जनवरी 2019

किसान बने राजनीति की मुख्य धुरी

हरिमोहन मिश्र

पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजों ने जनता के बदलते मन-मिजाज की एक झलक पेश की है। केंद्र और देश के ज्यादातर राज्यों में सत्तारूढ़ भाजपा को तगड़ा झटका लगा है, क्योंकि उसका गढ़ माने जाने वाले तीन सूबों में वह सत्ता से बेदखल हो गई है। 2014 के आम चुनाव और उसके बाद हुए कई विधानसभा चुनावों में जीत के जरिये उसने अपनी अजेयता का मिथक रच डाला था। इस सिलसिले में गुजरात में मामूली अंतर से मिली जीत को और यहां तक कि गोवा में मिली हार को भी वह अपने पक्ष में एकतरफा जनादेश बताने में सफल रही थी। पांच राज्यों के चुनावी नतीजों का सबसे बड़ा संदेश यह है कि लगभग ढाई दशक बाद 'विकास' का भ्रमजाल अब पीछे छूट गया है और खेती, किसान और रोजगार से जुड़े सवालों ने राजनीति के केंद्र में अपनी जगह बना ली है।

मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान में कांग्रेसी सरकारों ने बनते ही किसानों की कर्ज माफी के फैसले किए तो दनादन भाजपा शासित राज्यों को भी किसानों की याद आ गई। महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, झारखंड तो किसान राहत के ऐलान कर चुके हैं। ओडिशा ने भी किसानों को सीधे वित्तीय लाभ देने का ऐलान कर दिया है। इससे आर्थिक, कॉरपोरेट जगत से यह आवाज भी उठ रही है कि इससे अर्थव्यवस्था और वित्तीय अनुशासन गड़बड़ाने का खतरा है मगर यह आवाज अब पहले जैसा असर पैदा नहीं कर पाई। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ही नहीं, मध्य प्रदेश के नए मुख्यमंत्री कमल नाथ भी यह कह गए कि जब उद्योगपतियों के कर्ज माफ हो सकते हैं तो किसानों के क्यों नहीं? दरअसल, नब्बे के दशक में उदारीकरण के बाद से ही कृषि और किसानों के एजेंडे पर बात करना लगभग विकास विरोधी मान लिया जाता रहा है। विकास को बड़े उद्योगों और शहरीकरण का पर्याय बताया जाता रहा है। सरकारें खासकर चुनावों के समय किसानों और गांवों के मद में कुछ टोटकेनुमा कार्यक्रमों का ऐलान भले करती रही हैं लेकिन किसानों के हाथ लगातार खाली होते रहे हैं। हालात ये हो गए कि एक दशक में करीब तीन लाख किसान खुदकुशी कर चुके हैं। विकास की इस नव-उदारवादी दृष्टि का चरम एक मायने में 2014 के चुनाव थे, जब नरेंद्र मोदी गुजरात मॉडल के विकास के मुखौटे के रूप में उभरे थे। वे हर समस्या का इलाज महज 'विकास, विकास, विकास' बताया करते थे। लेकिन यह सोच अब पीछे छूट गई है, बशर्ते इन चुनावों के ये संदेश आगे भी इतने ही जोरदार बने रहें। अगर यह जनादेश नीतियों में बदलाव का वाहक बन जाते हैं तो वाकई देश में नई धारा फूट सकती है। तीन हिंदी प्रदेशों में ही नहीं, तेलंगाना और मिजोरम के नतीजों को भी देखें तो यह साफ संदेश सुनाई देगा कि नीतियों का फोकस बदलना चाहिए और कृषि, किसान और रोजगार उसके केंद्र में होना चाहिए। लेकिन इन संदेशों को भुलाने के लिए ही शायद चेहरों की चर्चाएं इतनी तेज कर दी जाती हैं कि कोलाहल में असली संदेश कहीं गुम हो जाए। लेकिन सवाल यही है, क्या यह एहसास इतना गहरा होगा कि विकास की धारा न सही, कम से कम उसके आक्रामक तरीके बदल दिए जाएं। भारी उद्योगों, विदेशी निवेश, शहरीकरण और बड़ी कंपनियों तथा बड़े घरानों को शह देने वाली नीतियों का ही परिणाम है कि नब्बे के दशक में खास तौर पर आर्थिक उदारीकरण की नीतियों के बाद से कृषि क्षेत्र की उपेक्षा लगातार तेज होती गई है। रोजगार का संकट भी इसी वजह से घनीभूत होता जा रहा है, क्योंकि कृषि क्षेत्र पर ही आज भी साठ प्रतिशत से ज्यादा आबादी पलती है। किसान लगातार लागत बढ़ने और दूसरी वजहों से कर्ज के बोझ में डूबता जा रहा है। फिलहाल तो यह दिख रहा है कि यह एहसास है। नतीजों के बाद राहुल गांधी ने कहा, ''कर्जमाफी बस तात्कालिक कदम है। कृषि की समस्या पेचीदी है और उसके लिए देश के लोगों और आर्थिक तंत्र को मिलकर नई राह खोजनी होगी और हम यह खोजेंगे।'' तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चंदशेखर राव ने कहा, ''अब हम केंद्र की राजनीति में अधिक सक्रिय होंगे क्योंकि देश में अर्थव्यवस्था और विकास की धारा बदलने की दरकार है। हमने कृषि और रोजगार केंद्रित नीतियों पर इधर काम किया है। इस बारे में बाकी नेताओं से बात करूंगा।'' एमएनएफ ने भी न सिर्फ स्थानीयता पर जोर दिया, बल्कि एनडीए का सदस्य होने के बावजूद केंद्र की नीतियों को खारिज कर दिया। ऐसा भी नहीं है कि लोग इन सब पर अपनी राय जाहिर नहीं कर रहे हैं। उदारीकरण की नीतियों के बाद पहला ही चुनाव उसके सूत्रधार पी.वी. नरसिंह राव हार गए थे, लेकिन नव-उदारवादी नीतियों का रुख नहीं बदला। अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में वह और उफान पर आ गया। आखिरकार उस सरकार को भी 2004 के चुनावों में लोगों ने हरा दिया। वामपंथी दलों के समर्थन से सत्ता में आई कांग्रेस की अगुआई वाली यूपीए सरकार में लोगों की राय का हलका-सा एहसास हुआ तो मनरेगा, शिक्षा का अधिकार जैसे कार्यक्रम और कानून लागू किए गए। शायद उसी आधार पर और 2008 में किसानों की कर्जमाफी का ऐलान करके यूपीए 2009 का चुनाव भी जीत पाई। लेकिन उदारीकरण के एक सूत्रधार मनमोहन सिंह की अगुआई में यूपीए सरकार की मूल धारा भी भारी उद्योगों, कारोबारों के पक्ष में ही बहती रही। इससे उसके आखिरी दौर में संकट इतना बड़ा हो गया कि उसके संभाले नहीं संभला। यूपीए सरकार ने कृषि संकट को संभालने के लिए अनाजों के समर्थन मूल्यों में कई बार इजाफा किया और आखिरी साल में खाद्य सुरक्षा कानून भी ले आई, लेकिन उसका खास असर नहीं हो पाया। दरअसल, ये सब उपाय वैसे ही तात्कालिक राहत देने वाले हैं, जैसे कर्ज माफी के कदम। संकट के मूल में तो भारी उद्योगों और कारोबार के पक्ष में एकतरफा झुकी नीतियां हैं। अगर आज नासिक के आसपास प्याज किसानों का संकट ही देख लें तो कुछ समझ में आ जाएगा। वहां किसान 105 रुपए क्विंटल प्याज बेचने को मजबूर हैं, जिसमें उन्हें घाटा ही घाटा है। लेकिन देश के शायद ही किसी हिस्से के बाजार में प्याज 15 या 20 रु. किलो से कम पर बिक रही हो। यह उस जिंस बाजार और वायदा कारोबार का परिणाम है, जिसे उदारीकरण के दौर में मंजूरी दी गई। यानी लोगों की जेब से पैसा प्याज किसानों के बदले वायदा कारोबारियों के पास पहुंच रहा है, जो देश के बड़े कारोबारियों का ही समूह है। अगर गौर से देखेंगे तो 2014 में भी देश के लोगों ने बड़ी उम्मीद से भाजपा की ओर रुख किया था। लेकिन आज सभी मुद्दे भाजपा और एनडीए के सामने बड़े सिरदर्द की तरह लौट आए जिनका समाधान करने के वादे के साथ उसे 2013-2014 में लोगों ने लगभग एकतरफा जनादेश सुना दिया था और कांग्रेस का सूपड़ा साफ कर दिया था, लेकिन इस दौरान कृषि संकट, अर्थव्यवस्था की खस्ताहाली, बेरोजगारी ऐसे चरम पर पहुंच गई कि लोग वह भी भूल गए, जो भाजपा कथित तौर पर राष्ट्रवाद और हिंदुत्ववाद का ज्वार पैदा करके जीवन के रोजमर्रा के मुद्दों को पीछे करना चाहती थी। यही नहीं, भाजपा की सरकारों ने लोगों की राय को शायद कुछ इस तरह समझा कि इन्फ्रॉस्ट्रक्चर यानी सडक़, बिजली, पानी की स्थिति सुधार दी जाए तो किसानों को राहत मिल जाएगी। पार्टियां ही नहीं, नव-उदारवादी नीतियों के पैरोकार अर्थशास्त्रियों ने भी मीडिया और तमाम मंचों से यही बताया कि सडक़, बिजली, पानी ही जनता मांग रही है। कथित तौर पर सरकारी आंकड़ों को देखें तो मौजूदा एनडीए सरकार और मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ की सरकारें ग्रामीण इन्फ्रॉस्ट्रक्चर यानी ग्रामीण सडक़ों, मकानों और शौचालयों पर काफी काम किया है। हालांकि सरकारी आंकड़े संदिग्ध होते हैं, लेकिन एक पल को इन्हें सच मान भी लिया जाए तो इससे संकट दूर नहीं हुआ, बल्कि बढ़ गया। यानी समस्या कुछ और है और इलाज कुछ और किया जा रहा है। एनडीए सरकार के कार्यकाल में ही उदारीकरण के ढाई दशकों के बाद पहली दफा इतने बड़े पैमाने पर देश के तमाम इलाकों में किसान आंदोलन देखने को मिले। जिस मध्य प्रदेश की शिवराज सरकार की वाहवाही कृषि अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिए की जाती रही है, उसी के राज में मंदसौर में पुलिस गोलीकांड में पांच किसान मारे गए। यही नहीं, शायद संकट को छुपाने के लिए पिछले दो-तीन साल से आत्महत्या के आंकड़े जारी करना भी बंद कर दिया गया है। तो, क्या हाल के चुनावी नतीजों से भाजपा या कांग्रेस को भी जनता की राय का सही-सही ख्याल आएगा। अगर अब भी विकास के नव-उदारवादी रास्ते से हटकर कृषि और रोजगार की व्यवस्था को मजबूत किया जाए, किसानों से खरीद मूल्य तय किए जाएं तो व्यापारियों से बिक्री मूल्य भी तय किए जाएं तो ही कुछ राहत मिल सकती है। वरना कामचलाऊ उपायों से कोई हल नहीं निकलने वाला है। यह भी गौर कर सकते हैं कि कथित तौर पर आर्थिक सुधार और काली कमाई पर अंकुश के लिए नोटबंदी और जीएसटी जैसे जो बेढ़ब कदम उठाए गए, उनका नतीजा देश और लोगों की जिंदगी पर और बुरा हुआ। इसलिए जरूरी है कि जनादेश का वास्तविक मर्म समझा जाए। बेशक, मौजूदा आर्थिक नीतियों और संरचनाओं में इतना आगे बढ़ने के बाद काम आसान नहीं है। फिर भी अगर सोच की दिशा मुड़ जाए तो भी इस जनादेश के प्रति सम्मान देना कहलाएगा। जनादेश के सियासी संदेश यकीनन जनादेश में वह सब दिखा, जिसका आभास किसी भी सेमीफाइनल में दिखना चाहिए। वे सभी मुद्दे भाजपा और एनडीए के सामने बड़े सरदर्द की तरह लौट आए, जिनका समाधान करने के वादे पर उसे 2013-2014 में लोगों ने बड़ी उम्मीद के साथ लगभग एकतरफा जनादेश सुना दिया था और कांग्रेस का सूपड़ा साफ कर दिया था, लेकिन खासकर इस दौर में कृषि संकट, अर्थव्यवस्था की खस्ताहाली, बेरोजगारी ऐसे चरम पर पहुंच गई कि लोग वह भी भूल गए जो भाजपा कथित तौर पर राष्ट्रवाद और हिंदुत्व का ज्वार पैदा करके जीवन के रोजमर्रा के मुद्दों को पीछे करना चाहती थी। जिंदगी के मूल मुद्दों की वापसी से छत्तीसगढ़ में धमाकेदार और मध्य प्रदेश व राजस्थान में कुछ हलका जनादेश कांग्रेस की ओर मुड़ा तो कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की भी जैसे जय-जय हो गई। उनकी छवि का विस्तार इससे भी आंका जा सकता है कि नतीजों और संसद के शीतकालीन सत्र के प्रारंभ के एक दिन पहले तमाम विपक्षी दिग्गजों ने उन्हें ही प्रेस को संबोधित करने को आगे किया और वे सब उनके साथ खड़े रहे। कांग्रेस अध्यक्ष बनने के सालभर बाद राहुल गांधी के लिए जनता का यह संदेश यकीनन नई राह खोलने वाला हो सकता है, बशर्ते आगे वे अपनी पार्टी को नए ढर्रे पर चलाने में कामयाब हो पाएं? यह भी जरूरी है कि उन्हें और उनकी पार्टी को जनता के संदेशों का इल्म भी करीने से हो, ताकि उन नीतियों की तरफ मुड़ा जाए, जिससे देश की अर्थव्यवस्था पटरी पर आए और लोगों के जीवन में उसका फर्क दिखे। उन्हें अर्थव्यवस्था का वह रुख भी मोड़ना पड़ सकता है, जिसके बनिस्बत खासकर यूपीए-2 सरकार के दौरान आर्थिक स्थितियां डांवाडोल होने लगी थीं, भ्रष्टाचार की खबरें छाने लगी थीं और कांग्रेस को चुनावों में अपने इतिहास का सबसे बुरा दौर देखने को मजबूर होना पड़ा था। वह मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ जैसे हिंदी प्रदेशों में तो जैसे अपना जनाधार ही गंवा बैठी थी और लोकसभा में 44 सीटों तक सिमट आई थी। यह कहा जा सकता है कि मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में किसानों की कर्जमाफी और छोटे उद्योग-धंधों को तरजीह देने का वादा ही ज्यादा कारगर साबित हुआ है। इसके बदले भाजपा के किसानों के लिए वादों पर भरोसा करना शायद इसलिए भी मुमकिन नहीं हो पाया कि उनके राज में किसान आंदोलन उग्र हुए और वे कोई खास नतीजा नहीं दे पाए। मध्य प्रदेश में मंदसौर गोलीकांड में चार किसानों की मौत और राजस्थान में एकाधिक बार बड़े-बड़े किसान आंदोलनों से लोगों में शायद एक तरह का अविश्वास पैदा हो गया। फिर मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में पंद्रह साल के भाजपा राज का एंटी-इन्कंबेंसी तथा लंबे समय तक शासन में होने से सत्तारूढ़ पार्टी के नेताओं का अहंकार भी बड़ा कारक हो सकता है। संभवत: मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह की सर्वसुलभ छवि भी भाजपा के प्रदर्शन में ज्यादा गिरावट को रोकने में एक वजह हो सकती है। वैसे, भाजपा के लिए तो ये चुनाव बस इतना ही संतोष लेकर आए हैं कि वह अपने सबसे पुराने और महत्वपूर्ण गढ़ मध्य प्रदेश में अपनी जमीन बहुत गंवाने से बच गई। उसका मत प्रतिशत कांग्रेस से लगभग बराबरी कर रहा है। इसका श्रेय मध्य प्रदेश में भाजपा और संघ परिवार की गहरी जड़ों के साथ शिवराजसिंह चौहान की लोकप्रियता को भी दिया जाना चाहिए। हालांकि दलित उत्पीडऩ और कथित गोरक्षकों के उत्पात ने भी समाज के अलग-अलग वर्गों में खटास और नाराजगी पैदा की। वजह यह भी है कि केंद्र की खासकर नोटबंदी और जीएसटी के फैसलों से सबसे अधिक रोजगार देने वाले क्षेत्रों कृषि, छोटे उद्योग-धंधों और विशाल अनौपचारिक क्षेत्र में तबाही देखने को मिली। यह असर इतना बड़ा था कि शिवराज के किसानों और कमजोर वर्गों के लिए राहत कार्यों का खास असर नहीं दिखा। छत्तीसगढ़ में 2013 के पिछले विधानसभा चुनावों में भी कांग्रेस और भाजपा की महज एक-दो सीटों का ही अंतर था, लेकिन कांग्रेस से पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी की विदाई के बाद पार्टी काफी कमजोर लग रही थी। जोगी ने जोगी जनता कांग्रेस नाम से अपनी पार्टी बना ली। इस बार अजीत जोगी शायद पहले यह चाहते थे कि कांग्रेस के साथ किसी तरह की व्यवस्था हो जाए, लेकिन कांग्रेस ने इसे सिरे से खारिज कर दिया। यही नहीं, चुनावों में टिकट बंटवारे के पहले तक कांग्रेस में रहीं जोगी की पत्नी रेणु जोगी ने टिकट न मिलने पर कांग्रेस छोड़ी और जोगी जनता कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ीं। उसके बाद जोगी ने बहुजन समाज पार्टी की मायावती से गठजोड़ करके तीसरा मोर्चा बनाना चाहा। लेकिन कांग्रेस यह धारणा बनाने में कामयाब रही कि यह गठबंधन भाजपा की मदद के लिए वोट कटवाने का काम करेगा। रमन सिंह भी लगातार कहते रहे हैं कि जोगी फैक्टर से इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन लोग शायद पिछली बार के घटनाक्रम शायद भूले नहीं थे। सो, इस बार ऐसा जनादेश सुनाया कि किसी तरह की जोड़तोड़ की नौबत ही न आए। राजस्थान में यह परंपरा भी रही है कि बारी-बारी से सरकारें बदली जाएं। लेकिन संघ परिवार के कट्टर तत्वों के उत्पात की लगातार घटनाओं ने शायद लोगों को नाराज ही किया। फिर समाज के अलग-अलग वर्गों में कई वजहों से नाराजगी भी भाजपा को भारी पड़ी। झालावाड़ जिले में झालरापाटन क्षेत्र से वसुंधरा राजे के खिलाफ कांग्रेस में हाल ही में आए पूर्व भाजपा नेता जसवंत सिंह के बेटे मानवेंद्र सिंह को मिले 75,000 से अधिक मत इस बात का संकेत हैं कि खासकर राजपूतों की नाराजगी ने फर्क पैदा किया है। इसी तरह जाट तथा अन्य वर्गों में भी नाराजगी भाजपा को भारी पड़ी। लेकिन असली मुद्दे बेरोजगारी, नोटबंदी, पेट्रोल-डीजल की महंगाई और गहराते कृषि संकट ही थे जिनका भाजपा कोई तोड़ नहीं निकाल पाई। आप याद कर सकते हैं कुछ समय पहले वसुंधरा राजे की वह टिप्पणी कि गोरक्षकों का उत्पात और मॉब लिंचिंग की घटनाएं बढ़ती बेरोजगारी की वजह से हो रही हैं। लेकिन, तेलंगाना में मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव ने कृषि पर ज्यादा ध्यान दिया। राज्य में सिंचित भूमि का दायरा बढ़ाया है। किसानों को कर्जमाफी और तरह-तरह की रियायतें दीं। इससे शायद लोगों ने अपने परिवार को लाभ देने वाले उनके तौर-तरीकों को तवज्जो नहीं दी। हालांकि कांग्रेस ने तेदेपा, भाकपा और एक क्षेत्रीय दल को मिलाकर महाकुटी (महागठबंधन) बनाकर तगड़ी चुनौती पेश की थी, लेकिन हो सकता है, तेदेपा नेता, आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू को मिलती शह ने महागठबंधन के प्रति लोगों के मन में संदेह पैदा कर दिया है। शायद उन्हें तेलंगाना और आंध्र के बीच तकरार की याद आ गई हो, लेकिन बड़ा मसला यह भी हो सकता है कि नायडू की छवि शहरीकरण और औद्योगिकीकरण पर जोर देने वाले नेता की रही है। अविभाजित आंध्र प्रदेश के बतौर मुख्यमंत्री नायडू के राज में हैदराबाद तो सिलिकॉन वैली का पर्याय बना था मगर कृषि पर ज्यादा फोकस नहीं रहा था। हालांकि महाकुटी के नेता ईवीएम में छेड़छाड़ और सरकारी मशीनरी के भारी दुरुपयोग का आरोप लगा रहे हैँ। बहरहाल, इस समूचे जनादेश का संकेत यही है कि बेहिसाब शहरीकरण और औद्योगिकीकरण और बड़े उद्योग तथा कारोबारी घरानों की ओर झुकी नीतियां कारगर नहीं हैं। इन चुनावों को कवर करते पत्रकारों को जगह-जगह लोगों ने नोटबंदी से नुकसान और रोजगार न होने की बातें बताईं। इन सबने भाजपा सरकारों के खिलाफ माहौल पैदा किया। फिर संघ परिवार और कट्टर हिंदुत्ववादियों ने देश भर में मॉब लिंचिंग वगैरह का जो माहौल बनाया, उसने शायद लोगों को और खफा किया। लेकिन इस जानदेश का सबसे बड़ा संदेश तो यही है कि अब कृषि और किसान फिर केंद्र में आ गए हैं। विकास की वह राह जो औद्योगिकरण और खासकर भारी उद्योगों के पक्ष में है, उससे लोगों ने खारिज कर दिया है। क्या यह संदेश जीती कांग्रेस और हारी भाजपा को समझ में आएगा? असली सवाल तो यही है। बहरहाल, इन नतीजों ने 2019 में भाजपा ही नहीं, विपक्ष के एजेंडे को भी तय कर दिया है। भाजपा को अपने सहयोगी दलों को ज्यादा तरजीह देनी पड़ रही है, जैसा कि बिहार में रामविलास पासवान की पार्टी को पाले में बनाए रखने के लिए हाल में भाजपा के तेवर ढीले भी पड़े। दरअसल, ये चुनाव यह भी साबित कर गए कि न मोदी अब चुनाव जिताऊ जादू दिखा पा रहे हैं, न भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की चाणक्य नीति और बूथ मैनेजमेंट कारगर रह गया है। यह हौवा भी बेमानी हो गया है कि संघ अपने कार्यकर्ताओं के जरिए बाजी पलट सकता है। इन चुनावों का कोई गणित लोकसभा चुनावों के मद में बनता है तो मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ में करीब 50 सीटें भाजपा को गंवानी पड़ सकती हैं। उधर, किसी भी संभावित विपक्षी गठबंधन या महागठबंधन में कांग्रेस और राहुल गांधी की मोलतौल की स्थिति मजबूत हो जाएगी। जो भी हो, यह वाकई सेमीफाइनल साबित हुआ, जिसमें अगले साल मई के आम चुनावों के सूत्र खुल सकते हैं। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार और 'आउटलुक' पत्रिका के संपादकीय सलाहकार हैं)