जनवरी 2019

कांग्रेस को बदल रहे हैं राहुल

अनिल सिन्हा

एक साल पहले औपचारिक तौर पर कांग्रेस का नेतृत्व संभालने के बाद से राहुल गांधी जड़ हो चुकी अपनी पार्टी का न सिर्फ चेहरा बल्कि उसकी चाल और चरित्र भी बदल रहे हैं। मोदी और शाह की धुन पर भांगड़ा करने में मस्त मुख्यधारा के मीडिया के लिए इस बदलाव को महसूस करना आसान नहीं है, लेकिन आम आदमी के सरोकारों से जुड़े तटस्थ राजनीतिक विश्लेषक इस बदलाव को शिद्दत से महसूस कर रहे हैं। हालांकि बदलाव का यह सिलसिला अभी शुरुआती दौर में है और देखने वाली बात होगी कि इसमें कहां तक निरंतरता बनी रहती है।

किसी को शायद ही अंदाजा था कि राहुल गांधी देश की राजनीति में एक साथ इतने बदलाव ला देंगे। अव्वल तो इसे ही मुश्किल माना जा रहा था कि वह कांग्रेस के भीतर कोई बदलाव ला पाएंगे, देश की राजनीति में बदलाव तो दूर की बात थी। वैसे भी, बरसों तक गांधी परिवार के दरबारी रहे लोगों के बदलने की उम्मीद कैसे की जा सकती थी? पार्टी की जड़ हो गई संस्कृति को लोकतांत्रिक बनाना लगभग नामुमकिन ही था। मीडिया ने उनकी ऐसी छवि बना दी थी कि उनकी पार्टी के लोग उन पर भरोसा करने को तैयार भी नहीं थे। लेकिन तीन हिंदी भाषी राज्यों में सरकार बनने से कांग्रेस में हो रहे परिवर्तनों को समझने की जरूरत पैदा हो गई है। यह बात अलग है कि मीडिया का बड़ा हिस्सा इन बदलावों पर नजर डालने के लिए अभी भी तैयार नहीं है। जब पार्टी के भीतर इन बदलावों को ही स्वीकार करने के लिए मीडिया तैयार नहीं है तो वह देश की राजनीति पर राहुल गांधी के असर को क्योंकर स्वीकार करेगा? अंग्रेजी की पुरानी कहावत है कि सफलता से ज्यादा सफल कुछ नहीं है। राहुल गांधी के मामले में यही हो रहा है। वह अगर तीन राज्य हार गए होते तो मीडिया ने उनका जीना हराम कर दिया होता। अभी भी जीत का अंतर कम होने को मुद्दा बनाया जा रहा है। ऐसे माहौल में किसी तटस्थ राजनीतिक विश्लेषण की संभावना कम ही बनती है। लेकिन सच्चाई यही है कि राहुल ने बरसों से तंग रही कांग्रेस की राजनीति को फैला दिया है और देश की राजनीति के फोकस को भी बदल दिया है। कांग्रेस में हो रहे बदलाव धीमे हैं और उन्हें ऊपर से नहीं समझा जा सकता है। बदलाव की पहली झलक गुजरात के चुनावों में दिखाई पड़ी थी। राहुल ने वहां हो रहे सामाजिक परिवर्तनों को पहचानने में देरी नहीं की। वहां की दबंग पटेल जाति से लेकर ओबीसी और दलित समाज में कई बदलाव आ गए हैं। ये बदलाव नई आर्थिक व्यवस्था की वजह से हुए हैं। लघु और मध्यम उद्योगों में पटेलों का बोलबाला खत्म हो गया है और बेरोजगारी ने उन्हें आरक्षण की मांग के लिए मजबूर कर दिया। हार्दिक पटेल इस आंदोलन के नेता बन गए। राहुल ने बिना देरी के उनसे अपने संबंध बनाए। ऐसा ही उन्होंने ओबीसी और दलित समाज के नए नेतृत्व के साथ किया। उन्होंने ओबीसी नेता अल्पेश ठाकोर और दलित नेता जिग्नेश मेवाणी को साथ कर लिया। गुजरात के अभियान में ही दिखाई दे गया कि वह कांग्रेस को समाज में उभर रही नई शक्तियों के साथ जोड़ना चाहते हैं। कांग्रेस का पुराना रवैया ठीक इसके विपरीत रहा है। राज्यों में उभरने वाले नए नेताओं को उसने कभी स्वीकार नहीं किया। कांग्रेस में यह तरीका इंदिरा गांधी ने विकसित किया था और राजीव गांधी तथा सोनिया गांधी के समय में भी यह बदस्तूर जारी रहा। राहुल ने इस परंपरा में परिवर्तन ला दिया है और सामूहिक नेतृत्व की ओर कदम बढ़ा दिया है। इसके लिए पार्टी के भीतर न्यूनतम लोकतंत्र लाना जरूरी था। राहुल ने इसे तेजी से लाया। पार्टी की युवा और छात्र इकाइयों में यह परिवर्तन वह पहले से ला रहे थे। लेकिन शोर-शराबे के कारण उन्हें इसका उतना लाभ नहीं मिला। अब वह इसे औपचारिक रूप से करने के बदले अनौपचारिक रूप से कर रहे हैं। गुजरात के चुनावों में उन्होंने अशोक गहलोत जैसे पुराने नेता का साथ लिया था और पार्टी के स्थानीय नेतृत्व को भी भरोसे में। यही रवैया उन्होंने कर्नाटक के चुनावों में अपनाया। वहां भी चुनाव बाद ही सही, उन्होंने देवेगौड़ा की पार्टी जनता दल सेकुलर की अहमियत को समझा। ऐसा इसलिए हो पाया कि पार्टी पहले की तरह एक बंद दिमाग वाली नौकरशाही के सहारे चलना बंद कर चुकी थी। राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के चुनावों में उन्होंने पार्टी के भीतरी लोकतंत्र को और मजबूत किया। इसके लिए जरूरी था कि राज्यों के नेताओं को रास्ते पर लाया जाए और उन्हें उम्मीदवार आदि चुनने में सही ढंग से मदद की जाए। छत्तीसगढ़ में मनमानी के लिए मशहूर रहे अजीत जोगी से उनका पिंड पहले ही छूट चुका था। उन्होंने भूपेश बघेल को पूरी ताकत दी और ताम्रध्वज साहू को साथ में जोड़ दिया। जोगी के जाने के बाद यह आसान हो गया था। इसी तरह राजस्थान में सचिन पायलट को उभरने का पूरा मौका दिया गया। पार्टी में पनप रहे लोकतंत्र का असली नजारा चुनाव के बाद मुख्यमंत्री चुनने में दिखाई पड़ा। कांग्रेस में पहली बार नेताओें के साथ कार्यकर्ताओं की पसंद को समझने की कोशिश हुई। राजस्थान में तो कार्यकर्ता सड़क पर भी उतरे। कांग्रेस में ऐसा पहली बार हुआ। कांग्रेस के बारे में यही परंपरा रही है कि किसी नेता ने अगर अपने प़क्ष में हंगामा कराया या बयान दिलाया तो उसका नाम कटा ही समझो। उसके नाम पर आलाकमान विचार ही नहीं करता था। राहुल ने उस परंपरा को पूरी तरह खत्म कर दिया है। राजस्थान और मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री ढूंढ़ना काफी कठिन था क्योंकि दोनों जगह दो-दो बराबर के दावे वाले उम्मीदवार थे। राहुल ने बातचीत के जरिए एक-दूसरे को स्वीकार कराया। पार्टी के भीतर लोकतंत्र की बहाली के साथ-साथ राहुल ने विपक्ष को भी साथ लेकर चलने में सफलता पाई है। विपक्ष के तमाम सीनियर नेताओं को वह हर जरूरी मौके पर साथ लेकर चल रहे हैं। मुख्यमंत्रियों के शपथग्रहण समारोहों में उन्होंने उनकी उपस्थिति को पक्का करने की पूरी कोशिश की। इस पर शायद ही किसी का ध्यान गया है कि राहुल गांधी ने पार्टी की उन आर्थिक नीतियों को सीधा खड़ा करना शुरू कर दिया है जो अभी तक सिर के बल खड़ी थीं। विदेशी पूंजी के लिए लालायित रहने वाली और प्राइवेट कंपनियों को सिर पर बिठा कर चलने वाली इन नीतियों ने देश में विषमता बढ़ाई। विकास दर बढ़ाने की होड़ में इसने संसाधन की लूट को बढावा दिया। आज देश के एक प्रतिशत अमीरों ने 73 प्रतिशत धन हथिया लिया है। एक आंकड़े के मुताबिक पिछले साल हर दो मिनट में एक अरबपति पैदा हुआ। इसके विपरीत मजदूरों की आमदनी साल में सिर्फ दो प्रतिशत बढ़ी है। इन नीतियों की शुरूआत कांग्रेस की नरसिंह राव सरकार ने की थी। इसे बनाने और लागू करने वाले दो लोग मनमोहन सिंह और पी. चिदंबरम आगे भी कांग्रेस की सरकारों में महत्पूर्ण भूमिका निभाते रहे। मनमोहन सरकार में वित्त मंत्री रहे प्रणब मुखर्जी भी कॉरपोरेट समर्थक नीतियों के पक्षधर थे। कांग्रेस में इन नीतियों के समर्थकों की एक बड़ी फौज है, जिसमें कपिल सिब्बल और आनंद शर्मा जैसे लोग हैं। आर्थिक सुधार का मतलब होता है विश्व बैंक के पैमाने पर खरा उतरना और कॉरपोरेट को हर तरह की छूट देना तथा मजदूरों के अधिकार छीनना। उदारीकरण के समय से ही यह शोर रहा है कि आर्थिक सुधार तेजी से हो रहे हैं या नहीं। इसका असर ऐसा था कि मोदी सरकार के आने के बाद से संसद की बहसों में अर्थ से संबंधित हर नीति की घोषणा के बाद आनंद शर्मा जैसे नेता यही कहते पाए जाते थे कि यह तो हमारी नीति की नकल है। यहां तक कि कांग्रेस ने जीएसटी का समर्थन किया। उसे सिर्फ इसे लागू करने को लेकर एतराज था। राहुल ने बिना कहे इस कांग्रेस की नीति पलट दी। इसकी शुरुआत उन्होंने 'सूट-बूट की सरकार' के नारे से की। मोदी सरकार को कॉरपोरेट समर्थक बताने के लिए यह अच्छा मुहावरा था। शुरू में इस मुहावरे के असली अर्थ को नहीं समझा गया। बाद में राहुल गांधी ने इस मुहावरे को विस्तार दिया। उन्होंने जीएसटी को ''गब्बर सिंह टैक्स'' बताया। यह उदारीकरण की अर्थ नीति पर सबसे जबर्दस्त हमला था, क्योंकि टैक्स प्रणाली में सुधार उदारीकरण की नीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। नोटबंदी पर उनका हमला उदारीकरण के समर्थकों की तरह नहीं है। उदारीकरण के समर्थकों में नोटबंदी के असर को लेकर दुविधा है। वे इससे विकास दर में कमी लाने वाला कदम मानते हैं, लेकिन इससे छोटे उद्योगों तथा व्यापारियों को उजाड़ने वाला कदम नहीं बताते। राहुल ने इसे गरीब व्यापारियों, किसानों तथा छोटे उद्योगों को उजाड़ने वाला तथा आम लोगों को परेशान करने वाला कदम बता कर इसके खिलाफ अभियान चलाया। राहुल का ''चौकीदार चोर है'' का नारा सिर्फ सांकेतिक और मोदी को भ्रष्ट बताने वाला नारा नहीं है, बल्कि बैंकिंग व्यवस्था और सरकार की कॉरपोरेट समर्थक नीतियों को उजागर करने वाला है। वह राफेल सौदे से लेकर नीरव मोदी के मामले को जोड़ कर यही बताते हैं कि मोदी भारत के नागरिकों से पैसा चुरा कर अंबानी और अडानी की जेब में डाल रहे हैं। यह भ्रष्टाचार के आम आरोप से अलग है। इसमें आरोप सिर्फ व्यक्तिगत नहीं होकर एक जनविरोधी साजिश में तब्दील हो जाते हैं। मनमोहन सरकार के दौरान हुए भ्रष्टाचार को लेकर भाजपा के अभियान का निशाना व्यक्ति होते थे, नीतियां नहीं। यहां तक कि टू-जी घोटाले के खिलाफ अपने अभियान में भाजपा ने कांग्रेस तथा मनमोहन सरकार में बैठे नेताओं को निशाना बनाया और व्यक्तिगत लाभ के आरोप लगाए। उनका आरोप था कि उदारीकरण की नीति को ठीक ढंग से लागू नहीं किया गया। उन्होंने मनमोहन सरकार या सोनिया गांधी को कॉरपोरेट समर्थक होने के लिए नहीं घेरा। राहुल व्यक्तिगत भ्रष्टाचार के व्यापक आर्थिक परिणामों के खिलाफ अभियान चला रहे हैं। यह असल में उदारीकरण की आर्थिक नीतियों पर हमला है। किसानों की कर्जमाफी को लेकर भी उनका नजरिया उदारीकरण-विरोधी है। वामपंथी पार्टियों को छोड़ कर कोई भी पार्टी कॉरपोरेट टैक्स में छूट का मुद्दा नहीं उठाती है। यहां तक कि समाजवादी पार्टी भी इसे लेकर कोई अभियान नहीं चलाती है। वह किसानों की कर्ज माफी से भी इसे नहीं जोड़ती। वामपंथी पार्टियां इन सारी बातों को जोड़ कर देखती हैं। राहुल ने अपनी पार्टी की घोषित और मनमोहन-चिदंबरम पोषित नीतियों को छोड़ कर किसानों की कर्जमाफी नहीं होने और कॉरपोरेट को टैक्स छूट देने के मुद्दों को जोड़ दिया है। यह हकीकत भी है। ये नीतियां एक ही दिशा में चलती हैं। यह दिशा है कॉरपोरेट की ओर जाने की। राहुल ने सिर के बल खड़ी नीतियों को पैर के बल खड़ा कर देने का काम किया है। जाहिर है इन नीतियों के अनुरूप कांग्रेस का नेतृत्व भी बदलेगा और इसी के हिसाब से राजनीति में चलने वाली बहस भी बदलेगी। हालांकि राहुल को इन नीतियों को ठीक ढंग से बनाने और पूरी तरह आम लोगों के हितों के लायक बनाने में समय लगेगा। अफसोस है कि कॉरपोरेट के शिकंजे में दबा मीडिया या बुद्धिजीवियों का जगत इस बहस के लिए तैयार नहीं है। लेकिन सामान्य जनता इसे ग्रहण कर रही है। देखना यह है कि 2019 तक जाते-जाते यह बहस कहां पहुंचती है। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार और द्रोहकाल डॉटकॉम के संपादक हैं)