जनवरी 2019

शिवराज नहीं, मोदी हारे

रविवार डेस्क

मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में जनता ने बदलाव के पक्ष में मतदान किया है। 15 वर्ष से सत्ता में काबिज भाजपा को सरकार गंवानी पड़ी, लेकिन उसकी पराजय उतनी बड़ी नहीं रही, जितनी कि पार्टी को पड़ोसी राज्य छत्तीसगढ़ में झेलनी पड़ी। नतीजों का विश्लेषण बताता है कि यह हार मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की कम, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अधिक है।

मध्य प्रदेश के चुनाव परिणाम देखने में जितने सीधे-सपाट नजर आते हैं, हकीकत में वैसा है नहीं। सत्ता गंवाने वाली भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेता दबी जुबान में यह कहते नजर आ जाते हैं कि ये परिणाम 'शिवराज सरकार' के कामकाज पर नहीं, बल्कि केंद्र सरकार की नोटबंदी और जीएसटी जैसी पहल पर मतदान का नतीजा हैं। इन नेताओं का कहना है कि अगर जनता शिवराज सरकार से ऊब चुकी होती या सत्ता विरोधी लहर होती तो भाजपा को 109 सीटें नहीं मिल पातीं। 230 सीटों वाली विधानसभा में कांग्रेस को 114 तो भाजपा को 109 सीटों पर जीत मिली। कांग्रेस को बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के दो, समाजवादी पार्टी (सपा) के एक और चार निर्दलीय विधायकों का समर्थन मिला और पार्टी 15 साल बाद सत्ता में वापसी करने में कामयाब रही। कांग्रेस कमल नाथ के नेतृत्व में सरकार बना चुकी है लेकिन पार्टी नेताओं के साथ बातचीत में एक कसक साफ नजर आती है। भ्रष्टाचार, किसान असंतोष, बेरोजगारी, महिला सुरक्षा जैसे तमाम मजबूत मुद्दे होने के बावजूद पार्टी पूर्ण बहुमत नहीं पा सकी। कांग्रेस का प्रदर्शन कांग्रेस भले ही सरकार बनाने में कामयाब रही, लेकिन विंध्य प्रदेश में कमजोर प्रदर्शन से उसे करारा झटका लगा। क्षेत्र की 30 विधानसभा सीटों में से कांग्रेस को महज 6 पर जीत मिली जबकि भाजपा 24 सीटों पर जीत पाने में कामयाब रही। कांग्रेस अगर वर्ष 2013 का 11 सीटों का आंकड़ा भी दोहराती तो वह आसानी से बहुमत हासिल कर सकती थी। परंतु इस चुनाव में नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह राहुल और विधानसभा उपाध्यक्ष राजेंद्र सिंह भी अपनी सीटें नहीं बचा पाये। कांग्रेस इस पराजय से नहीं उबर पाई है। इसका अंदाजा इस बात से लगता है कि मुख्यमंत्री कमल नाथ ने विंध्य में ईवीएम पर शक जताया है। उन्होंने कहा कि विंध्य प्रदेश में वोटिंग पर फोरेंसिक स्टडी करायी जायेगी और बाद में चुनाव आयोग से चर्चा की जायेगी। गौरतलब है कि सतना जिले में ईवीएम की गड़बड़ी की कई सूचनायें आयी थीं। हालांकि विंध्य में कांग्रेस की हार की वजह दूसरी है। पार्टी सत्ता विरोधी लहर के चलते तथा बसपा के प्रभाव के चलते इस क्षेत्र में भाजपा को कमजोर मानकर चल रही थी लेकिन हुआ इसका उलटा। एट्रोसिटी एक्ट पर सरकार के रुख तथा प्रधानमंत्री आवास योजना और संबल योजना के चलते कांग्रेस और बसपा के कोर वोटरों ने इस बार थोक में भाजपा को वोट दिया। अजय सिंह को विंध्य में प्रचार के लिए कमल नाथ ने खासतौर पर हेलिकॉप्टर प्रदान किया था लेकिन वह अपना घर ही नहीं संभाल पाये। उधर, मालवा-निमाड़ और ग्वालियर चंबल क्षेत्र ने कांग्रेस की सत्ता में वापसी में अहम भूमिका निभायी। मालवा-निमाड़ की 66 सीटों में से 2013 में भाजपा को 58 और कांग्रेस को 8 सीटें मिली थीं। इन चुनावों में बाजी पलट गयी। भाजपा घटकर 28 पर आ गयी, जबकि कांग्रेस को 35 सीटों पर जीत मिली। इस क्षेत्र की 8 सीटों पर कांग्रेस की जीत का अंतर 3000 से 1000 वोटों के बीच रहा। आदिवासी बहुल इस क्षेत्र में अच्छी पकड़ रखने वाले सामाजिक संगठन जय आदिवासी युवा संगठन (जयस) के नेता डॉ. हीरा अलावा को अपने साथ लेने का कांग्रेस का दांव काम कर गया और उसे आदिवासियों के वोट थोक में मिले। खुद अलावा भी मनावर से चुनाव जीत गये। ग्वालियर-चंबल संभाग में कांग्रेस का प्रदर्शन और जोरदार रहा और यहां 34 में से 26 सीटों पर उसे जीत हासिल हुई। पिछली बार 20 सीट जीतने वाली भाजपा इस बार 8 सीटों पर सिमट गयी। क्यों हार गयी भाजपा? मध्य प्रदेश में भाजपा ने पूरा चुनाव मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के नाम पर लड़ा था तो जाहिर है इस हार का ठीकरा भी उनके ही सिर फूटेगा। उन्होंने हार की जिम्मेदारी भी ले ली है लेकिन मप्र भाजपा के एक बड़े नेता नाम जाहिर न करने की शर्त पर कहते हैं कि यह हार केंद्र सरकार की नोटबंदी और जीएसटी जैसी नीतियों की बदौलत है, शिवराज से जनता आज भी नाराज नहीं है। उनकी इस बात में दम नजर आता है क्योंकि शिवराज के प्रभाव वाले सीहोर, होशंगाबाद में भाजपा ने क्लीन स्वीप किया है। विदिशा में भी पार्टी एक सीट छोड़कर हर जगह जीती है। वहीं इसके उलट मालवा-निमाड़ और ग्वालियर-चंबल इलाकों में भाजपा को हार का सामना करना पड़ा। ये इलाके किसान आंदोलन और सवर्ण आंदोलन से बहुत हद तक प्रभावित रहे। एट्रोसिटी एक्ट में केंद्र सरकार द्वारा किए गए संशोधन के बाद उज्जैन में सवर्ण आंदोलन बहुत तेजी से भड़का था। कारोबारी नगरी इंदौर में जीएसटी और नोटबंदी का जो असर छोटे कारोबारियों और श्रमिक वर्ग पर पड़ा था, इंदौर की 9 सीटों में से भाजपा के पास पिछले चुनाव में 8 सीटें थीं, जो इस बार घटकर 5 रह गयीं। पिछले चुनाव में उज्जैन की सभी सात सीटों पर भाजपा जीती थी। इस बार उसने इनमें से चार सीट गंवा दीं। प्रदेश की 230 विधानसभा सीटों में से 82 सीटें अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं। 35 सीटें अजा और 47 अजजा के लिए हैं। इन एक तिहाई सीटों की सरकार बनाने में निर्णायक भूमिका होती है। पिछली बार भाजपा को इनमें से 59 पर जीत मिली थी लेकिन इस बार वह केवल 34 पर रुक गयी। पिछली बार 47 अजजा सीटों में से 31 जीतने वाली भाजपा इस बार 16 पर सिमट गयी। कांग्रेस के कर्ज माफी के वादे ने भी किसानों को आकर्षित किया। बुंदेलखंड जैसे कृषि संकट से जूझ रहे इलाके में इसका असर साफ दिखा और दमोह से शिवराज सरकार के वित्त मंत्री जयंत मलैया हार गये। बुंदेलखंड की 26 सीटों में से भाजपा के पास पिछले चुनाव में 20 सीटें थीं जो घटकर 14 रह गयीं। चुनाव परिणामों का बारीक विश्लेषण साफ करता है कि मध्य प्रदेश के मतदाताओं ने काफी हद तक मोदी सरकार की नीतियों के खिलाफ जनादेश दिया है। ऐसे में 2019 के लोकसभा चुनाव में प्रदेश में भाजपा की राह मुश्किल हो सकती है। (लेखिका स्वतंत्र पत्रकार हैं और दिल्ली में कई बड़े मीडिया संस्थानों में काम कर चुकी हैं)