दिसम्बर 2018

आईना

डॉ. सुभाष खंडेलवाल

19वीं सदी में इंदौर में एक नगर सेठ हुकमचंद थे, जिनके नाम का प्रभाव अमेरिका तक में था। उनके कई सच्चे किस्से आज भी कहावत में मौजूद हैं। एक बार सेठ इतवारिया बाजार में जहां वे अपने शीश महल में रहते थे, उस जमाने के 20 रुपए के जुते पहनकर निकले। एक मोहल्ले वासी ने सेठ से बड़ा दिखने के लिए दूसरे दिन 21 रुपए के जूते पहन लिए। उसने पूरे मोहल्ले में घूम कर दिखाया कि वो हुकमचंद सेठ से भी बड़ा है। तीसरे दिन सेठ मोती, माणक, पन्ने का कंठा गले में डालकर निकले। पड़ोसी घर से बाहर ही नहीं आया। गुजरात का सरदार वल्लभ भाई पटेल का स्टेच्यू ऑफ यूनिटी पूरी दुनिया के सामने मोहल्लेवासी और हुकमचंद सेठ की कहानी याद दिला रहा है। चीन का बना सामान नहीं खरीदें, दिवाली पर पटाखे और मोबाइल नहीं खरीदें ऐसी असंख्य चीजों को न खरीदने की गुहार संघ और भाजपा का कार्यकर्ता घर-घर जाकर लगाता है। उसी पार्टी का प्रधानमंत्री चीन के लोहे से 3 हजार करोड़ की स्टेच्यू ऑफ यूनिटी बनाता है। कोई भी देश अपनी समस्त जनता का आईना होता है। दुर्भाग्य कि हमारे देश में देखने के अलग आईने हैं। हजारों बरस हो गए ये आईने नहीं बदले हैं। बंटे हुए, टूटे हुए आईने है। भाषा के, जात के, धर्म के अमीर-गरीब के न मालूम कितनी तरह के। यदि कोई भी बदलने की बात करता हैतो पलटकर उस पर इस तरह सवाल खड़ा कर दिया जाता है- घर का आईना भी अब हक जताने लगा है, खुद तो वैसा ही है लेकिन मेरी उम्र बताने लगा है। आजादी के पहले हुकमचंद सेठ इतवारिया में सभी जाति और छोटे- बड़ों के साथ रहते थे। उनके महल के पास में ही चाल बाड़े, गुवाड़ी होते थे, जिसके एक-एक कमरे में पांच-दस लोगों के परिवार रहते थे। उसी मोहल्ले में नाई, धोबी और मुसलमान भी रहते थे। रोटी-रोजगार भी साथ-साथ करते थे। सब एक-दूसरे में रचे, बसे गुंथे हुए थे। आजादी के बाद प्रगति हुई, अब जितना बड़ा पैसे वाला है, उसकी उतनी ही महंगी कॉलोनी में घर है। अलग-अलग जाति, धर्म की अलग-अलग कॉलोनियां भी बन चुकी हैं। एक जाति वर्ग है जो तब भी अछूता था और आज भी दूर है। घर से भी और रोटी-रोजगार से भी, वो दलित है। दलित तो अब भी दलित ही है, लेकिन अन्य को खासतौर पर मुस्लिम को दलित बनाने के नए-नए रास्ते खुलते जा रहे हैं। प्रधानमंत्री के विदेशो में घूमने से, जोर से बोलने से या महंगे सूट पहनने से देश को या मुकेश अंबानी के सबसे ऊंचे एंटिला महल बनाने से भारत ताकतवर और धनवान दिख सकता है। गांधी, सुभाष, भगतसिंह के होने से भारत महान दिख सकता है, लेकिन दिखने और होने में फर्क होता है। वही, फर्क जो स्टेच्यू ऑॅफ यूनिटी में है, वही फर्क जो हुकमचंद सेठ और उसके मोहल्ले वासी में हैं। नरेन्द्र मोदी जब दुनिया के सबसे बड़े स्टेच्यू का उद्धाटन कर रहे थे, तब उनके एक और गुजरात की पूर्व मुख्यरमंत्री आनन्दी बेन पटेल थीं और दूसरी ओर गुजरात के मौजूदा मुख्यमंत्री विजय रूपाणी थे। इक्विटी गायब थी, उनके गुरु लालकृष्ण आडवाणी जो गुजरात के गांधी नगर से बार-बार सांसद बनते रहे, वे गायब थे। उनकी पार्टी और सरकार की कोई नुमाइंदगी ही नहीं थी तो प्रतिपक्षीय दलों को बुलाने की बात करना बेमानी है। सरदार वल्लभ भाई पटेल की स्टेच्यू सीधी तनी खड़ी है। वर्तमान सरकार और उसके प्रधानमंत्री अपने को पटेल की स्टेच्यू जैसा सीधा तना खड़ा दिखा रहे हैं। यहां पर भी दिखने का और होने का वही फर्क है, जो मोहल्ले वाले और हुकमचंद सेठ में है। सरदार पटेल अंग्रेजों के लिए स्टेच्यू थे, सीधे तने खड़े हुए। वे उनसे लड़ते थे, जेल यात्राएं करते थे। वे रियासतों को भारत में विलिन कराते थे। इसके विपरीत नरेन्द्र मोदी अनिल अंबानी के लिए देश का सर झुकाते हैं। 2014 में किए गए वादों को भूलाते हैं। जनता की जिन्दगी से जुड़े मुद्दों को विकास के एजेंडे को ठुकराकर तमाम वे बातें जिनसे उन्माद पैदा होता है, नफरत बढ़ती है, देश बंटता है, उन्हें मजबूती प्रदान करते हैं। पिछले साढ़े चार वर्षों से यह लगातार हो रहा है। अभी-अभी भाजपा सांसद साक्षी महाराज का बयान ‘अयोध्या-काशी छोड़ो, जामा मस्जिद तोड़ो’ आया है वे संवैधानिक पद पर बैठे है ऐसे ही बयान उनके और अन्य लोगों के लगातार आते रहे हैं। लेकिन प्रधानमंत्री सदैव की तरह खामोश है। यहे एक अलग ही आईना है जो आने वाले कल की अलग शक्ल दिखा रहा है। राम मंदिर केन्द्र की मोदी सरकार का ग्राफ दिनोदिन जितना गिर रहा है, उसे उतना ही राम मंदिर याद आ रहा है। महाराष्ट्र में शिवसेना के उद्धव ठाकरे को भी इसी तर्ज पर राम मंदिर याद आ रहा है। मोदी के पहले ही उद्धव ठाकरे अयोध्या जाकर राम की गर्जना करके आ गए हैं। इसमें राम प्रेम कितना है और कुर्सी प्रेम कितना है, यह देश समझता है। वैसे हर डूबते का सहारा श्रीराम होते हैं, यह एक आस्था है, जो लोगों के दिलोदिमाग में सदियों से रची-बसी हुई है। यह आस्था ही भक्ति है, भांडगिरी नहीं है। भक्ति बहुआयामी होती है, भांडगिरी व्यक्तिवादी होती है। भक्ति अपने प्रभु को पाने के लिए पूजा, भजन, व्रत, साधना और तप का मार्ग प्रशस्त करती है। भांडगिरी, चमचागीरी, पाखंड, स्वार्थ, भोग और सत्ता के साथ पतन के गर्त में ले जाती है। भक्ति स्थायी, भांडगिरी अस्थायी है, भांडगिरी वालों ने भक्तिवालों को भरमाकर एक बार 6 दिसंबर 1992 को जो करना था (प्राप्त या अप्राप्त) वो कर लिया। उसके बाद भांड और भक्त अलग हैं। वो एक नहीं हो सकते। यही हमारे देश का हजारों साल का इतिहास है, साझा विरासत है। बाबर ने बाबरी मस्जिद 490 वर्ष पूर्व सन् 1528 में बनाई थी। इसके करीब 350 वर्ष बाद सन 1853 में हिन्दूओं ने आरोप लगाया कि यहां भगवान राम का जन्म हुआ था। इससे विवाद और हिंसा हुई तो ब्रिटिश सरकार ने यहां तारों की बागड़ लगाकर आंतरिक और बाहरी इलाके में हिन्दुओं और मुसलमानों को अलग-अलग जगह पूजा और नमाज के लिए दे दी। 1885 में महन्त रघुवीरदास इसे अदालत में ले गए। इसके 64 बरस बाद 23 दिसम्बर 1949 में यहां पर कुछ हिन्दुओं ने भगवान राम की मूर्ति रख दी। मुसलमानों ने नमाज बंद कर दी। इसके बाद 16 जनवरी 1950, 5 दिसंबर 1950, 17 दिसंबर 1959 को मंदिर के लिए न्यायालय में अलग-अलग प्रकरण दाखिल हुए। 18 दिसमबर 1961 को मुस्लिम पक्ष ने मालिकाना हक के लिए मुकदमा दायर किया। 1984 में विहिप ने आंदोलन की घोषणा की। वो पूरी अयोध्या में नहीं, वहां के कुछ पंथों तक सीमित था। देश का ध्यान इस ओर कभी नहीं गया। राजीव गांधी सन् 1984 में इंदिरा गांधी की शहादत के बाद प्रधानमंत्री बने थे। सन् 1985 में सर्वोच्च न्यायालय ने शाहबानो प्रकरण में पति के छोड़ने पर गुजारा भत्ता देने का फैसला सुनाया था। पूरे देश का मुसलमान तब शरीयत में हस्तक्षेप के नाम पर सड़क पर उतर आया था। लोकसभा में कांग्रेस के एक मंत्री जियाउल रहमान अंसारी थे। उन्होंने कट्टर मुस्लिम पंथ का पक्ष लेकर फैसले का विरोध किया था। वहीं कांग्रेस के ही एक मंत्री आरिफ मोहम्मद खान ने फैसले का समर्थन करते हुए मुस्लिम कट्टरवाद का विरोध किया था। राजीव गांधी कट्टरवाद के दबाव में आ गए थे। उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को लोकसभा में कानून बनाकर पलट दिया था। देश के मानस को तब धक्का लगा था। सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय मुस्लिम महिला के हक में दिया गया क्रांतिकारी निर्णय था। उसकी दुष्परिणति यह बनी कि मुस्लिम साम्प्रदायिकता के इस दबाव ने हिन्दू साम्प्रदायिकता की जमीन तैयार कर दी। साम्प्रदायिकता कोई सी भी हो, नुकसान ही करती है। कहते हैं कि राजीव गांधी के सिपेहसालारों ने राजनीतिक संतुलन बनाने के लिए अचानक राम मंदिर के ताले खुलवा दिए। यहीं से हिन्दू और मुसलमान का खेल शुरू हो गया। सन् 1989 में राम मंदिर आंदोलन उफान पर आया, जो 1992 में अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंचा। इस चरम में कुछ तर्क थे कि अयोध्या में राम का जन्म हुआ है, यह सर्वविदित है। हिन्दू मक्का-मदीने में मंदिर बनाने की बात तो कर नहीं रहा है। राम का मंदिर अयोध्या में नहीं बनेगा, तो कहां बनेगा? पूरे देश में लाखों मस्जिदें हैं, हिन्दू तो उदारवादी है क्या उन्हें किसी ने हटाया है या ऐसी बात भी की है। नारे लग रहे थे बच्चा बच्चा राम का, जन्म भूमि के काम का। जय जय सियाराम । इनके द्विअर्थी भाव ऐसे थे कि सिर शर्म से झुक जाए। हिन्दू धर्म का गिरा से गिरा व्यक्ति भी ऐसे शब्द और भाषा जुबान पर न तो कभी लाया था, और ना ही ला सकता था। लेकिन भांडगिरी भक्त को अपने आगोश में ले चुकी थी। प्रश्न ऐसे थे जिनके उत्तर बड़े से बड़े धर्म निरपेक्ष के पास भी नहीं थे। 6 दिसम्बर 1992 आजाद भारत और संविधान का स्याह पन्ना है। इसके बाद भांडगिरी वालों ने हर संभव प्रयास किया। लेकिन राम मंदिर से भक्त अलग हो चुके थे, उत्तरप्रदेश में सन् 1991-92 में भाजपा ने 85 में से 56 लोकसभा सीट प्राप्त की थीं। तत्पश्चात भाजपा की लोकसभा की सीटें हर चुनाव में कम होते-होते 8 पर चली गई थी। अचानक सन् 2014 में भाजपा की 72 सीट आर्इ हैं। वे राम मंदिर के नाम पर नहीं, कांग्रेस की असफलता और विकास की अवधारणा के नाम पर आई हैं। पूरे देश में यह प्रचारित किया गया कि गुजरात भारत का सबसे समृद्ध, सबसे मजबूत प्रांत है। अफसरशाही पर लगाम है। भ्रष्टाचार खत्म हो गया है। एक मिनट में एक खिड़की पर काम होते हैं। टाटा को भी एक मिनट में सब एनओसी मिल गई है। आईटी की बहार है। गुरजात में दंगे नहीं हैं। नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बन गए तो पढ़े-लिखे नौजवानों को नौकरी, सबको न्याय, सबका विकास के साथ नया भारत बनेगा। पूरे देश ने यही सपना देखा। आज 2014 का वो सपना टूट रहा है। आज नरेन्द्र मोदी सरकार हतप्रभ है। वो अपने ही जाल में खुद उलझी है। जाल के जंजाल से निकलने का एक मात्र तरीका उसे घटनाओं से सबक लेकर अपनी पूरी पार्टी और सरकार को विकास के काम में लगाकर 2014 में किए गए वादों को अमलीजामा पहनाने का प्रयास करना चाहिए था, लेकिन हर दिन उसका उलटा हो रहा है। लोकसभा में 10 सीटें गंवाकर 282 की 272 सीट होने पर भाजपा ने कहना शुरू कर दिया है। न्यायालय को गंभीर मामलों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। राम मंदिर आस्था का और सबरीमाला संवेदनशील मामले हैं, जबकि तीन तलाक इनके लिए गैर संवेदनशील मामला था। देश की असल परीक्षा की घड़ी आने वाली है। यदि 2018 के विधानसभा चुनाव परिणाम भाजपा के विपरीत आते हैं। मई 2019 में लोकसभा चुनाव हैं। देश और दुनिया को लोकतंत्र का अद्भुत नजारा देखना है। इसमें लोकतंत्र की ताकत और कमजोरी दोनों ही अपनी खूबसूरती और बदसूरती के साथ देखने को मिलेगी। लोकतंत्र के सभी स्तंभों पर मौजूदा सरकार प्रश्न चिन्ह खड़े कर रही है। उसके चरम पर पहुंचने का मार्ग प्रशस्त हो रहा है। सीता की अग्नि परीक्षा के बाद राम मंदिर के लिए राम की अग्नि परीक्षा है, लेकिन यह याद रहे कि जितनी पवित्र सीता थीं, उतने ही पवित्र राम है। इसीलिए वे सीताराम हैं। उनका स्थान दिलों में है, वे चेतन-अचेतन में हैं, आकार में, साकार में, निराकार में हैं, वे सोच-सोच में हैं। उन्हें एक मंदिर में बैठाने को बेताब लोग यह नहीं जानते कि एक दौर था, जब लोग सैकड़ों मील पैदल चलकर अयोध्याक गए थे। लाठी और गोलियां खाई थीं। वे विधायक, सांसद, मंत्री बनने के आकांक्षी नहीं थे, वे भक्त थे। आज भांड से भक्त अलग हो चुके हैं। अंदर क्या है, बाहर क्या है? यह देश की जनता जानती है।