जनवरी 2019

गांव ही लिखेंगे मोदी की विदाई का तराना!

एमके वेणु

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कुछ संसाधनों को शहरी क्षेत्रों से हटाकर ग्रामीण इलाकों की ओर मोड़ने का दांव चला है, लेकिन मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के चुनावी नतीजे बताते हैं कि यह दांव नाकाम रहा है। गुजरात और कर्नाटक के नतीजों ने भी यही संकेत दिया था। सवाल है कि क्या 2019 में ग्रामीण भारत में ही लिखा जाएगा मोदी की विदाई का गीत?

इस बात के पर्याप्त सबूत हैं कि ग्रामीण मतदाता भारतीय जनता पार्टी से दूर छिटक रहे हैं। यह नरेंद्र मोदी के लिए एक बुरी खबर है। मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव के लिए कराए गए कुछ एक्जिट पोल के नतीजे भी इस रुझान को बल देने वाले थे। उदाहरण के लिए इंडिया टुडे-एक्सिस एक्जिट पोल ने मत प्रतिशत के मामले में तीन राज्यों में ग्रामीण मतदाताओं के बीच कांग्रेस की अच्छी-खासी बढ़त- 3% से 10 % तक- दिखाई। गुजरात विधानसभा चुनावों में भी यह रुझान देखा गया था, जिसमें कांग्रेस ने ग्रामीण मतदाता बहुल इलाकों की 90 में से 56 सीटों पर जीत हासिल की। इन इलाकों में भाजपा सिर्फ 29 सीटें ही जीत पाई थी। हालांकि भाजपा किसी तरह से काफी कम अंतर से गुजरात को जीतने में कामयाब रही, क्योंकि वहां शहरी आबादी 50% से ज्यादा है, लेकिन हिंदी पट्टी के राज्यों में जहां ग्रामीण मतदाता 75 फीसदी से ज्यादा हैं, ऐसा शायद ही हो। ग्रामीण संकट, जिसका एक कारण लगातार सूखा पड़ना रहा है, लेकिन स्थिर आय ने जिसे बढ़ाने का काम किया, ने भाजपा को काफी अप्रिय बना दिया है। कृषि आय में बढ़ोतरी के मामले में मोदी सरकार का रिकॉर्ड संभवतः सबसे खराब रहा है। यह एक तथ्य है जिसे इस साल की शुरुआत में पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम द्वारा दिए आर्थिक सर्वेक्षण में आधिकारिक तौर पर सामने रखा गया था। भाजपा के लिए एक और नकारात्मक रुझान यह है कि हाल के सालों में ग्रामीण पट्टी में एक अच्छा-खासा रिवर्स माइग्रेशन हुआ है यानी बड़ी संख्या में लोग वापस गांवों को लौटे हैं। नेशनल सैंपल सर्वे संगठन के आंकड़ों से पता चलता है कि 2004-05 से 2011-12 तक 3.5 करोड़ से ज्यादा लोग गैर-कृषि रोजगार के क्षेत्र में शामिल हुए, जिसका कारण सामान्य आर्थिक तरक्की के साथ-साथ संभवतः निर्माण क्षेत्र में वृद्धि की तेज रफ्तार था। श्रम संबंधी मामलों के जानकार संतोष मेहरोत्रा के मुताबिक भारत के रोजगार इतिहास में शायद यह पहली बार था कि 2004 के बाद के 8 वर्षों में कृषि रोजगार में 3।5 करोड़ की कमी आई। हालांकि ऐसा कहा जाता है कि 2012-13 से लेबर मार्केट में 15 से 29 आयुवर्ग वाले 2 करोड़ से ज्यादा लोग वापस कृषि क्षेत्र में शामिल हो गए। यह कोई अच्छा रुझान नहीं है क्योंकि रिवर्स माइग्रेशन का एक बड़ा कारण शहरों में खासतौर पर निर्माण क्षेत्र में रोजगार की कमी के कारण पैदा संकट है। हो सकता है कि नोटबंदी ने हालात को और बदतर बनाया हो। चूंकि संरचनात्मक रूप से कृषि क्षेत्र कम आय वाला रोजगार मुहैया कराता है, इसलिए कृषि श्रम बाजार में बड़ा इजाफा अनिवार्य रूप से स्वस्थ्य संकेत नहीं है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने थोड़ी-बहुत मात्रा में ग्रामीण संकट के हल के तौर पर उज्ज्वला गैस योजना, कम लागत वाले ग्रामीण आवास, कृषि बीमा, मुद्रा बैंक ऋण जैसी कल्याण योजनाओं की गति बढ़ाने और किसानों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य को बढ़ाने का काम किया है। लेकिन इनमें से कई कल्याणकारी कार्यक्रमों की ओर गंभीरतापूर्वक ध्यान 2017 के मध्य के बाद से ही दिया गया और उनका क्रियान्वयन अभी भी कमजोर है। चुनाव अभियान के दौरान मध्य प्रदेश और राजस्थान यात्रा के दौरान कोई इस बात को महसूस किए बगैर नहीं रह सकता था कि ऐसी कल्याणकारी योजनाओं का क्रियान्वयन काफी कमजोर है। मध्य प्रदेश के एक वरिष्ठ कैबिनेट मंत्री ने कहा कि अगर ऐसे कल्याणकारी कार्यक्रम अपने क्रियान्वयन में सब तक समान रूप में नहीं पहुंचते हैं, तो वे उसका लाभ न मिलने वाले बहुसंख्यक लोगों में ज्यादा नाराजगी को जन्म देते हैं। राजस्थान के एक सांसद ने भी ऐसी ही बात कही। उन्होंने कहा, ‘कल्याणकारी योजनाओं के बड़ी आबादी तक न पहुंचने और ख़राब अमल से बेहतर है कि कोई योजना बनाई ही न जाये।’ 2019 के चुनाव अभियान में उतरते वक्त यह मोदी के सामने सबसे बड़ी चुनौती होगी। पिछले साढ़े चार वर्षों में प्रधानमंत्री का सबसे बड़ा दांव अब तक अप्रत्यक्ष और प्रत्यक्ष सब्सिडियों के एक बड़े हिस्से पर कब्जा जमाने वाले भारतीय शहरी मध्यव वर्ग से लेकर ग्रामीण भारत को कल्याण निधि और सब्सिडी हस्तांतरित करना रहा है। बचे हुए 15 फीसदी गांवों में बिजली पहुंचाने की कोशिश या उज्ज्वला योजना इसी रणनीति का हिस्सा हैं। भाजपा के मन में ग्रामीण मतदाता के कांग्रेस की तरफ ऐतिहासिक झुकाव को लेकर एक सतत संदेह और असुरक्षा की भावना रही है। आखिर मध्यवर्गीय मतदाता हमेशा से भाजपा के वफादार रहे हैं। इसलिए मोदी का राजनीतिक आर्थिक दांव शहरी क्षेत्र से कुछ संसाधन हटाकर ग्रामीण इलाकों की ओर मोड़ना रहा है। लेकिन जमीनी पड़ताल से पता चलता है कि यह कोशिश आधे-अधूरे मन से की गई है। और अगर पिछले चार वर्षों में भाजपा नेतृत्व की भाषणबाजियों के हिसाब से देखें, तो इसमें पैसा भी जरूरत से कम लगाया गया है। ऐसे में अगर मध्य प्रदेश के एक कैबिनेट मंत्री यह साफगोई के साथ स्वीकार करते हैं कि मुख्यमंत्री की लोकप्रियता के बावजूद भाजपा राज्य के ग्रामीण इलाकों में कमजोर है, तो इसमें कुछ आश्चर्यजनक नहीं है। और इसका कारण यह है कि केंद्र के काफी प्रचारित कल्याणकारी कार्यक्रमों के खराब क्रियान्वयन ने अपने लिए ही सत्ता विरोधी भावना (एंटी-इनकम्बेंसी) पैदा करने का काम किया है। 2019 में मोदी में ग्रामीण मतदाता मोदी के लिए चुनौती होंगे। जिस तरह के संकेत मिल रहे हैं, उनसे ऐसा लगता है कि यह कारक उनकी निजी लोकप्रियता पर भी ग्रहण लगा सकता है। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार और द वायर के संपादक हैं)