दिसम्बर 2018

असली मुद्दे तो उठे ही नहीं

अनिल सिन्हा

पैदा होते ही मरने वाले बच्चों, गर्भ में ही मार दी जाने वाली बच्चियों, स्कूल तक पहुचने में नाकामयाब बच्चों, आदिवासी-दलितों उसकी पीड़ा या खुदकुशी का रास्ता अपनाने वाले किसानों की संख्या कम करने में सरकारें नाकाम रही हैं। भले ही, अखबारों और चैनलों को रोजगार की उम्मीद में बैठे नौजवान और उसकी पीड़ा में सहभागी परिवार की कहानी में मजा नहीं आए और सोशल मीडिया में इसे लेकर कोई बवाल नहीं मचता हो, लेकिन यह हमारे अर्थतंत्र के फेल होने की सच्चाई बयान करता है। क्या विधानसभा चुनाव इन मुद्दों को सामने लाने और उन पर सोचने का गंभीर माहौल बनाने में कामयाब हो पाए।

जब भी किसी बड़े चुनाव का मौका आता है तो लोग राजनीति में बड़े बदलाव की उम्मीद करने लगते हैं। अब तो लोगों की बैचेनी इतनी बढ़ गई है कि एक राज्य विधान सभा के चुनाव हों या लोकसभा के उपचुनाव, लोग टकटकी लगा कर देखने लगते हैं। गुजरात और कर्नाटक के विधानसभा चुनावों या गोरखपुर के लोकसभा उपचुनाव में हम लोगों की दिलचस्पी देख चुके हैं। पांच राज्यों के विधान सभा चुनावों के साथ भी ऐसा ही था। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के चुनाव सिर्फ इसलिए महत्वपूर्ण नहीं माने जाने चाहिए कि यहां भारतीय जनता पार्टी सत्ता में हैं। ये राज्य इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं कि देश की बदहाली की पूरी तस्वीर पेश करते हैं । पैदा होते ही मरने वाले बच्चों, गर्भ में ही मार दी जाने वाली बच्चियों, स्कूल तक पहुचने में नाकामयाब बच्चों, बरसों से आजादी का अर्थ समझने की कोशिश कर रहे आदिवासी-दलितों उसकी पीड़ा या खुदकुशी का रास्ता अपनाने वाले किसानों की संख्या कम करने में सरकारें नाकाम रही हैं। भले ही, अखबारों और चैनलों को रोजगार की उम्मीद में बैठे नौजवान और उसकी पीड़ा में सहभागी परिवार की कहानी में मजा नहीं आए और सोशल मीडिया में इसे लेकर कोई बवाल नहीं मचता हो, यह हमारे अर्थतंत्र के फेल होने की सच्चाई बयान करता है। क्या विधानसभा के चुनाव इन मुद्दों को सामने लाने और उन पर सोचने का गंभीर माहौल बनाने में कामयाब हो पाए? दिल पर हाथ लेकर नेता लोग बोलें तो वे ही कह देंगे कि ऐसा नहीं हो पाया। अगर थोड़ी और ईमानदारी दिखाएंगे तो वे स्वीकार कर लेंगे कि वे ऐसा चाहते भी नहीं थे। क्या लोगों के मुद्दे इतने जटिल और साधारण आंखों की हद से बाहर थे कि नेताओं की नजर नहीं पड़ सके? क्या इनके समाधान उनके हाथ में नहीं थे? अगर गौर से देखें तो देश की हालत क्या है यह सबके सामने है। सबसे बड़ी बात यह है कि पिछले साढ़े चार सालों में लोगों की पीड़ा दूर करने के औजारों को नष्ट करने का काम इतनी तेजी से हुआ है कि इन औजारों या यानी लोकतंत्र की संस्थाओं को बचाने का मुद्दा पहले नंबर पर होना चाहिए था। लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। संस्थाएं इस तरह धड़धड़ा टूटी हैं कि जब आने वाली पीढ़ी इतिहास पढ़ेगी तो चैंके बगैर नहीं रह पाएगी। उसे मुहम्मद तुगलक की याद आएगी जिसने सल्तनत की राजधानी दिल्ली से हटाकर दौलताबाद ले जाने का फैसला किया था। राजधानी ही नहीं, राजधानी में रहने वाली आबादी को कूच करने का हुक्म उसने दिया था। वैसे इतिहासकार बताते हैं कि उसके इस फैसले के पीछे भी कुछ तर्क था। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नोटबंदी का फैसला उससे भी बुरा था। केवल नोटबंदी के फैसले से यह समझ में आ सकता है कि भाजपा के मन में लोकतांत्रिक संस्थाओं की कितनी कद्र है। इस फैसले से मोदी ने एक साथ रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया, वित्त मंत्रालय और कैबिनेट की हैसियत कम कर दी। करेंसी के चलन को नियंत्रित करने का पूरा अधिकार रिजर्व बैंक को है। लेकिन उसके इस अधिकार को एक झटके में छीन लिया गया। सीबीआई और आयकर विभाग की हालत भी वही कर दी गई। सीबीआई के मामले में तो विस्फोट ही हो गया और सुप्रीम कोर्ट को दखल देना पड़ा। संस्थाओं को नुकसान पहुंचाने का काम योजना आयोग को खत्म करने से शुरू हुआ। योजना आयोग देश के कमजोर तबकों की पीड़ा को पहचानने और उसे दूर करने का काम करता था। वह पता लगाता था कि गरीबी की हालत क्या है और मानव सूचकांक पर लोगों की हालत क्या है। वह बताता था कि आदिवासी और दलितों की हालत कैसे सुधरेगी। इसके ठीक उलट, उसकी जगह आया नीति आयोग अमीरों को फायदा पहुंचाने का काम करता है। वह देश के संसाधन को पूंजी वालों के हाथ में देने के उपाय निकालता है। उसने रेलवे बोर्ड की ताकत कम करने से लेकर बीमा कंपनियों को फायदा पहुंचाने वाले आयुष्मान भारत की योजना तैयार करने का काम तो कर लिया, लेकिन किसानों को खुदकुशी से बचाने और कर्ज माफ करने का कोई तरीका नहीं निकाल पाया। राफेल लड़ाकू विमान के जिस घोटाले की इतनी चर्चा है, उसके पीछे भी संस्थाओं का नष्ट होना है। मोदी ने कैबिनेट कमेटी और रक्षा मंत्रालय को पूरी तरह किनारे कर दिया। मंत्रियों की हालत तो ऐसी हो गई है कि सीबीआई में तैनात आईपीएस के अधिकरियों के तबादले में गृहमंत्री की कोई भूमिका नहीं थी और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवाल उसका फैसला ले रहे थे। कश्मीर में राष्ट्रपति शासन लगाने के समय यही हुआ। डोवाल और अमित शाह ने फैसला ले लिया और राजनाथ सिंह कहीं नजर नहीं आए। लोकतंत्र को कमजोर करने का काम सिर्फ संस्थाओं को उजाड़ने में नजर नहीं आता बल्कि हिंदुत्व के जरिए भी हो रहा है। गोरक्षकों का उन्माद इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। ऊपर से देखने पर ये हमले हिंसा की कुछ बिखरी घटनाओं सी लगें, लेकिन इसने मुसलमानों पर ऐसा विपरीत मनोवैज्ञानिक असर डाला है जैसा असर देश के विभाजन ने भी नहीं डाला। मुसलमान बाबरी मस्जिद ढहाने की हिंसा के बाद से ही धीरे-धीरे मुख्यधारा से बाहर होते गए और गोरक्षकों के हमले और लवजिहाद के झूठ ने उन्हें और भी किनारे कर दिया। वास्तव में, आज भारत की आम जिंदगी में मुसलमान कोई हैसियत नहीं रखता। यह सही है कि माओवादी हिंसा का से देश को बदलने का कोई रास्ता नहीं निकला है। इसने आदिवासियों को भी कोई लाभ नहीं पहुंचाया है। उनके संसाधन को लूटने का सिलसिला भी कहीं से कम नहीं हुआ है। लेकिन माओवादी हिंसा से जोड़ कर सुधा भारद्वाज जैसे लोगों को जेल भेजने का काम लोकतंत्र को कमजोर करने का ही एक तरीका है। इससे मानवाधिकारों की लड़ाई लड़ने वालों का काम और मुश्किल हुआ है। आदिवासियों और दलितों के लिए लड़ने वाले समाजवादियों, गांधीवादियों और मार्क्सवादियों की बड़ी फौज देश में मौजूद है। शहरी नक्सलवाद का नाम देकर उन्हें रास्ते से हटाने का काम हो रहा है। क्या विप़क्षी पार्टियां इन चुनौतियों का सामना करने में सक्षम हैं? अगर पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में हुए चुनाव प्रचार पर नजर डालें तो इसका उत्तर नकारात्मक ही आएगा। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को इस बात का श्रेय अवश्य दिया जाना चाहिए कि उन्होंने इन मुद्दों पर संवेदनशीलता का परिचय दिया है। वह रोहित वेमुला के मामले से लेकर सुधा भारद्वाज के मामले में जरूरी विरोध दर्शाते रहे हैं। चुनावों के दौरान भी उन्होंने नोटबंदी और सीबीआई का मामला उठा कर संस्थाओं को नष्ट करने के मामले को मुद्दा बनाया। इसी तरह उन्होंने राफेल के सौदे, सीबीआई के विवाद और विजय माल्या तथा नीरव मोदी के विदेश भागने को लेकर मोदी सरकार को जमकर घेरा। लेकिन इन मुद्दों को एक सही दिशा में ले जाने में वह सफल नहीं हो पाए। भ्रष्टाचार का ही मामला तो उन्हें लोकपाल और सूचना अधिकार कानून को ढीला करने जैसे मामलों को जनता के सामने लाना चाहिए। यह वादा करना चाहिए था कि उनकी सरकारें इन कानूनों को मजबूती देंगी। राहुल ने किसानों की आत्महत्या और बेरोजगारी जैसे अर्थव्यवस्था के मुद्दों को लेकर भी मोदी सरकार पर तीखे हमले किए और इनके समाधान का भरोसा भी लोगों को दिया है। लेकिन क्या इतना काफी है। देश की अर्थव्यवस्था की असलियत का अंदाजा तो रुपए की गिरती कीमत से होता है। रिजर्व बैंक से पैसे ले कर इसे उद्योगपतियों को कर्ज में देने की सरकार की कोशिश से भी पता चलता है कि अर्थव्यवस्था की हालत कितनी खराब है। राहुल नोटबंदी का मुद्दा उठा रहे हैं और इससे खुदरा कारोबार कर रहे लोगों की आजीविका छीनने की भी चर्चा कर रहे हैं, लेकिन इतने भर से बात बनती नहीं है। उदारीकरण और भूमंडलीकरण की आर्थिक नीतियों को लागू किए 28 वर्ष हो गए। क्या इसकी समीक्षा नहीं होनी चाहिए कि यह देश के करोड़ों मध्यवर्गीय और गरीब लोगों की समस्या हल नहीं कर सकी हैं? मुश्किल यह है कि राहुल उन्हीं लोगों से घिरे हैं जिन लोगों ने नई आर्थिक नीतियों की बुनियाद रखी है। मनमोहन सिंह से लेकर चिदंबरम तक एक बड़ी फौज है, जो इन नीतियों को बनाने वालों की है। उनके विचारों में परिवर्तन लाना राहुल गांधी के वश का नहीं है। लेकिन वह इतना जरूर कर सकते थे कि जनता को इन नीतियों के खिलाफ जागरूक करते। विधानसभा चुनावों ने उन्हें मौका दिया था, लेकिन वह इसका इस्तेमाल नहीं कर पाए। राहुल सबसे ज्यादा विफल हिंदुत्व से लड़ने में रहे। कमल नाथ जैसे उनके सिपहसालारों ने उन्हें हिंदू सिपाही बना दिया। उन्हें वे मंदिरों में तो घुमा ही लाए, उनसे यह भी घोषित करा दिया कि वे हिंदुत्ववादी नहीं हैं, लेकिन हिंदूवादी हैं। इन विचारों से वोट का फायदा कितना है, कहना मुश्किल है। लेकिन इससे सेकुलरिज्म का निश्चित तौर पर बड़ा नुकसान हुआ है। गोरक्षकों के उत्पात को उजागर करना जरूरी था ताकि लोग हिंदुत्व के नाम पर की जा रही हिंसा के खिलाफ खड़े हों और मुसलमानों को दी जा रही तकलीफ को समझें। उन्होंने ऐसा नहीं करके अपनी जिम्मेदारी के साथ अन्याय किया है। कांग्रेस ने राम मंदिर बनाने के नए अभियान के विरोध में भी मजबूत आवाज नहीं लगाई है। सुप्रीम कोर्ट को किनारे रख कर राम मंदिर बनाने का कानूनी रास्ता निकालने के खिलाफ कांग्रेस को मैदान में उतरना चाहिए था। कांग्रेस के अलावा जो पार्टियां मैदान में हैं, वे भी कोई ठोस मुद्दा नहीं उठा पाई हैं। कांग्रेस से अलग होकर चुनाव लड़ने वाली बहुजन समाज पार्टी या समाजवादी पार्टी ने इन मुद्दों को लेकर कोई खास संवेदनशीलता नहीं दिखाई। योगी आदित्य नाथ अयोध्या में जो नाटक राम की भक्ति के नाम पर कर रहे हैं और राम मंदिर बनाने की बात कर रहे हैं, उसका मुकाबला करने की कोई रणनीति उनके पास नजर नहीं आई। उनके रवैए से यही लगा कि वे अपनी उपस्थिति बनाए रखने को ही अपना लक्ष्य मानती हैं। योगी चुनाव क्षेत्रों में अपना हिंदुत्ववादी झंडा लेकर घूमते रहे और मायावती या अखिलेश उन्हें चुनौती नहीं दे पाए। अजीत जोगी जैसों की पार्टी से कोई उम्मीद रखना भी बेकार ही है। सच कहें तो लोकसभा चुनावों के पहले हुए इस बड़े चुनाव का मौका सबने गंवाया है। लेकिन इस सारे खेल में सबसे खराब भूमिका मीडिया की रही। उसने तो तय ही कर रखा है कि लोगों को मुद्दों से भटकाएंगे, लेकिन चौक-चौराहों की चर्चा से साफ हो जाता कि लोग असलियत को समझते हैं। यही लोकतंत्र के भविष्य के प्रति आस्था जगाता है।