जनवरी 2019

कमल नाथ के सामने चुनौती

प्रवीण मल्होत्रा

मध्यप्रदेश में 15 वर्षों के अंतराल के बाद कांग्रेस फिर सत्ता में आ चुकी है। मुख्यमंत्री कमल नाथ के समक्ष राजनीतिक मोर्चे पर सबसे बड़ी चुनौती है अपनी पार्टी के लिए विधानसभा चुनाव की सफलता को चार महीने बाद होने वाले लोकसभा चुनाव में भी दोहराने की। अप्रैल-मई के दौरान लोकसभा चुनाव संभावित हैं। चुनाव से एक महीने पहले आचार संहिता लागू हो जाएगी। यानी महज तीन महीने की अवधि में ही कमल नाथ को खुद को साबित करना होगा और उस जन-विश्वास का विस्तार करना होगा, जो विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को हासिल हुआ है।

मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान सहित पांच राज्यों में नई सरकारें बन गयी हैं। हिंदी पट्टी के तीनों राज्यों में चुनाव से पूर्व भारतीय जनता पार्टी की सरकारें थीं और अब इन तीनों राज्यों में कांग्रेस की सरकारें हैं। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में 15 वर्ष बाद कांग्रेस सत्ता में लौटी है तो राजस्थान ने अपनी परम्परा का पालन करते हुए पांच वर्ष बाद पुनः सरकार बदल दी। इन विधानसभा चुनावों में छत्तीसगढ़ में जहां कांग्रेस को अभूतपूर्व सफलता मिली, वहीं शेष दोनों राज्यों में वह बहुमत से एक-दो अंक से पिछड़ गयी, लेकिन इन राज्यों में भी निर्दलीयों के सहारे तथा सपा-बसपा द्वारा बाहर से समर्थन देने की घोषणा करने के बाद कांग्रेस को सरकार बनाने में कोई कठिनाई नहीं आई। इस आलेख में हम सिर्फ मध्यप्रदेश में नई सरकार के समक्ष आने वाली चुनोतियों पर ही चर्चा करने तक स्वयं को सीमित रखेंगे। मध्यप्रदेश अपेक्षाकृत एक शांत और आत्म सन्तोषी प्रदेश है। 2003 में जब भाजपा यहां भारी बहुमत से सत्ता में आई थी तब कांग्रेस की दस वर्षीय दिग्विजय सिंह सरकार के विरुद्ध जनता में भारी असन्तोष था, और उस असन्तोष को भाजपा की फायरब्रांड साध्वी उमा भारती के आक्रामक तेवरों ने एक लहर का रूप दे दिया था। उस लहर पर सवार होकर उमा भारती के नेतृत्व में भाजपा ने तीन चौथाई बहुमत के साथ सरकार बनाई थी। लेकिन भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने एक वर्ष के भीतर ही उमा भारती को हटाकर बाबूलाल गौर को मुख्यमंत्री बना दिया और फिर एक वर्ष बाद ही गौर को भी हटा कर विदिशा के युवा सांसद शिवराजसिंह चौहान को मुख्यमंत्री बनाया गया। मुख्यमंत्री बनने के बाद शिवराजसिंह की लोकप्रियता में निरन्तर वृद्धि होती गयी। इसके परिणाम स्वरूप भाजपा ने 2008 का चुनाव शिवराजसिंह की लोकप्रिय छवि को आधार बनाकर ही लड़ा और इन चुनावों में भी भारी विजय प्राप्त की। 2013 में भाजपा ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया था। केंद्र की मनमोहन सिंह सरकार के विरुद्ध तीव्र एंटी इनकंबेंसी थी। इस माहौल में शिवराजसिंह की अपार लोकप्रियता के बीच 2013 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को पुनः भारी बहुमत मिला और मध्यप्रदेश में कांग्रेस पूरी तरह निस्तेज हो गयी। ऐसा लगने लगा कि अब मध्यप्रदेश में कांग्रेस का भाग्योदय होना असम्भव है। जहां एक ओर शिवराजसिंह एक के बाद एक नई योजनाएं लाकर लोकप्रियता के शिखर पर थे, वहीं कांग्रेस सकारात्मक विपक्ष की भूमिका भी ठीक से नहीं निभा पा रही थी। कांग्रेस पूरी तरह से विभिन्न गुटों में बंटी हुई पार्टी बन कर रह गयी थी, और अपने ही अन्तर्विरोधों के कारण प्रदेश की राजनीति में निरन्तर अप्रासंगिक होती जा रही थी कि किसानों को उनकी उपज का उचित लाभकारी मूल्य नहीं मिलने के फलस्वरूप प्रदेश में एक स्वतः स्फूर्त किसान आंदोलन उभर कर सामने आ गया। किसान आंदोलन ने निस्तेज कांग्रेस में नव जीवन का संचार कर दिया। शिवराजसिंह सरकार की प्रशासकीय विफलता के फलस्वरूप मंदसौर के पिपलिया मंडी क्षेत्र में आंदोलनरत किसानों पर पुलिस के गोलीकांड में छह किसानों की मौत ने कांग्रेस को भाजपा के विरुद्ध एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा दे दिया, जिसका कांग्रेस ने भरपूर फायदा उठाया। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने मन्दसौर में किसान सम्मेलन को सम्बोधित किया, जिसमें भारी संख्या में किसानों ने भाग लेकर सरकार को सचेत कर दिया कि इस बार वह उनसे एकतरफा समर्थन की आशा न रखे। चुनाव परिणामों में इसकी झलक भी मिल गयी और गुजरात की तरह मध्यप्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में भी कांग्रेस को तुलनात्मक रूप से अच्छी सफलता प्राप्त हुई। मध्यप्रदेश मुख्यतः कृषि प्रधान प्रदेश है। प्रदेश में आज भी 66 फीसदी आबादी ग्रामीण है, जो मुख्यतः कृषि और कृषि से सम्बंधित अन्य कार्यों जैसे, दूध, फल एवं सब्जियों के उत्पादन में संलग्न है। शिवराजसिंह के शासनकाल में प्रदेश ने कृषि के क्षेत्र में अभूतपूर्व उन्नति की। हर वर्ष भरपूर उत्पादन होने के कारण प्रदेश को निरन्तर 'कृषि कर्मण पुरस्कार' मिल रहे थे। भरपूर उत्पादन के कारण किसानों में भी अच्छी आमदनी की अपेक्षाएं जाग्रत हो गयी थीं। लेकिन किसान जब कृषि उपज मंडी में अपनी फसल लेकर जाता था तो उसे उपज का लाभकारी मूल्य नहीं मिलता था। किसानों ने भरपूर उत्पादन की लालसा में बीज, खाद, ट्रैक्टर आदि के लिये सहकारी और अन्य सार्वजनिक बैंकों से काफी कर्जा ले रखा था। जब उन पर उपज की लागत से भी कम विक्रय मूल्य का संकट आ खड़ा हुआ तो आर्थिक संकटों से जूझता किसान कर्ज और ब्याज चुकाने में असमर्थ हो गया। इससे उपजी निराशा से अवसादग्रस्त किसानों को आत्महत्या ही एकमात्र विकल्प दिखाई देने लगा। इसके परिणामस्वरूप शिवराजसिंह के तीसरे कार्यकाल के अंतिम वर्ष में किसानों की आत्महत्याओं में 21 फीसदी की वृद्धि हो गयी। शिवराजसिंह स्वयं एक छोटे किसान परिवार से ही आते हैं। वे किसानों की समस्याओं को भलीभांति समझते भी हैं और उन्होंने उनकी समस्याओं को दूर करने के कई प्रयास भी किये लेकिन वे प्रदेश की नौकरशाही से अपनी नीतियों को ठीक से अमल नहीं करवा पाये। शिवराजसिंह की सबसे बड़ी कमजोरी यह थी कि वे बिना सोचे-समझे निरन्तर ऐसी लोकलुभावन घोषणाएं करते जा रहे थे, जिन्हें अमल में लाने के लिये न तो उनके पास सक्षम प्रशासकीय ढांचा था और न उसके अनुरूप संसाधन थे। इसके फलस्वरूप राज्य सरकार पर कर्जा भी बढ़ता जा रहा था। विधानसभा चुनाव की घोषणा होने के ठीक पूर्व राज्य सरकार पर लगभग पौने दो लाख करोड़ का कर्ज था। शिवराजसिंह के 13 वर्ष के शासनकाल में बिजली, सड़क और सिंचाई के क्षेत्र में काफी विकास हुआ, लेकिन इसके बावजूद औद्योगिकरण के क्षेत्र में कोई उल्लेखनीय उपलब्धि नहीं हो पाई। हर वर्ष बड़े पैमाने पर व्यापार और उद्योग मेले लगाए गए, उद्योगपतियों के स्वागत में 'रेड कार्पेट' भी बिछाए गये, हजारों करोड़ के एमओयू पर हस्ताक्षर भी हुए, लेकिन गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक जैसे राज्यो की तरह यहां बड़े उद्योगों का अभाव ही बना रहा। इससे बेरोजगारी का संकट भी बढ़ता गया। रही-सही कसर नोटबन्दी और जीएसटी की गलत नीतियों ने पूरी कर दी। इस तरह असन्तुष्ट किसान, बेरोजगार युवा और छोटे तथा मझौले व्यापारियों एवं उद्योगकर्मियों का गुस्सा इस विधानसभा चुनाव में भाजपा के विरुद्ध वोट के रूप में प्रकट हुआ। इसके अलावा एट्रोसिटी एक्ट के विरोध में भाजपा का परम्परागत सवर्ण वोट बैंक भी भाजपा से छिटक गया तथा पदोन्नति में आरक्षण के विरुद्ध मुखर सामान्य और पिछड़ा वर्ग के कर्मचारियों ने भी खुल कर अपनी नाराजगी प्रकट की। इन सब कारणों का मिला-जुला असर यह हुआ कि कांग्रेस को पिछले चुनाव की तुलना में सात फीसदी वोट अधिक मिले और वह भाजपा से थोड़े से कम वोट लाकर भी सीटों के अंकगणित में बाजी मार गयी। इस विधानसभा चुनाव में भाजपा को 41 फीसदी तथा कांग्रेस को 40.9 फीसदी वोट मिले हैं। चुनाव प्रचार के दौरान कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी द्वारा सरकार बनने के 10 दिन के भीतर किसानों का दो लाख तक का कर्ज माफ करने की घोषणा ने कर्ज में डूबे किसानों और ग्रामीण वोटरों का भाजपा से मोहभंग कर दिया। भाजपा को उम्मीद थी कि वह शिवराज सिंह के लोकप्रिय चेहरे को सामने रख कर तथा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि के बल पर चुनाव वैतरणी को पार कर लेगी। इसके अलावा केंद्र सरकार तथा राज्य सरकार की योजनाओं जैसे उज्जवला, जनधन, बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ, लाड़ली लक्ष्मी, ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबों के लिये गृह निर्माण हेतु अनुदान, स्वच्छता मिशन के तहत शौचालयों का निर्माण, भावान्तर योजना, उपज के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में की गई वृद्धि, कर्मचारियों को सातवां वेतन आयोग का लाभ इत्यादि के बल पर भी भाजपा को विश्वास था कि मध्यप्रदेश में वह अजेय है। लेकिन चुनाव परिणामों ने अप्रत्याशित रूप से कांग्रेस को विजय की संजीवनी दे दी। यद्यपि, कांग्रेस 230 में से 114 सीटें प्राप्त कर बहुमत के आंकड़े से दो कदम दूर रह गयी, लेकिन इस कमी की पूर्ति चार विजयी निर्दलीय विधायकों, जो कि वस्तुतः कांग्रेस के ही बागी थे, के समर्थन तथा सपा के एक विधायक एवं बसपा के दो विधायकों के समर्थन ने कर दी। भाजपा को 109 स्थानों पर विजयश्री मिली और वह बहुमत के जादुई आंकड़े से सात अंक पीछे रह गयी। मध्यप्रदेश में कांग्रेस की इस जीत के दो नायक थे - कमल नाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया और दोनों ही मुख्यमंत्री पद के दावेदार भी थे। कांग्रेस की इस जीत में दिग्विजय सिंह की भूमिका को भी कम करके आंकना उचित नहीं होगा। उन्होंने पर्दे के पीछे रह कर एक समन्वयकर्ता के रूप में बहुत सकारात्मक भूमिका का निर्वाह किया और कई असंतुष्टों को मना कर अधिकृत प्रत्याशियों के पक्ष में न सिर्फ बैठाया बल्कि उन्हें चुनाव प्रचार में सक्रिय भी किया। चुनाव में जीत के बाद जैसी कि कांग्रेस की परंपरा है, मुख्यमंत्री पद के लिये विजयी उम्मीदवारों की राय लेने का भोपाल में नाटक हुआ और अंततः सिंधिया को मना कर राहुल गांधी ने 72 वर्षीय वरिष्ठ और अनुभवी राजनीतिज्ञ कमल नाथ को मध्यप्रदेश का 15वां मुख्यमंत्री नियुक्त कर दिया। कमल नाथ ने मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते ही सबसे पहले किसानों के दो लाख तक के कर्ज माफ करने की घोषणा के साथ ही फाइल पर हस्ताक्षर भी कर दिए। कमल नाथ ने मुख्यमंत्री पद की अपनी पारी की शुरुआत काफी सक्रियतापूर्वक आरम्भ की है। शपथ लेने के तुरंत बाद उन्होंने जो प्रमुख घोषणाएं की हैं, वे हैं - वृद्धा पेंशन 300 रु. से बढ़ा कर 1000 रु. की गई है; विवाह-निकाह के लिये निर्धन परिवार की कन्याओं को अनुदान की राशि 26,000 रु. से बढ़ाकर 51,000 रु. की गई है; प्रसव के समय दी जाने वाली राशि 16,000 रु. से बढ़ाकर 26,000 रु. कर दी गयी है तथा प्रत्येक ग्राम पंचायत में गोशाला खोलने को मंजूरी दी गयी है। ये सारी घोषणाएं कांग्रेस के वचन पत्र का हिस्सा हैं। मुख्यमंत्री कमल नाथ और कांग्रेस को विधानसभा चुनाव की सफलता को निकट भविष्य में पुनः दोहराना होगा। इसके लिये उनके पास तीन माह से अधिक समय नहीं है। मई 2019 में लोकसभा के लिये आमचुनाव होना सम्भावित है। अप्रैल में आचार संहिता लग जाएगी। यानी तीन माह की अल्प अवधि में ही कमल नाथ को अपनी योग्यता सिद्ध करने के लिये शिवराजसिंह से बड़ी लकीर खींचनी होगी। मुख्यमंत्री बनने के बाद पहली प्रेस वार्ता में मुख्यमंत्री ने अपने सामने तीन प्रमुख प्राथमिकताएं रखी हैं - 1. किसानों की कर्ज माफी, 2. युवाओं को रोजगार देना और 3. महिलाओं को सुरक्षित माहौल देना। किसानों की कर्ज माफी की घोषणा हो चुकी है तथा उसके क्रियान्वयन के लिये मुख्य सचिव की अध्यक्षता में एक 22 सदस्यीय राज्य स्तरीय समिति भी गठित हो गयी है। जहां तक युवाओं को रोजगार देने का सवाल है, वह इतना आसान कार्य नहीं है, क्योंकि भाजपा के 15 वर्षीय 'विकासवादी' शासन के बावजूद औद्योगिकीकरण की दृष्टि से मध्यप्रदेश अभी भी एक पिछड़ा हुआ राज्य ही है। मुख्यमंत्री को 'छिंदवाड़ा मॉडल' के अनुरूप विकास के लिये भारी मात्रा में संसाधन जुटाना होंगे। इसमें न सिर्फ समय लगेगा, बल्कि यह कार्य काफी श्रमसाध्य भी है। तात्कालिक रूप से उन्होंने यह घोषणा की कि उन्हीं उद्योगों को अनुदान और सब्सिडी दी जाएगी, जो 70 फीसदी नौकरियां स्थानीय युवाओं को देंगे, प्रदेश के बेरोजगार युवाओं में आशा का संचार कर दिया है। शासकीय विभागों में जो स्थान रिक्त हैं, उनकी पूर्ति के लिये भी त्वरित कदम उठाना होंगे। महिलाओं की सुरक्षा का सवाल भी बहुत महत्वपूर्ण हो गया है, क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में महिलाओं के साथ होने वाले अत्याचारों में अप्रत्याशित वृद्धि देखने में आई है। महिलाओं और अबोध बालिकाओं के साथ बलात्कार एवं दुष्कर्म की बढ़ती घटनाओं ने प्रदेश को शर्मसार कर दिया है। अतः यह उपयुक्त होगा कि गृह विभाग मुख्यमंत्री स्वयं अपने पास रखें या किसी योग्य एवं वरिष्ठ विधायक को ही गृह मंत्रालय का दायित्व सौंपें। महिलाओं की सुरक्षा के लिये पुलिस बल को पुनः संगठित करना होगा तथा प्रदेश के सभी 51 जिला मुख्यालयों में महिला पुलिस थानों में पर्याप्त संख्या में बल की नियुक्ति तथा प्रदेश के अन्य सभी प्रमुख पुलिस थानों में महिला पुलिस अधिकारियों तथा अन्य महिला पुलिसकर्मियों की नियुक्ति करने के साथ ही गश्त और पेट्रोलिंग के लिये वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को 'ज़ीरो टॉलरेंस' के स्पष्ट निर्देश देने के साथ ही सभी स्तर के अधिकारियों की जिम्मेदारी भी सुनिश्चित करना होगी। जहां तक बलात्कार और नाबालिग बच्चियों के साथ यौन शोषण की समस्या से निपटने का सवाल है, उसके लिये असामाजिक तत्वों और रिश्तेदारों एवं परिचितों की यौन मनोवृत्तियां अधिक जिम्मेदार होती हैं। ऐसे प्रकरणों में पुलिस को त्वरित कार्रवाई और पुख्ता जांच कर आरोपितों को शीघ्रतापूर्वक पकड़ कर न्यायालय के माध्यम से कठोरतम दण्ड दिलाया जाना सर्वोच्च प्राथमिकता होना चाहिये। यह सब तभी सम्भव है, जब पुलिस को बिना किसी राजनीतिक दबाव के अपने कर्तव्य का पालन करने दिया जाए। इसके लिये अभी तक पुलिस का जो राजनीतिकरण हो गया है उससे पुलिस बल को मुक्त किया जाए और कांस्टेबल से लेकर डीजीपी तक की जवाबदेही निर्धारित की जाए और उसका अनिवार्यतः पालन कराया जाना सुनिश्चित किया जाए। शिवराजसिंह चौहान सरकार पर लगभग पौने दो लाख करोड़ रुपये का कर्ज छोड़कर गये हैं। इसलिये मुख्यमंत्री कमल नाथ को मितव्ययिता को मूल मंत्र मान कर सरकार चलाना होगी। किसानों की कर्ज माफी से 30 से 35 हजार करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ सरकार पर आने वाला है। मितव्ययिता को किस प्रकार अमलीजामा पहनाया जाए इसके लिये कुछ अन्य सुझाव भी हैं, जिन्हें यदि अमल में लाया जाए तो उसका एक सकारात्मक संदेश प्रदेश की जनता और मतदाताओं में अवश्य जाएगा। सुझाव निम्नानुसार हैं -- 1. वित्त विभाग की स्वीकृति के बिना कोई भी लोकलुभावन घोषणा न की जाए। यदि मुख्यमंत्री के समक्ष किसी क्षेत्र विशेष से कोई मांग आती है तो पहले उसका परीक्षण किया जाए, इसके बाद ही घोषणा की जाए। 2. अगले एक वर्ष के लिये मंत्रियों और अधिकारियों के विदेशी दौरों पर पूरी तरह रोक लगाई जाए। 3. मंत्री तथा सभी वरिष्ठ अधिकारी अंतर्देशीय शासकीय यात्राएं या तो रेल से करें या विमान की इकॉनोमी क्लास में ही करें तथा मुख्यमंत्री भी शासकीय विमान का उपयोग अत्यधिक आवश्यक होने पर ही करें अन्यथा नियमित फ्लाईट से ही यात्रा करने को प्राथमिकता दें। 4. सभी मंत्रियों तथा विधायकों के वेतन भत्तों में 25 से 30 फीसदी की कटौती की जाए। 5. अधिकांश निगम और मण्डल सफेद हाथी और जनता के ऊपर बोझ समान हैं। इसी प्रकार कुछ शासकीय विभाग भी अनावश्यक हैं। इनकी समीक्षा कर इन निगम, मण्डल और विभागों को भंग कर अन्य विभागों में विलीन कर दिया जाए। 6. भाजपा सरकार ने अपने कार्यकर्ताओं को अनुग्रहित करने के लिये 'मीसाबंदी पेंशन' के रूप में एक अनावश्यक बोझ प्रदेश की जनता पर डाल रखा है, जिसका कोई औचित्य नहीं है। यहां तक कि यदि कोई व्यक्ति जमाखोरी या कालाबाजारी के आरोप में आपातकाल के दौरान निरुद्ध किया गया था या एक दिन के लिये भी जेल में रहा था तो वह भी इस पेंशन का हकदार बन गया है। सत्तर के दशक में राशन की वस्तुओं तथा अन्य खाद्य सामग्री का अभाव होने के कारण उनकी जमाखोरी और कालाबाजारी की प्रवृत्ति आम थी और उसमें भाजपा के पूर्व संस्करण जनसंघ के कार्यकर्ता सामान्यतः शामिल रहते थे। आपातकाल में ऐसे कई जमाखोर और कालाबाजारी पकड़े गए थे। वे सब कालांतर में मीसा बन्दी बन कर पेंशन प्राप्त कर रहे हैं। अतः मीसा बंदियों को दी जाने वाली पेंशन को समाप्त किया जाना आवश्यक है। मुख्यमंत्री कमल नाथ से अपेक्षा है कि वे प्रदेश में एक नई कार्य संस्कृति को प्रोत्साहित करेंगे और प्रदेश को विकास की एक नई राह दिखाएंगे। यदि वे इसमें असफल रहे और उन्होंने मानवीय विकास की एक नई और बड़ी लकीर नहीं खींची तो जनता में यह धारणा ही बलवती होगी कि इनसे तो शिवराजसिंह चौहान की भाजपा सरकार ही बेहतर थी। (लेखक वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक एवं टिप्पणीकार हैं)