दिसम्बर 2018

चुनाव आए तो फिर आई राम की याद

अनिल जैन

राम नाम की विशेषता यह है कि वह लाचार, बेबस और बेसहारा को बहुत जल्द और बहुत शिद्दत से याद आता है। भाजपा भी इस समय राजनीतिक रूप से बेबस और बेसहारा है। आगामी आम चुनाव में जनता के बीच जाने के लिए उसके पास न तो कोई लोकलुभावन मुद्दा है और न ही अपनी सरकार की कोई उपलब्धि। इसलिए वह राम मंदिर के रूप में अपने पूर्व परीक्षित मुद्दे का ही सहारा लेना चाहती है, यह जानते हुए भी कि चुनावी राजनीति के लिहाज से यह मुद्दा पर्याप्त रूप से निचोड़ा जा चुका है।

भारतीय संस्कृति में जिस राम को सत्ता का त्याग करने वाले मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में जाना और माना जाता है, उसी राम के नाम को एक बार फिर सत्ता की सीढ़ी के रूप में इस्तेमाल करने का डरावना तानाबाना बुना जा रहा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, भाजपा, उसके समर्थक साधु-समुदाय और यहां तक कि केंद्र सरकार के मंत्रियों की ओर से अयोध्या में राम मंदिर बनाने के सवाल पर जिस तरह की आक्रामक और जहरीली बयानबाजी हो रही है, जिस तरह देश की सर्वोच्च अदालत को ललकारा-धमकाया जा रहा है, उसे हिंदू विरोधी बताया जा रहा है, उससे जाहिर है कि 2019 के आम चुनाव के मद्देनजर राम मंदिर के नाम पर भारतीय समाज को बांटने के व्यापक कार्यक्रम की योजना बन चुकी है। अयोध्या का राम जन्मभूमि बनाम बाबरी मस्जिद विवाद सुप्रीम कोर्ट के समक्ष विचाराधीन है, जिस पर सुनवाई जनवरी तक टल गई है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जनवरी में तय होगा कि मामला कौन-सी पीठ सुनेगी। यह तय हो जाने पर मामले की नियमित सुनवाई शुरू होगी। लेकिन संघ और भाजपा को यह मंजूर नहीं है। संघ-भाजपा समर्थक साधु-संतों के एक बड़े वर्ग ने 6 दिसंबर से अयोध्या में मंदिर निर्माण शुरू करने का ऐलान कर दिया है। हालांकि इस मसले पर इस तरह की घोषणाएं कोई नई बात नहीं हैं, क्योंकि 1990 से ही यह सिलसिला लगातार चल रहा है। जब भी लोकसभा या उत्तर प्रदेश विधानसभा का चुनाव आता है तो यह मुद्दा गरमा दिया जाता है और भरपूर इस्तेमाल करने के बाद उसे अगले चुनाव तक के लिए ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है। इसलिए जब संघ के मुखिया मोहन भागवत ने अपने विजयादशमी संबोधन में इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया तो कोई आश्चर्य नहीं हुआ। मगर इस बार उन्होंने जो कहा उसमें एक खतरनाक इरादा छुपा है। उन्होंने निर्देश देने के अंदाज में कहा कि सरकार मंदिर बनाने के लिए अध्यादेश जारी करे या फिर संसद में कानून पारित कराए। उनकी इस बात को कई अन्य मंचों से भी इस तरह दोहराया जा रहा है। जनता के बीच यह राय बनाने की कोशिश की जा रही है कि इस मुद्दे के न्यायिक समाधान के चक्कर में पड़ना बेकार है, सरकार अध्यादेश लाकर या कानून बनाकर मंदिर निर्माण का रास्ता साफ कर दे। अध्यादेश या अधिग्रहण संभव नहीं अध्यादेश लाने या कानून बनाने की बात को इस तरह पेश किया जा रहा है मानो वर्षों पुराने विवाद का हल ढूंढ़ लिया गया है, लेकिन हकीकत यह है कि अयोध्या मसला दो पक्षों के बीच का भूमि विवाद है। अदालत को फैसला इस बात का करना है कि विवादित जमीन पर मालिकाना हक किसका है। केंद्र सरकार इसमें दखल नहीं दे सकती, यानी निजी संपत्ति से जुड़े विवाद पर अध्यादेश नहीं लाया जा सकता। किसी की निजी जमीन केंद्र या राज्य की नहीं होती है। ऐसा तभी किया जा सकता है, जब सरकार जमीन का अधिग्रहण करना चाहती हो, पर इस मामले में अधिग्रहण का कोई अर्थ नहीं है। वैसे भी न्यायपालिका में लंबित मामलों पर अध्यादेश लाने का कोई संवैधानिक औचित्य नहीं है। बहुचर्चित शाहबानो मामले में सरकार अध्यादेश लाई थी, जिसके नतीजे अच्छे नहीं निकले, पर यह काम उसने अदालती फैसले के बाद किया था, उसके पहले नहीं। सरकार आम तौर पर प्रशासनिक जरूरतों के चलते उन्हीं मामलों में अध्यादेश की व्यवस्था का सहारा लेती है, जो विवादित नहीं होते और जनहित में होते हैं। फिर भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह अच्छा नहीं माना जाता कि सरकार अध्यादेशों का सहारा ले। सुप्रीम कोर्ट भी 2016 में कह चुकी है कि अध्यादेश लाना संविधान के साथ धोखेबाजी है। इसलिए उचित तो यही हो सकता है कि सभी पक्ष धैर्य के साथ अदालत के फैसले की प्रतीक्षा करें, लेकिन संघ और उसके समर्थक साधु-संत, यहां तक कि भाजपा नेतृत्व और केंद्रीय मंत्री भी न तो अदालत के फैसले की प्रतीक्षा करना चाहते हैं और न ही संवैधानिक व्यवस्था में उनकी आस्था है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला भी सर्वमान्य नहीं होगा हालांकि सुप्रीम कोर्ट का भी जब कभी इस मामले में जो फैसला आएगा, वह सर्वमान्य नहीं होगा और विवाद अपनी जगह कायम रहेगा। यदि फैसला बाबरी मस्जिद के पक्षकारों के खिलाफ गया, जिसकी संभावना कम ही है, तो हो सकता है कि मुस्लिम समुदाय उसे स्वीकार कर ले, जैसा कि उसके नुमाइंदों की ओर से लगातार कहा भी जाता रहा है। लेकिन अगर फैसला राम मंदिर के पक्षकारों के खिलाफ होता है तो वह संघ और भाजपा को कतई स्वीकार नहीं होगा। उसके नेता फिर वही राग अलापेंगे कि यह हमारे लिए धार्मिक आस्था का सवाल है और राम का जन्म कहां हुआ था, यह अदालत से तय नहीं हो सकता। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और कुछ केंद्रीय मंत्री तो अभी से कहने लगे हैं कि अदालतों को जनभावना को ध्यान में रखते हुए फैसले देना चाहिए। दरअसल, संघ परिवार को यह अच्छी तरह मालूम है कि कानूनी रूप से उनका पक्ष उतना मजबूत नहीं है, जितना बाबरी मस्जिद के पक्षकारों का है। यही वजह है कि न तो अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार ने अपने छह साल के कार्यकाल के दौरान और न ही नरेंद्र मोदी की सरकार ने अपने अभी तक के कार्यकाल में इस बात की कभी कोशिश ही नहीं कि इस पूरे मसले का न्यायिक समाधान जल्द से जल्द हो जाए। वैसे भी सामाजिक दृष्टि से विस्फोटक ऐसे मसलों का सर्वमान्य समाधान अदालतों के जरिये कभी निकल भी नहीं सकता। यही वजह है कि यह मामला विभिन्न नीची-ऊंची अदालतों से होता हुआ फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में है, जहां वह कब तक चलेगा, यह कोई नहीं कह सकता, खुद सुप्रीम कोर्ट भी नहीं। इसलिए इस मसले का कोई भी हल अदालत के बाहर दोनों समुदायों के बीच समझौते से ही संभव है। लेकिन दोनों ही पक्षों ने ऐसा करने में अभी तक कोई रुचि नहीं दिखाई है। हालांकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिंदू परिषद, भाजपा आदि के नेता अपने बयानों में जरूर यह इच्छा जताते रहते हैं, जिससे यह भ्रम होता है कि संघ परिवार जल्द से जल्द राम मंदिर बनाना चाहता है, लेकिन दरअसल राम मंदिर बनाने की जल्दी किसी को नहीं है। यह इसी से जाहिर है कि बाबरी मस्जिद का ध्वंस हुए लगभग ढाई दशक से ज्यादा समय हो चुका है, फिर भी मंदिर बनाने की कोई मुहिम शुरू नहीं हो पाई है। बाबरी मस्जिद ध्वंस के बाद के कुछ वर्षों तक जरूर मंदिर बनाने के लिए देश भर से ईंटें और चंदा जुटाने का कार्यक्रम चलाया गया तथा राम मंदिर के नए-नए मॉडल भी बनाए जाते रहे, लेकिन बाबरी मस्जिद को ढहाने के लिए जो उत्साह दिखाया गया, वह राम मंदिर बनाने के लिए कभी नहीं दिखाया गया। दिखाया भी नहीं जा सकता, क्योंकि जिस तरीके से बाबरी मस्जिद को ध्वस्त किया गया, उस तरीके से राम मंदिर नहीं बनाया जा सकता। समझौते से ही बन सकता है मंदिर अयोध्या में जिस जगह बाबरी मस्जिद थी, वहां मंदिर तो अब तभी बन सकता है, जब हिंदुओं और मुसलमानों के बीच कोई समझौता हो जाए। ऐसा नहीं है कि यह समझौता नहीं हो सकता। हो सकता था और आज भी हो सकता है, यदि यह मामला शुद्ध रूप से धार्मिक होता और विश्व हिंदू परिषद ने इसे उसी स्तर पर उठाया होता। भारत के मुसलमान इतने तंगदिल भी नहीं हैं कि वे अपने हिंदू भाई-बहनों की धार्मिक इच्छा का सम्मान न कर सकें। लेकिन हुआ यह कि जब से इस मुद्दे को स्थानीय स्तर से ऊपर लाया गया, तभी से इसे शक्ति प्रदर्शन का मामला बना दिया गया। संघ परिवार की ओर से हमेशा यह जताया गया कि हमें किसी की अनुकंपा से राम मंदिर नहीं चाहिए, वह जमीन तो हमारी ही है और हम उसे अपनी ताकत के बल पर लेकर रहेंगे। संघ परिवार के इसी रवैये ने मुस्लिम कट्टरपंथ के लिए खाद-पानी का काम किया। वैसे सचाई यह भी है कि देश के आम मुसलमानों को बाबरी मस्जिद से न पहले कोई लेना-देना था और न ही आज कुछ लेना-देना है, लेकिन अयोध्या के सवाल पर संघ परिवार के आक्रामक रवैये ने उनके दिल-दिमाग में यह आशंका जरूर पैदा कर दी है कि अगर आज सद्भावना दिखाते हुए उन्होंने अयोध्या की विवादित जमीन पर अपना दावा छोड़ दिया तो कल देश में उनकी दूसरी इबादतगाहों पर भी संघ परिवार इसी तरह अपना दावा जताने लगेगा। उनकी यह आशंका निराधार भी नहीं है, क्योंकि संघ परिवार ने ऐसे मामलों की एक लंबी फेहरिस्त तैयार कर रखी है और उसके बगल-बच्चा संगठनों का यह नारा 'अयोध्या तो झांकी है, मथुरा-काशी बाकी है' न सिर्फ मुसलमानों को बल्कि देश के हर अमन और भाईचारा पसंद व्यक्ति को डराता है। क्यों आती है राम मंदिर की याद? बहरहाल, मामले की मौजूदा कानूनी स्थिति और राजनीतिक-सामाजिक हकीकत के मद्देनजर अयोध्या में राम मंदिर बनना तब तक नामुमकिन है, जब तक भारत में संवैधानिक या अन्य किसी किस्म का फासीवाद कायम नहीं हो जाता। अगर सामान्य तरीके से यह मंदिर बनाया जा सकता होता तो बाबरी मस्जिद तोड़ने के लिए फासीवादी तरीके अपनाने की और अदालत में झूठा हलफनामा दाखिल करने की जरूरत ही नहीं पड़ती। इसलिए अब इसमें किसी को कोई शक नहीं रह जाना चाहिए कि संघ परिवार का राम मंदिर अभियान उसकी उस व्यापक मानसिकता और मांगपत्र का हिस्सा है, जिसके बाकी हिस्से कभी गोहत्या पर पाबंदी की मांग और गोरक्षा के नाम पर हिंसा, कभी धर्मांतरण रोकने के लिए कानून, कभी कथित लव जेहाद, कभी ईसाई मिशनरियों को देश निकाला देने की मुहिम, कभी गिरिजाघरों, पादरियों और ननों पर हमले, कभी धार की भोजशाला हिंदुओं के सुपुर्द करने की मांग, कभी श्रीनगर के लाल चौक पर तिरंगा फहराने की जिद, कभी धारा 370 को हटाने की मांग, कभी समान नागरिक संहिता और कभी स्कूलों में वंदे मातरम और सरस्वती वंदना का गायन अनिवार्य करने की मांग और कभी शहरों तथा सार्वजनिक स्थानों के नाम बदलने के हास्यास्पद उपक्रम के रूप में सामने आते हैं। इनमें से कोई एक मुहिम परिस्थितिवश कमजोर पड़ जाती है तो दूसरी को शुरू कर दिया जाता है। वाजपेयी सरकार के समय भुला दिया गया था राम को इस बात को ध्यान में रखने पर ही समझा जा सकता है कि अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भाजपा जब तक केंद्र की एनडीए सरकार में शामिल रही, उसने अपने तीन परमप्रिय मुद्दों को भले ही स्थगित रखा हो, लेकिन इन मुद्दों के पीछे जो हिंदूवादी एजेंडा है, उसका परित्याग कभी नहीं किया। नरेंद्र मोदी सरकार के साढ़े चार साल के कार्यकाल में भी राम मंदिर का मुद्दा कभी नहीं उठा और न ही उसका न्यायिक समाधान जल्दी कराने के लिए कोई पहल की गई। अब चूंकि लोकसभा के चुनाव करीब आ रहे हैं जिसमें मोदी सरकार अपनी तमाम नाकामियों के चलते अपनी राजनीतिक नाव डूबती नजर आ रही है तो राम याद आ रहे हैं। लेकिन इस सिलसिले में भाजपा समेत समूचे संघ परिवार को जनता के इस सवाल का जवाब तो देना ही होगा कि ढाई दशक बाद भी अयोध्या में वह राम मंदिर क्यों नहीं बनाया जा सका, जिसके लिए बाबरी मस्जिद ढहाई गई थी। भाजपा और संघ नेतृत्व के लिए इस आरोप का बोझ भी अपने सिर पर लेकर चलना मुश्किल होगा कि सत्ता की चकाचौंध और आपा-धापी में वह अपने आराध्य राम को भूल गया। अब रंगत खो चुका है यह मुद्दा दरअसल, राम नाम की विशेषता यह है कि वह लाचार, बेबस और बेसहारा को बहुत जल्द और बहुत शिद्दत से याद आता है। भाजपा भी इस समय राजनीतिक रूप से बेबस और बेसहारा है। आगामी आम चुनाव में जनता के बीच जाने के लिए उसके पास न तो कोई लोकलुभावन मुद्दा है और न ही अपनी सरकार की कोई उपलब्धि। इसलिए वह राम मंदिर के रूप में अपने पूर्व परीक्षित मुद्दे का ही सहारा लेना चाहती है, यह जानते हुए भी कि चुनावी राजनीति के लिहाज से यह मुद्दा पर्याप्त रूप से निचोड़ा जा चुका है। पिछले तीन दशक के दौरान लोकसभा और उत्तर प्रदेश विधानसभा का कोई चुनाव ऐसा नहीं रहा जिसमें भाजपा ने अयोध्या में राम मंदिर बनाने के वादे को अपने घोषणापत्र में जगह न दी हो। यह जानते हुए भी कि अयोध्या विवाद अदालत के समक्ष विचाराधीन है, उसने हर बार अपने चुनावी घोषणा पत्र में कहा कि पार्टी अयोध्या में राम मंदिर बनाने के रास्ते में जो भी बाधाएं हैं, उन्हें दूर कर एक भव्य राम मंदिर का निर्माण करेगी। भाजपा की ओर से इस मुद्दे को सबसे पहले और सबसे कारगर ढंग से उग्र हिंदुत्व की राजनीति के चैंपियन रहे लालकृष्ण आडवाणी ने उठाया था। उन्होंने 1990 में सोमनाथ से अयोध्या तक की अपनी 'राम रथयात्रा' के जरिए देशभर में उन्मादी माहौल बनाकर भाजपा के लिए सत्ता में पहुंचने का रास्ता तैयार किया था। राम मंदिर मुद्दे के सहारे ही भाजपा ने लोकसभा में अपनी सदस्य संख्या दो से बढ़ाकर पहले 89 फिर 110 और बाद में 150 तक पहुंचाई और केंद्र में गठबंधन सरकार बनाई। लेकिन सत्ता में रहते हुए अपने गठबंधन के सहयोगियों के दबाव में भाजपा को अपनी हिंदूवादी राजनीति के अन्य विवादास्पद मुद्दों के साथ ही राम मंदिर का मुद्दा भी ठंडे बस्ते में डालना पड़ा। तभी से यह मुद्दा अपनी रंगत लगातार खोता गया। फिर भी दिल है कि मानता नहीं इस मुद्दे को देश की राजनीति में बेअसर हुए लगभग दो दशक हो चुके हैं और इस दौरान भाजपा दो मर्तबा लोकसभा और तीन दफा उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव हार चुकी है। हालांकि 2014 के लोकसभा चुनाव और 2017 में उत्तर प्रदेश विधानसभा में भाजपा ने जीत हासिल की, लेकिन इन चुनावों में राम मंदिर का मुद्दा कहीं नहीं था। लेकिन अब वह 'दिल है कि मानता नहीं' की तर्ज पर फिर इस मुद्दे के सहारे चुनाव में उतर रही है। सवाल है कि क्या राम मंदिर मुद्दा रूपी यह काठ की हांडी क्या बार-बार चुनावी चूल्हे पर चढ़ाई जा सकती है? इस सवाल का सटीक जवाब भाजपा के ही दो शीर्ष नेता बहुत पहले दे चुके हैं। बात लगभग दो दशक पुरानी है। 1999 में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव के दौरान एक वोट से गिर गई थी और 13वीं लोकसभा के लिए मध्यावधि चुनाव की घोषणा हो चुकी थी। 26 दलों के एनडीए की अगुआई कर रही भाजपा के अध्यक्ष थे कुशाभाऊ ठाकरे। 'हिंदुस्तान' अखबार में ठाकरे का एक इंटरव्यू छपा था, जिसमें अखबार के विशेष संवाददाता जयशंकर गुप्त द्वारा राम मंदिर से संबंधित पूछे गए एक सवाल के जवाब में ठाकरे ने कहा था- 'नदी पार करने के लिए नाव की आवश्यकता होती है। नदी पार कर लेने के बाद जरूरी तो नहीं कि नाव को कंधे पर लाद कर आगे बड़ा जाए।' अयोध्या मुद्दे पर इसी से मिलती-जुलती बात उन्हीं दिनों एक पत्रकार परिषद में भाजपा की वरिष्ठ नेता सुषमा स्वराज ने भी कही थी। उनका कहना था कि राम मंदिर मुद्दा भाजपा के लिए एक बेअरर चेक की तरह था, जिसे हमने भुना लिया है। बेअरर चेक को बार-बार नहीं भुनाया जा सकता। ठाकरे और सुषमा स्वराज ने व्यावहारिक बात कही थी। क्योंकि राम मंदिर मुद्दे के जरिये ही भाजपा ने वह ताकत अर्जित की थी, जो उसे केंद्र की सत्ता तक पहुंचाने में सहायक बनी थी। चूंकि भाजपा का मौजूदा नेतृत्व ठाकरे और सुषमा की तरह राजनीतिक सोच-विचार रखने वाला नहीं, लिहाजा वह इस राजनीतिक व्यावहारिकता को नहीं समझ सकता।