अक्टूबर 2018

खेल के मैदान में भी आंचल बनता परचम

डॉ. रश्मि रावत

खेलों के नियम और परिवेश पुरुषों द्वारा पुरुषों के लिए बनाए गए थे। उनमें भी स्त्रियों ने अपना मुकाम बना के दिखा दिया। प्रतिकूल स्थितियों में भी स्त्री अपनी अकूत क्षमता के असंख्य नमूने पेश करके अपनी सामर्थ्य साबित कर चुकी है। अब कुछ कदम खेल-जगत के नियमों को लचकदार बनाकर दूसरी तरफ से भी बढ़ाए जाने चाहिए।

इंडोनेशिया में सम्पन्न एशियाड में स्वप्ना बर्मन, हिमा दास, द्युतिचंद, हर्षिता तोमर, विनेष फोगट, राही सरनोवत, पी.वी. संधु, सानिया नेहवाल समेत कई अन्य स्त्री खिलाड़ियों ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि यह बीत चुके जमाने की बात हो चुकी है, जब खेल के मैदान सिर्फ पुरुषों के लिए होते थे। सन् 1991 के बाद से केवल वही नए खेल ओलिम्पिक में शामिल किए जा सकते हैं जिनमें स्त्री खिलाड़ियों की भागीदारी हो। सन् 1900 में पेरिस ओलिम्पिक में महिलाओं ने पहली बार हिस्सा लिया था। सन् 2012 वह पहला वर्ष था, जब ओलिम्पिक में सभी खेलों में स्त्रियों ने भागीदरी की। 2012 के लंदन ओलिम्पिक के बाद से कहा जा सकता है कि सफलता से सरपट दौड़ने के लिए मैदान स्त्रियों के लिए उसी तरह खुल चुके हैं, जिस तरह पुरुषों के लिए। हाँ, अभी स्त्री-खेलों का इतिहास उतना समृद्ध नहीं है। लेकिन गत कुछ वर्षों में महिलाएँ अपनी मजबूत उपस्थिति विभिन्न खेलों में निरंतर दर्ज करती जा रही हैं। खेल-जगत में उपलब्धि का हर एक कदम समाज में सदियों से व्याप्त लैंगिक विषमता में दमदार धक्का लगाने में सक्षम होता है और फिर ऐसी शानदार सफलता। इस एशियाई खेलों में महिला खिलाड़ियों ने सफलता की नई जमीन तोड़ी है, कई नए रिकॉर्ड बनाए हैं। सफलता को सिर्फ पदकों से ही नहीं नापा जा सकता। सराहनीय प्रदर्शन करने वाली खिलाड़ियों की बड़ी संख्या इस बात की सजीव गवाही दे रही थी कि हमारा देश जुझारू, सक्षम, प्रतिभावान नगीनों से भरा हुआ है। विश्व स्तर की सुविधाएँ, प्रशिक्षण, उपकरण इत्यादि मिले तो हमारे खिलाड़ी किसी से कम नहीं साबित होंगे। महिलाओं की उत्कृष्ट उपलब्धियाँ अधिकतर वैयक्तिक स्पर्धाओं में देखने को मिलती हैं। हिमा दास, स्वप्ना बर्मन जैसे कई नाम हैं, जो छोटी-छोटी जगहों से निकल कर खुद की मेहनत और संकल्प-शक्ति के बल पर अपना आकाश गढ़ते हैं। इनका जुझारूपन, इनका हौसला, इनकी प्रतिभा अद्वितीय है। एथलेटिक्स, शूटिंग, तीरंदाजी, पहलवानी, बैडमिंटन, मुक्केबाजी जैसी स्पर्धाओं में भारत का अच्छा प्रदर्शन रहा है। दीपा कर्माकार ने अपने लाजवाब प्रदर्शन से कॉमनवेल्थ गेम्स में पदक जीता और ओलिम्पिक में भारत की ओर से भाग लेने वाली पहली महिला जिमनास्ट बनीं। साक्षी मलिक, दीपा कर्मकार, पी.वी. सिंधु. अदिति अशोक के उत्कृष्ट प्रदर्शन के कारण 2016 के रियो ओलिम्पिक को 'ईयर ऑफ इंडियन वुमेन इन स्पोर्ट्स' कहा गया था। सानिया नेहवाल, पी.वी.सिंधु, सानिया मिर्जा, अंजलि भागवत, फोगट बहनें, ज्वाला गुट्टा, कर्णम मल्लेश्वरी, मैरी कॉम, अश्विनी, मिताली राज, हरमीन प्रीत, रानी रामपाल....बहुत लम्बी सूची है महिला खिलाड़ियों की, जिन्होंने विभिन्न खेलों में विश्व स्तर पर अपनी सफलता के झंडे गाड़े हैं। भारतीय महिला हॉकी टीम एशियाड में 20 साल बाद फाइनल तक पहुँची थी। स्वर्ण पदक नहीं जीत पाई पर प्रदर्शन उत्कृष्ट था। हॉकी हमारा राष्ट्रीय खेल होते हुए भी उपेक्षित है। अच्छी खिलाड़ियों की हमारे पास कमी नहीं है। महिला क्रिकेट खिलाड़ी भी बेहतरीन खेल रही हैं। जितने संसाधन, प्रोत्साहन और लोकप्रियता इन्हें प्राप्त होने चाहिए, उसका शतांश भी इन्हें मिलता है? यह व्यवस्था पर एक बड़ा प्रश्नवाचक चिह्न है। असाधारण प्रतिभा के बल पर वैयक्तिक स्पर्धाओं में तो फिर भी चुनिंदा लोग ऊँचाइयाँ छू सकते हैं। उनमें भी उन स्पर्धाओं में भारतीय खिलाड़ी ज्यादा सफल होती दिखती हैं, जिनमें कम संसाधनों से गुजारा करना सम्भव हो। किंतु जिन खेलों के लिए मजबूत टीम और संसाधनों की दरकार है, वहाँ तो खिलाड़ियों की पूरी कोशिश भी उन्हें ऊँचे मुकाम तक नहीं पहुँचा सकती, जब तक संस्थानों का सुनियोजित सहयोग न मिले। 'चक दे इंडिया' फिल्म में महिला खिलाड़ियों की जिन बाधाओं और चुनौतियों को दिखाया गया है, सच्चाई उससे अलहदा नहीं है। संसाधनों के साथ-साथ इच्छा- शक्ति की इतनी कमी है कि ठीक से पोषण भी इनको नहीं मिल पाता और पारिवारिक-सामाजिक दबाव भी भरपूर झेलना पड़ता है। अपने चारों तरफ के परिवेश का प्रभाव तो हर स्तर पर पड़ता है। किसी का स्वाभाविक रुझान हो और कोई प्रेरक सहयोगी मिल जाए तो बेजोड़ काबिलियत के बूते वैयक्तिक स्पर्धा में फिर भी सफलता का परचम लहराया जा सकता है। किंतु सहयोग के बिना टीम नहीं बन सकती। इसलिए सामूहिक स्पर्धाओं में लड़की होने के नाते बहुत नुकसान उठाने पड़ते हैं। बॉलीबॉल, फुटबॉल, क्रिकेट आदि खेलों में स्कूल और कॉलेजों में टीम ही नहीं बन पाती। खेलने की शौकीन सक्षम खिलाड़ियों को मन मसोस कर लड़कों के खेल का मूक दर्शक बन जाना पड़ता है। खेल-जगत और अन्य साहसिक क्षेत्रों में प्रतिकूल स्थितियों में भी स्त्री अपनी अकूत क्षमता के असंख्य नमूने पेश करके अपनी सामर्थ्य साबित कर चुकी है। अब कुछ कदम खेल-जगत के नियमों को लचकदार बनाकर दूसरी तरफ से भी बढ़ाए जाने चाहिए। लड़कियों को शारीरिक गतिविधियों, खेल-स्पर्धाओं में भाग लेने के लिए अधिकाधिक प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। उनके लिए अनुकूल माहौल बनाना, उनके मार्ग की बाधाओं को दूर करना सारे समाज की जिम्मेदारी है। खेलों के नियम और परिवेश पुरुषों द्वारा पुरुषों के लिए बनाए गए थे। उनमें भी स्त्रियों ने अपना मुकाम बना के दिखा दिया। पर अब नए सिरे से स्त्रियों के समावेशन के निमित्त कसौटियाँ बननी चाहिए। स्कूली स्तर पर लड़के-लड़कियों के खेल एक साथ होने से लैंगिक समरसता का माहौल भी बनेगा और लड़कियों के खेलने में आने वाली बाधाएँ भी दूर होंगी। हमारे देश की सामाजिक, सांस्कृतिक परिस्थितियाँ कुछ इस तरह की हैं कि खेल में लड़कियों की भागीदारी का अनुपात लड़कों की तुलना में बहुत कम है। लड़कियों के लड़कों के साथ खेलने का अवसर मिलेगा तो टीम न बनने के कारण उन्हें खेल छोड़ना नहीं पड़ेगा और दूसरे उन्हें मजबूत टीम के साथ खेलने और अभ्यास करने का मौका मिलेगा। इससे उनका भरपूर विकास होगा। मनोवैज्ञानिक ढंग से भी उनके भीतर खुद को स्वस्थ व्यक्तित्व के रूप में विकसित करने का दायित्व उपजेगा। उनका खाना-पीना-खुद की भरपूर देखभाल करना सम्भव हो पाएगा। वरना, अकसर लड़कियाँ अपने शरीर और जरूरतों के प्रति सहज नहीं रह पातीं और फिर आइरन या किसी अन्य पोषक तत्व की कमी से जूझती हैं। खेलने वालियों की संख्या अभी कम है, इसलिए उन्हें स्थानीय स्तर पर अभ्यास करने के लिए बराबर या बेहतर प्रतिद्वंद्वी नहीं मिल पाती हैं। परिवार, समुदाय, पंचायत, नगर निगम, ...जिला, राज्य, केंद्रीय हर स्तर पर सक्रिय होने की जरूरत है। खेल और व्यायाम व्यक्तित्व के समूचे विकास के लिए जरूरी हैं। शारीरिक सक्रियता की कमी से ही तमाम तरह की नई-नई बीमारियाँ उपज रही हैं। लड़कियों की आवश्यकताओं का विशेष संज्ञान लेकर खेलों के समुचित विकास पर ध्यान दिया जाए तो वैश्विक पटल पर देश का गौरव तो बढ़ेगा ही। स्वस्थ मानसिकता के स्वस्थ नागरिक देश को उन्नत बनाएँगे। खेलने से सहभागिता, सामुदायिकता, परस्पर सौहार्द, नेतृत्व क्षमता, स्वस्थ प्रतियोगिता, सहन शक्ति, लचक...जैसे कई गुण सहज रूप से विकसित हो जाते हैं। खेलने के दौरान पैदा होने वाले हार्मोन अवसाद पैदा नहीं होने देते और सकारात्मक मनोदशा बनाए रखते हैं। लैंगिक, वर्णगत, प्रांतीय समरसता का भी खेलों के माध्यम से विकास होता है। इसलिए हर स्तर पर खेलों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। यूनेस्को ने 1978 में खेल और शारीरिक गतिविधियों को मानवाधिकार माना है। हमारे देश में इसके लिए उसके अनुरूप प्रोत्साहन और क्रियान्वयन की कमी दिखती है। खासतौर पर लड़कियों के संदर्भ में। स्कूल, कॉलेज में लड़कियों के खेल का प्रावधान है तो उसे लड़कियों के लिए भी क्रियान्वित करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध होना चाहिए। टीम किसी भी तरह बनाई जाए, चाहे 1-2 और कॉलेजों की लड़कियों के साथ मिलकर बने या लड़कों की टीम में शामिल हो कर। महावीर फोगट जैसी संकल्प शक्ति की जरूरत है, जो हर प्रतिकूलता से टकरा कर भी बेटियों को पहलवान बनाने का सपना पूरा करता है। फोगट परिवार की 6 बेटियाँ तो देश का नाम कमा ही रही हैं। इनके उदाहरण ने हरियाणा जैसे राज्य की लैंगिक सोच के ठहरे पानी में हलचल मचा दी और घर-घर में ये विचार उपजा कि ‘म्हारी छोरियाँ क्या छोरों से कम हैं’। अगर महावीर ठान नहीं लेते तो उनकी बेटियाँ तो वैसी ही जिंदगी जी रही थीं, जैसी समाज ने लड़कियों के लिए तय की होती है। वैसा ही खाना-पीना-पहनना। लड़कों के साथ लड़कियों को पहलवानी वह न करवाते तो कैसे उनका विकास होता। उन्हें खूब पौष्टिक खिलाना, जरूरत भर नींद, आराम... सुंदरता के मिथक से मुक्त व्यक्तित्व के रूप में विकसित करना। यही हर स्तर पर किए जाने की जरूरत है। शरीर जब स्वस्थ रहता है तो ऊर्जा अपने निकास के लिए स्वस्थ मार्ग खोजती है। आज के उपभोक्तावादी दौर में लड़कियों पर फिर से कोमल, नाजुक, कमसिन, चिकनी बने रहने का इतना अधिक दबाव है कि मध्य-उच्च वर्गीय लड़कियाँ भर पेट खाती नहीं हैं और निम्न वर्ग की लड़कियों को पौष्टिक खाना उपलब्ध नहीं हो पाता। राष्ट्रीय-अतंर्राष्ट्रीय स्तर पर भी 16 वर्ष तक के लड़कों-लड़कियों की स्पर्धा एक साथ होना अच्छा रहेगा। समाज में लैंगिक समानता स्थापित होने पर वह समय आएगा जब स्त्री-पुरुष के प्रदर्शन में अंतराल नहीं रह जाएगा। फिलहाल वह समय दूर है। लेकिन किशोरावस्था तक के प्रदर्शन में इतना अंतर नहीं दिखता कि वे एक साथ न खेल पाएँ। टेनिस जैसे कुछ खेलों को छोड़ दिया जाए तो स्त्री-पुरुष के वेतन, पुरस्कार राशि, स्पांसरशिप, और मीडिया कवरेज में बहुत अधिक भेदभाव है। इस भेदभाव का काफी नकारात्मक प्रभाव महिलाओं के प्रदर्शन और उन्हें मिलने वाली सुविधाओं तथा प्रशिक्षण में पड़ता है। अमेरिका में जहाँ खिलाड़ियों की 40% संख्या महिलाओं की है, वहाँ मीडिया में खेलों में इनकी कवरेज की प्रतिशतता 6-8% है और सर्वोच्च 4 समाचार पत्रों में केवल 3.5% ही है। भारत में, जहाँ खेलने वाली स्त्रियों का प्रतिशत पुरुषों के अनुपात में बहुत कम है। वहाँ मीडिया और वेतन के अंतराल का अनुमान किया जा सकता है। यदि आर्थिक तौर पर और मीडिया के स्तर पर स्त्रियों को समान महत्व दिया जाए तो समाज में उनके खेल के प्रति सकारात्मक माहौल बनने में बहुत मदद मिलेगी। सामाजिक, परम्परागत रूढ़ियाँ टूटेंगी, जिनके कारण लोग लड़कियों को बाहर भेजने में हिचकिचाते हैं। चोटिल होने वाले, तथाकथित सौंदर्य पर नकारात्मक प्रभाव डालने वाली गतिविधियों से लड़कियों को रोका जाता है। सुरक्षा को लेकर हमारा समाज पहले ही अतिरिक्त सजग है। निर्णायक मंडल, कोच की लड़कियों के यौन शोषण की कुत्सा की खबरें आती हैं तो यह लड़कियों की भागीदारी को बहुत हतोत्साहित करता है। ‘साला खडूस’ फिल्म में लड़कियों के शोषण के इस आयाम को बड़े अच्छे से दिखाया गया है। शुक्र है कि फिल्म के नायक की तरह कुछ खडूस मौजूद हैं, जो खिलाड़ी से सिर्फ प्रतिभा, लगन और अभ्यास चाहते हैं, इसके अतिरिक्त कुछ नहीं। जुनून के साथ पूरे विश्वास से उत्कृष्ट खिलाड़ी गढ़ते हैं। ऐसे कुछ खडूसों औरसेहत के लिए हानिकारक फोगट जैसे पिता के सहयोग और प्रोत्साहन से ही लड़कियाँ इन ऊँचाइयों पर पहुँच पाती होंगी। खिलाड़ियों की जीविकार्जन की क्षमता और लोकप्रियता समाज में स्टीरियो टाइप को तोड़ेगी और कई अनावश्यक टैबू भी टूटेंगे तो महिलाएँ खुद को अधिक फिट रख पाएँगी। अपने शरीर और उसकी जरूरतों के प्रति सहज रहेंगी तो उनके प्रदर्शन में नई उठान आएगी। अधिकांश स्त्रियों का मानना है कि मासिक स्राव उनके प्रदर्शन को प्रभावित करता है। कई शीर्ष खिलाड़ियों ने महत्वपूर्ण स्पर्धाओं में इसे अपनी हार का कारण माना है। इस तरह के टैबू दूर होने के बाद से समस्याओं और समाधान पर खुल कर बात होती है तो समस्या कम होती जाती है। 26 साल की किरन गाँधी ने लंदन में मासिक स्राव के दौरान बिना नैपकिन प्रयोग किए मैराथन दौड़ सम्पन्न की। वे इस दौरान खुद को संकुचित महसूस करने के चलन को तोड़ते हुए अपने शरीर के प्रति सहज होने का संदेश देना चाहती थीं। उन्होंने माना कि महत्वपूर्ण स्पर्धाओं में फोकस अपने प्रदर्शन पर रहे, जिसके लिए जीवन भर तैयारी की है, न कि लिहाज करने पर। इससे अधिकतर महिलाओं ने सहमति दिखाई और सोशल मीडिया में कइयों की पोस्ट पर ये शब्द चमक उठे 'Happy to bleed'। खेल सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक परिवर्तन का कारगर हथियार बनता है। खेलों के महाकुम्भ में विश्वभर की आँखें मेगा प्रतियोगिताओं में लगी रहती हैं। उस वक्त लैंगिक समानता के संदेश प्रभावी ढंग से सम्प्रेषित होते हैं। सितारे खिलाड़ी जो करते, जो बोलते हैं उनका लोगों पर बहुत प्रभाव पड़ता है। इसलिए वे निजी कम्पनियों के ही नहीं, सामाजिक प्रगति के भी ब्रांड एम्बेसडर हो सकते हैं। एक भीषण समस्या जो स्त्री होने के कारण झेलनी पड़ती है खिलाड़ियों को। 2014 के कॉमन वेल्थ गेम्स में द्युतिचंद को जिन दो प्रतियोगिताओं से बाहर कर दिया था। 4 साल बाद एशियाड में उन्हीं दोनों स्पर्धाओं में उन्होंने पदक जीते। आजीवन स्त्री की तरह जिंदगी जीने, सारे क्रिया कलाप सम्पन्न करने के बाद टेस्टोटेरोन हार्मोन का स्तर देख कर अंतर्राष्ट्रीय मानक यह तय करते हैं कि वह महिला वर्ग में भाग ले सकती है या नहीं। इसी को द्युतिचंद ने चुनौती दी थी और अंततः उनके पक्ष में फैसला आया। फिर उन्होंने स्पर्धाओं में भाग लिया, सफलता भी पाई, पर कितना कुछ खोया भी। नए नियमों के अनुसार भी महिलाओं के भीतर हार्मोन का स्तर तय करेगा कि वे किस वर्ग में स्पर्धा में हिस्सा ले सकती हैं और उन्हें दवाइयों की सहायता से अपने हार्मोन के स्तर को मानकों के अनुकूलन में लाना पड़ेगा। द्युतिचंद समेत कई खिलाड़ियों की सख्त आपत्ति है कि हम अपनी स्वाभाविक, प्राकृतिक संरचना को क्यों कृत्रिम साँचे में जबरन ढालें। इसका कोई वैज्ञानिक प्रमाण भी नहीं है कि प्राकृतिक रूप से पाए जाने पर यह हार्मोन प्रदर्शन को प्रभावित करता है या नहीं। करता भी है तो जैसे किसी को अपने कद या किसी भी शारीरिक वैशिष्ट्य का फायदा या नुकसान होता है, उसी तरह यह भी एक विशिष्ट लक्षण की तरह लिया जाना चाहिए और व्यक्ति की गरिमा और निजता की रक्षा करनी चाहिए। यह उसके मानवाधिकारों का भी एक तरह से उल्लंघन है। स्त्रियों के खेल के प्रति समाज में जागरूकता आएगी और अधिकाधिक स्त्रियों खेलों में भागीदारी बढ़ाती जाएंगी, तो मीडिया भी स्थान बढ़ाने के लिए मजबूर होगा। वरना, सोशल मीडिया भी है और हमारे जैसी हजारों-लाखों स्त्रियाँ भी। सचेतनता स्त्री विषयक इन समस्याओं पर हस्तक्षेप करके एक आम सहमति बनाएगी तो खेल के इन नए नियमों में स्त्री के गरिमामय समावेशन की पूरी सम्भाव्यता होगी। (लेखिका दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापन के साथ ही साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं के लिए लिखती हैं)