अक्टूबर 2018

कुलदीप नैयर ने ‘द्रोहकाल’ न्यूज पोर्टल का उद्घाटन किया

रविवार डेस्क

समाचारों और विचारों के न्यूज पोर्टल द्रोहकाल का उद् घाटन नौ अगस्त को नई दिल्ली में जाने-माने पत्रकार कुलदीप नैयर ने किया। उन्होंने उम्मीद जताई कि प्रतिबद्ध और अनुभवी संपादक मंडल के नेतृत्व में यह पोर्टल जल्द ही अपनी नई पहचान बनाने में सफल होगा।

नौ अगस्त को भारत छोडो आंदोलन की वर्षगांठ के अवसर पर नई दिल्ली में आयोजित एक सादे कार्यक्रम में मशहूर पत्रकार और मानवाधिकार कार्यकर्ता कुलदीप नैयर ने समाचारों और विचारों की नई वेबसाइट ‘द्रोहकाल’ का उद्घाटन किया। यह नैयर का आखिरी सार्वजनिक कार्यक्रम था। उन्होंने उम्मीद जताई कि प्रतिबद्ध और अनुभवी संपादक मंडल के नेतृत्व में यह पोर्टल जल्द ही अपनी नई पहचान बनाने में सफल होगा। देश में बढ़ती सांप्रदायिकता पर चिंता व्यक्त करते हुए नैयर ने कहा कि इसका एक बड़ा कारण नई पीढ़ी के आदर्शों में आई गिरावट है। नैयर ने कहा कि मीडिया भी इस आदर्शहीनता का शिकार हो गई है और यह एक पीड़ादायक स्थिति है। उन्होंने कहा कि धर्म के आधार पर हुए बंटवारे के बावजूद पुरानी पीढ़ी सांप्रदायिक नहीं थी। वह बीच में उभर गई विभाजन की रेखा को भूल कर भारत और पाकिस्तान की साझी विरासत को याद रखती थी। उन्होंने कहा कि सांप्रदायिकता दोनों मुल्कों और सभी समुदायों में बढ़ी है। आजादी के बाद भारत सांप्रदायिकता को दूर रखने में सफल हुआ था, लेकिन अब यहां हिंदुत्व का असर हो रहा है। यह खतरनाक है और मुल्क के अपनी हजारों साल पुरानी संस्कृति से दूर ले जाएगा। उन्होंने मीडिया में आए बदलावों पर भी चिंता जाहिर की और कहा कि संपादकीय आजादी मालिकों ने छीन ली है और पत्रकारों को मजबूरन उनके इशारे पर काम करना पड़ता है। मालिक सिर्फ अपने व्यापारिक हितों पर नजर रखता है और सरकार की हां में हां मिलाता है। प्रसिद्ध कवि और लेखक मंगलेश डबराल ने कहा कि अब अखबार और चैनल सिर्फ सरकारी समाचारों को प्रसारित करने में लगे हैं। उन्होंने संपादकीय स्वतंत्रता का जिक्र करते हुए ‘जनसत्ता’ के पूर्व संपादक प्रभाष जोशी को याद किया और कहा कि स्व. जोशी अपने सहकर्मियों को पूरी आजादी देते थे। वरिष्ठ पत्रकार जयशंकर गुप्त ने कहा कि आज का मीडिया सत्ता के सामने झुकने को ही अपना आदर्श मानता है। ‘द्रोहकाल’ के संपादक सुभाष खंडेलवाल ने भविष्य के प्रति आशा प्रकट करते हुए कहा कि इस देश में सांप्रदायिकता के लिए जगह नहीं है और जनता उसे पराजित कर देगी। उन्होंने कहा कि भारत असल में जातियों का देश है और जातियों की पहचान धार्मिक पहचान से ज्यादा असर रखती है। प्रसिद्ध मानवाधिकार कार्यकर्ता एनडी पंचोली ने सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने वाली शक्तियों की बढ़ती ताकत पर चिंता जाहिर की और उससे संघर्ष करने की जरूरत बताई। कार्यक्रम में द्रोहकाल के संपादक-मंडल के सदस्य अनिल सिन्हा और अनिल जैन, दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रोफेसर तथा लेखिका डॉ. रश्मि रावत, इंदौर के पत्रकार द्वय हिदायतउल्लाह खान तथा राजेश राठौर भी उपस्थित थे