जनवरी 2019

2018 का सबक

डॉ. सुभाष खंडेलवाल

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जब चुनी हुईं सरकारें सत्ता में आकर अपने किए वादों को भूल जाती हैं, तब वो स्तरहीनता पर उतर जाती है। उसकी सजा उन्हें लोकतंत्र में चुनावों से मिल जाती है। विधानसभा चुनाव 2018 का यही सबक है। सेमीफाइनल हो गया। लोकसभा चुनाव 2019 मई के फाइनल की तैयारी है। प्रश्न है प्रति प्रश्न है। उत्तर पुन: जनता के पास मौजूद है। कुर्सी की अदम्य लालसा ने राजनीति में स्तरहीन शब्दों को तीव्रता प्रदान की है। हास्य की जगह उपहास, व्यंग्य की जगह कटुता, मुद्दों की जगह मुंहजोरी, जोड़ने के बदले तोड़ना, आज की राजनीति के पर्याय बन गए हैं। पप्पू ऐसी ही राजनीति के बीहड़ से निकला वो ख्याल था, जो हकीकत से दूर था। मई 2014 के चुनाव के बाद नरेन्द्र मोदी के मोदी-मोदी के जयगान के बीच जब दिल्ली विधानसभा के चुनाव परिणाम आए तो आम आदमी पार्टी ने 70 में से 67 सीटें जीती थीं। तब हमने लिखा था जनता गुड, बेटर, बेस्ट में अन्तर करना जानती है। उसके बाद बिहार विधानसभा के चुनाव हुए, तो राजद, जनता दल यू गठजोड़ को बहुमत मिला था। इसके बाद आए उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव जहां अखिलेश यादव की सरकार थी। जो पारिवारिक कलह में उलझी थी। जनता पिछले 20 वर्षों से कभी मुलायम, तो कभी मायावती की सत्ता से ऊब चुकी थी। वहां भाजपा की सरकार बन गई। ऐसा प्रचारित किया गया, जैसे इससे पहले कोई जीता ही न हो। अमित शाह अश्वमेध का घोड़ा इस उद्घोष के साथ लेकर निकल पड़े कि कांग्रेस मुक्त भारत बनाना है। तर्क पर कुतर्क भारी थे। मोदी-शाह पारस पत्थर बन गए, जो उन्हें छू ले, वह सोना था। साम-दाम-दंड-भेद उसके अबोध अस्त्र थे। गोवा, उत्तराखंड और अन्य राज्य में किया गया दलबदल सफलता का पैमाना बन गया। जनता की जिन्दगी से जुड़े सभी मुद्दे गायब थे। लोकतंत्र के सभी स्तंभ खंडित हो रहे थे। मीडिया पर हमले थे, एनडीटीवी के प्रणय राय को उन पर हो रही ज्यादती को पत्रकारवार्ता बुलाकर बताना पड़ा। आज तक से पुण्य प्रसून की रवानगी की कहानी सबके सामने थी। सीबीआई जो पांच हजार अफसरों की संस्था थी, जो सबकी जांच करती थी, उसकी जांच होने लगी। आरबीआई पर दबाव की नई कहानी सामने आने लगी थी। सर्वोच्च न्यायालय के चार न्यायाधीशों ने अचानक पत्रकार वार्ता बुलाकर कहा कि आने वाली पीढ़ी हमें माफ नहीं करेगी। न्यायपालिका के काम में केन्द्र सरकार द्वारा हस्तक्षेप किया जा रहा है। लोकतंत्र के लिए इनसे बड़ा खतरा और कुछ नहीं हो सकता था। इसके पूर्व नीरव मोदी, मेहुल चौकसी, विजय माल्या अपनी शर्मनाक हरकतों से सरकार का छुपा चेहरा दिखाकर देश से फरार हो चुके थे। मोदी सरकार को इनसे कोई फर्क नहीं पड़ रहा था। डॉलर, पौंड के भाव लगातार बढ़ते जा रहे थे। रुपया और जीडीपी गिरती जा रही थी। महंगाई, बेरोजगारी, बढ़ती जा रही थी। डीजल, पेट्रोल के दाम भी बढ़ते जा रहे थे, किसान को फसल का लागत मूल्य नहीं दिया जा रहा था। वे लगातार आत्महत्या करते जा रहे थे। ऐसे में मोदी अचानक नोटबंदी ले आए। तब हमने लिखा था। ‘जीरो बटा घाटा = सन्नाटा’ नोटबंदी इतिहास के मध्यकाल के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी की पुनरावृत्ति है। नोटबंदी में साधारण आदमी लाइन में लगकर पिसता रहा और अमित शाह की गुजरात स्थित बैंक में साढ़े सात सौ करोड़ रुपए एक सप्ताह में जमा हो गए। कैश देश की ताकत था, एक वरदान था। जिसे कमजोर कर अभिशाप में बदल दिया गया। जीएसटी एक देश- एक कर का सपना थी। जो एक देश और कई कहर में बदल गई। इस पर कुछ भी बोलने का अर्थ बेईमानी था। ठीक उसी तरह जिस तरह कश्मीर पर कुछ भी बोलने का मतलब देशद्रोह था। साध्वी और साधु जो लोकसभा, विधानसभा जैसे संवैधानिक जगहों पर बैठे हुए थे। जिन पर संविधान की रक्षा की जवाबदारी थी। उनके संविधान तोड़ने के बयान लगातार आते रहे। गाय, लव-जिहाद के नाम पर सड़क पर सरेआम पिटाई और हत्याओं पर न तो शर्म आई और ना डर लगा। वही सिलसिला आज भी जारी है। इनका जवाब प्रधानमंत्री ने संसद के अन्दर और बाहर कभी भी नहीं दिया। मोदी सरकार के पक्ष में एक तर्क शेष था कि प्रधानमंत्री पर कोई आरोप नहीं है। राफेल घोटाले ने उसकी भी भरपाई कर दी। इस पर हम पहले सब कुछ लिख चुके हैं। इन सबका परिणाम यह हुआ कि सरकार अपनी लोकप्रियता खोने लगी, जवाबदेह खुद थी। जवाबदारी कांग्रेस पर डालने लगी। बार-बार एक ही राग था- पप्पू, मां बेटे, मामा क्वात्रोच्ची, बोफोर्स, राबर्ट वाडरा, 60 साल। यही सुनते-सुनते जिन्हें चुना था, वे वही राग साढ़े चार साल बाद भी अलाप रहे थे। यह बेसुरापन जनता समझ गई, लेकिन अंधभक्त उसे अब भी सुरीली तान, सुन्दर गायन बताए जा रहे थे। इसके पूर्व, जनता ने उपचुनावों में दस लोकसभा सीटों पर खासतौर पर उत्तरप्रदेश की गोरखपुर, फूलपुर, कैराना, राजस्थान में अलवर और अजमेर, बिहार में अररिया, जहांनाबाद, मध्यप्रदेश में झाबुआ, महाराष्ट्र में पालघर सीट इनमें से पिछले चुनाव में कई सीटें तीन लाख से अधिक वोटों से जीती थीं, उन्हें हराकर मोदी सरकार को सबक दिया था, लेकिन घमंड और स्तुति गान ने समझकर भी समझने नहीं दिया। सन् 2014 में वो गुजरात के गुड गवर्नेंस, दंगे नहीं होते हैं, मजबूत अर्थव्यवस्था, टाटा को एक मिनट में स्वीकृति, उद्योग, व्यापार, नौकरी की बहार के विकास के एजेंडे के साथ सरकार में आई थी। लेकिन इनमें से बहुत से प्रश्नों के तो वो उत्तर भी नहीं दे पा रही थी। सरकार के पास देश को बताने के लिए एक भी उपलब्धि नहीं थी। उसने राम मंदिर का पुराना एजेंडा निकालना शुरू कर दिया। साक्षी महाराज जैसे सांसदों के बयान आ गए कि ‘काशी-मथुरा छोड़ो, पहले जामा मस्जिद तोड़ो’। शहरों के नाम बदले जाने लगे, लेकिन जनता भुलावे में नहीं आई। अभी-अभी बुलन्दशहर इसके पहले मुजफ्फरनगर और उसके पहले बिहार और उत्तरप्रदेश में तीन सौ अधिक जगहों पर साम्प्रदायिक दंगों के प्रयास किए जा चुके हैं, लेकिन देश की जनता जागरूक हो चुकी है। जिस तरह अब वह किसी के कहने से नहीं, अपने विवेक से वोट डालती है, ठीक उसी तरह अब वह साम्प्रदायिकता को भी अपने विवेक से समझने लगी है। इन्हीं सब कारणों से मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ ने लोकतंत्र की मजबूती के लिए अपनी कहानी लिख दी है, जो 2019 मई की तैयारी है। इन चुनावों के कई निहितार्थ हैं। उनमें से ही एक कांग्रेस के ही एक वर्ग से मोदी का जादू उतरना है। इस चुनाव का एक सबब यह भी है कि भाजपा का ही एक बड़ा वर्ग जो उद्योग, व्यापार, शिक्षा, चिकित्सा जैसी सम्पन्न जगह से लेकर तो ऊंची जातियों में बहुतायत से मौजूद है। उनके एक वर्ग को अब पप्पू अच्छा लग रहा है। वो पास हो गया, यह कहना पड़ रहा है। राहुल गांधी 2004 से 2014 में कभी भी प्रधानमंत्री बन सकते थे, केबिनेट मंत्री बन सकते थे। 2004 में सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री पद का त्याग कर एक मिसाल प्रस्तुत की थी, उसमें राहुल की भी सहमति थी। लेकिन 2004 से 2014 की कांग्रेस की सत्ता से उत्पन्न नाराजी ने, जिसके जिम्मेदार राहुल गांधी भी थे। उन अच्छाइयों को विस्मृत करवा दिया था। इंदौर में पत्रकार वार्ता में एक पत्रकार ने राहुल गांधी से प्रश्न भी कर लिया कि आपको पप्पू कहते हैं? उनका उत्तर था ‘आप भोलेनाथ का मतलब समझते हैं’? राहुल गांधी का यह उत्तर बहुत साधारण दिखता है, लेकिन यही उन्हें असाधारण बनाता है। राहुल करीब एक घंटे तक दो सौ लोगों के बीच मौजूद रहे, फिर एक हजार लोगों के बीच मौजूद रहे। प्रश्नों की खुली छूट थी। अमित शाह की तरह पहले से ही तय प्रश्न या डांटने वाले उत्तर नही थे। राहुल के उत्तर सुनकर हॉल में मौजूद सारे लोग भौंचक थे। राहुल गांधी के जाने के बाद कहने लगे- यह तो बड़ा विद्वान है। प्रश्न उठता है कि जिन मोदी को आप अभी तक समझदार मान रहे थे, वे पिछले साढ़े चार वर्षों में प्रेस से मिलने से भी बचते रहे हैं। यह सब इन्हें राहुल से मिलने से पहले समझ में क्यों नहीं आया? इन चुनावों का एक सबब यह भी है कि जो इस भ्रम में जीते हैं कि बुद्धि का ठेका उनके पास है और आए दिन जनता के नाम का रोना-रोते हैं, उनसे ज्यादा समझदार जनता है। छत्तीसगढ़ में चुनाव परिणाम कांग्रेस के सर्वाधिक अनुकूल आए। वह इसलिए क्योंकि वहां प्रतिपक्ष पूरे पांच साल संघर्ष करता रहा। मुख्यमंत्री बघेल ने कई बार जन-यात्राएं निकालीं। उन्हें पन्द्रह दिन से अधिक जेल में भी दुर्भावना पूर्वक बंद किया गया, लेकिन वे डटे रहे, जमानत पर छूटने से इंकार कर दिया। मौजूदा सरकार को हराने के प्रति नाराजगी ने बसपा और जोगी गठबंधन के वोटों को कांग्रेस के पक्ष में मर्ज करवा दिया। मध्यप्रदेश में इसका उलटा था। इसके तीनों बड़े नेताओं की खींचतान में यह अनाथ था। कमलनाथ का अवतरण चुनाव के तीन माह पूर्व हुआ था। पंद्रह वर्षों तक मध्यप्रदेश में डंपर कांड से लेकर व्यापमं की तरह कई घोटाले होते रहे, सब ओर खामोशी थी। मंदसौर में गोली से किसान मर गए, लेकिन कांग्रेस के पैर तब उठे, जब राहुल गांधी आए। मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह 2003 में चुनाव हारते ही दिल्ली चले गए थे। वे पिछले पन्द्रह वर्षों से भाजपा और खासतौर से आरएसएस के खिलाफ लड़ रहे थे। मध्यप्रदेश में व्यापमं में दो हजार से अधिक लोग, अधिकारी और मंत्री जेल में थे। शिवराजसिंह पर आरोपों के प्रत्युत्तर में भाजपा अपने बचाव में दिग्विजयसिंह के पुराने कार्यकाल को लेकर हमले करती थी। जिस तरह वह दिल्ली में सरकार बनने पर कांग्रेस के 60 साल को लेकर हमले करती। कांग्रेस का कोई नेतृत्व ही नहीं था जो जवाब देता। कांग्रेस लगातार कमजोर होती रही, चुनाव हारती रही। दिग्विजयसिंह एक वर्ष पूर्व 6 माह तक नर्मदा की परिक्रमा करते हुए करीब 125 विधानसभा की जनता से रूबरू हुए थे। उनकी यात्रा ने शिवराजसिंह चौहान की हवाई यात्रा की पोल खोल कर पूरे प्रदेश में हलचल मचा दी थी। नर्मदा किनारे की सीटों ने ही कांग्रेस को बचाया है। मोदी, शाह, शिवराज ने इन्हें इतना डरा दिया था कि कमलनाथ, सिंधिया और दिग्विजय सिंह मतभेदों को भुलाकर टिकट वितरण और भाजपा को हराने के मामले में एक हो गए थे। कांग्रेस का सबसे मजबूत गढ़ था राजस्थान। वहां पर सचिन पायलट ने जनता के बीच जाकर, यात्राएं निकालकर भाजपा को कमजोर किया। सिक्स पीएम, नो पीएम जनता की जुबान पर था। कांग्रेस अतिरेक में आ गई और टिकट बंटवारे में गलतियां कीं। इसकी सजा यह मिली कि सवा सौ से डेढ़ सौ सीट सिर्फ सौ में बदल गईं। इन चुनावों का एक सबक यह है कि कांग्रेस ही कांग्रेस को हराती है। इसलिए इन चुनावों का एक सबब यह भी है कि गलती की माफी नहीं है। जनता सब जानती है। देश मई 2019 के लिए पिछले साढ़े चार वर्षों से गठबंधन का इंतजार कर रहा है। कांग्रेस सहित सभी भाजपा विरोधी राजनैतिक दल अपने छोटे-छोटे स्वार्थों में उलझकर प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी पूरी तरह निभा नहीं पा रहे थे। इसलिए गठबंधन बनने की दो ही शर्त थीं। पहली जनता की पीटाई उसका तकलीफ पाकर दर्द और गुस्से से इकट्ठा होकर एक ताकत बनना। दूसरी प्रतिपक्षीय नेताओं की धुलाई उन पर सीबीआई आदि सरकारी एजेंसियों के माध्यम से बदले की भावना से कार्रवाई करना। मोदी सरकार ने यह दोनों काम कर दिए हैं। इसलिए महागठबंधन बन चुका है। जो इसमें नहीं आएगा, जनता की ताकत उसे बाहर कर देगी। जनता दिल्ली के लिए वोट डालेगी। भाजपा को विकास के एजेंडे पर आना पड़ेगा। इसी में उसका, सबका और देश का भला है। अभी सम्पन्न हुए चुनाव कांग्रेस से ज्यादा जनता ने लड़े हैं। वह ज्यादा जानती है, यह सर्वविदित तथ्य है।