दिसम्बर 2018

मूर्तियों को लेकर स्वामी दयानंद की 11 चेतावनियां

त्रिभुवन

यह ऐसा कालखंड है, जब पत्थर की मूर्तियां इस देश के जीवित नागरिकों की दुर्दशा पर भारी पड़ रही हैं। ऐसे दौर में उस साधु के विचार अवश्य पढ़े जाने चाहिए, जिसने मंदिरों और मूर्तियों के विरुद्ध पूरे भारत में घूम-घूमकर सिंह गर्जना की और इस पर प्रश्न उठाए। और बताया कि इस देश की सबसे बड़ी जरूरत क्या है और क्यों है।

यह मूर्तियों और मूर्तिपूजा के अन्धप्रेम में सुशिक्षित वर्ग तक के बहने और बहकने का एक आश्चर्यजनक दौर है। यह ऐसा कालखंड है, जब पत्थर की मूर्तियां इस देश के जीवित नागरिकों की दुर्दशा पर भारी पड़ रही हैं। गुजरात में सरदार पटेल की मूर्ति पर 3000 करोड़ खर्च किए गए हैं। शिवाजी की प्रतिमा महाराष्ट्र में बनाई जा रही है। इस पर 3600 करोड़ खर्च हो रहे हैं। एक स्वयम्भू सद्गुरु ने देश का गरलपान करने के बजाय शिव की 500 मीटर ऊंची प्रतिमा बना डाली है। मायावती ने हजारों करोड़ रुपए मूर्तियों पर बहा दिए। बेहतर होता अगर वे इस पैसे से आंबेडकर साहित्य इस देश के घर-घर में पहुंचा देतीं या हर दलित को शिक्षित करने के लिए इस पैसे का उपयोग करतीं। कांग्रेस ने तो मूर्तियों के नाम पर इस देश के भूमि और संसाधन ऐतिहासिक और अश्लील ढंग से नष्ट किए ही, कम्युनिस्ट भी किसी मूर्तिपूजक समुदाय से पीछे नहीं रहे। अगर गुजरात में सरदार वल्लभभाई पटेल और महाराष्ट्र में शिवाजी की प्रतिमाएं आवश्यक हैं तो राजस्थान में 5000 करोड़ की लागत से 5000 मीटर की महाराणा प्रताप की प्रतिमा तो होनी ही चाहिए। अजमेर में इतनी ही बड़ी प्रतिमा पृथ्वीराज चौहान, उदयपुर में महाराणा कुंभा, महाराणा सांगा, मीरा बाई और सर्वस्व त्यागी पन्ना धाय की प्रतिमाएं गगनचुंबी आकार की नहीं हों तो सब बदमजा है। मैं बाबा नानक, कबीर, दादू, बुल्लेशाह, कुंभनदास जैसे संतत्व का लगभग उपासक सा हूं, और मैं अगर मूर्ति लगाना चाहूं तो नानक की 10 हजार मीटर ऊंची मूर्ति ननकाना साहब में इस तरह स्थापित करवाऊं कि तेहरान में बैठे बंदे को भी वह दिखे और मक्का में बैठे हजयात्री को भी। वह गया से भी दिखे और हरिद्वार से भी या चार धाम से भी। कुछ मूर्तियां पुनर्जागरण के योद्धाओं की हों तो कुछ माइकेल मधुसूदन दत्त, काज़ी नजरुल इस्लाम, निराला और मुक्तिबोध जैसों की भी हों। ये कम से कम हज़ार-हज़ार मीटर की तो हों ही! अब बहुत से सुशिक्षितों को लग रहा है कि अगर राम मंदिर अयोध्या में नहीं बनेगा तो कहां बनेगा? ऐसे दौर में उस साधु के विचार अवश्य पढ़े जाने चाहिए, जिसने मंदिरों और मूर्तियों के विऱुद्ध पूरे भारत में घूम-घूमकर सिंह गर्जना की और इस पर प्रश्न उठाए। और बताया कि इस देश की सबसे बड़ी जरूरत क्या है और क्यों है। यह साधु कोई और नहीं दयानन्द सरस्वती था, जिसके स्वयम्भू आत्मविनाशी शिष्य और अनुयायी आजकल मूर्तिवत जड़त्व और पाखंड को प्राप्त कर साम्प्रदायिक मार्ग पर तीव्र वेग से दौड़ रहे हैं! भारतीय समाज के एक बड़े हिस्से की वैचारिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, मानसिक, आर्थिक और आचार संबंधी पतन का मूल कारण मूर्तियों और मूर्तिपूजा को बताते हुए स्वामी दयानंद सरस्वती नामक एक संन्यासी ने देश भर में घूम-घूमकर चेतावनियां दी थीं। इस साधु ने एक ग्रंथ लिखा "सत्यार्थ प्रकाश", जो बहुत विवादास्पद ग्रंथ है और इस पर समय-समय पर विभिन्न समुदाय प्रतिबंध लगाने की मांग भी करते हैं। लेकिन इसका मूर्तियों और मूर्तिपूजा से संबंधित हिस्सा आंखें खोलने वाला है। स्वामी दयानंद इस पुस्तक के 11वें अध्याय में लिखते हैं : मूर्तिपूजा की ये प्रमुख 11 बुराइयां हैं। जो भी मूर्तिपूजा करेगा या मंदिरों को मानेगा, वह इन बुराइयों से नहीं बचेगा। इन मूर्तियों, इन मंदिरों और इन मंदिरों के पैरोकारों के कारण ही भारत भूमि विदेशी आक्रांताओं और लुटेरों से पद दलित होती रही। भारत में जगह-जगह मंदिर व्यभिचार और अपव्यय का कारण बने हुए हैं। बहुत सारे लोग अपने आपको संत कहते हैं, लेकिन मूलत: उनके उद्देश्य कुछ और हैं। वे देश के भोले-भाले लोगों को बहका कर हमारा नुकसान करते हैं। उन्होंने चेताया : 1. मूर्ति पूजा करना परम अधर्म है। उस में करोड़ों रुपए मंदिरों में व्यय करके दरिद्र होते हैं। मंदिरों मं मूर्तियों के कारण प्रमाद होता है। अलबत्ता, ये मूर्तियां पुजारियों के लिए बहुत बड़े अर्थ और वित्त दोहन का कारण हैं। 2. स्त्री पुरुषों का मंदिरों में मेला लगा रहता है। चालाक लोग आस्था की आड़ में स्त्रियों को बहकाकर या उनकी विवशता का फायदा उठाकर व्यभिचार करते हैं। मूर्ति को ही ईश्वरीय शक्ति मानकर जब भोली-भाली स्त्रियां या किशोरी तरुणियां अध्यात्मक, तीर्थ या ईश्वर उपासना के लिए वहां आती हैं तो वे उन को भ्रमित कर व्यभिचार करते हैं। पर पुरुषों के संग से दूषित करते हैं और इससे स्त्री और पुरुष के बीच जो सच्चा पवित्र प्रेम है, उसके आनंद को नष्ट कर देते हैं। 3. मंदिरों में ज्यादातर लड़ाई और बखेड़ा रहता है। रोग आदि उत्पन्न होते हैं। मूर्ति पूजा को ही धर्म, अर्थ, काम और मुक्ति का साधन मानकर पुरुषार्थ रहित होकर मनुष्य जन्म व्यर्थ गंवाते हैं। 4. नाना प्रकार की और एक-दूसरे के विपरीत स्वरूप और नाम से युक्त और अन्य अन्य चरित्र युक्त मूर्तियों के कारण पुजारी लोग देश की एकता को नष्ट करके एक-दूसरे के विरुद्ध मत में चलते हैं। ये आपस में वाद-विवाद और लड़ाई झगड़ा करके परस्पर फूट बढ़ाते हैं। देश का नाश करते हैं। लोगों के जीवन में अशांति पैदा करते हैं और गति और प्रगति को एकदम थाम देते हैं। 5. मूर्तियों के भरोसे बैठे रहते हैं। शत्रु का मुकाबला करने लायक रणनीति बनाने या शक्ति बढ़ाने के बजाय मंदिर में घंटा-पूंपूं मंत्र तंत्र करते रहते हैं। मूर्तियों की पूजा में ही अपना अभ्युदय और विजय मान बैठे रहते हैं। इसी से भारत का पराजय हुआ और देश तथा राज्य का स्वातंत्र्य हरण हुआ। देश का धन लूटा गया। सुख और चैन समाप्त किया गया। सब कुछ शत्रुओं के अधीन चला गया, लेकिन सीखा फिर भी नहीं और हमें पराधीन होकर भटियारी के टट्टू और कुम्हार के गधे के समान शत्रुओं के वश में कर दिया। एक दिन नहीं सोचा कि हमारी पीढ़ियां किस तरह नाना विधि दु:ख पाएंगी और अश्रु विगलित जीवन जिएंगी। 6. ये जो मूर्तियों के पत्थर हैं। ये जो पाषाण मूर्तियां हैं। ये सब दुष्ट बुद्धि वालों का सृजन हैं। ये मूर्तियां और मंदिर हमारी गुलामी के केंद्र हैं। आदमी इनके चक्कर में आकर मंदिर-मंदिर और देश-देशांतर घूमते घूमते दुख पाते हैं। धर्म, संसार और परमार्थ के काम को नष्ट करते हैं। 7. ये मूर्तियां चोरों आदि से पीड़ित कराती हैं। इनके नाम पर ठगवादी गिरोह पलते हैं। दुष्ट और लुटेरे लोग पुजारियों का रूप धरकर बैठ जाते हैं और धन का अपहरण करते हैं। इसके बाद ये लोग उस धन को वेश्याओं और पर-स्त्री गमन पर खर्च करते हैं। लड़ाई, भिड़ाई और बखेड़े चलते रहते हैं। 8. ये मूर्तियां दाता के मूल सुख को नष्ट कर देती हैं। इनके कारण लोग माता-पिता आदि माननीय, वंदनीय और पूजनीय सच्ची मूर्तियों को तो छोड़ देते हैं। उनकी उपेक्षा और अपमान करते हैं। और पाषाण आदि की मूर्तियों की पूजा करते हैं। कोई इन नकली मूर्तियों को तोड़-फोड़ देता है तो या चोर ले जाता है तो हा-हा करके रोते रहते हैं, लेकिन घर में या देश में जो मानवीय स्वरूप की सच्ची मूर्तियां हैं, वे भूखे-प्यासे भी मर जाएं तो उनकी किसी को फिक्र नहीं होती। क्या यह परम पिता परमात्मा की बनाई सृष्टि के प्रति द्रोह नहीं है? 9. सदैव ही पाषाण की मूर्तियों का चिंतन करने से आदमी जड़त्व को प्राप्त होता है। जड़ का निरंतर चिंतन करके आत्मा भी जड़त्व को प्राप्त हो जाती है और देश में विद्या और विज्ञान की उन्नति रुक जाती है। अविद्या आकर घर में जड़ जमा लेती है। बुद्धि भी जड़ हो जाती है। मूर्तिपूजा एक तरह से जड़ता का मार्ग है। जड़त्व धर्म के अंतःकरण को नष्ट कर देता है और आत्मा में आया जड़त्व विनाश का कारण बनता है। 10. प्रकृति ने बहुत से सुगंधि युक्त पुष्प वल्लरियां और बेलें आदि बनाई हैं। वायु बनाई है। जल बनाया है। लेकिन इन मूर्तियों के कारण होने वाली भीड़-भाड़ और दुर्गंध इन सब चीजों की आरोग्यता को नष्ट कर देती है और वातावरण को दूषित बनाती है। हम मृत लोगों की अस्थियां गंगा में बहाकर उसकी पवित्रता को नष्ट कर रहे हैं। हम पौधों से पुष्पों को तोड़कर उनका जीवन नष्ट करते हैं। अगर यही पुष्प जीवंत रहते तो वातावरण को सुवासित करते, लेकिन इन्हें तोड़कर मूर्तियों पर अर्पित कर दिया तो ये दुर्गंध फैलाते हैं और वातावरण दूषित करते हैं। क्या परमात्मा ने ये फूल इन पत्थरों पर चढ़ाने के लिए बनाए हैं? क्या प्रकृति ने पुष्प, चंदन और दूध जैसे पदार्थ इन प्रतिमाओं पर चढ़ाकर नष्ट करने और नदियों, निर्झरों और सुरम्य स्थलों का प्राकृतिक और नैसर्गिक सौंदर्य को प्रदूषित करने के लिए बनाया था? 11. अगर कोई सच्ची मूर्ति पूजा है या कोई मूर्ति इस धरती पर पूजनीय है तो वह माता की है। किसी भी संतान के लिए माता से बढ़कर पूजनीय क्या होगा? दूसरी पूजनीय प्रतिमा पिता हैं। पिता का सम्मान करना। माता-पिता की सेवा करनी। उन्हें सदैव प्रसन्न रखना। उनकी तन, मन और धन से सेवा करनी। कभी अप्रिय वचन नहीं बोलना। सदैव मधुर व्यवहार करना और उनकी समुचित आज्ञाओं का सम्यक पालन करना। पति-पत्नी के माता-पिता के प्रति सदैव वैसा ही आदर करें और पत्नी भी सदैव अपने पति के माता-पिता के प्रति आदर रखे। इसके बाद अगर कोई सम्मानीय देवता है तो वह आपका गुरु है। शिक्षक है। और अंत में जो विद्वान अतिथि है, वह पूजनीय यानी सम्माननीय है। उसका सम्मान करें। सदव्यवहार करें। पांचवां सम्मानीय पत्नी के लिए पति और पति के लिए पत्नी है। ये दोनों परस्पर सदैव एक-दूसरे का विश्वास बनाए रखें और प्रेम और प्रतिष्ठा से आपूरित रहें। इनकी सेवा न करके जो पाषाण आदिमूर्ति पूजते हैं, वे वेद विरोधी आचरण करते हैं। शासक वर्ग के लिए पूजनीय प्रतिमा प्रजा है। वह उसके कल्याण और परोपकार के लिए जो भी कर सके,करे। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। उदयपुर में रहते हैं)