतीय अध्यक्ष बनाया था, उस वक्त डॉ. राम मनोहर लोहिया ने कहा था रोज सुबह अखबार में एक खूबसूरत चेहरा देखने को मिला करेगा। कालांतर में भारतीय राजनीति के स्वर्णिम एवं काले अध्याय इंदिरा गांधी के नाम लिखाये। उनके बाद से आज तक की राजनीति को देखते हैं तो लगता है कि उनकी राजनीति के स्वर्णिम रिकॉर्ड को कोई छू न सका है और काले कामों को उनके बाद वालों ने इस कदर गति दी है कि वे काले बादल बनकर भारत के सारे आसमां पर छा गए हैं। आज घटाघोप अंधियारा है और उनसे आए दिन कभी बोफोर्स, कभी राफेल, कभी व्यापमं तो कभी सीबीआई के भ्रष्टाचार और काले कारनामों की बरसात होती रही है। इसलिए कह सकते हैं कि इंदिरा गांधी ने अनेकानेक विरोधाभासों के बाद भी स्वयं को सिद्ध किया है। राजीव गांधी भी इंदिरा गांधी की तरह वंशवाद की देन थे। लेकिन उन्होंने भारतीय राजनीति में एक विकासशील प्रधानमंत्री के साथ एक आदर्श राजनेता की छाप छोड़ी। सोनिया और राहुल गांधी भी उसी वंश परम्परा के वाहक हैं। सोनिया गांधी चाहतीं तो सन् 1991 में प्रधानमंत्री बन सकती थीं, लेकिन उन्होंने नरसिंहराव को प्रधानमंत्री बनाया। उसके बाद जब सन् 1998 में कांग्रेस डूब रही थी, तब उसका नेतृत्व ग्रहण कर उसे बचाया। अन्यथा कांग्रेस स्काइलेब की तरह टूटकर अलग-अलग प्रांतों में कई पार्टियों के रूप में बिखर जाती। उन्होंने सन् 2004 में प्रधानमंत्री का पद त्यागकर मनमोहन सिंह के रूप में एक योग्य प्रधानमंत्री बनाया। मनमोहन सिंह को देश की जनता ने 2004 से 2009 की सरकार के बाद 2009 में पुन: सरकार बनाने का मौका दिया था। सोनिया, राहुल गांधी सरकार और संगठन को नियंत्रित कर रहे थे। यह सर्वविदित तथ्य है, लेकिन उन्होंने अपने किसी भी कर्म एवं आचरण से कोई गलत संदेश नहीं दिया। 2013 में मनमोहन सिंह सरकार के खिलाफ उठे मुद्दे, जिनमें भ्रष्टाचार भी एक प्रमुख मुद्दा था, जिनसे मनमोहन सिंह सरकार को लोकसभा चुनाव 2014 में पराजय झेलना पड़ी थी, उन मुद्दों का क्या हश्र हुआ। वे कहां खो गए, कितने सही-गलत निकले और आज क्या हो रहा है, यह देश देख रहा है। देश ने बड़ी उम्मीद के साथ जिन नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाया था, उनको और उनके कार्यकाल को भी ध्यान से देख रहा है। इसलिए लोकतंत्र खंडित होने के दौर में भी लोकतंत्र पर यकीन रखिये। लोक और तंत्र को खंडित करने वाले व्यक्ति, विचार और पार्टी को देश की जनता ठुकराती रही है। यह सन् 1975 के आपातकाल के दौर के बाद 1977 के लोकसभा चुनावों ने सिद्ध किया था। यह सन् 2014 में नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद पिछले वर्षों में हुए ग्यारह से अधिक लोकसभा चुनावों ने और अभी-अभी हुए विधानसभा चुनावों ने भी सिद्ध किया है। अब मई 2019 की तैयारी है। प्रियंका गांधी का आना भारतीय राजनीति की एक असहज, लेकिन अब सहज बन चुकी प्रक्रिया का हिस्सा है। गले-गले तक वंशवाद में डूबे दल, नेता और उनके समर्थक जब वंशवाद पर सवाल उठाते हैं, तो उनके विवेक पर तरस आता है। सोनिया गांधी ने जब सन् 2004 में प्रधानमंत्री पद ठुकराया था। तब राहुल-प्रियंका से परामर्श किया था, जिसमें दोनों ने उनका साथ दिया था। इस नजारे को पूरे देश ने देखा था। राजनैतिक दलों में एक पार्षद या विधायक का टिकट कटने पर टिकटार्थी, उसका घर-परिवार और समर्थक ऐसे रुदन-क्रंदन करने लगते हैं, जैसे उनका जहाँ लुट गया हो। ऐसे दौर में सोनिया गांधी का प्रधानमंत्री पद ठुकराने का दृश्य एक अलौकिक घटना बन गया था, जिसका लाभ उनकी पार्टी को 2009 में भी मिला था और आज भी मिल रहा है। राहुल-प्रियंका ने मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्रित्व काल में कोई महत्वाकांक्षा नहीं दिखाई। आज प्रियंका गांधी 47 वर्ष की हो रही हैं। उनका आगमन भारतीय राजनीति में उनकी चिर प्रतिक्षीत इंतजारी के बाद हुआ है। उनसे चमत्कार की उम्मीद की जा रही है। पक्ष-विपक्ष के अपने-अपने तर्क हैं, जिनका जवाब उनकी दादी इंदिरा गांधी ने जिस तरह अपनी खूबसूरती से नहीं, वरन स्वयं को सिद्ध करके दिया था, उसी तर्ज पर प्रियंका को स्वयं को सिद्ध करना होगा। -- कठिन डगर मध्यप्रदेश में सत्ता बदले डेढ़ माह हो रहे हैं। पन्द्रह साल बाद कांग्रेस के चेहरे पर चमक लौटी है। मुख्यमंत्री कमलनाथ हैं। शेडो मुख्यमंत्री के रूप में पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजसिंह हैं। वहीं मुख्यमंत्री पद के दावेदार रहे ज्योतिरादित्य सिंधिया के कई समर्थक कैबिनेट मंत्री बने हैं। कह सकते हैं कि कमलनाथ के नेतृत्व में व्यक्तिवादी नहीं सामूहिक मंत्रिमंडल बना है। सरकार चलाना सबसे आसान और सबसे कठिन काम होता है। यदि जनहित में उद्देश्यपूर्ण सरकार चलाना है तो यह राजनीति की एक कठिन डगर होती है। यह वैसी ही होती है, जैसे पानी के भंवर जाल से तैरकर बाहर आना। सरकारें कठिन डगर नहीं वरन् आसान रास्ता पकड़ती हैं। पुलिस, सुरक्षा गार्ड, अधिकारी, समर्थकों के काफिले के साथ जब सायरन बजाती लाल-पीली बत्ती लगी गाड़ियों के साथ मुख्यमंत्री, मंत्री की गाड़ियां गुजरती हैं, तब सब कुछ ठहर जाता है। यह नजारा लोकतंत्र में किसी राजा-महाराजा, वायसराय की पुनरावृत्ति का संकेत देता है। सन् 1977 में जनता सरकार के दिनों में जार्ज फर्नांडीस जैसे मंत्रियों ने इन परम्पराओं को तोड़ने का प्रयास किया था। वे जनता पार्टी की टूट के साथ ही कालकवलित हो गईं। इसके बाद दिल्ली में मुख्यमंत्री बनते ही अरविंद केजरीवाल ने यह काम किया। कई केन्द्रीय मंत्री और मुख्यमंत्री भी ऐसी ही घोषणाएं करने लगे। लेकिन राजनीति की मुद्दा विहीन करकशता में यह बातें कहीं खो गईं। लोकतंत्र की प्रगति को नेता समझ रहे हैं। इसलिए इस बार जो सरकार आई है, वो जैसा कि हम लिख रहे हैं ठहरी हुई है, लेकिन कठिन डगर पर चलने में हिचक रही है। राजशाही के सब साधन मौजूद हैं, लेकिन सरकार बचती दिख रही है। कहीं-कहीं फंसते भी दिख रही है। मुख्यमंत्री कमलनाथ ने किसानों की कर्जमाफी और पुलिस की साप्ताहिक छुट्टी का वादा पूरा कर मानवीयता का काम किया है। मंत्री भी क्षेत्रों में विकास की बात कर रहे हैं। नगर निगम, विकास प्राधिकरण से लेकर तमाम शासकीय विभागों में भ्रष्टाचार थम गए हैं। शिवराज सरकार के पूर्व जब कांग्रेस सरकार थी, तब पुलिस विभाग में थानेदार या सीएसपी स्तर पर भ्रष्टाचार सुनने में आते थे, वह शिवराज सरकार में डीआईजी, आईजी तक सरेआम पहुंच गया था। कलेक्टर-कमिश्नर जिनका कभी स्तर होता था, उनमें निम्न स्तर वालों की चलन थी। फिलहाल लूट तंत्र की शक्तियां कमजोर हो गई हैं। लेकिन सब जानते हैं कि ये ताकतें अपना रास्ता बना लेंगी, सरकार के जनहित के वादों को दीमक की तरह चाट कर खोखला कर देंगी। मंदसौर में जब छह किसानों को गोली से मार दी गई थी। तब राहुल गांधी मंदसौर आए थे। अब किसानों को दी गई ऋण माफी ऊपरी सतह भर है, यह कितने किसान, खेत, गांव को राहत पहुंचा पाएगी? सरकार ने किसानों के लिए कौन-सी नीति कार्यक्रम बनाया है? उनकी तह में जाकर कहां तक उनके दर्द को समझा है? म.प्र. के इन्दौर में बनाई जा रही स्मार्ट सिटी में दमन से मकान, दुकान को तोड़कर सड़कें चौड़ी की गई हैं। यह जनहित में जरूरी हो सकता है, लेकिन मुआवजा नहीं देना अमानवीयता है। उस वक्त कांग्रेस ने विरोध करते हुए मुआवजे की मांग की थी। अब नई सरकार आने पर कांग्रेस के विधायक नानीबाई का मायरा और कथा करवाकर करोड़ों रुपए खर्च कर रहे हैं। और मंत्री राघौगढ़ में मायरा करने की घोषणा कर रहे हैं। मायरा और कथा होती रहेंगी यह काम धार्मिक, सामाजिक संगठन और व्यक्ति समय-समय पर करवाते रहते हैं, लेकिन जब नानी का मकान और दुकान ही टूट गई है और वृद्ध बेसहारा हैं। ऐसे में मायरा कौन करेगा। यह जवाबदारी सरकार की है। उसे सर्वे कराकर मुआवजा देने की तुरंत घोषणा करना चाहिए। मुख्यमंत्री स्वीटजरलैंड पहुंच गए हैं। वे अपने खर्चे पर गए होंगे, पुराने मुख्यमंत्री शिवराज, सरकार के खर्चे पर सपरिवार मंत्रियों, अधिकारियों के साथ जाते थे। कहते थे कि म.प्र. के विकास के लिए देखने जाते हैं। शुक्र है कमलनाथ ने जाने के पूर्व ऐसा कोई बयान नहीं दिया है। कमलनाथ को कमल की तरह अपने नीचे के कीचड़ को साफ करना होगा। नई सरकार ने पुरानी सरकार के डंपर, रेती, व्यापमं, भ्रष्ट अधिकारियों पर दूरगामी नहीं, वरन् तात्कालिक जांच की कोई कार्रवाई नहीं की है। सरकारों के पुराने और नए दलालों में अंदरुनी गठबंधन होता है। यदि बेशर्म सरकार रहती है, तो यह बहुत जल्दी सार्वजनिक भी हो जाता है। नए मुख्यमंत्री की कोई दुकान नहीं खुली है। इसलिए मंत्री दुकान नहीं खोल पा रहे हैं। इस सरकार को ठहरना नहीं, वरन् पानी के भंवर जाल को काटते हुए तेजी से तैरना जरूरी है, अन्यथा सरकार डूब जाएगी। रविवार की ओर से एक पत्र म.प्र. सहित अन्य प्रांतों के मुख्यमंत्री और मंत्रियों को सफाई कामगारों के लिए म.प्र. देश में पहला मेन्युअल से मशीन वाला राज्य बने, इस हेतु भेजा है, जो संलग्न है- केन्द्र सरकार द्वारा सन् 1993 में मैला ढोने पर रोक लगाने का पहला कानून बनाया गया। लेकिन यह सिर्फ सूखे शौचालयों के लिए था। फिर दूसरा कानून सन् 2013 में बनाया गया, इसमें सेप्टिक टैंकों की और रेलवे पटरियों की सफाई को भी शामिल किया गया। इसके बाद पिछले पांच वर्षों में मेन होल में सफाई करने से 1470 सफाईकर्मियों की मौत हुई है। यह जानकारी भी एक वर्ष पुरानी है। कानूनन रोक के बाद भी यह काम हमारे देश के गांव, गली, मोहल्ले से लेकर महानगरों तक में सरकार के अंगों द्वारा कानून तोड़कर सरे आम कराया जाता है। हमारी इस संवेदनहीनता ने सदियों से हमारे देश को तोड़ा है। नुकसान पहुंचाया है। आजादी के 72 वर्ष बाद आजाद भारत की यह स्थिति हमारी बेशर्मी के साथ संवेदनहीनता को भी दर्शाती है। हमें इंसान कहलाने में फख्रमहसूस होता है, लेकिन इंसान को इंसान नहीं मानने में शर्म महसूस नहीं होती है। सफाईकर्मी के मेन होल में वह भी हमारी सफाई के लिए जो हमारे जिंदा रहने की एक बड़ी वजह है। सफाई करते हुए मरने पर हम इसे अखबार में पढ़कर या टीवी पर देखकर भूल जाते हैं। इसका बड़ा कारण सिर्फ एक ही जाति दलित का इसमें लगे होना है। यदि इस कार्य में अन्य जातियां, खास तौर पर बड़ी जातियां भी शामिल होतीं तो इंसान की जगह मशीन से सफाई कभी की शुरू हो चुकी होती। कानून के बाद भी इंसान के हाथों से गंदगी की सफाई रोकी नहीं जा सकी है। इस परिस्थिति में इसका तात्कालिक हल तो इंसान के बदले मशीन है। जब दस, बीस, पचास मंजिल तक लिफ्ट जा सकती है, तो जमीन के कुछ अंदर आधुनिक लिफ्ट क्यों नहीं जा सकती? सरकारों की दृष्टि इस ओर नहीं जाती है। सच्चाई तो यह है कि इस दिशा में कभी सोचा ही नहीं है। इसका और अच्छा हल मेन होल खत्म करना है। आधुनिक सीवरेज लाइन विकसित करना है। लेकिन व्यवस्था की पहली प्राथमिकता मेट्रो, बुलेट ट्रेन रहती है। अत: नवनिर्वाचित सरकार से निवेदन है कि वो अपनी कार्य सूची में इस इंसानियत से परिपूर्ण कार्य को, जो उसकी पहली प्राथमिकता होनी चाहिए, जिसके निर्वहन के लिए कानून भी है। उस कानून के पालन के लिए इंसान की जगह मशीन से सफाई की घोषणा कर इंसानियत और देशहित में कदम उठाएं।