दिसम्बर 2018

मौत की सजा के खिलाफ विश्व जनमत

रोहन शर्मा

नवबंर महीने में कुछ खबरें देश-दुनिया के लिए बेहद महत्वपूर्ण रहीं। संयुक्त राष्ट्र में मौत की सजा खत्म करने के लिए के पक्ष में एक प्रस्ताव पारित हुआ, जिस पर 123 देशों ने प्रस्ताव के पक्ष में तथा भारत सहित 36 देशों ने विपक्ष में मतदान किया। इसके अलावा अमेरिका में हुए मध्यावधि चुनाव में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की पार्टी की करारी हार हुई। पंजाब में एक निरंकारी भवन पर हुए भीषण हमले से खालिस्तानी आतंकवाद की आहट फिर सुनाई दी। पडोसी पाकिस्तान से अच्छी खबर यह आई कि वहां की सुप्रीम कोर्ट ने एक ईसाई महिला को ईश निंदा के आरोप से बरी कर उसकी फांसी की सजा रद्द कर दी।

कानून की किताबों में मौत की सजा रहे या न रहे, इस सवाल को लेकर विश्वव्यापी बहस बहुत लंबे समय से जारी है। दुनियाभर में कई देश और संगठन मौत की सजा को खत्म कराने के लिए सक्रिय हैं। इस सिलसिले में संयुक्त राष्ट्र महासभा में भी हर दो साल में मतदान के जरिये प्रस्ताव पारित होता है, जिसमें विभिन्न देश मौत की सजा के विरोध और समर्थन में अपना मत व्यक्त करते हैं। हाल ही में एक बार फिर संयुक्त राष्ट्र महासभा ने दुनिया के सभी देशों से मौत की सजा पर रोक लगाने की अपील करते हुए एक प्रस्ताव पारित किया है। महासभा की तीसरी कमेटी (सामाजिक, मानवीय, सांस्कृतिक) में पेश किए गए इस मसौदा प्रस्ताव के पक्ष में 123 देशों ने और भारत सहित 36 देशों ने विरोध में वोट दिया। 30 देशों ने अपने को मतदान से अलग रखा। पिछले मौकों की तुलना में इस बार प्रस्ताव के पक्ष-विपक्ष में पड़े वोटों की संख्या बताती है कि मौत की सजा के खिलाफ विश्व जनमत में लगातार बढ़ोतरी हो रही है, जो एक अच्छा संकेत है। इससे पहले 2016 में इस आशय का प्रस्ताव 38 के मुकाबले 115 मतों से पारित हुआ था। उससे पहले 2014 में इस तरह के प्रस्ताव के पक्ष में 114 मत पड़े थे, जबकि 2012 में यह प्रस्ताव 41 के मुकाबले 109 वोटों से पारित हुआ था। कुल मिलाकर 2006 से मौत की सजा के खिलाफ वोट देने वाले देशों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है। हालांकि भारत हमेशा ही इस प्रस्ताव के विरोध में मत देता है और इस बार भी उसने ऐसा ही किया है। इस सिलसिले में संयुक्त राष्ट्र स्थित भारत के स्थायी मिशन में प्रथम सचिव पॉलोमी त्रिपाठी ने स्पष्ट किया कि प्रस्ताव मौत की सजा को खत्म करने के मकसद से फांसी की सजा पर रोक लगाने को बढ़ावा देने की बात करता है। चूंकि, यह प्रस्ताव भारत के वैधानिक कानून के खिलाफ जाता है, इसलिए भारत का इस प्रस्ताव के खिलाफ वोट देना लाजिमी था। त्रिपाठी ने साफ किया भारत में मौत की सजा रेयरेस्ट ऑफ रेयर मामलों में ही दी जाती है, जहां अपराध इतना जघन्य होता है कि पूरे समाज को झकझोर देता है। भारतीय कानून स्वतंत्र अदालत द्बारा निष्पक्ष सुनवाई, दोष साबित होने तक निर्दोष माने जाने की धारणा, बचाव के लिए न्यूनतम गारंटी और ऊपरी अदालत द्वारा समीक्षा के अधिकार समेत सभी अपेक्षित प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों का प्रावधान करता है। बहरहाल, संयुक्त राष्ट्र ने अपने प्रस्ताव के माध्यम से उन सभी देशों से मौत की सजा के प्रावधान को खत्म करने की अपील की है, जो अभी भी अपने यहां अपराधियों को मौत की सजा दे रहे हैं। प्रस्ताव में कहा गया है कि अगर वे ऐसा नहीं कर सकते हैं तो इस सजा का कम से कम इस्तेमाल करें तथा ऐसे अपराधों की रोकथाम के ठोस उपाय करें, जिनमें मौत की सजा दी जाती है। यह संयुक्त राष्ट्र, एमनेस्टी इंटरनेशनल तथा दुनिया के अन्य मानवाधिकार संगठनों की कोशिशों का ही परिणाम है कि अब तक संयुक्त राष्ट्र के 192 सदस्य देशों में से फ्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन समेत 61 देशों ने तो अपने यहां बाकायदा इस सजा को पूरी तरह खत्म कर दिया है, जबकि लगभग 70 देश ऐसे हैं, जिन्होंने इसे औपचारिक रूप से तो खत्म नहीं किया है, पर वे इस सजा को अमल में नहीं लाते हैं। दरअसल, संयुक्त राष्ट्र का यह प्रयास अहिंसा के उदात्त मूल्य पर आधारित एक आदर्श की स्थापना का प्रयास है, जो मानता है कि मनुष्य जीवन अनमोल है, इसलिए किसी अपराधी की जान लेने के बजाय उसे आत्म-सुधार का मौका देना चाहिए। लेकिन आदर्श और यथार्थ में बड़ा फर्क होता है। यह सच है कि अहिंसा का दर्शन भारत-भूमि से ही प्रस्फुटित हुआ है, लेकिन आज भारत सहित कई देश ऐसे हैं, जो तरह-तरह के आतंकवाद और अलगाववाद जैसी राष्ट्राघाती चुनौतियों से जूझ रहे हैं। ऐसे देशों के लिए मौत की सजा खत्म करना व्यावहारिक रूप से मुमकिन नहीं है। हालांकि मौत की सजा भी एक तरह की बर्बरता ही है और वॉल्टर बेंजामिन ने कहा भी है कि सभ्यता का इतिहास बर्बरता का भी इतिहास है। लेकिन सभ्यता का इतिहास अहिंसक तरीकों से ऐसी स्थितियां विकसित करने का इतिहास भी तो है, जिनमें हिंसक विवाद और अपराध जन्म ही न ले सकें। जिन देशों को उनके यहां के हालात मौत की सजा खत्म करने की इजाजत नहीं देते, उन्हें तो अपने यहां अहिंसक तरीकों ऐसा वातावरण बनाने की ठोस कोशिशें करनी ही चाहिए। डोनाल्ड ट्रंप के लिए मध्यावधि सबक अमेरिका में पिछले दिनों हुए मध्यावधि चुनाव को अगर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दो साल के अभी तक के कार्यकाल पर जनमत संग्रह माना जाए तो साफ है कि जनता के एक बड़े हिस्से में ट्रंप की लोकप्रियता घटी है और लोगों ने उनकी नीतियों को नकारा है। इन मध्यावधि चुनावों में अमेरिकी संसद के निचले सदन यानी हाउस ऑफ रिप्रजेंटेटिव (प्रतिनिधि सभा) की सभी 435 सीटों, सीनेट के करीब एक तिहाई सदस्यों तथा 37 राज्यों के गवर्नरों को चुनने लिए वोट डाले गए। अमेरिकी चुनाव व्यवस्था के मुताबिक हर चार वर्ष में ऐसे मध्यावधि चुनाव होते हैं, जो राष्ट्रपति के कार्यकाल के बीच की अवधि में संपन्न होते हैं। इस बार के मध्यावधि चुनाव के नतीजों से डेमोक्रेटिक पार्टी का निचले सदन में बहुमत हो गया है, जो राष्ट्रपति ट्रंप के लिए किसी झटके से कम नहीं है। हालांकि उनकी रिपब्लिकन पार्टी का उच्च सदन यानी सीनेट में बहुमत बना रहेगा। सीनेट में मिली जीत से उत्साहित होकर ही ट्रंप ने प्रतिनिधि सभा के चुनाव नतीजों को अपने लिए झटका मानने से इनकार कर दिया है। उनकी यह प्रतिक्रिया कुछ हद तक सही भी है, क्योंकि अमेरिकी प्रशासन तंत्र की सबसे शक्तिशाली संस्था तो सीनेट ही है, जहां उनकी पार्टी का बहुमत बरकरार रहा है। बहरहाल, अब संसद में ट्रंप की वह हैसियत नहीं रह जाएगी, जो अभी तक थी। प्रतिनिधि सभा में डेमोक्रेटिक पार्टी के बहुमत के चलते अब ट्रंप के लिए अपनी नीतियों को पारित कराना आसान नहीं होगा। प्रतिनिधि सभा में डेमोक्रैटिक पार्टी ट्रंप प्रशासन की हर नीति की गहरी समीक्षा कर सकती है। वह अब तक की नीतियों पर भी सवाल उठा सकती है। राष्ट्रपति ट्रंप के निजी व्यापार और वित्तीय मामलों की जांच भी करवा सकती है। अब इस बात की भी संभावना बढ़ गई है कि रूस के राष्ट्रपति के साथ राष्ट्रपति ट्रंप के कथित संबंधों और अमेरिकी चुनाव में रूसी हस्तक्षेप संबंधी आरोपों की भी जांच हो। हालांकि, सीनेट में बहुमत के चलते ट्रंप को कार्यकारी और न्यायिक नियुक्तियों में कोई समस्या पेश नहीं आएगी। फिर भी इन चुनाव नतीजों से उन्हें यह बात तो समझ में आ ही गई होगी कि पूरा अमेरिका उनकी तरह नहीं सोचता है, भले ही वह 'अमेरिका फर्स्ट' के लुभावने नारे उछालते रहें। ट्रंप ने नस्लवाद और अप्रवासन के मुद्दे पर इस चुनाव में भी आक्रामक रुख अपनाया, लेकिन नतीजों से जाहिर है कि अमेरिकी जनता के बहुमत ने इसे बहुत पसंद नहीं किया। दरअसल, अमेरिकी जनतंत्र की अपनी एक गरिमा रही है और जिन नीतियों की वजह से अमेरिका दुनियाभर का आदर्श बना है, उनसे अचानक पीछे लौटना अमेरिकी जनता के एक बड़े हिस्से को बिल्कुल भी रास नहीं आया है। हकीकत यह भी है कि निरंतर बहुरंगी होते अमेरिकी समाज से ट्रंप की एकांगी सोच मेल नहीं खा रही है। अमेरिकी समाज की विविधता की एक झलक इस चुनाव में भी देखने को मिली है। इस बार प्रतिनिधि सभा के चुनाव में दो ऐसी मुस्लिम महिलाओं को जीत हासिल हुई है, जो शरणार्थी के तौर पर अमेरिका आ बसी थीं। इसके अलावा एक समलिंगी पुरुष को गवर्नर पद के लिए चुना गया है। भारतीय मूल के जिन उम्मीदवारों को 'समोसा कॉकस' कहा जा रहा था, वे ज्यादा कामयाब नहीं हुए। भारतीय मूल के करीब एक दर्जन उम्मीदवार प्रतिनिधि सभा के लिए चुनावी मैदान थे, लेकिन जीत का आंकड़ा पिछली बार की तरह चार ही रहा। इन चुनावों का एक उल्लेखनीय पहलू यह भी है कि इस बार रेकॉर्ड संख्या में लोगों ने अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया, जो कि इस बात को दर्शाता है कि लोगों में परिवर्तन की चाह तेज हुई है। आने वाले दिनों में देखने वाली बात होगी कि ट्रंप के रुख को ये चुनाव नतीजे किस रूप में और किस हद तक बदल पाते हैं। अमेरिकी चुनाव के नतीजों से भारत की मौजूदा सरकार और सत्तारूढ पार्टी भी चाहे तो सबक लेकर आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक अतिवाद का रास्ता छोड सकती है। पंजाब में फिर आतंकवाद की आहट पिछली सदी के आखिरी दौर में लगभग एक दशक तक आतंकवाद की आग में झुलसते रहे पंजाब में एक बार फिर आतंकवाद की आहट सुनाई दे रही है। सिखों के प्रमुख धार्मिक शहर अमृतसर से करीब दस किलोमीटर दूर एक गांव में पिछले दिनों स्थित निरंकारी भवन पर हुआ हमला चिंता पैदा करने वाला है। इस घटना में तीन लोग मारे गए और कम से कम 19 घायल हुए। इस हमले के एक सप्ताह पहले ही पंजाब पुलिस ने पाकिस्तानी मूल के आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद से जुड़े कुछ संदिग्ध लोगों के प्रदेश में दाखिल होने की अफवाह के बाद अलर्ट जारी किया था और प्रदेशभर में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई थी, लेकिन इसके बावजूद निरंकारी भवन पर हमला हो गया। दरअसल, पंजाब में पिछले कुछ समय से आतंकवादी संगठनों के फिर से सिर उठाने के संकेत लगातार मिल रहे हैं। वहां अस्सी के दशक में खालिस्तानियों ने ठीक इसी तरह निरंकारियों पर हमले के साथ अपना हिसक अभियान शुरू किया था और फिर ज्यादातर प्रवासी मजदूरों को अपना निशाना बनाया था। असल में वे सबसे कमजोर तबकों पर हमले के जरिए प्रशासन का रुख भांपने की कोशिश करते हैं। सचाई यह भी है कि स्वर्ण मंदिर में ऑपरेशन ब्लू स्टार और उसके बाद लंबे समय तक चली पुलिस कार्रवाई से खालिस्तान समर्थकों की रीढ़ भले ही टूट गई हो, पर वे पूरी तरह खत्म नहीं किए जा सके हैं। पंजाब की राजनीति में उनकी मौजूदगी किसी न किसी रूप में लगातार बनी रही और कुछ मामलों में उन्होंने अपना अजेंडा भी लागू कराया। अभी वे देश-विदेश में फिर से संगठित हो रहे हैं और उन्हे अंतरराष्ट्रीय आतंकी संगठनों का सहयोग भी मिल रहा है। खुफिया एजेंसियो को सूचना मिली है कि बीते 4 नवंबर को आईएसआई चीफ आसिम मुनीर ने कई खालिस्तानी आतंकियों के साथ मीटिंग की और कहा गया कि वे 'सिख फॉर जस्टिस' को पूरा सहयोग करें। यह संगठन 2020 में खालिस्तान के लिए जनमत संग्रह कराने का इरादा रखता है और इस मकसद से इसने ब्रिटेन, कनाडा आदि देशों में रैलियां भी की हैं। खालिस्तान आंदोलन को दोबारा जिंदा करने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फंड भी इकट्ठा किया जा रहा है। दरअसल, पंजाब के कई राजनेता अपने तात्कालिक लाभ के लिए कट्टरपंथियों की मांगों के आगे घुटने टेकते रहे हैं। पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या के दोषी रजोआना और दिल्ली बम धमाके के दोषी भुल्लर को फांसी न देने के लिए अकाली सरकार ने जिस तरह पंजाब विधानसभा में प्रस्ताव पारित कराया, उससे खालिस्तानियों को नई ताकत मिली। फिर अभी कांग्रेस की सरकार ने भी ईश निंदा कानून पारित करके उन्हीं तत्वों को संतुष्ट करने की कोशिश की। नतीजा सामने है। कश्मीरी आतंकी संगठनों के सदस्यों का भी पंजाब आना-जाना लगा ही रहता है। पंजाब में पिछले महीनों में दो आतंकी मॉड्यूल तोड़े गए हैं, लेकिन अभी एक दर्जन और मॉड्यूल होने की आशंका जताई जा रही है। पंजाब पुलिस अपनी मुस्तैदी से राज्य में आतंकवाद को फिर से पैर जमाने से रोक सकती है, लेकिन यह तभी संभव है, जब पंजाबी राजनीति के तीनों प्रमुख धड़े कांग्रेस, अकाली दल और आम आदमी पार्टी इस मामले में सहमति बनाकर चलें। पाकिस्तान में उम्मीद की किरण पिछले दिनों भारतीय उपमहाद्वीप में बेहद दिलचस्प परिदृश्य देखने को मिला। महाद्वीप के दोनों बड़े देशों भारत और पाकिस्तान में बहुसंख्यक समुदायों के धार्मिक कट्टरपंथी समूह अपने-अपने यहां की न्यायपालिका को खुलेआम चुनौती देते और कतिपय मामलों में उसके फैसलों की धज्जियां बिखेरते देखे गए। यह तो था परिदृश्य का एक भाग। इसमें कोई विरोधाभास नहीं रहा। परिदृश्य का दूसरा भाग इसके ठीक उलट रहा। दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत में जहां सरकार के मंत्री, सत्तारूढ़ दल और उसके सहमना संगठन कट्टरपंथियों के सुर में सुर मिलाते हुए न्यायपालिका को जनभावनाओं के अनुरूप फैसले देने की नसीहत दे रहे थे तो वहीं धर्म की बुनियाद पर बने मुल्क पाकिस्तान की हुकूमत अपने यहां की न्यायपालिका के बचाव में खड़ी होकर कट्टरपंथियों की चुनौती का मुकाबला करती दिख रही थी। इस समूचे परिदृश्य का भारतीय हिस्सा जहां डराने और चिंता पैदा करने वाला है, वहीं पाकिस्तानी हिस्सा सुखद आश्चर्य पैदा करता है। दरअसल, पाकिस्तान का सत्ता प्रतिष्ठान अपने 70 वर्ष के इतिहास में पहली बार अपने मुल्क के दागदार अतीत से दो-दो हाथ करता नजर आ रहा है। पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने पिछले दिनों ईसाई महिला आसिया मसीह उर्फ आसिया बीबी को ईशनिंदा के एक मामले में बरी कर दिया। आसिया बीबी पर एक मुस्लिम महिला के साथ बातचीत के दौरान पैगंबर हजरत मोहम्मद के बारे में आपत्तिजनक टिप्पणी करने का आरोप था। ट्रायल कोर्ट और फिर हाई कोर्ट ने इस मामले में आसिया बीबी को मौत की सजा सुनाई थी। उसी सजा के खिलाफ अपील की सुनवाई करते हुए सर्वोच्च अदालत ने आसिया बीबी को अब बरी कर दिया। प्रधान न्यायाधीश मियां साकिब निसार की अगुआई वाली तीन सदस्यीय पीठ की ओर से आसिया को बरी करते हुए उसकी रिहाई का विस्तृत फैसला जस्टिस आसिफ सईद खोसा ने लिखा। उन्होंने अपने फैसले में कहा कि पैगंबर हजरत मोहम्मद या कुरआन का अपमान करने की सजा मौत या उम्र कैद है लेकिन इस जुर्म का गलत और झूठा इल्जाम अक्सर लगाया जाता है। अदालत ने अपने फैसले में मशाल खान और अयूब मसीह केस का हवाला देते हुए इस बात को भी रेखांकित किया कि पिछले 28 वर्षों में 62 अभियुक्तों को अदालत का फैसला आने से पहले ही कत्ल कर दिया गया। अदालत के इस फैसले का जहां देश के अमन और तरक्की पसंद लोगों ने सोशल मीडिया के माध्यम से समर्थन करते हुए इस कानून और इंसाफ की जीत बताया, वहीं कट्टरपंथी और आतंकवादी समूहों ने इस फैसले के खिलाफ देश के विभिन्न शहरों में विरोध प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों से निबटने के लिए पुलिस को धारा 144 लागू करनी पड़ी और आंसूगैस के गोले दागने पड़े। इन समूहों से जुड़े लोगों ने सुप्रीम कोर्ट के जजों को धमकियां और गालियां देते हुए उन्हें इस्लाम का दुश्मन करार दिया। इस सबके बीच कुछ मानवाधिकार संगठनों ने आसिया बीबी के बचाव में सामने आकर सरकार से अनुरोध किया कि आसिया के परिवार और उनके वकील की सुरक्षा का पुख्ता बंदोबस्त किया जाए। इस पूरे मामले का सबसे बड़ा सुखद पहलु यह रहा कि कट्टरपंथियों की ओर से मिल रही धमकियों और गालियों के जवाब में सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश साकिब निसार ने दो टूक कहा कि वे मुसलमानों के नहीं, बल्कि देश की सुप्रीम कोर्ट के जज हैं और देश के गैर मुस्लिम नागरिकों के साथ इंसाफ करना भी उनका फर्ज है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने भी दृढतापूर्वक सुप्रीम कोर्ट के फैसले का समर्थन करते हुए कहा कि आसिया बीबी के मामले में जो लोग सुप्रीम कोर्ट के फैसले का विरोध कर रहे हैं, वे इस्लाम को नुकसान पहुंचा रहे हैं। उन्होंने न्यायाधीशों को मारने और सेना में बगावत का आह्वान करने वालों को देश विरोधी करार देते हुए चेतावनी दी कि वे हुकूमत को उस मुकाम तक पहुंचने के लिए मजबूर न करें, जहां उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई करने के अलावा कोई विकल्प न बचे। सरकार के इस रुख का विपक्ष ने भी समर्थन किया है। विपक्ष के नेता बिलावल भुट्टो ने नेशनल असेंबली में कहा कि उनकी पार्टी कट्टरपंथियों के खिलाफ पूरी तरह सरकार के साथ है। सिर्फ सरकार और विपक्ष ही नहीं, बल्कि पाकिस्तान के मीडिया ने भी इस मामले में पूरी तरह सुप्रीम कोर्ट के फैसले के पक्ष में खडे होकर सरकार से कहा कि वह ईशनिंदा कानून का दुरुपयोग रोकने और फर्जी आरोप लगाने वालों से निबटने के बारे में कारगर कदम उठाए। पाकिस्तान में इंसाफ और मानवाधिकार के पक्ष में तथा धार्मिक कट्टरपंथ के खिलाफ उठ रही ये आवाजें बताती हैं कि पाकिस्तान अपने बदनुमा अतीत से पीछा छुड़ाने के लिए किस कदर बेचैन है। उम्मीद की जानी चाहिए कि आने वाले दिनों में इस बेचैनी में इजाफा होगा और पाकिस्तान अपने अतीत के अंधेरे कुएं से बाहर निकलेगा।