अक्टूबर 2018

अमानवीय होते युग के विरोध की कविता

रवीन्द्र त्रिपाठी

विष्णु खरे वर्तमान ही नहीं बल्कि अतीत की अमानवीयता को भी परत-दर-परत सामने लाने वाले कवि थे। यही वजह है कि वे एक ओर महाभारत के युद्ध की अनैतिकताओं को सामने लाते हैं तो दूसरी ओर नौका दुर्घटना में मरे सीरियाई-कुर्द मूल के निर्वासित शरणार्थी बच्चे आलैन की त्रासदी को सामने लाते हैं। पत्रकारिता और साहित्य, हर जगह उन्होंने मूर्तिभंजन और साथ ही, नयी मूर्ति गढ़ने का काम किया।

पिछले दिनों प्रसिद्ध हिंदी कवि विष्णु खरे का निधन हो गया। 9 फरवरी 1940 को छिंदवाड़ा में जन्मे खरे की साहित्यिक-रचनात्मक उपस्थिति आलोचना से लेकर फिल्म-समीक्षा और अनुवादों (यानी हिंदी से दूसरी भाषाओं में और दूसरी भाषाओं से हिंदी में) में भी रही। लेकिन बुनियादी रूप से वे कवि थे। कई विधाओं और वैचारिक क्षेत्रों में सक्रियता की वजह से उनके कवि-व्यक्तित्व का वैसा स्वीकार हिंदी की समकालीन दुनिया में नहीं हुआ, जिसके वे हकदार थे। इसके और भी कारण रहे। लेकिन आने वाले बरसों में उनका काव्य-व्यक्तित्व ज्यादा प्रखरता से उभरेगा, ऐसा मानना चाहिए, क्योंकि ये वो पक्ष है जिसमें उनकी सर्जनात्मकता सबसे अधिक अभिव्यक्त हुई है। खरे वर्तमान ही नहीं, बल्कि अतीत की अमानवीयता को भी परत-दर-परत सामने लाने वाले कवि थे। यही वजह है कि वे एक ओर महाभारत के युद्ध की अनैतिकताओं को सामने लाते हैं तो दूसरी ओर नौका दुर्घटना में मरे सीरियाई-कुर्द मूल के निर्वासित शरणार्थी बच्चे आलैन की त्रासदी को सामने लाते हैं। पत्रकारिता और साहित्य, हर जगह उन्होंने मूर्तिभंजन और साथ ही, नयी मूर्ति गढ़ने का काम किया। खरे आधुनिक समय में विश्व साहित्य की ओर हिंदी की खिड़की खोले हुए थे। उन्होंने जर्मन, डच, फिनिश भाषाओं से हिंदी में अनुवाद किये। हिंदी कविताओं का अंग्रेजी और जर्मन में अनुवाद किया। खरे ने हिंदी कविता के अंत: करण को काफी बदला। प्रश्न ये उठेगा कि ये बदलाव किस तरह का था? इस बारे में पहली बात तो यही कही जाएगी कि वे हिंदी कविता को गद्य के काफी करीब ले गए। हालांकि इसकी शुरुआत तो मुक्तिबोध से हो चुकी थी। खरे उसे और आगे ले गए। खरे की कविता में गीतात्मकता या ‘लिरिसिज्म’ नहीं के बराबर है। उनकी ज्यादातर कविताएं या तो निबंधों या लेखों की तरह हैं या कहानी के सांचें में ढली हुई। खरे एक पत्रकार रहे और पत्रकारिता में भी उनका इलाका मुख्य रूप से संपादकीय या अग्रलेख-लेखन का था (फिल्म समीक्षाओं को छोड़ दें तो।) शायद इस कारण भी संपादकीय या अग्रलेख का शिल्प उनकी कविताओं को निर्मित करने में एक कारक तत्व रहा। जैसा कि संपादकीयों या अग्रलेखों में होता है कि किसी खास विषय पर विचार और विश्लेषण किया जाता है। यह पद्धति खरे की कई कविताओं मे मौजूद है। ‘लालटेन जलाना’, ‘सिर पर मैला ढोने की अमानवीय प्रथा’, ‘हर शहर में एक बदनाम औरत होती है’ जैसी लंबी कविताओं में यही शिल्प और प्रक्रिया दिखती है। जहां तक कहानियों के शिल्प का प्रभाव है, इस सिलसिले में उनकी कुछ कविताएं यहां याद की जी सकती हैं। जैसे ‘गुंग महल’, ‘होनहार’, ‘न हन्यते’ जैसी कविताएं इसी कहानी शैली की है। फिलहाल एक को ही लें यानी ‘न हन्यते’ को। शीर्षक ही गीता के दूसरे अध्याय के बीसवें श्लोक की उक्ति की याद दिला देता है – ‘न हन्यते हन्यमाने शरीरे’। यानी शरीर के मरने पर भी आत्मा अमर रहती है। लेकिन कविता ये नहीं कहती है। वह गीता की इस उक्ति से अलग जाकर विडंबनापूर्ण तरीके से ये कहती है कि कई लोग हत्याएं करते हैं लेकिन उनके भीतर किसी तरह का अपराध बोध नहीं होता। वे जीवन भर समझ नहीं पाते कि उन्होंने कोई गलत काम किया। ये कविता उस आदमी की तरफ से एक किस्सा या बयान है जो एक वक्त पहलवानी करता रहा और जिसने भारत के विभाजन के दौरान उपजी हिंसा के दौर में अपने साथियों के साथ मिलकर कुछ निरीह और निर्दोष मुसलमानों की हत्या की थी। बिलकुल सहज तरीके से वह अपने कारनामे बताता है- रात से लेकर मुंह अंधेरे तक कभी इस किनारे बैठ जाते कभी उस/इक्कों और तांगों को नहीं छेड़ते थे/पर पैदलों और साइकिलवालों को सलाम या आदाबर्ज वगैरह कहकर रोक लेते/पहचानने के और भी तरीके थे/अक्सर तो यही दर्जी, नाई, भिश्ती, जुलाहे, तरखान, मिस्त्री, झल्लीवाले होते थे/ कुछ तो पता नहीं कैसे हमें पहचान जाते थे/पंडज्जी, लालाजी, ठाकुर साहब कहकर पैरों पर गिरने लगते थे/ऐसों को तो छोड़ ही नहीं सकते थे/सो काम खत्म किया, वही बोरे ऱखते थे उन्हीं में डाला/रस्सी में बांधा और नीचे जमनाजी में घसीटकर बहा दिया/क्रिशन भगवान ने गीता में कहा है कि पापियों को मारने से पाप नहीं लगता/फिर भी छीना-झपटी से इतनी घिन हो जाती थी/कि जमनाजी में अस्नान कर निगमबोध के हनुमानजी के सिर नवा/ कौड़िया पुल के पास गरम दूध पीकर ही लौटते थे। खरे की कविता की एक और विशिष्टता भारतीय मिथकों और पुराणों को लेकर विमर्शात्मक रवैया है। जैसे कि कविता ‘अग्निरथोवाच’। अग्निरथ वह रथ है, जिस पर महाभारत युद्ध के दौरान सारथी की भूमिका में कृष्ण बैठते थे और योद्धा के रूप में अर्जुन। कथा है कि युद्ध के बाद कृष्ण के उतरते और रथ की ध्वज पर हनुमान के चले जाने के बाद वह रथ जल गया था। इस कविता में अग्निरथ अपनी बात कहता है जो इस बात को रेखांकित करता है कि पूरा युद्ध किस तरह अनैतिकताओं से भरा था- क्या- क्या नहीं किया क्षेत्रज्ञ ने क्षेत्र में/भाइयों और स्वजनों के बीच रण हुआ सो हुआ/बूढ़ों को मारा गया, गुरु हत्याएं हुईं/दबे स्वर में झूठ बोले गए, कुश पर सब कुछ त्याग बैठे, आसीनों को छला गया/जिसने शस्त्र न उठाने की प्रतिज्ञा की थी उसने चक्र उठाया/भुजाएं काटी गईं नर-रक्त पीया गया/रथ से उतरे विपदाग्रस्त विनयी महारथी का शिरोच्छेद हुआ/जांघ पर गदा युद्ध में किया गया प्रहार/ मरे हुए वीरों के मस्तक पर पैर रगड़े गए/नपुंसकों तक का वध हुआ। कई और तरह के विमर्श उभरते हैं विष्णु करे की कविताओं में। ये विमर्श इतिहास से भी जुड़े हैं और आजकल उभर रहे आक्रामक राष्ट्रवाद और सांप्रदायिक हिंसाओं से भी। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार है)