दिसम्बर 2018

संस्थाओं की बर्बादी का महासंकट

हरिमोहन मिश्र

न्यायपालिका, चुनाव आयोग, योजना आयोग, सतर्कता आयोग, सीबीआई, रिजर्व बैंक, उच्च शिक्षण संस्थान आदि वे संस्थाएं हैं, जो हमारे लोकतंत्र की बुनियाद हैं। ये संसदीय लोकतंत्र के बहकने और खास हितों के लिए उसके दुरुपयोग पर अंकुश लगाती रही हैं। इसलिए इनका ढहना बड़े खतरे का सूचक है। ये संस्थाएं कोई एक दिन में नहीं बनी हैं और कई थपेड़े झेल चुकी हैं या उथल-पुथल के दौर से गुजर चुकी हैं। इमरजेंसी का वह दौर याद कीजिए। संस्थाएं अगर नष्ट हो गईं तो उन्हें फिर से खड़ा करना इतना आसान नहीं हो पाएगा।

लगता है, मोदी सरकार 'सारा इतिहास-वर्तमान बदल डालूंगा' जैसे किसी मिशन पर सवार है और वह भी कुछ ऐसे कि आपको भरपूर सस्पेंस और सिर खुजाते रह जाने का मजा दें। आप भला विधानसभा भंग करने का ऐसा 'फैक्साना' फसाना कब और कहा सुन पाए होंगे, जैसा जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने सुनाया है। आपने शायद ही कभी किसी प्रधान न्यायाधीश को प्रधानमंत्री की मौजूदगी में फफक-फफक कर रोते देखा होगा, न कभी यह जान पाए होंगे कि न्यायपालिका की संगीन दशा पर सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठ न्यायाधीशों ने प्रेस कांफ्रेंस बुलाकर प्रधान न्यायाधीश के रवैये पर सवाल उठाया। न कभी आपने केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) का वह तमाशा देखा होगा, जिसमें समूचा अमला दो हिस्सों में बंटकर एक-दूसरे पर ही नहीं, हाकिमों (प्रधानमंत्री कार्यालय, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार, आला नेता के अपने प्रदेश के एक केंद्रीय राज्यमंत्री, केंद्रीय सतर्कता आयोग) पर भी कीचड़ उछाल होली खेल रहा है और रोज-रोज नए कारनामे उजागर कर रहा है। इस भंवर में सुप्रीम कोर्ट का रवैया भी सवालों को आमंत्रित करने लगा है। फिर हमारी अर्थव्यवस्था और जमा-पूंजी के रखवाले भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की चूले झकझोरने की कहानी भी सामने है। तो, क्या यह सवाल नहीं पूछा जाना चाहिए कि आखिर पिछले चुनावों में अप्रत्याशित बड़ी जीत हासिल करके सत्ता में आई एनडीए या नरेंद्र मोदी सरकार के आखिरी दौर में आते-आते सारी संस्थाएं ढहने क्यों लगी हैं? योजना का नाम बदला, काम खत्म! दरअसल, संस्थाओं को तोड़ने-मरोड़ने या उनका मानमर्दन करने का सिलसिला सरकार ने मई 2014 में सत्ता संभालने के साथ ही शुरू कर दिया था। सबसे पहले योजना आयोग को भंग करके उसकी जगह नीति आयोग बनाया गया, जो अभी तक भी कोई खास शक्ल नहीं ले पाया है। उसके पूर्व उपाध्यक्ष अरविंद पानगड़िया को अनिश्चितता की वजह से अपना पद छोड़कर वापस अमेरिकी विश्वविद्यालय में जाना पड़ा। उनकी जगह सिर्फ राजीव कुमार ही नहीं बैठाए गए, बल्कि एक सीईओ अमिताभ कांत को बैठाया गया। लेकिन, अब लगता है कि इस संस्था को सिर्फ अपने चहेते नौकरशाहों को रिटायर होने के बाद बेहतरीन पनाहगाह की तरह इस्तेमाल किया जाने लगा है। न्यायपालिका की अहमियत घटाई योजना आयोग को ठिकाने लगाने के बाद सरकार न्यायिक नियुक्ति आयोग संशोधन विधेयक ले आई, जिसका मकसद न्यायिक नियुक्तियों में सुप्रीम कोर्ट की अहमियत घटा कर उसमें सरकार की भूमिका बढ़ाना था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश टीएस ठाकुर की अगुआई में संविधान पीठ ने उसे असंवैधानिक घोषित कर दिया और नई मानक नियुक्ति प्रक्रिया तैयार करने के लिए सरकार को निर्देश दिया। लेकिन यह मामला आज तक लटका है। नियुक्तियों के मामले में ही न्यायाधीश ठाकुर को आंसू भी बहाने पड़े थे। हालांकि उनके बाद आए प्रधान न्यायाधीश जेएस खेहर और फिर न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा के कार्यकाल में सरकार के हक में कई फैसले ऐसे हुए, जो विवादास्पद हैं। इनमें बिड़ला-सहारा डायरियों और महाराष्ट्र में जज लोया की विवादास्पद परिस्थितियों में आकस्मिक मौत जैसे मामलों में जांच से मुंह मोड़ लेना प्रमुख है। प्रधान न्यायाधीश के पद से पिछले दिनों सेवानिवृत्त हुए दीपक मिश्रा जब अपने कार्यकाल में महत्वपूर्ण मामलों की सुनवाई वरिष्ठ जजों की अनदेखी कर न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा जैसे कनिष्ठ जजों को देने का सिलसिला शुरू किया तो इस 'असाधारण स्थिति' के खिलाफ चार वरिष्ठ चार जजों न्यायमूर्ति जे. चेलमेश्वर, रंजन गोगोई, कुरियन जोसफ और मदन बी. लोकुर ने मीडिया के माध्यम से देश को बताया कि सुप्रीम कोर्ट में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है, जिससे देश का लोकतंत्र खतरे में है। आजाद भारत के इतिहास में यह अपनी तरह का पहला वाकया था, जिसने देश की सर्वोच्च अदालत के मुखिया को कठघरे में खड़ा किया था। अब प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई के जिम्मे संस्थाओं की बर्बादी रोकने और उच्च पदों से जुड़े मामलों में फैसला सुनाने का वक्त आया है। सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई, राफेल विमान सौदा, गुजरात दंगों की पीड़ित जाकिया जाफरी मामले में जो रुख दिखाया है, उससे उम्मीद भी बंधी है, लेकिन सीबीआई मामले में उसके हालिया रवैये से कुछ सवाल भी उठे हैं। उच्च शिक्षण संस्थानों का मान मर्दन मोदी सरकार के गठन के साथ ही खासकर तत्कालीन मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी के कार्यकाल में विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षा संस्थानों की स्वायत्तता खत्म करने, आला पदों पर अपने चहेतों को बैठाने और सम्मानित अकादमिक हस्तियों को अपमानित करने का सिलसिला शुरू हुआ। इसके विद्प नजारे विद्गुप दिल्ली में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के साथ ही कोलकाता, चेन्नई, इलाहाबाद, बनारस के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में देखने को मिले, जहां उन्मादी राष्ट्रवाद के खिलाफ छात्रों के आंदोलन, गिरफ्तारियां वगैरह भी देखने को मिलीं। विश्वविद्यालयों के अनुदान में कटौती और उनकी भर्तियां रोककर उन्हें मजबूर करने और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग को बेमानी बनाने की कोशिशों से भी देश बाहर हो चुका है। आईआईटी और आईआईएम जैसे संस्थानों के मुखिया और विश्वविद्यालयों के कुलपति पदों पर संघ परिवार के लोगों की नियुक्तियों का मामला भी जाना-पहचाना है। सरकार यह सब करते हुए नई शिक्षा नीति लाने का वादा करती रही है। लेकिन वह अपने कार्यकाल के आखिरी दौर तक नहीं ला पाई है। चुनाव आयोग भी सरकार से निर्देशित! लोकतंत्र के लिए एक और अहम संस्था चुनाव आयोग को भी अपने हक में करने की कोशिशों के नजारे दिख चुके हैं। सबसे ताजा मामला तो मौजूदा विधानसभा चुनावों का ही है, जब चुनाव तारीखों के ऐलान के लिए प्रेस कॉन्फ्रेंस की तय अवधि टाल दी गई। आरोप यह है कि प्रधानमंत्री को जयपुर में कुछ ऐलान के लिए मोहलत दी जानी थी। पिछले साल गुजरात और हिमाचल प्रदेश के चुनाव की तारीखों का ऐलान भी अलग-अलग करने पर भी यही सवाल उठ खड़ा हुआ था। यही नहीं, दिल्ली में 22 विधायकों को संसदीय सचिव बनाने के मामले में भी आयोग के फैसले एकतरफा साबित हुए। आयोग ने उन्हें अयोग्य ठहरा दिया था जबकि दिल्ली हाई कोर्ट ने उसके फैसले को असंवैधानिक करार दे दिया और अब राष्ट्रपति ने भी उसे बेमानी बता दिया है। आयोग लगभग समूचे विपक्ष के ईवीएम पर उठाए सवालों को भी नजरअंदाज कर रहा है। होना यह चाहिए था कि ईवीएम पर जब शंकाए हैं तो उसके इस्तेमाल पर पुनर्विचार किया जाता। सीबीआई का सत्यानाश बड़े पदों पर कदाचार और भ्रष्टाचार की रोकथाम के लिए गठित सीबीआई के हाल तो जगजाहिर है ही, उसके साथ केंद्रीय सतर्कता आयोग, प्रवर्तन निदेशालय (ईडी), खुफिया ब्यूरो (आईबी) वगैरह भी कीचड़ में लथपथ है, जिनकी खबरों से अब देश अनजान नहीं रह गया है। कथित तौर पर विपक्षी नेताओं के खिलाफ इस्तेमाल करने और अपने चहेतों को बरी करने के लिए सीबीआई को माफिक बनाने का सिलसिला तो कई साल से जारी है लेकिन 2016 में सीबीआई के निदेशक अनिल सिन्हा के रिटायर होने के साथ ही यह सिलसिला जोर पकड़ गया। दो दिसबर को उनके रिटायर होने के वक्त वरिष्ट अधिकारी एसके दत्ता को उनकी जगह लेनी थी, लेकिन सरकार ने दो दिन पहले उनका तबादला गृह मंत्रालय में विशेष सचिव के तौर पर कर दिया, जिसके बैठने के लिए वहां दफ्तर भी नहीं था। फिर गुजरात काडर के 1984 बैच के राकेश अस्थाना को विशेष निदेशक बनाकर उन्हें कार्यकारी भूमिका दे दी गई। लेकिन निदेशक नियुक्ति मंडल ने फरवरी 2017 को आलोक वर्मा को निदेशक नियुक्त किया। इस मंडल में प्रधानमंत्री के अलावा प्रधान न्यायाधीश या उनकी ओर से सुप्रीम कोर्ट का कोई वरिष्ठ जज और लोकसभा में विपक्ष या सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी का नेता होता है। आलोक वर्मा निदेशक जरूर बना दिए गए, लेकिन अस्थाना ही सभी महत्वपूर्ण मामले देखते रहे। सीबीआई में अपने पहले कार्यकाल के दौरान चारा घोटाले में लालू यादव के खिलाफ चार्जशीट तैयार करने वाले अस्थाना यूपीए सरकार बनने के बाद अपने मूल काडर गुजरात चले गए थे। उन्होंने गोधरा साबरमती एक्सप्रेस अग्निकांड, अक्षरधाम जैसे मामलों की जांच भी की थी। सीबीआई में फिलहाल उनके जिम्मे लालू यादव के खिलाफ आईआरटीसी होटल घोटाले, विजय माल्या के प्रवर्तन, नीरव मोदी और मेहुल चौकसी वगैरह के संगीन मामले थे। माल्या के लुकआउट नोटिस को ढीला करने का आरोप भी उन पर उछला। लेकिन अस्थाना की कार्यशैली और अपने अधिकारों में दखलदाजी से आलोक वर्मा नाखुश हुए। उन्होंने अस्थाना के खिलाफ कई मामलों में चल रही जांच का हवाला देकर केंद्रीय सतर्कता आयुक्त (सीवीसी) केवी चौधरी से शिकायत की कि उन्हें विशेष निदेशक नहीं बनाए रखना चाहिए, लेकिन चौधरी ने तब उसे खारिज कर दिया था। तनाव बढ़ने पर अस्थाना ने 24 अगस्त को वर्मा के खिलाफ गोमांस निर्यातक मोइन कुरैशी के मामले में हैदराबाद के व्यापारी सतीश सना से 2 करोड़ रुपए घूस लेने की शिकायत कैबिनेट सचिव से की, जो जांच के लिए सीवीसी के पास पहुंची। लेकिन सीवीसी उस शिकायत पर मौन रहे। फिर 26 अक्टूबर को प्रधानमंत्री ने वर्मा को बुलाया, मगर बात नहीं बनी तो 27 अक्टूबर की आधी रात सीवीसी की सिफारिश पर वर्मा और अस्थाना दोनों को लंबी छुट्टी पर भेज दिया गया। कार्यभार एम. नागेश्वर राव को दे दिया गया। राव ने दनादन 13 अधिकारियों के तबादले कर दिए, जिनमें ज्यादातर वही थे जो अस्थाना के खिलाफ जांच कर रहे थे। यह सब कुछ 28 अक्टूबर की सुबह 9 बजे के पहले हो चुका था और वर्मा तथा अस्थाना को दफ्तर में न घुसने देने का निर्देश भी जारी हो चुका था। 29 अक्टूबर को वर्मा ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उसके बाद एनजीओ कॉमन कॉज की ओर से वकील प्रशांत भूषण ने भी याचिका लगाई और बाद में नियुक्ति कमेटी के सदस्य के नाते कांग्रेस के लोकसभा में नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने वर्मा को पुनर्स्थापित करने की याचिका लगाई। सुप्रीम कोर्ट ने सीवीसी से दस दिन में वर्मा के खिलाफ जांच की पूरी करने का निर्देश दिया और उसकी निगरानी सुप्रीम कोर्ट के रिटायर जज एके पटनायक के हवाले कर दी। सीवीसी ने वर्मा के खिलाफ जाँच की रपट सीलबंद लिफाफे में सुप्रीम कोर्ट को सौंपी, जिसमें कुछ 'असामान्य' और कुछ 'गंभीर' टिप्पणियां थीं। उसे जवाब के लिए वर्मा को सौपा गया। लेकिन अगली सुनवाई पर रिपोर्ट लीक होने पर प्रधान न्यायाधीश गोगोई भड़क गए और उन्होंने 29 नवबर तक सुनवाई टाल दी। इस बीच बस्सी, जिनका तबादला अंडमान-निकोबार कर दिया गया है, और एमके सिन्हा, जिनका तबादला नागपुर कर दिया है, अपनी -अपनी अर्जी लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंच चुके थे। सिन्हा ने आरोप लगाया कि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवाल और केंद्रीय राज्यमंत्री हरिभाई जांच में दखलंदाजी कर रहे थे और मंत्री महोदय ने तो रिश्वत भी ली है। सबूत के तौर पर उनकी बातचीत के टेप पेश किए गए। बहरहाल, वर्मा के सूत्रों के मुताबिक वे राफेल सौदे पर प्रशांत भूषण, यशवंत सिन्हा, अरुण शौरी की याचिका पर जांच शुरू कर रहे थे। उन्होंने दस्तावेजों के सत्यापन के लिए रक्षा मंत्रालय को लिखा भी था। इसके अलावा कोयला आवंटन घोटाले जैसे छह-सात संगीन मामलों की फाइलें उनकी मेज पर थीं। अब देखना है कि सुप्रीम कोर्ट कैसे सीबीआई, सीवीसी, आईबी, रॉ, ईडी जैसे अहम भ्रष्टाचार निवारक संस्थाओं की स्वायत्तता बहाल करा पाता है। रिजर्व बैंक पर टेढी नजरें अब जिस संस्था की स्वायत्तता पर सीधे सरकार की टेढी नजर है, वह है भारतीय रिजर्व बैंक यानी आरबीआई, जो हमारी अर्थव्यवस्था का मूलाधार है। कथित तौर पर सरकार चाहती है कि आरबीआई अपने करीब 9 लाख करोड़ रुपये के संरक्षित कोष में कुछ ढील दे, यानी उससे कुछ रकम आगे बढ़ाए,ताकि बैंक उद्योगों को कर्ज मुहैया करा सके और मंदी में घिरी अर्थव्यवस्था कम से कम 2019 के आम चुनावों के पहले कुछ सुखद एहसास दे सके। सरकार की मंशा यह भी है कि संरक्षित कोष से 3.6 लाख करोड़ रुपये सरकार को सौंप दे। याद करें यही वह राशि है, जिसकी उम्मीद नोटबंदी के बाद लगाई गई थी कि 3-4 लाख करोड़ रुपये बैंकों में वापस नहीं आएंगे तो उसे सरकार कथित लोक कल्याणकारी योजनाओं में लगाकर अपनी जय-जयकार करा लेगी। लेकिन वह तो मिला नहीं। आरबीआई के मुताबिक ही 99.3 प्रतिशत राशि बैंकों में आ चुकी है और कुछ पुराने नोट नेपाल, भूटान, दुबई वगैरह में चल रहे हैं, जिन्हें सरकार को वापस लेना है। खैर, सरकारी दलील यह है कि आरबीआई के संरक्षित कोष से ढील देने से छोटे और मझोले उद्योगों को कर्ज मुहैया होगा तो कारोबार-धंधों में कुछ चमक आएगी। लेकिन महंगाई पर अंकुश रखने के कारण रिजर्व बैंक के अधिकारी यह रियायत नहीं देना चाहते। उस ओर से दलील यह भी है कि जिस तरह बैंकों के डूबत खातों के कर्ज (जिन्हें सरकारी भाषा में गैर-निष्पादित संपत्तियां या एनपीए कहा जाता है, जो एक मायने में छलावा है) बढ़ते जा रहे हैं (मोटे अनुमान से करीब 13.5 लाख करोड़ रुपये), उसमें अगर और कर्ज देने की रियायत बरती गई तो उससे वैसा ही संकट पैदा हो सकता है जैसा नब्बे के दौर में चंद्रशेखर सरकार के दौरान खड़ा हुआ था और सोना गिरवी रखकर कर्ज लेना पड़ा था। यह भी कहा जा रहा है कि दिवालिया संहिता के तहत जब बैंकों ने नोटिस देने शुरू किए तो बड़े कर्जदारों में हड़कंप मच गया। निजी क्षेत्र की बिजली परियोजनाओं का मामला गंभीर होने लगा है। हाल में ऐसी ही एक परियोजना के लिए अडानी समूह ने इलाहाबाद हाई कोर्ट से राहत हासिल की है। कहा यह भी जा रहा है कि ये कंपनियां दिवालिया संहिता की कार्रवाई से बचाने के लिए बैंको से और कर्ज की मांग कर रही हैं। लेकिन आरबीआई की 19 नवंबर को केंद्रीय बोर्ड की बैठक में सरकार ने अपने नियुक्त किए निदेशकों के दबाव के आगे उसे झुका लिया है और संरक्षित कोष से रियायत के मामले के लिए एक कमेटी गठित की जा रही है। सरकार ने चेताया था कि अगर उसकी बातें नहीं मानी गईं तो वह आरबीआई कानून के अनुच्छेद 7 पर अमल करके उसे अपना आदेश मानने पर बाध्य कर सकती है, जिस पर आज तक कभी अमल नहीं किया गया। लेकिन कई बड़े सवाल आसानी से हल होते नहीं दिखते। कथित तौर पर पीएमओ में बातचीत के बाद रिजर्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल का रुख नरम पड़ा। आरबीआई बोर्ड में सरकार के नामित सदस्य एस. गुरुमूर्ति ने हाल ही में कहा कि नोटबंदी नहीं की जाती तो अर्थव्यवस्था बर्बाद हो जाती। कथित तौर पर नोटबंदी के सूत्रधारों में एक माने जाने वाले और आरएसएस से लंबे समय से जुड़े गुरुमूर्ति का यह बयान नोटबंदी के पहले आरबीआई की 8 नवबर 2०16 को शाम 5.3० बजे की बैठक के मिनिट्स के खुलासे के बाद आया है, जिसमें नोटबंदी के लिए सरकार के बताए लक्ष्यों को बेमानी करार दिया गया था। वैसे, नोटबंदी के बारे में प्रधानमंत्री ने हाल में छत्तीसगढ़ की एक चुनावी सभा में कहा, 'कांग्रेस के लोग बिस्तर और बोरों में भरकर नोट रखते थे। मोदी ने नोटबंदी करके सारे नोट निकाल लिए। कोई नहीं रो रहा है। बस एक परिवार रो रहा है।' यह कयास भी कई हलकों में लगाया ही जाता है कि नोटबंदी का मकसद 2017 मे उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के पहले विपक्षी दलों को नकदी से खाली कर देना था। जो भी हो, लेकिन नोटबंदी के सार्थक नतीजे तो शायद आरबीआई अभी नहीं खोज पाया है। मगर आरबीआई की बर्बादी के आसार नजर आने लगे हैं। ये सभी संस्थाएं हमारे लोकतंत्र की बुनियाद हैं। ये संसदीय लोकतंत्र के बहकने और खास हितों के लिए उसके दुरुपयोग पर अंकुश लगाती रही हैं। इसलिए इनका ढहना बड़े खतरे का सूचक है। ये संस्थाएं कोई एक दिन में नहीं बनी हैं और कई थपेड़े झेल चुकी हैं या उथल-पुथल के दौर से गुजर चुकी हैं। इमरजेंसी का वह दौर याद कीजिए। संस्थाएं अगर नष्ट हो गईं तो उन्हें फिर से खड़ा करना इतना आसान नहीं हो पाएगा। संकट की असली वजह आज का असली संकट शायद यही है कि सारी शक्तियां एक नेता में सिमट आई हैं और अलग राय रखने वाला हर कोई 'पराया' या 'दुश्मन' मान लिया जाता है। मोदी ही इकलौते लोकप्रिय नेता, मोदी ही हर राज्य में इकलौते चुनाव प्रचारक हो गए। यहां तक कि स्थानीय निकाय के चुनावों में भी मोदी ही चुनाव प्रचार करते नजर आए। आप जरा अंदाजा लगाइए कि 2014 के पहले भाजपा में ही लालकृष्ण आडवाणी, मुरलीमनोहर जोशी, सुषमा स्वराज, राजनाथ सिंह, नितिन गडकरी जैसे तमाम नेताओें की लोकप्रियता के अपने-अपने दायरे हुआ करते थे। अब मोदी और अमित शाह के अलावा शायद ही किसी की पूछ होती है। यह केंद्रीयकरण सभी को अपने मातहत करने और अपनी मर्जी से सब कुछ चलाने की भूख भी पैदा करता है, जो सभी संस्थाओं को नष्ट कर रहा है। मामला सिर्फ सीबीआई और आरबीआई का ही नहीं है, अभी तो शायद गैर-बैंकिंग संस्थाओं और बैंकों के ढहने के रूप में और बड़ा संकट कगार पर खड़ा नजर आ रहा है। कई जानकार कयास लगा रहे हैं कि अमेरिका में लीमन ब्रदर्स के डूबने जैसा संकट आ सकता है। बहरहाल, ये सभी संकट उसी केंद्रीकृत मनोवृत्ति और कामकाज की शैली के नतीजे हैं, जो दूसरो की हर राय को शंका की नजर से देखती है। लेकिन जब-जब ऐसा हुआ है, उसका अंत सुखद नहीं रहा है। अकसर ऐसे नेता अपनी जिद में देश को मुश्किल के कगार पर खड़ा करते रहे हैं। इंदिरा गांधी का उदाहरण हमारे सामने है। इमरजेंसी ही नहीं, बाद के दौर में पंजाब समस्या में भी वे ऐसे उलझीं कि उसका नतीजा भयावह हुआ। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार और 'आउटलुक' पत्रिका के सलाहकार संपादक हैं)