अक्टूबर 2018

कैसे बचेंगी भारतीय भाषाएं ?

राजकुमार कुम्भज

हमने स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद भी अपनी शिक्षा के लिए एक विदेशी भाषा का चयन किया और भारतीय भाषाओं को हीन भाव से देखते रहे। अंग्रेज हमें यह समझाने में हद दर्जे तक सफल रहे कि भारतीय भाषाएं और खासतौर से मातृभाषाएं, नया बौद्धिक संसार अर्जित कर पाने के लायक ही नहीं हैं। वे यह भी समझाने में सफलता पा गए कि मातृभाषा में रचनात्मक का अभाव है। इस तरह हम एक भाषायी हीनता बोध से ग्रस्त समाज में तब्दील होते गए।

भारत के उपराष्ट्रपति एम. वैंकेया नायडू ने अभी दो माह पूर्व दिल्ली स्थित आर.के. पुरम में आंध्रप्रदेश एज्यूकेशन सोसायटी के स्थापना दिवस पर नए भवन का शिलान्यास करते वक्त मातृभाषा की अनिवार्यता पर ध्यान केंद्रित किया था, तब उन्होंने स्कूलों में मातृभाषा को एक अनिवार्य विषय के तौर पर पढ़ाए जाने की सलाह सभी राज्यों को दी थी। उपराष्ट्रपति के मुताबिक व्यक्ति चाहे जितनी भी भाषाएं सीख सकता है। हर भाषा में अपनी संस्कृति, मूल्य, नैतिकता और परम्पराएं छिपी होती हैं, किन्तु मातृभाषा की उपेक्षा नहीं होनी चाहिए। अन्य भारतीय भाषाएं सीखने से देश की एकता व अखंडता मजबूत होती है, लेकिन राज्यों को चाहिए कि वे स्कूलों में मातृभाषा की पढ़ाई को अनिवार्य करें। मातृभाषा में समझी-समझाई गई कोई भी बात दिल-दिमाग की गहराई तक पहुंच जाती है। पीपुल्स लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया के सर्वेक्षण में देश की भाषाओं संबंधित तथ्य रखे गए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक भारत में बोली जा रही 780 भारतीय भाषाओं में से तकरीबन 400 भाषाएं अगले पचास बरस में समाप्त हो जाएंगी। पिछले पचास बरस में 250 भारतीय भाषाएं समाप्त हो चुकी हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि सबसे ज्यादा खतरा उन भाषाओं को है, जो आदिवासी समुदायों से जुड़ी हैं। जाहिर है कि जब कोई भाषा खत्म होती है, तो उसके साथ उस भाषा की संस्कृति और परम्पराएं भी खत्म हो जाती है। इसलिए भी मातृभाषा को बचाने की जरूरत है। मातृभाषा, मिट्टी और खून में समाहित होती है। देश में कई भाषाएं ऐसी हैं, जो हजारों बरस पुरानी हैं, इनमें मैथिली एक हजार बरस से भी अधिक पुरानी है, लेकिन मैथिली कमजोर हुई है, इसका एक मात्र कारण यही है की बतौर मातृभाषा मैथिली का दबदबा कुछ कम हुआ है, मौजूदा समय में नए शब्दों के प्रति अस्वीकार्यता से ऐसा हुआ है। भारतीय भाषा लोक सर्वेक्षण के अध्यक्ष गणेश एन देवी के अनुसार मुम्बई में भाषा की विविधता इसलिए बढ़ी है कि वहां एक दूसरी भाषा के नए शब्दों के प्रति स्वीकार्यता भी बढ़ी है। मुम्बई में इस वक्त कम से कम तीन सौ भाषाएं बोली जाती हैं। इसका प्रमुख कारण बोलचाल में मातृभाषा बोलने वालों को बढ़ावा देना है। भोजपुरी भाषा भी उनमें से एक है। इस भाषा में बोलचाल से उद्यमिता बढ़ी है, मातृभाषा में बोलचाल से भाषा का सम्मान बढ़ता है। एक अध्ययन में पाया गया है कि जो बच्चे घर से बाहर दूसरी भाषा बोलते हैं और घर-परिवार में अपनी मातृभाषा में बात करते हैं, वे ज्यादा बुद्धिमान होते हैं। ब्रिटेन स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ रीडिंग के शोधकर्ताओं के एक ताजा शोध का निष्कर्ष यही है। शोधकर्ताओं के इस समूह ने बच्चों की बुद्धिमत्ता (आईक्यू) जांच में पाया कि मातृभाषा बोलने वाले बच्चे, उन बच्चों के मुकाबले अच्छे अंक लाए जो सिर्फ गैर मातृभाषा जानते हैं। इस अध्ययन में ब्रिटेन में रहने वाले तुर्की के सात से ग्यारह बरस के सौ बच्चों को शामिल किया गया था। इस अध्ययन से जाहिर हो जाता है कि घर से बाहर दूसरी भाषा किन्तु घर-परिवार में मातृभाषा में की जाने वाली बातचीत बच्चों की बुद्धिमत्ता प्रभावित करती है। मातृभाषा-विमुखता से ही संस्कृति-विमुखता आती है। मातृभाषा से विमुखता का एक सीधा-सा अभिप्राय यही है कि पूर्वजों द्वारा स्मृति-कोष में संचित ज्ञान-विज्ञान, कला-कौशल, अनुभव-संवेदन, शिल्प, साहित्य, संगीत, रचनात्मक और जीवन संस्कार सहित वह सब कुछ खो बैठना, जिससे आदमी में अपनापन आता है। मातृभाषा का स्वीकार्य दूसरे दर्जे की निर्मिति नहीं है और न ही यह स्वीकार्य किसी कुंठित मानसिकता का कारण होना चाहिए। इधर रोजगार के लिए अंग्रेजी का दबदबा बढ़ता ही जा रहा है, लेकिन कौशल-विकास के लिए मातृभाषा से बढ़कर कोई बेहतर विकल्प हो ही नहीं सकता है। इस तथ्य को समझने की जरूरत है। एक गैर-सरकारी संगठन प्रथम द्वारा जारी की गई सर्वेक्षण रिपोर्ट में कहा गया है कि ग्रामीण भारत के कुल पांच फीसदी बच्चे ही व्यावसायिक शिक्षा अर्जित कर पा रहे हैं। जबकि अस्सी फीसदी नौकरियों के लिए कौशल विकास की आवश्यकता होती है। इसी सर्वेक्षण से यह भी ज्ञात हुआ है कि 14 से 18 बरस की आयु वर्ग के 25 फीसदी बच्चे अपनी मातृभाषा में लिखी गई किताब पढ़ने में असमर्थ हैं, जबकि भारतीय भाषा लोक-सर्वेक्षण का आकलन कहता है कि दूसरी भाषाओं में दी गई शिक्षा से बुद्धिमत्ता तो बढ़ती है, लेकिन समझदारी का विकास नहीं हो पाता है। मातृभाषा में पढ़ाई नहीं करने वाले बच्चों का 'आईक्यू’ पचास फीसदी ही विकसित हो पाता है। इस समझदारी के अभाव से समाज में असंतुलित-मानसिकता के साथ ही साथ हिंसा के खतरे भी बढ़ते हैं। इसलिए बेहद जरूरी हो जाता है कि शिक्षा के क्षेत्र में मातृभाषा के महत्व को खासतौर से समझते हुए शिक्षण को मातृभाषा से जोड़ा जाना चाहिए। हमारे उपराष्ट्रपति एम. वैंकेया नायडू का आशय भी यही है कि स्कूलों में मातृभाषा की पढ़ाई को अनिवार्य किया जाए। इस सबके बीच जो एक सबसे बड़ी सकारात्मक संभावना दिखाई दे रही है, वह यही हो सकती है कि मातृभाषा में पढ़ाई की अनिवार्यता से हिंसा और अपराध की दुनिया पर थोड़ा-बहुत अंकुश लग सकता है। लोकजीवन की प्रयोगशीलता किसी भी भाषा के लिए प्राणवायु का काम करती है। लोकजीवन से आने वाले नए-नए शब्दों से भाषा समृद्ध होती है, लेकिन भावनात्मक-संतुलन के लिए जीवन में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका मातृ-भाषा की ही होती है। इसलिए मातृभाषा की अनदेखी नहीं की जाना चाहिए। उसे अनिवार्य शिक्षा से जोड़े जाने की जरूरत है। लोकजीवन में यह लोकोक्ति सदियों से चली आ रही है। कोस-कोस पर पानी बदले, नौ कोस पर बानी। भाषा के इस मौलिक बदलाव की बाबद बरसों पूर्व ही अध्ययन कर लिया गया था। भाषा में परिवर्तन की अवधारणा कोई नई चीज नहीं है, बल्कि यह तो स्वाभाविक और प्राकृतिक स्थिति है। एक लोक-प्रचलित तथ्य यह भी है कि क्षेत्रीय बोलियों और पड़ोसी राज्य की भाषाओं से अंगीकार किए गए शब्द, भाषा की सहजता और प्रवाहमयता बढ़ाते हैं। इस संदर्भ में गुजरात, महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश से सटे निकटतम क्षेत्रों की बोली-भाषा का अध्ययन किया जा सकता है। इन क्षेत्रों की मातृ भाषाओं में जिस भाषा-बोली का इस्तेमाल किया जाता है। उसमें गुजराती, मराठी और मालवी सहित राजस्थानी शब्द प्रचुरता से प्रयुक्त किए जाते हैं, किन्तु खेद का विषय है कि औपनिवेशिक गुलामी के दौर में हमें अंग्रेजी की परतंत्रता में धकेल कर हमारा समस्त भाषाएं-संस्कार नष्ट-भ्रष्ट कर दिया है। भारत की तरह की अफ्रीकी देश भी लंबे समय से औपनिवेशिक दासता के शिकार रहे हैं। औपनिवेशिक शक्तियों ने जिस तरह भारतीय भाषाओं को नष्ट-भ्रष्ट किया, ठीक उसी तरह से उन्होंने अफ्रीकी भाषाओं को भी तहस-नहस किया, लेकिन यह जानकर प्रसन्नता होती है कि वहां न्गूगी व श्यांगों जैसे विचारक हुए, जिन्होंने भाषाई-तबाही की इस औपनिवेशिक साजिश को सूक्ष्मता से पहचाना और आवाज उठाई, न्गूगी व श्यांगों का खास विरोध अफ्रीकी भाषाओं का दमन करने वाली अंग्रेजी से था। अपनी क्षुब्धता दर्शाते हुए उन्होंने तो यहां तक कह दिया था कि अफ्रीका में अंग्रेजी विभागों को बंद कर देना चाहिए। गौर किया जा सकता है कि न्गूगी वा श्यांगों का यह कथन कितना वजनदार है कि मातृभाषा का आग्रह कोई अंग्रेजी की प्रतिक्रिया में नहीं है, बल्कि यह तो औपनिवेशिक लूट के विरुद्ध एक सकारात्मक हस्तक्षेप है। क्या भारत में ऐसी कोई आवाज उठाई जा सकती है? हमने स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद भी अपनी शिक्षा के लिए एक विदेशी भाषा का चयन किया और भारतीय भाषाओं को हीन भाव से देखते रहे। अंग्रेज हमें यह समझाने में हद दर्जे तक सफल रहे कि भारतीय भाषाएं और खासतौर से मातृभाषाएं, नया बौद्धिक संसार अर्जित कर पाने के लायक ही नहीं हैं। वे यह भी समझाने में सफलता पा गए कि मातृभाषा में रचनात्मक का अभाव है। इस तरह हम एक भाषायी हीनता बोध से ग्रस्त समाज में तब्दील होते गए। मातृभाषाओं में उपलब्ध पारंपरिक ज्ञान की उपेक्षा से मौलिक सृजन प्रभावित हुआ। मातृभाषाओं की नागरिकता समाप्त होती गई। भाषायी लोकतंत्र संकुचन की ओर बढ़ता गया। दुनिया और जीवन की तमाम जटिलताएं-मातृभाषा में आसानी से समझी व सुलझाई जा सकती हैं, लेकिन मातृभाषाओं की शून्यता ने हमें भाषा-शून्य बनाया और भाषा-शून्यता ने ज्ञान-शून्य। अब सवाल यह है कि अंग्रेजी की अराजकता में मातृभाषा कैसे बचाएं? (लेखक वरिष्ठ कवि एवं टिप्पणीकार हैं)