नवम्बर 2018

चुनाव

डॉ. सुभाष खंडेलवाल

एक बार एक नेता ट्रेन में सफर कर रहे थे। वे एसी कोच में ऊपर की बर्थ पर सोये हुए थे, अचानक आवाज लगी ‘टेशन’ आ गया है। वे बर्थ से नीचे गिर गए, कारण कि वे यह समझ बैठे थे कि शेषन आ गया है। शेषन के संकल्प से पुख्ता हुई चुनाव प्रणाली आज भारत के लोकतंत्र को बचा रही है। मुख्य चुनाव आयुक्त आचार संहिता के बाद प्रधानमंत्री की भूमिका में और प्रधानमंत्री जब देश में होते हैं तो मुख्य चुनाव आयुक्त की भूमिका में रहते हैं। यही नहीं प्रदेशों के चुनाव आयुक्त के सामने भी मुख्यमंत्री होश-हवास में रहते हैं। चुनाव आयोग जहांगीरी न्याय बन गया है। गलती करने पर तुरंत जांच और कार्रवाई करता है, जबकि प्रधानमंत्री और उनकी सरकार किसी भी गलती पर कोई कार्रवाई नहीं करते। उलटे नीरव मोदी, मेहुल चौकसी, विजय माल्या आदि को भागने में मदद करते हैं। उनके साथ संघ-मंग मुख्यमंत्री और केन्द्रीय मंत्री का बचाव करती है। यदि चुनाव आयोग भी केन्द्र सरकार की तरह हो जाता, यदि मुख्य चुनाव आयुक्त भी प्रधानमंत्री की तरह विदेशी दौरे पर निकल जाते और तर्क देते कि अमेरिका, ब्रिटेन की चुनाव प्रणाली का अध्ययन करना जरूरी है। यदि प्रदेशों के चुनाव आयुक्त शिवराजसिंह आदि मुख्यमंत्रियों की तरह जिस तरह बार-बार परिवार और अधिकारियों के साथ विदेश यात्रा पर प्रदेश के विकास की खोज में जाते हैं, वैसी ही यात्राएं प्रदेश के चुनाव आयुक्त करते और मुख्य चुनाव आयुक्त आंखें बंद कर लेते, जैसे आंखें प्रधानमंत्री ने कर ली है, तो क्या होता? यदि चुनाव आयोग शिकायतों का बुरा मानकर हर शिकायतकर्ता को देशद्रोही कहने लगता, जैसा कि वर्तमान सरकार कहती है, तो क्या होता? होता यह कि सरकार को तो जनता चुनाव में हरा कर सबक सिखा देती, लेकिन चुनाव आयोग लोकतंत्र के प्राण तत्व चुनाव प्रणाली को ही चकनाचूर कर देता। चुनाव आयोग के कठोर नियंत्रण के बाद भी हमारे राजनीतिक दल बिगड़ने के नए-नए रास्ते निकाल लेते हैं। एक-एक सीट पर करोड़ों रुपये खर्च कर लोकतंत्र में लोक की ताकत, जो उसे हजारों वर्षों बाद वोट के माध्यम से मिली है, उसे कमजोर करने पर आमादा हैं। पांच राज्यों के होने जा रहे 2018 के विधानसभा चुनाव, लोकसभा चुनाव 2019 की ही नहीं, वरन् आने वाले कल के भारत की दशा और दिशा भी तय करेंगे। इन चुनाव से जिन्दगी से जुड़े मूल मुद्दे गायब हैं। किसी भी दल का कोई घोषणा पत्र देखने में नहीं आया है। नोटबंदी से देश की अर्थव्यवस्था चौपट है। जीएसटी से मानसिक यंत्रणा का दौर है। रॉफेल घोटाले में देश भक्त सरकार भ्रष्टाचार की गोद में है। अकबर सरकार की सूरत का एक नया संस्करण है। ऐसा लग रहा है कि रोज सरकार की छुपी हुई नई-नई सूरतें सामने आ रही हैं। सीबीआई मामले ने देश को झकझोर दिया है। पांच हजार अधिकारियों के साथ काम कर रहा यह संगठन और देश, सरकार के षड्यंत्र को देखकर हतप्रभ है। राहुल गांधी अपनी मां सोनिया गांधी की तर्ज पर ही निम्न से निम्न हमलों का सामना कर और ताकतवर बन गए हैं। देशभर में घूमकर कह रहे हैं कि यह सरकार कॉरपोरेट के साथ मिलकर गरीब आदमी के पंद्रह लाख करोड़ रुपये खा गई है। चौकीदार ही चोर है आदि शब्द बाणों से मोदी पर हमले कर रहे हैं। यह प्रतिपक्ष के नेता के रूप में उनका कर्तव्य भी है। राहुल गांधी का आजकल स्तुतिगान दबे स्वर में होने लगा है। कल यह उच्च स्वर में होगा, देखना यह होगा कि कहीं यह भी मोदी-मोदी की तर्ज पर देश को हठधर्मिता के दौर में नहीं ले जाएं। राहुल गांधी को इतने बड़े देश में रात-दिन घूम-घूमकर प्रतिपक्ष का उत्तरदायित्व निभाना पड़ रहा है। लेकिन उनमें दो कमियां खासतौर पर हैं। पहली, वे देश को अभी भी वैकल्पिक कार्यक्रम के साथ प्रतिपक्षी दलों के गठबंधन की तस्वीर नहीं दिखा पाए हैं। दूसरा, गांधी के वारिस सभी दल बनते हैं, अमल कोई नहीं करता। कांग्रेस उन पर अपना पहला हक मानती है। यदि वो गांधी का अंश मात्र भी ग्रहण कर लें और भाषण रैली के साथ सत्याग्रह की अवधारण धारण कर लें, तो देश सही राह पर चल पड़ेगा। आजकल रैलियां पुराने राजाओं की परम्परा में बदल गई हैं। दिल्ली में रामलीला मैदान पर और देशभर में जगह-जगह धरना, भूख हड़ताल और जेल भरो आंदोलन शुरू करे। यदि राहुल गांधी पांच दिन भी भूखे रह लिए तो देशभर के कांग्रेसी और उनके साथ जनता सड़क पर उतर आएगी। वैसे कांग्रेसियों का एक बड़ा तबका सत्ता में रहकर खाया-कमाया हुआ है। उसे भूखे रहने से स्वास्थ्य लाभ होगा, सरकार की हठधर्मिता टूटेगी और महंगाई, बेरोजगारी से पिसती जनता, आत्महत्या करते किसानों को कहीं तो लगेगा कि हमारे दुख को ये लोग कुछ तो समझते हैं। मी-टू विवेकानन्द जब अमेरिका गए थे, तब वे वहां कई महीनों अमेरिकन महिलाओं के घर उनके अतिथि बनकर रहे थे। उन्होंने लिखा है कि मैं यहां की नारियों को देखकर अभिभूत हूँ, ये साक्षात जगदम्बा की प्रतिमूर्ति हैं। काश! मैं भारत में 1000 माँ जगदम्बा तैयार कर सकूं तो चैन से मर सकूंगा। विवेकानन्द का कथन सार्थक होने जा रहा है। भारत में 20 जगदम्बा तैयार हो गई हैं और रोज नई जगदम्बा सामने आ रही हैं। यह सब मी-टू आंदोलन की देन है। यह सन 2006 में अमेरिका से ही शुरू हुआ था। अक्टूबर 2017 में प्रचलन में आया। हॉलीवुड के सबसे बड़े प्रोड्यूसर हार्वी विंस्टीन के खिलाफ 20 से अधिक नारियों ने शिकायत की थी। भारत में मी-टू पुरुषोचित दरिंदगी के खिलाफ सदियों से दबी, दिखने में बड़ी, लेकिन यथार्थ में छोटी आवाज है। यह नारी क्रांति की दिशा में एक मजबूत कदम है। इससे घबराहट मची हुई है। इसने मौजूदा सरकार और उसके केन्द्रीय मंत्री एम.जे. अकबर का असली चेहरा सामने लाने का काम किया है। 135 करोड़ लोगों का नेतृत्व करने वाली सरकार के 70 सदस्यीय मंत्री मंडल में एक ऐसा शख्स बैठा है, जिसकी दरिंदगी के काले कारनामों से वह अनजान है, जबकि वो दावा करते हैं कि हम जमीं तो क्या आसमां की खबर रखते हैं। यौन शोषण और बलात्कार के मामले वैसे ही असामान्य होते हैं, लेकिन अकबर का मामला असामान्य में भी असामान्य है, रेयर ऑफ रेयर है, देश को इंतजार था कि 70 सदस्यीय प्रतिनिधि मंडल के साथ विदेश यात्रा पर गए हुए अकबर को सरकार वापस बुला लेगी, लेकिन यात्रा की अवधि बढ़ाकर उन्हें अन्य जगहों पर भेज दिया गया। देश को उम्मीद थी कि आते ही अकबर का इस्तीफा ले लिया जाएगा। ऐसा कुछ भी ना हो सका। उलटा चोर कोतवाल को डांटे की तर्ज पर एमजे अकबर ने 97 वकीलों की फौज एक अकेली प्रिया रमानी के खिलाफ उतार दी। उस फौज की खूबी यह है कि उसमें 37 महिला वकील है। प्रिया रमानी ने बस इतना ही कहा कि मेरा सच मेरे साथ है। उनका सच यह है कि जब आज से 20 वर्ष पूर्व वे 23 वर्ष की थी और अकबर 43 वर्ष के थे तब उनके बुलाने पर मिलने गईं तो अकबर ने उनसे यौन उत्पीड़न किया था। तब वे अकबर को झटककर चली आई थीं। सभी शिकायतों का सार यह है कि वे जब भी महिला पत्रकारों से मिलते थे तो बाथ टब में या चड्डी में गंदी कुत्सित नजरों के साथ कहीं पर भी हाथ मारते हुए हमलावर के रूप में पेश आते थे। प्रश्न उठता है अकबर जैसे लोगों में यह सब करने का हौसला और ताकत कहां से आती है? हम कह सकते हैं यह सब सरकार के संरक्षण का ही कुफल होता है। मी टू के पक्ष में एक से बढ़कर एक स्वर उठ रहे हैं, तो विरोध में कुतर्क हैं, बीस वर्ष बाद कैसे कहा जा सकता है, इतने समय चुप क्यों रहे। प्रति प्रश्न है कि यदि किसी ने बीस वर्ष पूर्व आपको दो लप्पड़ दिए थे। किसी ने बीस वर्ष पूर्व आपकी मां, बहन, पत्नी का बलात्कार तो नहीं, बस उन पर पर हाथ डाला था। आप समाज के डर से तब चुप थे, लेकिन क्या उसे भूल सकते हैं। जब भी मौका मिलेगा, उसे छोड़ेंगे नहीं। बशर्ते, आपका हौसला साथ दे। प्रिया रमानी सहित 20 महिला पत्रकारों ने यह कर दिखाया है। सदियों की चुप्पी तोड़ी है। यह चुप्पी ही भारतीय समाज की तकलीफों का सबसे बड़ा कारण रही है। मी-टू हजारों बरस के सूखे के बाद गिरी पानी की कुछ बूंदें हैं। इससे यदि बरसात तो ठीक, रिमझिम फुहार भी आ गई तो देश में नारी क्रांति घटित हो जाएगी। मीडिया और जनता की जाग्रति ही यह सब करवा रही है। अन्यथा आज तक शिकायतकर्ता को ही जलील होना पड़ता रहा है। पंजाब के पुलिस महानिदेशक गिल का मामला कैसे भुलाया जा सकता है, उन्होंने वहां की महिला आईएएस के नितंब पर हाथ मारे थे। महिला के पति भी आईएएस थे, दोनों ने लम्बी लड़ाई लड़ी थी। गिल का तो कुछ बिगड़ा नहीं, उन्हें पद्मश्री अवश्य मिल गया। ऐसे ही अनेक प्रकरण हुए, जिनमें शिकायकर्ता को कुचल दिया गया। यह तो आसाराम से लेकर राम-रहीम तक का जो हश्र हुआ है और दिल्ली में निर्भया की मौत से जो चेतना जाग्रत हुई है, उसका सुफल है। आज से पांच वर्ष पूर्व जब दिल्ली में निर्भया के साथ वीभत्स बलात्कार हुआ था, तब उसने अस्पताल में आईसीयू में अंतिम सांसें लेने के पूर्व कहा था पापा मैं जीना चाहती हूं। यह वह क्रांति थी, जो सदियों में पहली बार घटित हुई थी। इससे पहले बलात्कार के बाद फांसी, कुआं, आत्महत्या के अलावा कोई अन्य विकल्प न था। हमारी फिल्मों ने इसे नामालूम कितनी बार दिखाया है। काश! फिल्मकार ने फिल्म में नारी के मुंह छुपाने और आत्महत्या करने के बजाए बलात्कारियों को जलील किया होता। उसे समाज की जलालत से बचने के लिए फांसी पर चढ़ते दिखाया होता, तो शायद यह मी-टू बहुत पहले ही घटित हो चुकी होती। एमजे अकबर की तुलना बादशाह अकबर से की जा रही है। बादशाह तो दोनों ही हैं। असली बादशाह अकबर ने जोधा बाई सहित 8 शादी की थीं। जोधा बाई के बेटे जहांगीर को अपने बाद भारत का सम्राट बनाया था। इस शादी ने देश के सामाजिक सौहार्द को मजबूत किया था। असली अकबर की जिंदगी में जबर्दस्ती का कोई इतिहास नहीं है। जबकि नकली अकबर के मीडिया मुगल और मंत्री होने के बाद भी शिकायत करने वाली महिलाओं की संख्या बढ़ती जा रही है। इन महिलाओं की पूरी बात आप टीवी पर ध्यान से सुनिए, इनके दर्द से रूबरू हो जाएंगे। इनके हौसले को सलाम करने को दिल चाहेगा। जिस समाज में पुरुष अपनी पत्नी को करवा चौथ के नाम पर भूखे रखकर लंबी जिन्दगी की प्रार्थना करवाता हो, जिसमें सावित्री यमराज से लड़कर पति को जिंदा करवाती हो, इनका सबसे बड़ा कारण धर्मग्रंथ लिखने वाले पुरुष ही रहे। जैन धर्म के तो चौबीस ही तीर्थंकर पुरुष रहे। कहते हैं कि एक तीर्थंकर मल्लिका बाई थी, जिन्हें बाद में मल्लिनाथ कर दिया गया। जिस समाज में मस्जिद में आज भी महिला नहीं जा सकती हों, जहां पर मंदिरों में नारी के लिए तरह-तरह के व्यवधान रहते आए हों, जहां के बोहरा समाज में लड़की का आज भी खतना होता हो, जहां नारी आज भी घूंघट-परदों में कैद हो, उस समाज में मी-टू पुरुष की उस सत्ता को चुनौती है, जो यह मानती है कि नारी इंसान नहीं, वरन् सम्पत्ति है, उसकी जिन्दगी में कब क्या होगा, यह तय करना पुरुष का अधिकार है। हमारा देश नारी की पूजा करता है, लेकिन नारी को जीते जी सम्मान से जीने का अधिकार नहीं देता है। जो अधिकार की बात करती है, उसकी आवाज दबा दी जाती है। देश के गांव, गली-मोहल्लों से रोज यौन उत्पीड़न और बलात्कार की खबरें आ रही हैं। उसका कारण एमजे अकबर जैसे लोग हैं, जिन्हें मीडिया और सत्ता से ताकत मिलती है, लेकिन यह टूटती है। जब प्रिया सहित 20 से अधिक जगदम्बाओं की आवाज में देश की हर नारी और जागरूक पुरुष की आवाज मिल जाती है, तब एमजे अकबर का मंत्री पद से इस्तीफा हो जाता है। अकबर अभी भी भाजपा में मौजूद हैं। उन्हें संभालकर रख लिया गया है। शायद भविष्य में फिर जरूरत पड़े। प्रिया और अन्य की गूंज इस सरकार को आज सत्ता की मदमस्ती में सुनाई नहीं दे रही है, लेकिन देश इसे बड़ी ही शिद्दत से सुन रहा है। सदियों की चुप्पी तोड़ने की दिशा में एक आवाज बनकर ये सभी सदैव जिंदा रहेगी।