दिसम्बर 2018

लैंगिक सौहार्द की राह में

डॉ. रश्मि रावत

हम 21वीं सदी में जी रहे हैं और अब वह समय आ गया है] जब समाज को इस गलत अवधारणा से मुक्ति पा लेना चाहिए कि सिर्फ लड़कियों को संस्कारवान बना कर ही उनके लिए सुरक्षित वातावरण तैयार किया जा सकता है। यह पूरी तरह विज्ञान का युग है, जिसमें जीवनयापन की परिभाषा ही बदल गई है, लिहाजा हमें लिंग संवेदीकरण पर पुनर्विचार करते हुए एक ऐसे समाज को गढ़ने की दिशा में आगे बढ़ना होगा, जहां लैंगिक सौहार्द भावना हो और स्त्री-पुरुष के बीच असमानता की कोई दीवार न हो।

यह एक अच्छा संकेत है कि वर्तमान समय में जेंडर सैंसिटाइजेशन (लिंग संवेदीकरण) की जरूरत बहुत जोर-शोर से महसूस की जा रही है। हर स्तर पर लैंगिक सौहार्द कायम होने से ही स्वस्थ समाज विकसित हो सकता है। लैंगिक विषमता एवम लैंगिक सद्भाव के प्रति संवेदित व्यक्ति ही एक पूर्ण व्यक्ति और लोकतंत्र का काबिल नागरिक हो सकता है। संविधान प्रदत्त अधिकार, स्वतंत्रता और मानवाधिकार को हासिल करने की पूर्व शर्त है मानव होना। भेदभावग्रस्त होकर, खंडित होकर पूर्ण मनुष्य कैसे हुआ जा सकता है? सभ्यता की अब तक की यात्रा कुछ इस तरह की रही है कि स्त्री-पुरुष दोनों ही समाज में वांछित भूमिका निभाने के क्रम में आदमियत की पटरी से उतर गए हैं। समाज प्रदत्त ये भूमिकाएँ अपनी-अपनी प्रवृत्तियों और जरूरतों के मुताबिक बदली जा सकती हैं और बदली जाती भी हैं। यह अकाट्य सच नहीं है जिसे बदला न जा सके और वांछित दिशा में बदले जाने में व्यक्ति और समाज की भलाई है, इस बात का बोध समतामूलक समाज की राह में उठा पहला कदम हो सकता है। स्त्री-पुरुष दोनों को ही सचेतन प्रयास से निरंतर लैंगिक संवेदना अपने भीतर जगानी है। जो जहाँ है, उसे वहीं उसी स्तर से क्रमिक रूप से आगे बढ़ते जाना है। यह तो साफ समझ में आने वाली बात शायद हो गई है कि लैंगिक रूप से संवेदित होना सिर्फ स्त्री-मुक्ति का प्रश्न नहीं है। यह मानव-मुक्ति का सवाल है। पूरे समाज का हित इसमें निहित है। खुद अपने आप को, अपने अस्तित्व को, अपने व्यक्तित्व को भी लैंगिक संवेदना के बिना समझा नहीं जा सकता। खुद अपनी धुरी में होने के लिए भी समाज में व्याप्त विषमता को समझ कर समभाव की चेतना का जगना जरूरी है। आजकल स्कूलों, कॉलेजों, संस्थानों, विभिन्न कार्य-समूहों में जोर-शोर से लैंगिक सद्भाव के कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। पर्यावरण, स्त्री अध्ययन, मानवाधिकार जैसे विषय पाठ्यक्रम का हिस्सा हैं। इससे लैंगिक सरोकार के लिए मानसिक पृष्ठभूमि तो बन ही जाती है। बौद्धिक जगत में लैंगिक संवेदना अहम भूमिका निरंतर निभा रही है। जेंडर विशेष के विशेषाधिकारों को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष ढंग से प्रदर्शित करने वाली किताबों की विषय-वस्तु में बदलाव किए गए हैं और किए जा रहे हैं। प्राथमिक स्तर पर ही ककहरा सीखते वक्त ही क, ख, ग के साथ लगी तस्वीरें और कविताएँ बच्चों को जेंडर की बँधी-बँधाई समझ पैदा कर देती हैं। मानव विज्ञान की पुस्तकों में भी स्त्री-पुरुष की रूढ़ भूमिकाओं को नकारा जा रहा है। मानवीय संवेदना की बेहतर समझ वाली विषय-वस्तु को स्थान दिया गया है। मसलन रोने, हँसने जैसे सहज मानवीय भाव जेंडर आधारित नहीं हैं। लड़के भी रो सकते हैं। घर के सभी काम कर सकते हैं। अच्छे नर्स, प्राइमरी टीचर, विमान परिचारक हो सकते हैं। अच्छे वक्ता और कोमल सहृदय इंसान हो सकते हैं। लड़कियाँ भी बल्ब बदलने से लेकर अंतरिक्ष तक की यात्रा करने तक सभी काम कर सकती हैं। लड़ाकू विमान चला सकती हैं। कोई सा भी खेल खेल सकती हैं। गणितज्ञ बन सकती हैं। वस्तुनिष्ठ रवैये वाली साहसी, दृढ़ संकल्पी व्यक्ति हो सकती हैं। प्रकृति ने शारीरिक, जैविक स्तर पर स्त्री और पुरुष को भिन्न बनाया है, पर वरीयता क्रम में एक को दूसरे से बेहतर या कमतर बनाने का काम समाज की देन है। स्वाभाविक मानवीय गुणों से प्रकृति ने स्त्री-पुरुष दोनों को नवाजा है। किंतु समाज ने गुणों का बँटवारा सा कर लिया। एक खास तरह के गुणों को विकसित करने की अपेक्षा स्त्रियों से की जाती है और दूसरी तरह के गुणों को धारण करने की जिम्मेदारी पुरुषों के कंधों पर डाल दी गई है। लम्बे समय से जब ऐसा होता आया तो ये अर्जित गुण प्राकृतिक सच्चाई की तरह स्थापित हो गए और बहुसंख्यक समाज के मन में बैठ गया कि इन्हें बदला नहीं जा सकता। पुलिस अधिकारियों की एक कार्यशाला में जेंडर सैंसिटाइजेशन के मुद्दे पर आपस में संवाद करने का अवसर मिला तो दोनों ही पक्षों को दिलचस्प अनुभव हुए। यूँ तो जिंदगी की एकदम शुरुआत से ही समरसता की बुनियाद डालना और समाज में व्याप्त विषमता की समझ विकसित करना ही सबसे अधिक कारगर हो सकता है। इस प्रक्रिया से छूट गए लोगों के लिए लैंगिक सरोकार को उनके निजी और सार्वजनिक जीवन का अंग बनाने की कितनी अधिक आवश्यकता है इस कार्यशाला के दौरान और बेहतर से ढंग से जाना। हर तरह के व्यवसाय के प्रशिक्षण में लैंगिक सौहार्द की शिक्षा शामिल होनी चाहिए। कार्य के क्रियान्वयन के लिए जो बुनियादी सिद्धांत या शपथ ली जाती हैं, उसमें लैंगिक सरोकारों को समंजित कर लेना चाहिए। इससे लैंगिक संवेदनशीलता का महत्व रेखांकित होगा और यह जाने-अनजाने चेतना का हिस्सा बनता जाएगा। हमारे समाज में पुरुष समाजीकरण की प्रक्रिया में 'अति पुरुष' बना दिए जाते हैं और स्त्रियाँ अति स्त्रियाँ। पितृसत्तात्मकता घर से लेकर बाहर तक सब जगह मौजूद है। तो कोई भी विभाग उससे कैसे बचा रह सकता है। औपनिवेशिक भारत के दमनकारी नियमों के तहत क्रियारत पुलिस सेवाओं में आज भी बहुत अधिक बदलाव नहीं आया है। इतनी अधिक जनसंख्या के अनुपात में पुलिस बल यूँ ही कम रहा है। दिन-प्रतिदिन पुलिस के दायित्व में बढ़ोतरी होती जा रही है। महिला सैन्य बल की संख्या तो उस अनुपात में बहुत ही कम है, जितनी उनकी जरूरत रहती है। इन सब स्थितियों के मद्देनजर पुलिस पर कार्यभार और तरह-तरह के दबाव बहुत हैं। ऐसा महसूस होता है कि पुलिस की वर्दी पहन कर तो वे और भी अधिक 'अति पुरुष' हो जाते हैं। इस जेंडर रोल को वहन करने की कीमत उनकी महिला सहकर्मियों, पुलिस से डरने वाली जनता को तो चुकानी पड़ती है ही, पर पुलिस कर्मी को भी लगातार अपने व्यक्तित्व में यह अतिरिक्त बोझ वहन करना, उनके सहज ढंग से जीने में बाधा बनता है। कार्यशाला के दौरान सैन्य अधिकारियों ने महसूस किया कि अगर अपने से इतर लिंग की जरूरतों, उनकी सामर्थ्य, उनकी सीमा के लिए वे संवेदनशीलता और समझदारी का रुख अपनाएँ तो अपने खुद के साथ भी वे सहज रिश्ता बना पाएंगे। परिणामस्वरूप जनता के साथ भी विनम्रता से पेश आने के लिए उनका मानसिक, व्यवहारिक प्रशिक्षण होगा। इससे उनकी समाज में छवि सुधरेगी और जनता भी पुलिस का अधिकाधिक सहयोग करेगी। जेंडर सैंसिटाइजेशन के सत्र में परस्पर संवाद और रोल प्ले से स्वाभाविक रूप से ये बातें सामने आईं कि डर और परस्पर अविश्वास के स्थान पर प्रेम एवं सौहार्द से काम करने के लिए मानसिक साँचों में किस तरह के बदलाव लाने हैं। मौजूदा सोच में क्या चीजें जड़ जमाए बैठी हैं। उनके ढहे बिना चेतना में वांछित बदलाव नहीं आ सकते। दिमाग के मोटे ढेले सत्र के आगे बढ़ने के साथ खुद-ब-खुद टूटते गए और अंत तक लगा कि दिमाग की भुरभुरी सोंधी मिट्टी में नयी संवेदना के बीज डाले जा सकते हैं। पुलिस अधिकारियों के अपने अनुभव बताने के क्रम में सामने आया कि खुद उन्हें लैंगिक विषमता के कारण क्या दिक्कतें आती हैं। उनके अनुभवों को पूरी संवेदनशीलता और सहानुभूति के साथ सुने जाने पर खुद उनके दिमाग के भीतर से ही रूढ़ सोच में सेंध लगाने वाले तर्क उभरते दिखे। अपने अनुभव को अपने मुँह से जिम्मेदारी के साथ विस्तार से बोलने पर एक तो तार्किक असंगति सामने आ जाती है। दूसरा यह भी कि प्रगतिविरोधी जड़ स्थिति कायम रखी जाने पर जो समस्याएँ उत्पन्न होंगी, उनकी ओर ध्यान खुद चला जाता है। एक बार यह समझ आ जाए कि सबको अपने को संवेदित करने की जिम्मेदारी खुद लेनी है। दूसरे पक्ष की कमियाँ देखते रहने से अपना भी अहित है। यह थोड़ी सी शुरुआत भी बहुत बड़ा असर डालती है। खासतौर से पुलिस सेवाओं जैसी गत्यात्मक सेवाओं में जिनकी जिम्मेदारी भी बड़ी है और ताकत भी। लैंगिक सौहार्द को इतना महत्व देना कि अपने व्यस्त क्रियाकलाप के बीच में से उसके लिए समय निकालना। दिन के चंद घंटे केवल लैंगिक विषमता अथवा लैंगिक समरसता पर बात करना भी अपने आप में चेतना के ठहरे हुए जल में कंकड़ मारकर बदलाव स्वीकार करने की तरंगें पैदा करने में सक्षम होता है। उसके बाद जब स्त्री या पुरुष अपने को पीड़ित मानकर ही सही सच्चे, सजीव ढंग से अपनी व्यथा कहते हैं और विस्तार से बताते हैं कि खास जेंडर भूमिका में होने के कारण किस तरह से उन्हें अतिरिक्त जिम्मेदारी उठानी पड़ती है या दूसरे जेंडर को विशेषाधिकार मिलते हैं या स्त्री कर्मियों को किस तरह संकुचित होकर रहना पड़ता है क्योंकि उनकी संख्या बहुत ही कम होती है। विस्तृत विवरण देने के क्रम में वे खुद बोल जाते हैं कि खास जेंडर रोल समाज द्वारा तय किए गए हैं। जिसके फायदे और नुकसान एक या दूसरे को होते हैं और आपसी समझ से इन भूमिकाओं में लचक लाई जा सकती है। ये स्थिर वास्तविकताएँ नहीं हैं। व्यक्ति के भरपूर योगदान और विकास के लिए इसमें बदलाव की दरकार है। सोच के इस पड़ाव तक पहुँचने के बाद इस आशय की बातें पॉवर प्वाइंट प्रदर्शन द्वारा आसान भाषा में प्रस्तुत करने पर मैंने पाया कि पूरी तरह उन्हें समझा और सराहा गया कि लैंगिक विषमता की शुरुआत किस तरह हुई। कैसे ज्ञान और समाज की तमाम संरचनाओं में पितृसत्ता इस स्वाभाविक तरह से पैठ गई कि लगा कि जैसे वस्तुनिष्ठता का यही तकाजा है जो कहा जा रहा है, लिखा जा रहा है, जिया जा रहा है। किंतु इस पूरी प्रक्रिया में पुरुष ही ज्ञान का कर्ता भी था और लक्ष्य भी। इसलिए इस ज्ञान और व्यवहार से समाज में भेद पड़ गया। और इस भेद के कारण मनुष्य अपने वास्तविक अस्तित्व से दूर छिटक गया। उसे समाज द्वारा अपेक्षित जेंडर रोल को ग्रहण करने के कारण अपनी बहुत सी ऊर्जा लगानी पड़ती है। इससे उसके चयन की स्वतंत्रता भी बाधित होती है और सामर्थ्य भी कम होती है। अब इस भेदभाव को समझ कर क्रमिक ढंग से दूर करने की भी जरूरत है। स्त्री और पुरुष दोनों ज्ञान और क्रियान्वयन के केंद्र में होने चाहिए और दोनों ही कर्ता। यह आदर्श स्थिति है, किंतु सभ्यता के लम्बे विषमता के इतिहास के कारण इसमें अभी काफी समय लगेगा। और इस संक्रमणशील दौर में कुछ अवांछित अनुभव भी हो सकते हैं। स्वस्थ समाज रचने के लिए हर समय के लोगों को कुछ कीमत चुकानी पड़ती है और इसके पुरस्कार भी मिलते हैं। जीवंत कार्यशाला के अनुभवों से जाना कि जहाँ सभ्यता के विषम इतिहास और उसके परिणामों को लेकर अज्ञान है। वहाँ चेतना में इतना भर जोड़ना कि परम्परा प्रदत्त ज्ञान प्रणालियों और सामाजिक भूमिकाओं पर प्रश्न खड़े किए जा सकते हैं, बहुत फर्क डालता है। बातचीत से उभर कर यह भी सामने आया कि विषमता और आतंक भाषा की कोख में पलता है इसलिए भाषा को नर्म, मानवीय और जेंडर संवेदित बनाने की बहुत जरूरत है। पुलिस के मुख्य सिद्धांतों में जेंडर सरोकारों का समायोजन कारगर होगा। कार्यशाला के दौरान ठोस यथार्थ को समझने का अवसर मिला और महसूस हुआ कि अकादमिक से जुड़े लोगों का अपने दायरे से बाहर निकल कर काम करना उनकी बौद्धिक समझ को भी पुख्ता करेगा। सिद्धांत को व्यवहार रूप में लाने की कुछ समझ शायद नए इलाकों में काम करने से पैदा हो। बौद्धिक जगत अपनी खुद की ट्रैप में फँस सा जाता है। सब कुछ जानते हुए भी बदलाव की ओर उद्यत नहीं होता। इस तरह आज के सबसे बड़े सरोकार लैंगिक सौहार्द कायम करने की दिशा में इस कार्यशाला ने दो तरफा भूमिका निभाई और दोनों पक्षों ने एक-दूसरे से सीखा। उम्मीद है कि इस तरह के अभ्यास बदस्तूर जारी रहेंगे। (लेखिका दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापन के साथ ही विभिन्न साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं के लिए नियमित लिखती हैं)