जनवरी 2019

ज्ञानपीठ पुरस्कार और हिन्दी जगत का हाहाकार

त्रिभुवन

अंग्रेजी के प्रसिद्ध उपन्यासकार अमिताव घोष को इस वर्ष का प्रतिष्ठित ज्ञानपीठ पुरस्कार मिलने पर हिंदी जगत में हाहाकार मचा हुआ है। पुरस्कार के लिए उनके नाम के चयन को हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं का अपमान करार दिया जा रहा है। लेकिन जलवायु परिवर्तन जैसे वैज्ञानिक और तकनीकी विषय को सामाजिक सरोकारों से जोड़कर उसे साहित्य का रुचिकर विषय बना देने वाले अमिताव घोष के रचना-कर्म पर कोई चर्चा नहीं कर रहा है। दरअसल अमिताव घोष अपने रचना-कर्म के जरिये व्यवस्था से पराजित लोगों के भीतर जिस तरह जिजीविषा जगाते हैं, वह इस समय का सबसे जरूरी स्वर है।

पिछले दिनों प्रसिद्ध सरोद वादक अमजद अली खां साहब ने सिटी पैलेस में काफी लंबी बातचीत के दौरान एक बहुत उम्दा बात कही : सुर इन्सानियत को बांधता है और शब्दों पर टिकी भाषा बिखेरती है। सुर नैसर्गिक है। भाषाएं और शब्द कृत्रिम। प्रसिद्ध उपन्यासकार अमिताव घोष को ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला और उस पर हिन्दी जगत में हाहाकार होने लगा तो मुझे सहसा अमजद अली खां फिर से याद आ गए। उनके शब्द सुरों की तरह अनुगुंजित हो उठे। हम आजीवन अंग्रेजी वेशभूषा पहनेंगे, अंग्रेजी जीवन मूल्यों का धारण करेंगे और बचपन से अंग्रेजी न सीख पाने की कुंठाओं को ढोएंगे और अंतत: अंग्रेजी को गरियाएंगे। प्रसिद्ध कवि असद ज़ैदी साहब ने अपनी एक फ़ेसबुक पोस्ट में बहुत मार्के की बात लिखी है: "अंग्रेज़ी आज न सिर्फ़ विश्वभाषा है बल्कि बहुत पहले से भारतीय भाषा की तरह अपनी जगह बना चुकी है। यह ज्ञान विज्ञान, उच्च शिक्षा और उपमहाद्वीप स्तर पर सम्पर्क और कामकाज का माध्यम है। सिर्फ़ अखिल भारतीय कुलीन वर्ग ही नहीं, उत्तर-पूर्व के राज्यों और गोवा में अवाम का बड़ा हिस्सा अंग्रेज़ी बोलता है। तथाकथित हिंदी प्रदेश में भी हिंदी की व्याप्ति और हिंदी का राज बहुत पुराना नहीं है! इसके नाम पर भी बहुत भाषायी और भाषिक ग़ारतगरी फैलाई गई है और अपराध किए गए हैं! सांस्कृतिक अस्मिता, भारतीयता, 'निज भाषा', 'देशज' के आग्रह के बहाने दीवारें खड़ी करना और तत्ववाद फैलाना दरअसल अलोकतांत्रिक और संस्कृति-विरोधी कार्य है।" लेकिन यह अवसर था कि अमिताव घोष के रचनाकर्म पर चर्चा होती। क्या हम हिन्दी में जलवायु परिवर्तन पर कोई अच्छा साहित्य ला पाएं हैं? जलवायु परिवर्तन आज के युग का सबसे बड़ा वैज्ञानिक सच है। लेकिन अमिताव घोष ने इसे वैज्ञानिक और तकनीकी विषय से बदलकर सामाजिक सरोकारों से जोड़कर साहित्य का बहुत अदभुत विषय बना दिया है। उनकी हाल ही आई अदभुत पुस्तक 'दॅ ग्रेट डिरेंजमेंट: क्लाइमेट चेंज ऐंड अनथिंकेबल' इस विषय को संकीर्णताओं के दायरे से उठाकर संस्कृति, समाज, राजनीति और सत्ता प्रतिष्ठानों से जोड़कर मनुष्यता के सरोकारों का आईना बना देती है। वे चेता रहे हैं कि अब गगनभेदी आवाज़ उठाने का समय आ गया है। अमिताव घोष के भीतर एक अद्भुत कथाकार है। उनकी दृष्टि बहुत साफ़ है। वे भूमंडलीकरण से लेकर सुदूर ग्रामीण जीवन की टूटन तक के सूक्ष्म पर्यवेक्षक हैं। वे साहित्य में कार्पोरेट एंपायर के ख़तरों को बहुत खूबसूरती से अंकित करते हैं। हमें साहित्य में जिस सिंथेसिस और इमेजिनेशन की ज़रूरत होती है और जिससे किसी लेखक का रचनाकर्म महक उठता है, वह खूबी अमिताव में देखी जा सकती है। साहित्य में अतीतजीविता पर काम करने वाले लेखक बहुत बड़ी तादाद में हैं और वे कार्बन कणों की तरह वातावरण को आच्छादित किए हुए हैं, लेकिन मानव के भविष्य में प्रवेश करके ख़तरों की छायाओं को देखने वाले लेखक गिनती के हैं और यह सुखद है कि अमिताव घोष उनमें एक हैं। मानव इतिहास के अनुभवों को निचोड़कर मानव भविष्य की दुश्चिंताओं को रेखांकित करना किसी प्रतिभा के बस की बात है। मुझे हर वह लेखक सहज ही बहुत भा जाता है, जो सरहदों को तोड़ने की संभावनाएं और पृथ्वीे से जुड़ी आशंकाएं वर्णित करता है। गे, लेस्बियन और एलजीबीटी से लेकर जातिवाद, सांप्रदायिकता और संकीर्ण राष्ट्रवाद को प्रिय विषय बनाने वाले युग में हमारे पास कोई है, जो इस ब्रह्मांड में दग्ध होती पृथ्वीा और विकराल खतरों से रूबरू हमारी मानव सभ्यता के सरोकारों की चिंता करता है। मेरा बेटा अक्सर सुबह ढाई से तीन बजे के बीच जब मुझे पक्षियों की चहचहाहट शुरू होते ही प्रकृति के अनंत वैभव और इस पर मंडराते खतरों के बारे में आगाह करता है तो उसकी एक प्रभावी अनुगूंज 'दॅ ग्रेट डिरेंजमेंट: क्लाइमेट चेंज एंड अनथिंकेबल' में सुनाई देती है। उनकी कृति 'रिवर ऑव स्मॉक' को पिछले कई दशकों में रची गई कृतियों में एक अलग तरह की रचना है। कुछ साल पहले मेरा बेटा जब अमिताव घोष का उपन्यास 'सी ऑव पॉपीज' लेकर आया तभी शायद मैंने उन्हें पढ़ना शुरू किया था। आज भी याद है कि उनका यह उपन्यास मानो अद्भुत पात्रों का एक सम्मोहक पैनोरमा ही है। वे हारे हुए और पराजित लोगों के भीतर जिस तरह की जिजीविषा जगाते हैं, वह इस समय का सबसे ज़रूरी स्वर है। मेरा ख़याल है, इस मामले में प्रबुद्ध मित्रों को अपना भाषा प्रेम परे रखकर चीज़ों को देखना चाहिए। (लेखक उदयपुर में दैनिक भास्कर के संपादक हैं। उनकी यह टिप्पणी उनके फेसबुक वॉल से ली गई है)