जनवरी 2019

मोदी से संघ का मोहभंग !

प्रवीण मल्होत्रा

पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजों का भाजपा के पितृ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में बारीकी से विश्लेषण शुरू हो चुका है। प्रारंभिक निष्कर्ष यह है कि मोदी का करिश्मा अब चुक गया है और 2019 के आमचुनाव में भाजपा को नए चेहरे के साथ उतरना चाहिए। इस सिलसिले में संघ की निगाह नितिन गडकरी पर टिकी है। गडकरी ने भी हाल ही में अपने कुछ बयानों के जरिये यह संकेत देने की कोशिश की है कि वे नई भूमिका निभाने के लिए तैयार हैं।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ नेता किशोर तिवारी ने संघ प्रमुख मोहन भागवत तथा सरकार्यवाह भैयाजी जोशी को चिट्ठी लिख कर कहा है कि यदि 2019 का चुनाव जीतना है तो नरेंद्र मोदी नहीं, नितिन गडकरी के नेतृत्व में चुनाव लड़ा जाए। उन्होंने मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भाजपा की हार का सबसे बड़ा कारण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अहंकार को माना है। अभी तक एनडीए के अंदर से ही विरोध के स्वर सुनाई दे रहे थे। पहले चंद्रबाबू नायडू ने अपनी पार्टी टीडीपी को एनडीए से अलग किया और अभी हाल ही में उपेंद्र कुशवाहा केंद्रीय मंत्री मंडल से इस्तीफा देकर अलग हो गए हैं। वे 20 दिसम्बर को ही अपनी पार्टी राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के साथ यूपीए में शामिल हो गए हैं। शिवसेना तो एनडीए में रहते हुए ही चिर विद्रोही की भूमिका निभा रही है। राजनीति के मौसम वैज्ञानिक रामविलास पासवान ने भी तेवर दिखाना शुरू कर दिया है और उन्होंने अपने सांसद पुत्र चिराग पासवान को आगे कर रखा है। नितिन गडकरी स्वयं अपने को इस भूमिका में देखने लगे हैं कि वे बहुत जल्दी नरेंद्र मोदी का विकल्प बन सकते हैं। उन्होंने अभी अपने एक लम्बे इंटरव्यू में स्पष्ट रूप से यह कहा है कि राजनीति में धर्म, जाति, मन्दिर वगैरह को नहीं लाना चाहिए और सरकार को अपने विकास के कामों के आधार पर ही वोट मांगना चाहिए। स्पष्ट रूप से उनका यह कथन मोदी-शाह की चुनावी रणनीति से अलग सोच दर्शा रहा है। इसका एक ही अर्थ है कि अब न सिर्फ एनडीए, बल्कि संघ में भी पांच राज्यों में भाजपा की करारी हार के बाद यह धारणा बलवती हो रही है कि नरेंद्र मोदी स्टार प्रचारक के रूप में चुनाव जिताने वाली मशीन नहीं रह गए हैं। मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भाजपा ने अपनी सरकारें खो दी हैं तथा तेलंगाना और मिजोरम में भी मोदी-शाह की जोड़ी कोई कमाल नहीं दिखा पाई है। दोनों राज्यों में भाजपा सिर्फ एक-एक सीट लाकर अपना खाता भर खोल पाई है। तेलंगाना की शर्मनाक हार ने यह मिथक भी तोड़ दिया है कि भाजपा दक्षिण में एक शक्ति के रूप में उभर रही है। उत्तरप्रदेश जो लोकसभा में सबसे अधिक 80 सदस्य चुन कर भेजता है। यदि वहां भी सपा-बसपा-लोद और कांग्रेस का गठबन्धन हो जाता है तो भाजपा को कुछ विशेष हासिल होने वाला नहीं है। कुछ न्यूज़ चैनल और समाचारपत्रों ने पिछले दिनों यह खबर प्रकाशित की है कि मायावती-अखिलेश और अजीत सिंह में सीटों का बंटवारा हो गया है और उन्होंने उत्तरप्रदेश के अपने गठबन्धन से कांग्रेस को इसलिए बाहर रखा है, क्योंकि कांग्रेस के वोट उन्हें ट्रांसफर नहीं होते हैं तथा भाजपा और कांग्रेस का वोट बैंक एक ही है। मीडिया में यह खबर भी तैर रही है कि बसपा 38, सपा 37 तथा लोकदल 3 सीटों पर चुनाव लड़ेंगे तथा शेष दो सीट अमेठी और रायबरेली गांधी परिवार के लिए छोड़ दी गई हैं। लेकिन इस खबर की अभी तक सपा और बसपा की ओर से अधिकृत रूप से कोई पुष्टि नहीं की गई है, पर खण्डन भी नहीं किया गया है। वरिष्ठ पत्रकार अनिल जैन का स्पष्ट रूप से कहना है कि : "पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद पहले से जारी फर्जी खबरों के कारोबार में अचानक तेजी आ गई। यह तेजी सिर्फ सोशल मीडिया पर ही नहीं, अखबारों, टीवी चैनलों और चुनिंदा वेबपोर्टल पर भी देखी जा सकती है। इस सिलसिले में सबसे बड़ा और ताजा उदाहरण वह फर्जी खबर है, जिसमें कहा गया है कि उत्तर प्रदेश में सपा, बसपा और रालोद के बीच लोकसभा चुनाव के लिए गठबंधन और सीटों का बंटवारा हो गया है। इस फर्जी खबर का मकसद यह बताना है कि महागठबंधन को लेकर विपक्षी दलों में मतभेद हैं और इन तीनों दलों ने उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को अलग-थलग पटक दिया है। सूत्रों के हवाले से प्रचारित इस फर्जी खबर पर जहां सुपारीबाज टीवी चैनलों ने संपादकनुमा दलालों को बैठाकर उनसे 'विश्लेषण' भी करा दिया, वहीं अखबारों में भी इस खबर को लेकर संपादकीय टिप्पणी और विश्लेषण छपने का सिलसिला जारी है। कहा जा सकता है कि आने वाले चार-पांच महीनों में मुख्यधारा मीडिया के गिरने और कीचड़ में लौटने के नए-नए नजारे देखने को मिलेंगे।" बहरहाल, अनुमान लगाया जा सकता है कि उत्तरप्रदेश में यदि सपा, बसपा, लोद तथा कांग्रेस का गठबन्धन हो जाता है तो भाजपा को उन 15 से 20 सीटों पर सफलता मिल सकती है जहां शहरी आबादी ज्यादा है। यानी 2014 की 73 सीटों के मुकाबले लगभग 53-58 सीटों का नुकसान सम्भावित है। भाजपा के लिए इतना बड़ा घाटा कहीं से भी पूरा नहीं हो पाएगा। मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में लोकसभा की 65 सीटें हैं। 2014 में भाजपा ने इनमें से 62 सीटों पर जीत हासिल की थी। अभी इन तीनों राज्यों में विधानसभा चुनाव के जो नतीजे आए हैं, यदि उन्हीं को आधार माना जाए तो 2019 में इन तीनों राज्यों में भाजपा को 30 से अधिक सीटें मिलने की कोई उम्मीद नहीं है। यानी इन तीन राज्यों में भी भाजपा को 30-32 सीटों का नुकसान सम्भावित है। इस प्रकार उपरोक्त चारों राज्यों में ही भाजपा को लगभग 85 सीटों का नुकसान हो रहा है। पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, उत्तराखंड, बिहार, गुजरात, महाराष्ट्र और कर्नाटक में भी भाजपा 2014 के नतीजों को दोहरा पाएगी यह दावा कोई भी नहीं कर सकता है। इस प्रकार यदि 2014 के मुकाबले इन सभी राज्यों में कुल मिलाकर भाजपा की 100 से 120 सीटें कम हो जाती हैं तो उसका विजय रथ वहीं पहुंच जाएगा जो अटलजी के समय 1999 में था यानी 200 के अंदर। इस समूचे विश्लेषण का यही निष्कर्ष है कि यदि कोई अप्रत्याशित घटना नहीं घटी तो 2019 में मोदी-शाह का मान-मर्दन होने की प्रबल संभावना है। यानी संघ के वरिष्ठ नेता किशोर तिवारी का यह निष्कर्ष सही हो जाएगा कि नरेंद्र मोदी के अहंकार ने भाजपा को वहीं पहुंचा दिया, जहां वह 1998-99 में थी। (लेखक वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक और टिप्पणीकार हैं)