दिसम्बर 2018

उम्मीद! तुम अब अधमरा शब्द हो

कनक तिवारी

बार बार वादा होता है। महंगाई मिटेगी। पिछले सत्तर वर्षों में महंगाई का सूचकांक ऊपर की ओर रहा है। पांच रुपये से कम में घी खरीदने वाले बुजुर्ग अनुभव पांच रुपये में चाय का कप भी नहीं पी सकते। खाद्यान्न, डीजल, पेट्रोल, रसोई गैस, रेल और बस की टिकटें, अस्पताल और स्कूल का खर्च सब में इजाफा हो रहा है। फिर भी घोषणापत्र समझा रहे हैं। अभी वोट दीजिए। अगले पच्चीस वर्षों में रामराज्य आ जाएगा। यह कैसा लोकतंत्र है?

पांच विधानसभाओं के चुनाव हो रहे हैं। अगले साल मई में लोकसभा चुनाव होंगे। पांच वर्षों में होने वाली विधायिकाओं के चुनाव उसी तरह हैं जैसे डायबिटीज़ का बीमार हर तीन महीने में खून में घुल रही अवांछित शक्कर की मात्रा की जांच कराता हो। अब तो लगता है लोकतंत्र दिल के मरीज की तरह है। चुनाव उसके लिए एंजियोग्राफी, एंजियोप्लास्टी या बाइपास सर्जरी करता जिंदा या मुर्दा रहने के बीच की चुनौतियां खंगालने आता है। हर पार्टी और उम्मीदवार का चुनावी झूठ धार्मिक वादों की तरह होता है। जैसे पति-पत्नी होते शादी की औपचारिक रस्मों में कसम खाते हैं सात जन्मों तक साथ रहेंगे। एक-दूसरे के लिए हर कुरबानी करेंगे। चुनाव होली के त्योहार की तरह भी हो रहे हैं। होली में संकोच छोड़ मतदाता और जनता उम्मीदवारों को ठर्र भाषा में खरीखोटी सुनाते हैं। यह भाषा होली के दिन इस्तेमाल करने के लिए शब्दकोश से निकाल और तराश कर हर भारतीय कंठ में रख लेता है। लोकतंत्र को नहीं मालूम था धीरे-धीरे चुनावी उम्मीदवारों के जिस्म पर बेशर्मी की पपड़ी मोटी होती जाएगी। गेंडे की खाल भी उससे शर्माने लगी है। ये सब फब्तियां लोकोक्तियों की तरह जनता में लोकप्रिय हो रही हैं। दुख है लोकतंत्र के पवित्र मंदिर में चरित्रहीन पुजारियों और पंडों का भी कब्जा हो रहा है। वे उस मंदिर के भरभरा कर गिर जाने तक कब्जा क्या नहीं हटाएंगे? वादों की गठरी जनता के सिर और कंधों पर लादी जा रही है। सैकड़ों वादे राजनीतिक पार्टियों और उम्मीदवारों ने किए हैं। सबसे सताया हुआ वर्ग किसानों का है। पाकिस्तान को धूल चटाने के बाद गैरमहत्वाकांक्षी प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री ने 'जय जवान जय किसान' का नारा दिया था। उसका माकूल अर्थ उनके उत्तराधिकारी प्रधानमंत्री उसी अर्थ में समझ पाए होंगे, इसमें संदेह है। कोई राष्ट्रीय पुख्ता किसान नीति नहीं है, जिससे भारतीय कृषि को सम्मान और संपत्ति के पैमानों पर आत्मसम्मानी और समर्थ कहा जा सके। किसानों का कर्ज माफ किया जाए तो बड़प्पन काहे का? सरकारी जमावड़े में भ्रष्टाचार की सड़ांध लाइलाज हो रही है। सहकारी बैंकों की नीतियां और नियम किसानों के जिस्म तक को नोंच लेना चाहते हैं। खाद, बीज और पानी देने वाली एजेंसियों में भ्रष्टाचार के कीड़े कुलबुलाते रहते हैं। इसके बावजूद हर सरकार आंख के अंधों को नयनसुख कहती तरक्की देती रहती है। कमीशनखोर, आढ़तिए, दलाल, बिचौलिए जैसे शब्दों को धता बताते सहकारी और सरकारी मुलाजिम लूट के बाजार में आ गए हैं। यही हाल मजदूरों के इलाकों का है। मनमोहन सिंह और मोदी सरकारों ने मजदूर विरोधी बीसियों कानून रचे हैं। फिर भी देश में मजदूर आंदोलनों को बढ़ावा देने कांग्रेस और भाजपा के घोषणापत्रों की नाटकीयता की झूठ की चाशनी बहुत लुभावनी होती रहती है। पर्यावरण की दिखाऊ चिंता सभी पार्टियों को है। हंसी की बात है कि भारत की राजधानी दिल्ली में ही लोकतंत्र का पर्यावरण दम तोड़ रहा है। पता नहीं देश भर से आए चुनिंदा सांसद दिल्ली की जहरीली हवा में सांस लेकर किस तरह अपनी दिमागी हालत चुस्त-दुरुस्त रख पाते हैं। महिलाओं का सड़कों पर बलात्कार विधायकों, सांसदों, मंत्रियों तक ने किया है। राजभवनों में अय्याशी हुई हैं। हर मामले में सजा सिफर रही है। बलात्कारियों, लुटेरों, डकैतों, गिरहकटों की नस्ल के लोग राजनीतिक पार्टियों में आका बन गए हैं। जिन पत्तों पर तकिया था, वे ही हवा दे रहे हैं। बार-बार वादा होता है। महंगाई मिटेगी। पिछले सत्तर वर्षों में महंगाई का सूचकांक ऊपर की ओर रहा है। पांच रुपये से कम में घी खरीदने वाले बुजुर्ग अनुभव पांच रुपये में चाय का कप भी नहीं पी सकते। खाद्यान्न, डीजल, पेट्रोल, रसोई गैस, रेल और बस की टिकटें, अस्पताल और स्कूल का खर्च सब में इजाफा हो रहा है। फिर भी घोषणापत्र समझा रहे हैं। अभी वोट दीजिए। अगले पच्चीस वर्षों में रामराज्य आ जाएगा। यह कैसा लोकतंत्र है? जम्हूरियत के प्रतीक राम का मंदिर बनाने को सबसे बड़ा सर्वदलीय राजनीतिक शगल बना दिया गया है। 'इस्लाम खतरे में है'का नारा लगाते वे सब लामबंद हो जाते हैं, जिनके पूर्वज संविधान सभा में धर्मनिरपेक्षता लाने के लिए बौद्धिक और आध्यात्मिक संघर्ष कर रहे थे। अधिकतर विधायक और सांसद चुनाव जीतने के बाद डॉक्टर जैकिल और मिस्टर हाइड की कहानी की तरह भूमिका करते सरेआम पाखंड का नकाब ओढ़ लेते हैं। उनकी संपत्तियां, संततियां और संस्तुतियां दिन दूनी-रात चौगुनी तरक्की करती हैं। वे संवैधानिक कार्यों के लिए चुने जाते हैं। बस वही काम उन्हें करना न तो भाता है, न आता है। वह मुगलिया या मराठा दरबार के सूबेदारों की तरह अपने-अपने इलाकों में लोकतंत्र को 'मेरी मुर्गी की एक टांग' वाला मुहावरा सिखाते हैं। देश के लोग महान हैं। अब भी उम्मीद कर रहे हैं, आगे उनके सभी सपने यथार्थ में तब्दील होंगे। उनके सैकड़ों सपने पहले ही पानी के बुलबुलों की तरह फूट चुके हैं। लोग सपने देखना छोड़ देंगे तो जीवन तो दूभर हो जाएगा। वे जानते हैं उन्हें अपने सपनों की सीढ़ी चढ़ते ही रहना है। सपने जीवित रखते अगले चुनाव में वोट देने की अनिच्छा को राष्ट्रीय संवैधानिक कर्तव्य के कारण फिर कुचलना है। सब जानते हैं कौन जीतेगा और कौन मंत्री बनेगा। सब जानते हैं किस मंत्री के कौन-कौन दलाल बाजार में फल फूल रहे हैं। देश की दौलत अंगरेजों ने खुलेआम लूटी है। देश की दौलत बल्कि उसकी प्रतिष्ठा अब भी तो लुट रही है। चोर-डकैतों से अपनी रक्षा करना जरूरी होता है। जब बाड़ ही खेत को खाने लगे, तब लोकतंत्र के खेत की रक्षा कौन करेगा। जनता लोकतंत्र की उपज या फसल नहीं बची है। उसे खरपतवार समझ लिया गया है। लोकतंत्र के पवित्र मंदिर पर सियासी पेशेवर साधुओं का कब्जा है। वे भारत के ऋषियों के नाम कलंकित करते धर्म बाजार के दलाल हैं। नन्हीं बच्चियों के कौमार्य को कुचलते हैं। कई तो अय्याशियां करते हथियारों के अंतर्राष्ट्रीय तस्करों से भी गलबहियां करते रहे हैं। कई देश में नदियों, विचारों, संस्थाओं, व्यक्तियों सब में खुरापात का प्रदूषण फैला रहे हैं। ऑक्सीजन लोकतंत्र के जीवन की सांस के लिए जरूरी है। ऑक्सीजन के साथ कई दूषित हवाएं और गैसें घुल-मिल गई हैं। जिंदगी के बरक्स वे सब जनता के लिए नाउम्मीदी की बहनें हैं। फिर भी लोकतंत्र सिखाता है उम्मीदजदा रहो। (लेखक वरिष्ठ टिप्पणीकार हैं। बिलासपुर में रहते हैं)