दिसम्बर 2018

सीबीआई की पतनगाथा का ताजा अध्याय

रवींद्र दुबे

देश की सर्वोच्च जांच एजेंसी सीबीआई इन दिनों फिर से गलत कारणों की वजह से सुर्ख़ियों में है। यह और बात है कि उसे सुर्ख़ियों में आने के लिए सही कारण कभी मिले ही नहीं। सीबीआई के डायरेक्टर आलोक वर्मा और स्पेशल डायरेक्टर राकेश अस्थाना के बीच छिड़े हुए खुले युद्ध की सड़ांध दिल्ली की सत्ता के गलियारों में बेतहाशा फैल गयी है। इससे न केवल सरकार में, बल्कि पूरे देश में चिंता का माहौल बन गया है। सरकार के सख़्त नियंत्रण वाला चेहरा अब ढीला होता नजर आ रहा है।

देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी का वर्तमान संकट प्रारंभ लगभग एक साल पूर्व हुआ, जब केन्द्रीय सतर्कता आयोग की बैठक में सीबीआई डायरेक्टर आलोक वर्मा ने राकेश अस्थाना की एडिशनल डायरेक्टर से स्पेशल डायरेक्टर के पद पर पदोन्नति का विरोध किया। केन्द्रीय सतर्कता आयोग ने डायरेक्टर की बात नहीं मानी और यह पदोन्नति कर दी। गुजरात कैडर के अधिकारी राकेश अस्थाना पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का वरदहस्त था। अस्थाना ने अनेक प्रशासकीय कार्यों में डायरेक्टर के फैसलों में दखलंदाजी करने की कोशिश की। सारी हदें तो तब पार हुईं, जब 24 अगस्त उन्होंने कैबिनेट सेक्रेटरी के समक्ष डायरेक्टर आलोक वर्मा पर शिकायतन आरोप लगाया कि वर्मा ने मोइन क़ुरैशी प्रकरण के एक गवाह सतीश साना से दो करोड़ रुपये प्राप्त किये हैं। कैबिनेट सेक्रेटरी ने यह शिकायत जाँच के लिये केन्द्रीय सतर्कता आयोग को भेज दी। इस शिकायत के कुछ ही दिनों बाद सी।बी।आई। ने सतीश साना को मजिस्ट्रेट के सामने प्रस्तुत किया, जहाँ उसने पलटते हुए यह बयान दिया कि उसने राकेश अस्थाना को तीन करोड़ रुपये की रिश्वत दी है। बिना समय गंवाए डायरेक्टर आलोक वर्मा ने 15 अक्टूबर को इसमें प्राथमिकी दर्ज करा दी तथा अस्थाना के एक विश्वस्त उपाधीक्षक को गिरफ़्तार कर जेल भेज दिया। अस्थाना को स्वयं अपने गिरफ़्तार होने की आशंका हो गई और उन्होंने हाई कोर्ट से एक सप्ताह के लिए अपनी गिरफ़्तारी रुकवा ली। इन घटनाओं से हुई जगहँसाई को देखते हुए सरकार ने तत्काल कार्रवाई करते हुए दोनों अधिकारियों को देर रात ज़बरन छुट्टी पर भेज दिया ।शासन को यह निर्णय लेने में केन्द्रीय सतर्कता आयोग द्वारा 23 अक्टूबर को रात साढ़े आठ बजे भेजा गया वो पत्र काम आया, जिसमें उसने शासन को लिखा कि आलोक वर्मा जिनके विरुद्ध जाँच हो रही है, उन्होंने संबंधित दस्तावेज़ केन्द्रीय सतर्कता आयोग को प्रस्तुत नहीं किये हैं। इस आधार पर केन्द्रीय सतर्कता आयोग ने अपने अधिकारों का प्रयोग करते हुए वर्मा के समस्त अधिकार निरस्त कर दिये। शासन द्वारा ज़बरन छुट्टी पर भेजे जाने के आदेश को आलोक वर्मा ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, जिस पर 14 नवम्बर को सुनवाई हुई। मामले में एक जबरदस्त नाटकीय मोड़ 19 नवंबर को तब आ गया, जब राकेश अस्थाना के खिलाफ रिश्वत लेने के आरोपों की जाँच कर रहे उप-महानिरीक्षक स्तर के अधिकारी मनीष कुमार सिन्हा का स्थानान्तर एकाएक नागपुर कर दिया गया। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करते हुए आरोप लगाया कि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवाल ने राकेश अस्थाना के खिलाफ जांच में दखलंदाजी कर अस्थाना के घर की तलाशी रुकवा दी। सिन्हा की याचिका में प्रधानमंत्री कार्यालय, कोयला एवं खान राज्यमंत्री हरिभाई चौधरी और विधि सचिव सुरेश चंद्रा के खिलाफ गंभीर आरोप लगाये गए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसले में भारत सरकार के वर्मा को छुट्टी पर भेजने के आदेश को निरस्त नहीं किया। सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्रीय सतर्कता आयोग को दो हफ़्ते में आलोक वर्मा की जाँच पूर्ण करने के लिए कहा और केन्द्रीय सतर्कता आयोग के ऊपर पर्यवेक्षण के लिए एक सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट के जज पटनायक को नियुक्त कर दिया। भारत सरकार द्वारा बनाये गये सीबीआई के कार्यवाहक डायरेक्टर नागेश्वर राव के संबंध में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वे कोई महत्वपूर्ण फ़ैसला नहीं लेंगे और विगत दिनों में जो उन्होंने निर्णय लिए हैं उन्हें सुप्रीम कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत करें। सरकार और कांग्रेस दोनों ने इसे अपनी जीत बताई है। कांग्रेस एवं अन्य विपक्षी दलों ने सीबीआई की स्वायत्तता पर मोदी सरकार द्वारा किए गए हमलों की तीखी आलोचना की। मजेदार बात ये है कि कांग्रेस द्वारा पूर्व में सीबीआई का दुरुपयोग करने का एक लंबा इतिहास रहा है। लेकिन कांग्रेस ने जन-स्मृति की अल्पजीविता के मद्दे नजर मोदी सरकार पर प्रहार प्रारंभ कर दिये हैं। राहुल गांधी ने इस घटनाक्रम को नाटकीय मोड़ देते हुए सीधे-सीधे राफेल फाइटर जेट की ख़रीदी से ज़ोड़ दिया है और आरोप लगा दिया है कि राफ़ेल की जाँच को रोकने के लिए आलोक वर्मा को हटाया गया है। इसी दौरान आँध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने घोषणा कर दी कि उनके राज्यों में सीबीआई द्वारा अब कोई हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता है। ये दोनों मुख्यमंत्री, मोदी सरकार के विरुद्ध बनाए जा रहे महागठबंधन के साथ हैं तथा उसका नेतृत्व करना चाहते हैं। इस कारण इनके द्वारा दिया गया बयान राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। जहाँ तक क़ानूनी पहलू का सवाल है इन दोनों मुख्यमंत्रियों के बयानों का कोई मतलब नहीं है। सीबीआई वैसे भी स्वयमेव किसी राज्य के आपराधिक प्रकरणों में हस्तक्षेप नहीं कर सकती। सीबीआई केवल तीन तरह के मामलों में ही कार्रवाई कर सकती है। पहले प्रकार के प्रकरण वे हैं, जो केंद्र सरकार के अधिकारियों और कर्मचारियों से संबंधित है। दूसरे वे हैं जिनमें राज्य सरकार स्वयं केंद्र सरकार से सीबीआई द्वारा जाँच कराने की माँग करती है। तीसरे वो मामले हैं, जिन्हें हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट महत्वपूर्ण समझते हुए सीबीआई को जाँच के लिए देते हैं। यहाँ स्मरणीय है कि कॉमनवेल्थ गेम्स, टूजी स्पेक्ट्रम तथा कौल आवंटन घोटाले जैसे मामलों की जाँच सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर प्रारंभ की गई थी। इसलिए इन दोनों मुख्यमंत्रियों ने जो बयान दिए हैं वह वास्तव में यथास्थिति का ही द्योतक हैं। वर्मा के पक्ष में कांग्रेस और विपक्षी दल अचानक आ गए हैं, क्योंकि उन्हें आशा है कि वर्मा डायरेक्टर का पद पाते ही केंद्र सरकार के विरुद्ध किसी ऐसे संवेदनशील मामले में जाँच खड़ी कर सकते हैं, जो उन्हें आगामी चुनाव में एक बड़ा मुद्दा दे सकती है। दूसरी तरफ़ सरकार के तथाकथित समर्थक स्पेशल डायरेक्टर श्री अस्थाना के विरुद्ध गंभीर आरोपों पर सी।बी।आई। द्वारा ही जाँच की जा रही है। सी।बी।आई। के इन दोनों अधिकारियों की आंतरिक लड़ाई अब सुप्रीम कोर्ट में बहस का मुद्दा बन गई है। इसमें कोई दो मत नहीं हो सकते कि सी बी आई के इस घटनाक्रम में जो कुछ दिखाई दे रहा है, मामला उस से कहीं ज्यादा गहरा है | इस मामले में जिस तरह की पेंचबंदी की गई है, उसके तार राजनीति और 2019 में आने वाले आम चुनाव से जुड़े हैं | सी बी आई के दोनों गुट एक दूसरे के खिलाफ पिछले कई महीनों से एक दूसरे के खिलाफ न सिर्फ सक्रिय हैं बल्कि एक दूसरे की कब्र खोदने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे हैं। और तो और शिकायतों सार्वजनिक होने और सरकारी खतोकिताबत के मीडिया तक पंहुचाए जाने में सियासत की भूमिका भी साफ नजर आ रही है। अगर यह बात सही है, तो इस सब के पीछे किस का हाथ है? ये काम भी किसी अपराध से कम नहीं है। इस केन्द्रीय एजेंसी के साथ ही यह उन लोगों पर भी सवालिया निशान लगते हैं। लंबा सिलसिला है सीबीआई के दुरुपयोग का सीबीआई की निष्पक्षता पर प्रश्नचिन्ह बार-बार यों ही नहीं लगते। इसका एक लंबा इतिहास है। संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) के पहले कार्यकाल को याद करें। 2004 में जब गठबंधन पहली बार सत्ता में आया तो सरकार ने एजेंसी को तहलका डॉटकॉम द्वारा उजागर रक्षा सौदों की जाँच का काम सौंपा। इन सौदों का भंडाफोड़ 2001 में हुआ था। उस समय राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबंधन सत्तासीन था और इसी सीबीआई ने तहलका के रिपोर्टर कुमार बादल को सहारनपुर में तीन तेंदुओं की मौत में उनकी भूमिका के मद्देनजर गिरफ्तार कर लिया था। यह वही सीबीआई थी, जिसने झारखण्ड मुक्ति मोर्चा रिश्वत कांड में दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा झामुमो नेताओं और पीवी नरसिंह राव को दोषमुक्त कर दिए जाने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील करना मुनासिब नहीं समझा और 90 दिन की समय सीमा को बीत जाने दिया। जिन्होंने सीबीआई को करीब से देखा है, उनके लिए इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है। सीबीआई को सौंपे जाने वाले मामलों की शुरुआत बहुत धमाकेदार होती है। वे कुछ दिन सुर्खियों में बने भी रहते हैं। फिर वे या तो टाँय-टाँय फिस्स हो जाते हैं या फिर अदालती भूलभुलैयाँ में खोकर और आम जनता की याददाश्त से ओझल होकर सालों घिसटते रहते हैं। हुक्मरानों द्वारा सीबीआई को राजनीतिक विरोधियों से हिसाब किताब बराबर करने के औजार के रूप में इस्तेमाल करते हुए साढ़े तीन दशक से अधिक अरसा बीत चुका है। अस्सी के दशक के अंत में, जब प्रधानमंत्री राजीव गांधी पर बोफोर्स मामले में दबाव पड़ा, तो सीबीआई को कार्मिक मंत्रालय से हटाकर प्रधान मंत्री कार्यालय की ले आया गया। एजेंसी के तत्कालीन निदेशक मोहन कात्रे ने बोफोर्स मामले के जांच खुद अपने हाथों में ले ली। इस सिलसिले में उन्होंने स्वीडन और स्विट्जरलैंड के अनेकों चक्कर लगाये। कात्रे को सेवावृद्धियां भी मिलीं। अरुण मुखर्जी राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल के अंतिम सीबीआई निदेशक थे जिन्हें विश्वनाथ प्रताप सिंह के गद्दी संभालते ही महीने भर में दरवाजा दिखा दिया गया। कहा गया कि राजीव गांधी की मदद के लिए बोफोर्स मामले के साथ उन्होंने छेड़छाड़ की। दूसरी ओर कांग्रेस का कहना था कि मुखर्जी सैयद मोदी हत्याकांड में अमिता मोदी की डायरी प्रेस को लीक करने के आरोप में हटाये गए थे। मुखर्जी की जगह लाए गए निदेशक आर। शेखर ने एक पत्रकार वार्ता बुलाकर बोफोर्स मामले में प्राथमिकी दर्ज किए जाने की घोषणा की। सामान्यतया दो या तीन पन्नों की जगह इस एफआईआर में 56 पेज थे, जिनका महत्व अदालत से ज्यादा मीडिया के लिए था। इस पर एक जज ने व्यंग्यपूर्ण टिप्पणी भी की थी। जैन हवाला कांड याद है आपको? जैन की हवाला डायरियां चंद्रशेखर के प्रधानमंत्रित्व काल में बरामद हुई थीं। बताते हैं कि तत्कालीन निदेशक राजा विजय करण ने उन्हें प्रधानमंत्री के आदेश पर तिजोरी में बंद कर दिया था। वे पीवी नरसिंह राव के कार्यकाल में सार्वजनिक हुईं। ऐसा एक जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश से हुआ था। जैसे ही ये डायरियां सार्वजनिक हुईं, राव के पार्टी के भीतर और बाहर के सारे विरोधी ध्वस्त हो गए। राव के बाद आये देवगौड़ा। उन्होंने कर्नाटक कैडर के जोगिन्दर सिंह को निदेशक पद के लिए चुना। देवगौड़ा की पार्टी के तत्कालीन अध्यक्ष लालू यादव पर चारा घोटाले के आरोप लगे और उन्होंने यह सोचकर मामला सीबीआई को सौंप दिया कि सरकार उन्हीं की पार्टी की है इसलिए मामले पर पर्दा पड़ा रहेगा। लेकिन तत्कालीन संयुक्त निदेशक यूएन बिस्वास ने ऐसा नहीं होने दिया। उन्होंने पटना है कोर्ट से कहा कि उनके द्वारा भेजी गई रिपोर्ट से छेड़छाड़ की गई है। इस पर हाईकोर्ट ने बिस्वास से सीधे उन्हें रिपोर्ट करने को कहा। लालू की गिरफ्तारी के लिए सेना बुला कर बिस्वास ने ड्रामा तो खड़ा कर दिया, लेकिन एजेंसी को इस मामले में आज तक कोई सबूत नहीं मिला। जोगिन्दर सिंह ने इस दौरान तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सीताराम केसरी की संपत्ति और उनके निजी डॉक्टर तंवर की हत्या की भी जांच की। केसरी को लगा कि देवगौड़ा उन्हें उलझाना चाहते हैं। उन्होंने सरकार से समर्थन वापस ले लिया। सीबीआई छः साल तक सत्ता में रही वाजपेयी सरकार के भी काम आई। तहलका के साथ साथ कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के निजी सचिव विन्सेंट जॉर्ज के खिलाफ भी आय से अधिक संपत्ति रखने के मामले को उकेरा। इतना ही नहीं, राजग के कार्यकाल में ही सीबीआई ने बाबरी मस्जिद ध्वंस मामले में लालकृष्ण आडवानी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती आदि नेताओं को क्लीन चिट दे दी। भारत के भविष्य के हित को ध्यान में रखने वालों को यह चिंता होना स्वाभाविक है कि ऐसी परिस्थितियां भविष्य में न हो। इस समस्या का एकमात्र हल यही है कि सीबीआई को अमेरिकी जाँच एजेंसी FBI की तर्ज़ पर पूरी तरह से स्वायत्त कर दिया जाए। दरअसल, भारत की सीबीआई को अमेरिका की FBI की भाँति कोई मज़बूत क़ानूनी ढांचा प्राप्त नहीं है तथा वह उसके सामने बहुत बौनी है। सभी राजनीतिक दल सीबीआई और राज्यों में पुलिस पर से अपना नियंत्रण नहीं समाप्त होने देना चाहते हैं। इसलिए सीबीआई की स्वायत्तता की आशा केवल सुप्रीम कोर्ट से ही की जा सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व में भी सीबीआई डायरेक्टर का दो वर्ष का निश्चित कार्यकाल कर दिया था। परंतु यह एक बहुत छोटा क़दम था और जब तक सीबीआई का मूलभूत वैधानिक ढाँचा बदला नहीं जाता, तब तक इसमें कोई सुधार होने की गुंजाइश नहीं है।