जनवरी 2019

शंका-निवारण

डॉ. रश्मि रावत

अनुमान है कि शौचालय की सुविधा से वंचित दुनिया की कुल आबादी का एक-तिहाई हिस्सा भारत में है, जबकि इस एक तिहाई हिस्से में कामकाजी औरतें शामिल नहीं होंगी। सेल्स वुमेन, सर्वेक्षणकर्मी और इस तरह के अन्य व्यवसायों में लगी स्त्रियों को अक्सर पूरा दिन निवृत्त हुए बिना बिताना पड़ता है। पीने के लिए पानी तो फिर भी कोई दे सकता है। किंतु अपने घर में यह सुविधा अपरिचित को उपलब्ध करवाना वर्तमान दौर में असंभव सा होता जा रहा है। यहां तक कि दिन भर अपने ही घरों में काम करने वाली घरेलू सहायिकाओं को भी कम ही लोग अपने घर का शौचालय प्रयोग करने देते हैं।

स्त्री की आजादी के नाम पर देहविमर्श की बातें जोर-शोर से की जा रही हैं। यौन-मुक्ति की कुंजी से स्त्री को परत-दर-परत कसने वाली जकड़बंदियां खुल सकती हैं, इसमें भला किसे संदेह हो सकता है। कब और कैसे किन प्रश्नों के बीज बोने हैं, इस निर्णय के लिए सामाजिक गतिकी की दुरुस्त समझ होनी जरुरी है। देह को अपनी गिरफ्त में लेने वाली एजेंसियों का बोध धीरे-धीरे उन्हें एक हद तक बेअसर करने लगता है। सामान्य शारीरिक क्रियाएं जिनका मन के जोर से कोई सम्बंध नहीं है। यदि कोई समाज उस स्तर तक भी न पहुंचा हो कि लोगों की बुनियादी शारीरिक जरूरतों की भी पूर्ति हो सके तो अन्य सभी सवाल बेमानी हो जाते हैं। कुछ भी करने के लिए पेट का भूखा न रहना जितना जरूरी है उतना ही उसका खाली होना भी। दोनों का ही समाधान करने में सभ्यता हार गई है। फिलहाल हम अपनी चर्चा केंद्रित करेंगे स्त्रियों की शंका निवारण सम्बंधी समस्याओं पर। ये तो एक हद तक समझा जा चुका है कि यह उनकी व्यक्तिगत समस्या नहीं है और इसके दुष्परिणाम भी व्यापक और दूरगामी हैं। घरों में शौचालय बनने चाहिए। इस बात की जाग्रति पिछले कुछ समय से काफी फैली है। शौचालय बनाने के रास्ते में आने वाली आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक अड़चनों से पार पाने की कोशिशें की जा रही हैं। बड़ी संख्या में घरों में शौचालय बने भी हैं। पति के घर में शौच की सुविधा न होने के कारण नौबत तलाक तक आने की सच्ची घटना पर आधारित मुख्यधारा की हिट फिल्म प्रसारित होने से भी इस समस्या पर लोगों का ध्यान गया। इन दिनों अखबारों में इस तरह की घटनाएं छपती रही हैं कि शौचालय न होने के कारण दुल्हन ने विवाह से इंकार किया, रिश्ता तोड़ा या शौचालय की शर्त रखी। राजस्थान के एक जज ने शौचालय न बनवाने को मानसिक उत्पीड़न मानते हुए इस आधार पर तलाक मंजूर किया। रोंगटे खड़े करने वाली एक घटना में तो काफी समय से घर में शौच की सुविधा जुटाने की मांग कर रही 16 साल की किशोरी ने इसी कारण आत्महत्या कर ली थी। खुले में निवृत्त होना स्त्री की गरिमा के विरुद्ध तो है ही, साथ ही उस समाज में जो स्त्रियों के लिए सुरक्षित नहीं है, अंधेरे में बाहर निकलने पर उन्हें कई तरह के जोखिम उठाने पड़ते हैं। इस दौरान बलात्कार जैसे अमानवीय दुष्कृत्य की ताक में रहने वाले दरिंदों की भी कमी नहीं है। जंगल के निकटस्थ जगहों पर पशुओं की शिकार भी वह बनती हैं। कुछ साल पहले गढ़वाल में एक बच्ची लघुशंका के लिए रात को घर से बाहर निकली और उसे तेंदुआ उठा कर ले गया। वैज्ञानिक और तकनीकी विकास की बदौलत सुख-सुविधाओं और मनोरंजन के साधनों से दुनिया पटी हुई है। ऐसे समय में बुनियादी सुविधा के अभाव की इतनी बड़ी कीमत समाज को चुकानी पड़े, हजम करने वाली बात नहीं है। कई कारणों से पुरुषों की तुलना में स्त्रियों के लिए यह मुद्दा कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है। सैनिटरी सुविधाएं स्त्रियों की जिंदगी की तीसरी सबसे बड़ी जरूरत है। शौच के निस्तारण की व्यवस्था न होने से प्रदूषित पानी का शिकार तो समूचा समाज ही बनता है। तरह-तरह की बीमारियां इससे फैलती हैं। इसके अतिरिक्त इस सुविधा का अभाव कई तरह के शारीरिक, मानसिक दबाव बनाए रखता है। घर में सुविधा न होने का अर्थ है कि खुद को इस तरह से साधना कि दिन के नियत समय के अलावा जरूरत न पड़े। इसका असर खान-पान से लेकर हर पहलू पर पड़ता है। सुविधा वंचित स्त्रियां खाना-पीना कम कर देती हैं और गॉल ब्लैडर पर दबाव झेलती हैं। जिसका बहुत बुरा असर उनके स्वास्थ्य पर पड़ता है। स्त्री परिवार का केंद्र होती है इसलिए स्त्री की दशा से पूरे परिवार की जिंदगी प्रभावित होती है। अनुमान है कि शौचालय की सुविधा से वंचित दुनिया की कुल आबादी का एक-तिहाई हिस्सा भारत में है, जबकि इस एक तिहाई हिस्से में कामकाजी औरतें शामिल नहीं होंगी। सेल्स वुमेन, सर्वेक्षणकर्मी और इस तरह के अन्य व्यवसायों में लगी स्त्रियों को अक्सर पूरा दिन निवृत्त हुए बिना बिताना पड़ता है। पीने के लिए पानी तो फिर भी कोई दे सकता है। किंतु अपने घर में यह सुविधा अपरिचित को उपलब्ध करवाना वर्तमान दौर में असंभव सा होता जा रहा है। यहां तक कि दिन भर अपने ही घरों में काम करने वाली घरेलू सहायिकाओं को भी कम ही लोग अपने घर का शौचालय प्रयोग करने देते हैं। दिन भर निवृत्ति के बिना गुजारना या इसके लिए दूर कहीं जाना कितना उत्पीड़न देता होगा, समझा जा सकता है। इसका इनके स्वास्थ्य, व्यक्तित्व, काम-काज सभी पर प्रभाव पड़ता है। कार्य-स्थलों पर भी स्त्रियों के लिए साफ-सुथरे शौचालय की पर्याप्त सुविधा नहीं है। जिन कार्यालयों में स्त्रियों की संख्या बहुत कम है। सोच लिया जाता है कि स्त्री-पुरुष दोनों एक शौचालय से काम चला लेंगे। किंतु वस्तुतः इसका परिणाम यह होता है कि स्त्रियां कोशिश करने लगती हैं कि 8-9 घंटे की इस अवधि में उन्हें जाने की जरूरत ही न पड़े। जिससे स्वास्थ्य के साथ-साथ उनकी कार्य क्षमता पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। रास्तों में भी शौचालय अक्सर पुरुषों को ध्यान में रख कर बनाए जाते रहे हैं। उनका स्वरूप स्त्री सुलभ नहीं होता और कई बार वे खुले भी होते हैं। पहले स्त्रियों को घर से बाहर निकलने की जरूरत कम पड़ती थी। अब जबकि सामाजिक, व्यावसायिक कामों के अलावा वह घुमक्कड़ी के उद्देश्य से भी बाहर निकलने लगी हैं तो रास्तों में और पर्यटक स्थलों पर उन्हें पर्याप्त सुविधा नहीं मिलती। स्त्रियों से हुई बातचीत के आधार पर यह बात सामने आई कि कई स्त्रियां सैनिटरी सुविधाओं के अभाव के कारण बाहर निकलने से बचती हैं। बिंदेश्वरी पाठक ने पूर्ण प्रतिबद्धता के साथ व्यापक पैमाने पर शौचालय-निर्माण के लिए देश भर में अभियान चलाया हुआ है। इन्होंने 1970 में बिहार में सुलभ इंटरनेशनल की स्थापना की और वर्तमान में यह देश की सबसे बड़ी गैर सरकारी संस्था है जो स्वच्छ सैनिटरी सुविधाओं के साथ-साथ बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार से भी जोड़ रही है। किंतु समस्या इतनी अधिक व्यापक है कि बहुत बड़े पैमाने पर काम किए जाने की जरूरत है। गांव-देहात-कस्बों में, नगरों-महानगरों, देश-विदेश में इस विषय में कार्यक्रम करके इसे प्राथमिक महत्व की मुहिम की तरह स्थापित करने का पाठक जी का पूरा प्रयास है। ऐसे प्रयासों की एक लम्बी कड़ी की जरूरत है। समाज में व्याप्त भेदभाव भी इस समस्या को और अधिक गहरा करते हैं। जाहिर है कि वर्ग, लिंग और वर्ण के निम्न स्तर पर अवस्थित समूह को इससे सबसे अधिक नुकसान उठाना पड़ता है। हॉलीवुड में 'हिडन फिगर्स' फिल्म में नासा में कार्यरत अश्वेत महिला गणितज्ञ वैज्ञानिक को शौच-निवृत्ति के लिए कुछ दूर जाना पड़ता था, जिसमें उसके दिन के 1-2 घंटे नष्ट होते थे, क्योंकि शौचालय श्वेतों के लिए आरक्षित थे। अंतरिक्ष का महत्वपूर्ण अभियान उस महिला की विशेषज्ञता पर निर्भर न होता तो क्या उसे इस टीम का हिस्सा बनाया जाता? अगर उसका कोई विकल्प सम्भव होता तो क्या उसके स्थान पर श्वेत, पुरुष रखने को वरीयता नहीं दी जाती। बाद में उसके लिए इन नियमों में जो ढील दी गई, क्या वह दी जाती? इन सवालों पर ठहर कर विचार करने पर सामान्य सुविधाओं के अभाव के परिणामस्वरूप घटित होने वाले दूरस्थ निष्कर्ष प्राप्त होंगे। मामूली सी लगने वाली छोटी-छोटी चीजों का अभाव व्यक्ति के पूरे उठान को ही रोक सकता है। रोजमर्रा की जिंदगी में इस ओर कभी हमारा ध्यान तक नहीं जाता। अमेरिका जैसे विकसित देश की उत्कृष्ट संस्था में इस तरह की समस्या रही है तो आम स्थलों की हालत की कल्पना की जा सकती है। भारत में जातिगत विषमता समस्या को और अधिक त्रासकारी बना देती है। अवसरवादी, सुविधाभोगी प्रवृत्ति वाला दोगला आधुनिक समाज सेवाएं लेने में तो नहीं हिचकता पर सुविधाओं को दूसरों से साझा करने में उसकी जातिगत भेदभाव की मानसिकता आड़े आती है। सांस्कृतिक जड़ें इतनी गहरी हैं कि भूमंडलीकृत समय में भी हम शरीर की इन स्वाभाविक जरूरतों के प्रति सहज नहीं हो पाए हैं। सामाजिकरण, संस्कृतिकरण की प्रक्रिया इतनी जटिल और व्यापक है कि वह शारीरिकता के इन आयामों को भी अपने सांचे में ढाल लेती है, जिन पर सामान्य तौर पर प्राणी का अपना वश नहीं होता। पारम्परिक, सौम्य, शालीन स्त्री से अपेक्षा की जाती है कि उसे खाने-पीने-जाने की जरूरत कम पड़े। विवाह के लंबे-चौड़े अनुष्ठानों में एवं अन्य धार्मिक व्रत, उपवासों में तो जबरन ग्रंथियों को सिकोड़ कर रखना ही होता है। नई बहुएं भी अपने नए घर में संकोच की मुद्रा में रहती हैं। अगर उनके कमरे से संलग्न निजी शौचालय न हो तो परिजनों की उपस्थिति में उसकी कोशिश रहती है कि उसे जरूरत न पड़े। देश का आर्थिक-सामाजिक ढांचा इस तरह का है कि कम प्रतिशत निवासियों को ही संलग्न शौचालय की सुविधा है। हमारे समाज में अक्सर सुनने में आता है कि लड़कियों का खाना और लड़कों का नहाना पता नहीं चलना चाहिए। लड़कियों को अल्पाहारी बनाने की संस्कृति का सूत्र इसी समस्या से शायद जुड़ता हो। इस मुद्दे को सेमिनारों का, अध्ययन का हिस्सा बनाना और आंदोलन की तरह इस पर काम किए जाना सकारात्मक दिशा की ओर संकेत करता है, पर समस्या के विकराल रूप को देखते हुए अभी ये प्रयास नाकाफी साबित हो रहे हैं। इसलिए इन मुद्दों को समाज और साहित्य में अधिकाधिक जगह दिए जाने की जरूरत है। स्त्री-विमर्श को तो इन सवालों को उच्च प्राथमिकता देनी ही चाहिए। जब तक हमारी बहुसंख्य बहनें अपने तन-मन पर इस तरह के दबावों को झेलने के लिए अभिशप्त हैं, तब तक बहनापे के सूत्र कैसे जुड़ सकते हैं। ब्रा, सैनिटरी नैपकिन, मुक्त यौन सम्बंधों के लिए सामूहिक आवाजें उठती रहती हैं। उससे कहीं अधिक जरूरत इस मुद्दे को विमर्श का अहम हिस्सा बनाने की है। स्वस्थ शरीर स्त्री के पास हो, तभी वह व्यक्तित्व के अन्य आयामों को विकसित करने की सोच सकती है। आर्थिक पक्ष इस आंदोलन का एक हिस्सा भर है। दिमाग के महीन स्तरों तक में लगे जाले साफ करने के सांस्कृतिक अभियान की भी पूरी जरूरत है। यह बात एक स्त्री से बेहतर कौन समझ सकता है। इसलिए उसे ही इस मुहिम में आगे आने की जिम्मेदारी उठानी चाहिए। समाज को अपनी इस शंका से मुक्त होना ही है कि बुनियादी सुविधाओं का संज्ञान लिए बिना उसका विकास हो सकता है। स्त्री-विमर्श इन प्रश्नों से कतराएगा तो अकादमिक विमर्श भर बन कर रह जाएगा। मुक्ति अकेले में मिल सकती है। इस शंका का निवारण आवश्यक है। (लेखिका दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापन के साथ ही विभिन्न साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं के लिए नियमित लिखती हैं)