जनवरी 2019

आम आदमी की निजता पर अब सरकारी निगरानी

अनिल जैन

Intro दिसंबर के महीने में कुछ खबरें देश-दुनिया के लिए बेहद महत्वपूर्ण रहीं। भारत सरकार ने आम आदमी की निजता का हरण करने की दिशा में कदम उठाते हुए देश में मौजूद सभी कंप्यूटरों की जांच करने का अधिकार दस सरकारी एजेंसियों को दे दिया, तो सरकार के ही मुख्य आर्थिक सलाहकार रहे अरविंद सुब्रमण्यम ने देश को जल्दी ही आर्थिक मंदी का सामना करने के लिए चेताया है। उधर दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश अमेरिका ने सीरिया और अफगानिस्तान से अपनी फौजें हटाने का फैसला लेकर एक तरह से अपनी हार कुबूल कर ली है तो इसी बीच पौलेंड में जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों पर सालाना वैश्विक सम्मेलन बिना किसी ठोस फैसले के संपन्न हो गया। इधर दिल्ली में शादी समारोहों में होने वाली भोजन की बर्बादी को रोकने की दिशा में दिल्ली सरकार ने जल्द ही एक व्यापक नीति बनाने का आश्वासन सुप्रीम कोर्ट को दिया है।

भारत में जन्मे मशहूर ब्रिटिश उपन्यासकार जार्ज ऑरवेल का एक चर्चित उपन्यास है- '1984'। सत्तर साल पहले 1948 में समय से आगे एक समय की कल्पना पर आधारित लिखे गए इस राजनीतिक उपन्यास में बताया गया है कि राजसत्ता किस तरह अपने नागरिकों पर नजर रखती हैं और उनकी बुनियादी आजादी का हरण करती है। जार्ज ऑरवेल की कल्पना अब अपने यहां हकीकत में बदलती दिख रही है। केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देते हुए एक आदेश जारी कर केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन काम करने वाली दस एजेंसियों को देश में चलने वाले सभी कंप्यूटरों की जांच का अधिकार दिया है। यानी ये एजेंसियां महज शक के आधार पर किसी भी व्यक्ति या संस्था के कंप्यूटर में मौजूद डेटा की जांच का सकेंगी। इसके साथ ही उन्हें उस डिवाइस और डेटा की निगरानी करने, उसे रोकने और डिक्रिप्ट करने का भी अधिकार होगा। इस आदेश के मुताबिक सभी सर्विस प्रोवाइडर और कंप्यूटर के मालिकों को जांच एजेंसियों के साथ तकनीकी सहयोग करना होगा। असहयोग करने वाले को सात साल की सजा के साथ जुर्माना भी लगाया जा सकता है। हालांकि सरकार की ओर फिलहाल देश की सुरक्षा का वास्ता देते हुए विशेष स्थितियों में ही यह कार्रवाई करने की बात कही जा रही है और बताया जा रहा है कि इसका आम लोगों पर कोई असर नहीं पडेगा। लेकिन हमारे देश में पुलिस या दूसरी जांच एजेंसियों के कामकाज के कुख्यात औपनिवेशिक तौर-तरीकों के मद्देनजर यह समझना मुश्किल नहीं है कि इन एजेंसियों को दिए गए अधिकार का जमीनी असर क्या हो सकता है। क्या इसका एक अर्थ यह नहीं है कि सरकार लोगों की निजी गतिविधियों को अपनी मनमानी निगरानी के दायरे में लाने जा रही है? बेशक राष्ट्रीय सुरक्षा का सवाल बेहद अहम है और सर्वोच्च प्राथमिकता के आधार पर इसकी चिंता सरकारों को ही नहीं बल्कि हर नागरिक को करनी चाहिए। लेकिन सरकार के इस आदेश के प्रथम दृष्टया जो आशय समझ में आ रहे हैं, उसमें यह कैसे सुनिश्चित होगा कि इसके जरिए लोगों की निजी स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों को निशाना नहीं बनाया जाएगा? फोन कॉल या कंप्यूटरों की जांच का जो आदेश जारी किया गया है, वह किस तरह किसी व्यक्ति की जासूसी करने से अलग है? यह कैसे सुनिश्चित होगा कि जांच एजेंसियां इस अधिकार का बेजा इस्तेमाल नहीं करेंगी? किसी व्यक्ति या संस्था की गतिविधि संदिग्ध है या नहीं, इसे कौन परिभाषित करेगा और कैसे करेगा? संभव है कि कुछ लोग ऐसी गतिविधियों में लिप्त हो, जो देश की सुरक्षा और सामाजिक सद्भाव के लिहाज से बेहद आपत्तिजनक हों, मगर किसी आपराधिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्ति और सामान्य नागरिकों के साथ बर्ताव में सरकार कोई फर्क करेगी या नहीं? सवाल यह भी है कि मौजूदा कायदे-कानून क्या देश विरोधी गतिविधियों से निबटने में इतने नाकारा हैं कि सरकार को आम लोगों पर अप्रत्यक्ष निगरानी का आदेश जारी करना पडा? गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट निजता को संविधान में दर्ज मौलिक अधिकार के रूप में मानकर इसके पक्ष में फैसला दे चुका है। उसके मद्देनजर क्या गारंटी है कि सरकार के ताजा आदेश से सुप्रीम कोर्ट के फैसले और संविधान में वर्णित नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं होगा? हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि किसी भी लोकतंत्र को तभी परिपक्व माना जाता है, जब उसमें असहमति और अभिव्यक्ति को अधिकार की शक्ल में जगह मिलती है। लेकिन कई बार सरकारें देश की सुरक्षा का वास्ता देकर नागरिकों को निगरानी के दायरे में रखकर उनकी निजता और अभिव्यक्ति की आजादी का दमन करती हैं। दुनिया के कई देशों में ऐसा होता रहा है। जबकि असहमति और अभिव्यक्ति की आजादी किसी भी लोकतांत्रिक समाज की खूबसूरती होती है और इन पर किसी भी रूप में अंकुश लगाने की कोशिशें लोकतंत्र की बुनियाद को कमजोर करती है।