दिसम्बर 2018

ख़ुद के चक्रव्यूह में फंस गए सचिन पायलट

अवधेश आकोदिया

आमतौर पर किसी नेता के लिए चुनाव में उम्मीदवारी तय होना सियासी सफ़र का सुखद पड़ाव होता है, लेकिन सचिन पायलट के लिए यह कोढ़ में खाज की तरह है। असल में राजस्थान का मुख्यमंत्री बनने का ख़्वाब देख रहे पायलट न तो ख़ुद विधानसभा का चुनाव लड़ना चाहते थे और न ही अशोक गहलोत को चुनावी मैदान में उम्मीदवार की हैसियत से उतरता हुआ देखना चाहते थे। लेकिन गहलोत के दांव से उनकी इस योजना पर एक झटके में पानी फिर गया।

जब दौसा से भाजपा सांसद हरीश मीणा ने कांग्रेस का हाथ थामा तो किसी को उम्मीद नहीं थी कि 24, अकबर रोड (नई दिल्ली स्थित कांग्रेस मुख्यालय) से इस सियासी घटना से भी बड़ी कोई ख़बर बाहर निकलेगी। लेकिन ख़बर बाहर निकली। वह भी इतनी बड़ी कि जिसने राजस्थान कांग्रेस में पिछले कई महीने से जारी ‘कौन बनेगा मुख्यमंत्री’ के खेल में शह-मात के सिरे उजागर कर दिए। इस बड़ी ख़बर के सूत्रधार बने कांग्रेस के संगठन महासचिव और पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत। उन्होंने कांग्रेस मुख्यालय में हरीश मीणा की पार्टी में अगवानी करते हुए अचानक यह ऐलान कर सबको चौंका दिया कि वे विधानसभा का चुनाव अपनी परंपरागत सीट सरदारपुरा से लड़ेंगे और पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट भी प्रत्याशी की हैसियत से चुनाव मैदान में उतरेंगे। गहलोत ने कहा, ‘जो अफवाहें चल रही थीं कि कांग्रेस में फूट है। वो भाजपा का षड्यंत्र था। उसका पिछले दो महीने में पर्दाफाश हो चुका है। वो बातें ख़त्म हो गई हैं। हम सब एक साथ मैदान में उतर रहे हैं। चुनाव सचिन पायलट भी लड़ेंगे। मैं भी लडूंगा। सब लोग चुनाव लड़ेंगे।’ उनकी इस घोषणा को सुनकर प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट और राजस्थान के प्रभारी महासचिव अविनाश पांडे तो सकपकाए ही, प्रेस कॉन्फ्रेंस में आए पत्रकार भी भौचक्के रह गए। सबने गहलोत से सवाल किया- ‘सचिन पायलट कहां से चुनाव लड़ेंगे?’ गहलोत ने इस सवाल का कोई जवाब नहीं दिया और माइक सचिन पायलट को थमा दिया। पायलट ने यह तो नहीं बताया कि वे कहां से चुनाव मैदान में उतरेंगे, लेकिन गहलोत की घोषणा पर मुहर ज़रूर लगा दी। पायलट ने कहा, ‘राहुल गांधी जी के निर्देश और अशोक गहलोत जी के निवेदन पर मैं भी विधानसभा का चुनाव लड़ूंगा। गहलोत जी भी चुनाव लड़ेंगे।’ आमतौर पर किसी नेता के लिए चुनाव में उम्मीदवारी तय होना सियासी सफ़र का सुखद पड़ाव होता है, लेकिन सचिन पायलट के लिए यह कोढ़ में खाज की तरह है। असल में राजस्थान का मुख्यमंत्री बनने का ख़्वाब देख रहे पायलट न तो ख़ुद विधानसभा का चुनाव लड़ना चाहते थे और न ही गहलोत को चुनावी मैदान में उम्मीदवार की हैसियत से उतरता हुआ देखना चाहते थे। पायलट की यह चाहत उस रणनीति का हिस्सा थी जिसका चक्रव्यूह उन्होंने मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने के लिए रचा था। चर्चा के मुताबिक इसके पीछे उनकी पहली चाल यह सियासी मैसेज देने की थी कि आलाकमान राजस्थान की राजनीति में अशोक गहलोत की सीधी भूमिका नहीं चाहता। राहुल गांधी उनका उपयोग संगठन के कामकाज में ही जारी रखना चाहते हैं। यदि प्रदेश कांग्रेस के नेताओं में यह संदेश चला जाता तो इसका सीधा अर्थ यह होता कि अशोक गहलोत मुख्यमंत्री की रेस से बाहर हो गए हैं और सचिन पायलट को मुख्यमंत्री बनने को हरी झंडी मिल गई है। पायलट की ख़ुद को और गहलोत को विधानसभा चुनाव में उम्मीदवार न बनने देने की दूसरी वजह नतीजों के बाद होने वाली विधायक दल की बैठक थी। इसमें कोई दो-राय नहीं है कि कांग्रेस में मुख्यमंत्री वही बनता है जिसे आलाकमान आशीर्वाद देता है। आमतौर पर एआईसीसी के पर्यवेक्षकों की मौजूदगी में विधायक दल की बैठक होती है और इसमें मुख्यमंत्री तय करने का अधिकार आलाकमान को देने का प्रस्ताव पारित किया जाता है,लेकिन 2008 के विधानसभा चुनाव में ऐसा नहीं हुआ। 2008 में विधायक दल की बैठक में एक लाइन का प्रस्ताव पारित होने की बजाय सीक्रेट वोटिंग हुई थी। इसमें कांग्रेस के 96 विधायकों में से 92 ने अशोक गहलोत को मुख्यमंत्री के लिए अपनी पसंद बताया। डॉ। सीपी जोशी और शीशराम ओला ने अपनी दावेदारी ज़रूर पेश की, लेकिन उन्हें विधायकों का समर्थन नहीं मिला। सचिन पायलट नहीं चाहते थे कि 2008 की प्रक्रिया को इस बार दोहराया जाए। उन्हें यह आशंका थी कि यदि अशोक गहलोत विधायक दल की बैठक में आएंगे तो वे पर्यवेक्षकों को सीक्रेट वोटिंग करवाने के लिए निश्चित रूप से कहेंगे। इस स्थिति में गहलोत विधायकों की पसंद में अव्वल आ सकते हैं। इससे बचने के लिए विधायक दल की बैठक में गहलोत का प्रवेश निषेध करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं था। इसी वजह से सचिन पायलट ने आलाकमान के सामने ख़ुद अशोक गहलोत और डॉ। सीपी जोशी के चुनाव न लड़ने की मांग रखी। हालांकि इसके पीछे उन्होंने तर्क यह दिया कि बड़े नेताओं के चुनाव लड़ने से वे अपनी सीट पर केंद्रित हो जाएंगे और बाकी सीटों पर प्रचार के लिए पूरा समय नहीं दे पाएंगे। इससे पार्टी का प्रदर्शन प्रभावित होगा। पायलट को उम्मीद थी कि राहुल गांधी उनकी बात मानेंगे। उनकी उम्मीद को उस समय और बल मिला जब मध्य प्रदेश में कांग्रेस ने प्रदेश अध्यक्ष कमल नाथ और सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया को विधानसभा का चुनाव नहीं लड़वाया। लेकिन राहुल गांधी के सामने जब यह मुद्दा आया तो अशोक गहलोत ने साफ लहज़े में कह दिया कि वे विधानसभा चुनाव लड़ेंगे। सचिन ने राहुल गांधी के ज़रिये अशोक गहलोत पर खूब दबाव बनाने की कोशिश की, लेकिन उन्हें कामयाबी नहीं मिली। ऐसी स्थिति में पायलट के लिए भी चुनावी रण में उतरना अनिवार्य हो गया। यदि वे चुनाव नहीं लड़ते तो सीधा संदेश यह जाता कि कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष मुख्यमंत्री की रेस से बाहर हो चुके हैं। यानी पायलट ने जो चक्रव्यूह अशोक गहलोत की घेराबंदी करने के लिए बनाया वे ख़ुद ही उसमें उलझ गए। यह तय होने के बाद कि राजस्थान में कांग्रेस के बड़े नेता चुनाव लड़ेंगे तो पायलट के सामने सीट का संकट पैदा हो गया। उन्हें इस बात का डर सता रहा था कि 2008 के विधानसभा चुनाव में जैसा डॉ। सीपी जोशी के साथ हुआ, वैसा इस बार कहीं उनके साथ न हो जाए। गौरतलब है कि 2008 में डॉ। सीपी जोशी प्रदेश में कांग्रेस के मुखिया थे और उन्हें मुख्यमंत्री पद का तगड़ा दावेदार माना जा रहा था। डॉ। जोशी का मुख्यमंत्री बनने का सपना उस समय चकनाचूर हो गया, जब वे महज़ एक वोट से नाथद्वारा से विधानसभा चुनाव हार गए। पायलट को यह आशंका है कि वे भी जोशी की तरह धराशायी न हो जाएं। इससे बचने के लिए उन्हें ऐसी सीट तलाशना ज़रूरी हो गया, जहां भितरघात और हार की दूर-दूर तक कोई गुंजाइश न हो। पायलट की उपयुक्त सीट की तलाश इतनी लंबी हो गई कि भाजपा ने उम्मीदवारों की दो सूचियां जारी कर दीं, लेकिन कांग्रेस की ओर से चुनाव लड़ने वालों की पहली खेप भी सामने नहीं आई। सूत्रों के मुताबिक कांग्रेस की केंद्रीय चुनाव समिति की पहली बैठक में ही इस बात पर मुहर लग गई थी कि अशोक गहलोत और सचिन पायलट, दोनों चुनाव लड़ेंगे। गहलोत की सीट को लेकर किसी को कोई संशय नहीं था, लेकिन पायलट केंद्रीय चुनाव समिति की बैठक में अपनी सीट नहीं बता पाए। उन्होंने इसके लिए समय मांगा। यह समय ज़रूरत से ज़्यादा लंबा खिंच गया। पायलट ख़ुद के नाम के बिना उम्मीदवारों की पहली सूची जारी करने के पक्ष में नहीं थे। पायलट गुट के एक नेता ‘ऑफ द रिकॉर्ड’ बातचीत में इसकी पुष्टि करते हैं। वे कहते हैं, ‘यदि पहली सूची आ जाती और उसमें अशोक गहलोत का नाम ज़रूर होता। यदि इसमें पायलट का नाम नहीं होता तो इसका गलत संदेश जाता। उनके विरोधी यह भ्रम फैलाते कि पार्टी के अध्यक्ष को चुनाव लड़ने के लिए सीट नहीं मिल रही।’ अशोक गहलोत ने सचिन पायलट की इस दुविधा को मौके की तरह लिया। उन्होंने बीते बुधवार को एआईसीसी में हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में जिस ढंग से ख़ुद और पायलट के चुनाव लड़ने का ऐलान किया, उसने मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए इन दोनों के बीच जारी जंग की दिशा तय कर दी। गहलोत ने उस बात की घोषणा बिना मौका और दस्तूर के की जो पायलट की दुखती रग है। सचिन पायलट की सीट की खोज कई दिनों की जद्दोजहद के बाद जयपुर से सौ किलोमीटर दूर जाकर थमी। सीट का संकट दूर होते ही कांग्रेस की कई दिनों से अटकी सूची गुरुवार देर रात बाहर आ गई। इसमें पायलट व गहलोत के अलावा डॉ। सीपी जोशी और डॉ. गिरिजा व्यास के नाम शामिल हैं। पायलट ने जिस टोंक सीट को अपना सियासी ठिकाना चुना है। वह मुस्लिम और गुर्जर बहुल क्षेत्र है। सचिन को उम्मीद है कि यह गठजोड़ उनकी नैया पार कर देगा। स्थानीय राजनीति के जानकारों का भी यही मानना है। हालांकि सियासी गलियारों में यह चर्चा ज़ोरों पर है कि मुख्यमंत्री बनने का ख़्वाब देख रहे पायलट को दौसा या अजमेर ज़िले को छोड़कर टोंक की शरण में आना पड़ा। गौरतलब है कि सचिन पायलट ने अपनी सियासी पारी अपने पिता राजेश पायलट की परंपरागत सीट दौसा से 2004 के लोकसभा चुनाव में जीत के साथ किया था। हालांकि 2009 का लोकसभा चुनाव वे यहां से नहीं लड़ पाए, क्योंकि परिसीमन में दौसा सीट अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हो गई। 2009 के लोकसभा चुनाव में पायलट अजमेर से चुनावी मैदान में उतरे और जीते। हालांकि 2014 के आम चुनाव में सचिन को यहां से मुंह की खानी पड़ी। पहले यह माना जा रहा था कि पायलट अजमेर या दौसा ज़िले की किसी सीट से विधानसभा का चुनाव लड़ेंगे, लेकिन उन्हें नवाबों के शहर टोंक रास आया। भाजपा ने टोंक सीट पर पहले तो मौजूदा विधायक अजीत मेहता को उम्मीदवार घोषित किया था, लेकिन पायलट के मुकाबले उन्हें मजबूत प्रत्याशी नहीं माना गया। पायलट की उम्मीदवारी घोषित होने के बाद भाजपा ने उन्हें टक्कर देने के लिए राज्य के लोक निर्माण मंत्री यूनुस खान को उम्मीदवार घोषित किया। अब यह तो 11 दिसंबर को ही पता चलेगा कि टोंक से पायलट का प्लेन उड़ान भर पाता है या नहीं, लेकिन उन्हें न चाहते हुए भी विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए ‘रनवे’ पर उतरना पड़ गया है। उनके लिए टोंक से जीत दर्ज करने से ज़्यादा इस बात की फ़िक्र है कि मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने के लिए अब किस राह पर चला जाए। (लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।)