दिसम्बर 2018

कौन हैं जो विकल्पहीनता का ढोल पीट रहे हैं?

हेमंत कुमार झा

देश का वंचित और श्रमजीवी तबका नेतृत्वहीन है। कॉरपोरेट राज दुनिया के सिर पर नग्न नृत्य कर रहा है। कॉरपोरेट नियंत्रित मीडिया तथा कॉरेपोरेट की दलाली करने वाला राजनीतिक वर्ग विकल्पहीनता का ढोल पीट रहा है। वैकल्पिक नेतृत्व को उभरने न देने की तमाम कोशिशें जारी हैं, जबकि उन विचारों को "अप्रासंगिकताओं का अरण्यरोदन" करार दिया जा रहा है जो वंचितों के संवैधानिक और आर्थिक अधिकारों की बातें उठाते हैं। लेकिन इतिहास ने हमें यही बताया है कि छद्म का साम्राज्य अनंत काल तक नहीं चल सकता।

शीत युद्ध की समाप्ति और सोवियत विघटन के बाद जिन विचारकों को नई दुनिया के निर्माण की आहटें सुनाई देने लगी थीं, उन्हें भी अहसास नहीं होगा कि अगले दशकों में राजनीति का वैचारिक बंध्यत्व इस कदर बढ़ जाने वाला है कि सबसे प्रतापी लोकतंत्र में डोनाल्ड ट्रंप और सबसे बड़े लोकतंत्र में नरेंद्र मोदी सरीखे राजनेता सत्तासीन होंगे, जो राजनीति को एक प्रहसन में तब्दील कर देने में कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखेंगे। विकल्पहीनता का मिथक इसी बंजर वैचारिक जमीन से निकला है, जिसकी चर्चा भारत में आजकल कुछ अधिक ही है क्योंकि कॉरपोरेट लूट का रिकॉर्ड बनवाने वाले नरेंद्र मोदी को 2019 में आम चुनावों का सामना करना है, जबकि इस मिथक के सहारे ही "जनवादी गणराज्य" कहे जाने वाले चीन में शी जिनपिंग आजीवन सत्तासीन रहने का संवैधानिक फार्मूला सामने ला चुके हैं। कभी जारशाही को उखाड़ फेंकने वाले और बाद के दशकों में दमनकारी साम्यवादी सत्ता की चूलें हिला देने वाले रूस में विकल्पहीनता का आलम यह है कि ब्लादिमीर पुतिन लोकतंत्र को अपनी जेब में रख दो दशकों से सत्ता के पर्याय बने हुए हैं। यह सब इसलिये संभव हो पा रहा है, क्योंकि वंचित नेतृत्वहीन हैं और कॉरपोरेट राज दुनिया के सिर पर नग्न नृत्य कर रहा है। वैकल्पिक नेतृत्व को उभरने न देने की तमाम कोशिशें जारी हैं, जबकि उन विचारों को "अप्रासंगिकताओं का अरण्यरोदन" करार दिया जा रहा है, जो वंचितों के संवैधानिक और आर्थिक अधिकारों की बातें उठाते हैं। यही कारण है कि कॉरपोरेट लूट से त्रस्त भारत में वैचारिक राजनीति करने वाले लोगों का साधनहीन समूह जब आम लोगों के बीच जागरण का शंखनाद करता है, तो उन्हें न मीडिया कोई तवज्जो देता है न राजनीतिक संस्कृति उन्हें उनका स्थान देती है। वंचितों की शिक्षा और उनका स्वास्थ्य सरकारी नीतियों में हाशिये पर डाल दिये जाते हैं और उनकी बात उठाने वालों की आवाजें कृत्रिम विमर्शों के प्रायोजित शोर में गुम होती जाती हैं। साजिशों का स्वरूप वैश्विक है, क्योंकि लूट और शोषण का दायरा भी वैश्विक है। ब्रिटेन के जुझारू लेबर नेता जेरेमी कोर्बिन के प्रति तो ब्रिटिश मीडिया ही उदासीन है, क्योंकि वे ऐसे अनोखे ब्रिटिश नेता हैं जो खुल कर कॉरपोरेटवाद और अमेरिका की मुखालफत करते हैं। वे अपनी ही पार्टी के पूर्व प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर को युद्ध अपराधी ठहराते हैं, क्योंकि जार्ज बुश जूनियर के साथ मिलकर ब्लेयर ने इराक सहित पश्चिम और मध्य एशिया को अंतहीन बर्बादियों के रास्ते पर धकेल दिया है। क्यों...? क्योंकि इन क्षेत्रों में वैश्विक कॉरपोरेट के हित निहित थे। कितने प्रतिशत भारतीय युवा जेरेमी कोर्बिन और उनकी वैचारिकता से परिचित हैं? निश्चय ही बहुत कम, क्योंकि जब ब्रिटिश मीडिया ही उनकी उपेक्षा करता है तो भारतीय मीडिया तो कब का कॉरपोरेट के भोंपू में तब्दील हो चुका है। कोर्बिन ऐसे विचारक राजनेताओं में हैं, जो शिक्षा और स्वास्थ्य को किसी भी कीमत पर निजी हाथों में देने के सख्त खिलाफ हैं। उनके ये विचार जितने प्रासंगिक ब्रिटेन के लिये हैं, उससे बहुत ज्यादा भारत के लिये हैं। लेकिन, जब भारत में उनकी चर्चा ही नहीं होगी तो वैचारिक संक्रमण का खतरा भी कम होगा। इस खबर को भारत में बिल्कुल तवज्जो नहीं मिली कि शी के जनवादी चीन में एक निजी उपक्रम के उन कर्मचारियों को सार्वजनिक रूप से बेल्ट से पीटा गया और पेशाब पीने को विवश किया गया, जिन पर कंपनी के टारगेट को पूरा करने में अक्षम रहने का आरोप लगा। यह पूंजी और श्रम के बीच के रिश्ते का उत्तर आधुनिक रूप है, जिसमें कर्मचारियों के आत्मसम्मान और उनकी मानवीय गरिमा का कोई महत्व नहीं। शी जिनपिंग आज चीन में अजेय हैं और किसी भी राजनीतिक चुनौती से परे हैं तो इसलिये नहीं कि वे चीनी जनता के दिलों पर राज करते हैं, बल्कि इसलिये कि चीन के पूंजीपतियों सहित पूरी दुनिया की वित्तीय शक्तियों का समर्थन उन्हें हासिल है। 21वीं शताब्दी की राजनीति में राजनेताओं के लिये जनसमर्थन से अधिक महत्वपूर्ण कॉरपोरेट की शक्तियों का समर्थन है , क्योंकि कॉरपोरेट अगर साथ है जनसमर्थन जुटाना बहुत आसान हो जा रहा है। चुनाव अब प्रबंधन के सहारे लड़े जाते हैं, जिसके लिये पेशेवर प्रबंधकों का समूह अपनी सेवाओं के साथ हाजिर रहता है। उन्हें भुगतान करिये, वे जनता को बरगलाने और जनमत को मोड़ने के तमाम नुस्खों के साथ आपको चुनाव जितवाने को सक्रिय हो जाएंगे। अपने जीवन के लिये, अपनी जीविका के लिये, अपने बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य के लिये वंचितों का संघर्ष दिनोदिन कठिन से कठिनतर होता जा रहा है। पूंजी और सत्ता का तादात्म्य राजनेताओं को कॉरपोरेट की कठपुतली बना चुका है। मीडिया साजिशों का एक प्रभावी उपकरण बन चुका है। प्रतिरोध की शक्तियां बिखरी हुई हैं इसलिये हाशिये पर हैं। अंधेरे गहराते जा रहे हैं। इन गहराते अंधेरों में वंचितों की मानवीय गरिमा भी कहीं गुम होती जा रही है। ये अंधेरे तब तक गहराते जाएंगे, जब तक आम लोगों को अपनी मानवीय गरिमा को भी खो देने का अहसास न हो जाए। ये अहसास न हो, इसकी पूरी तैयारी है, लेकिन छद्म का साम्राज्य अनंत काल तक नहीं चल सकता, इतिहास ने हमें यही बताया है। (लेखक मगध विश्वविद्यालय में हिंदी के असोसिएट प्रोफेसर हैं और पटना में रहते हैं)