दिसम्बर 2018

केंद्र-राज्य टकराव का नया दौर शुरू होगा!

रविवार डेस्क

देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी यानी केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) की साख पर मंडरा रहा संकट अब केंद्र और राज्यों के बीच टकराव का बायस भी बनता नजर आ रहा है। आंध्र प्रदेश और पश्चिम बंगाल सरकार ने जिस तरह अभूतपूर्व कदम उठाते हुए अपने यहां सीबीआई की सीधे दखलंदाजी पर रोक लगा दी है, उसका आने वाले दिनों में विस्तार हो सकता है तथा कुछ अन्य विपक्ष शासित राज्य भी ऐसा कर सकते हैं।

केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) के दो शीर्ष अधिकारियों के बीच भ्रष्टाचार के आरोप-प्रत्यारोप को लेकर मचे घमासान के बीच आंध्र प्रदेश और पश्चिम बंगाल सरकार ने जो अभूतपूर्व और चौंकाने वाले फैसले लिए हैं, उनकी गूंज दूर तक और देर तक सुनाई देगी। दोनों राज्य सरकारों ने अपने-अपने सूबे में सीबीआई की सीधे दखलंदाजी पर अब पाबंदी लगा दी है। गौरतलब है कि सीबीआई दिल्ली स्पेशल पुलिस स्टैब्लिशमेंट एक्ट 1946 के तहत गठित और केंद्र सरकार के तहत काम करने वाली जांच एजेंसी है। चूंकि, कानून-व्यवस्था राज्य के अधिकारों की सूची में शामिल है, लिहाजा इस एक्ट की धारा 6 के तहत मामलों की जांच के लिए राज्यों की सहमति आवश्यक है और ज्यादातर राज्य सरकारें बहुत सारे मामलों के लिए स्थायी सम्मति की अधिसूचना जारी कर चुकी हैं। लेकिन अब इस सम्मति को आंध्र प्रदेश और पश्चिम बंगाल की सरकार ने वापस ले लिया है। दोनों राज्यों में अब किसी भी जरूरी मामले में तलाशी, छापामारी या जांच का काम सीबीआई के बजाय राज्य सरकार के अधीन काम करने वाला एंटी करप्शन ब्यूरो करेगा। इस आशय के फैसले की घोषणा करते हुए पहले आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने और फिर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने केंद्र सरकार पर सीबीआई के राजनीतिक इस्तेमाल का आरोप लगाया है। दोनों राज्य सरकारों के इस फैसले पर वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा है कि इन सरकारों ने यह फैसला अपने गलत कामों को छुपाने के लिए लिया है। केंद्र सरकार के नुमाइंदे के तौर पर जेटली की यही प्रतिक्रिया अपेक्षित थी। लेकिन नायडू ने कहा है कि अब सीबीआई समेत तमात केंद्रीय एजेंसियों को केंद्र में शीर्ष पर बैठे एक-दो व्यक्ति अपने फायदे और विरोधियों को ब्लैकमेल करने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं। इसी तरह का आरोप राहुल गांधी, ममता बनर्जी, शरद यादव, अरविंद केजरीवाल समेत तमाम विपक्षी नेता ही नहीं लगा रहे हैं बल्कि इस तरह की आवाजें केंद्र में सत्तारूढ़ एनडीए के घटक दलों की ओर से भी उठ रही हैं। भाजपा के भी भीतर एक वर्ग है जो ऐसा ही महसूस कर रहा है। दरअसल, हमारा देश इस समय राजकाज और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के विचलन पर अंकुश रखने वाली संस्थाओं की बर्बादी के दौर से गुजर रहा है। चुनाव आयोग, सतर्कता आयोग, सूचना आयोग, सीएजी, रिजर्व बैंक और यहां तक की न्यायपालिका की साख भी सवालों के घेरे में आने से बच नहीं पाई है। ऐसे में देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी यानी सीबीआई की विश्वसनीयता की साख पर अंगुली उठना या केंद्र सरकार पर इस एजेंसी के दुरुपयोग का आरोप लगना कोई नई और चौंकाने वाली बात नहीं है। यही वजह है कि सीबीआई के गठन को गुवाहाटी हाई कोर्ट अपने एक फैसले में असंवैधानिक बता चुका है। उसका यह फैसला अभी सुप्रीम कोर्ट के विचाराधीन है। दरअसल सीबीआई के कामकाज का अब तक जो रिकॉर्ड रहा है, उसके आधार पर यह कहना अनुचित नहीं होगा कि सीबीआई के रूप में केंद्र सरकार ने एक समानांतर पुलिस बल खड़ा कर लिया है और वह इसका इस्तेमाल आमतौर पर अपने राजनीतिक हितों को साधने के लिए करती है। सीबीआई के कामकाज पर बारीकी से निगाह रखने वाले जानते हैं कि यह एजेंसी किसी भी मामले की जांच का काम तो जोर-शोर से शुरू करती है, लेकिन कुछ ही दिनों बाद मामला फिस्स हो जाता है। केंद्र सरकार द्वारा अपने राजनीतिक विरोधियों से हिसाब चूकता करने या उन्हें राजनीतिक तौर पर अपने अनुकूल बनाने के लिए सीबीआई को औजार के तौर पर इस्तेमाल करने का इतिहास चार दशक से भी पुराना है। पिछले चार दशकों में करीब-करीब हर सरकार ने सीबीआई को अपने राजनीतिक हरम की बांदी की तरह इस्तेमाल किया है। इसीलिए कुछ वर्षों पहले सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान सीबीआई के तत्कालीन निदेशक को बुरी तरह लताडा था और कहा था कि सीबीआई केंद्र सरकार के तोते की तरह काम करता है। इस सिलसिले में बिल्कुल ताजा मामला बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव का माना जा सकता है, जिनके बारे में सीबीआई के मौजूदा निदेशक आलोक वर्मा ने केंद्रीय सतर्कता आयुक्त सीवीसी को एक नोटिस के जवाब में भेजे अपने पत्र में आरोप लगाया है कि आईआरसीटीसी घोटाले की जांच के समय सीबीआई के विशेष निदेशक राकेश अस्थाना बिहार के उपमुख्यमंत्री तथा भाजपा नेता सुशील मोदी और प्रधानमंत्री कार्यालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के लगातार संपर्क में थे और पर्याप्त साक्ष्य न होने के बावजूद लालू यादव और उनके परिजनों के खिलाफ मामला दर्ज करने की जल्दबाजी में थे। ऐसे ही एक अन्य मामले में सीबीआई के डीआईजी एमके सिन्हा ने देश के मुख्य सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवाल तथा प्रधानमंत्री कार्यालय से संबद्ध राज्यमंत्री पर एक महत्वपूर्ण मामले में जांच को प्रभावित करने तथा रिश्वत लेने के आरोप लगाए हैं। बहरहाल, चंद्रबाबू नायडू और ममता बनर्जी ने जो कदम उठाया है, उसका दायरा अन्य विपक्ष शासित राज्यों तक बढ़ सकता है। यदि ऐसा होता है तो केंद्र-राज्य टकराव का नया और बड़ा दौर शुरू होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। इस टकराव से बतौर संस्था सीबीआई का बचा-खुचा इकबाल भी जाता रहेगा। सुप्रीम कोर्ट के समक्ष भी एक नई चुनौती खड़ी हो सकती है कि उच्च पदों पर भ्रष्टाचार से इस निवारक संस्था को कैसे बचाया जाए।