अक्टूबर 2018

जाति और योनि के दो कटघरे

रविवार डेस्क

भारतीय समाजवादी आंदोलन विशिष्ट नेता और प्रखर चिंतक-विचारक डॉ. राममनोहर लोहिया भारत के पिछडेपन के दो प्रमुख कारणों की शिखाख्त की है- एक, जाति व्यवस्था और दूसरी स्त्री को गुलाम बनाए रखने की प्रवृत्ति। उनका मानना था कि जाति और यौनि के कटघरों में जकडे रहने की वजह से ही भारत का सदियों पुराना इतिहास एक पराजित समाज का इतिहास रहा है। इसी महीने की 12 तारीख को डॉ. लोहिया के निधन को 51साल पूरे हो रहे हैं। इस मौके पर प्रस्तुत है उनका ही एक प्रसिद्ध व्याख्यान जो उन्होंने 1953 में दिया था।

दुनिया में सबसे अधिक उदास हैं हिन्दुस्तानी लोग। वे उदास हैं, क्योंकि वे ही सबसे ज्यादा गरीब और बीमार भी हैं, परन्तु उतना ही बड़ा एक और कारण यह भी है कि उनकी प्रकृति में एक विचित्र झुकाव आ गया है, ख़ास कर उनके इधर के इतिहासकाल में बात तो निर्लिप्तता के दर्शन की करते हैं, जो तर्क में और विशेषतः अंतर्दृष्टि में निर्मल है, पर व्यवहार में वे भद्दे ढंग से लिप्त रहते हैं। उन्हें प्राणों का इतना मोह है कि किसी बड़े प्रयत्न करने की जोखिम उठाने के बजाय वे दरिद्रता के निम्नतम स्तर पर जीना ही पसंद करते हैं, और उनके पैसे और सत्ता के लालच का क्या कहना कि दुनिया के और कोई लोग उस लालच का इतना बड़ा प्रदर्शन नहीं करते। आत्मा के इस पतन के लिए, मुझे यकीन है, जाति और औरत के दोनों कटघरे मुख्यतः जिम्मेदार हैं। इन कटघरों में इतनी शक्ति है कि साहसिकता और आनंद की समूची क्षमता को ये ख़त्म कर देते हैं। जो लोग सोचते हैं कि आधुनिक अर्थतंत्र के द्वारा गरीबी मिटाने के साथ ही ये कटघरे अपने-आप ख़त्म हो जायेंगे, बड़ी भारी भूल करते हैं। गरीबी और ये दो कटघरे एक-दूसरे के कीटाणुओं पर पनपते हैं। जब तक, साथ ही साथ, इन दो कटघरों को ख़त्म करने का सचेत और निरंतर प्रयत्न नहीं किया जाता तब तक गरीबी मिटाने का प्रयत्न छल-कपट है। भारतीय गणतंत्र के राष्ट्रपति ने पुण्य नगरी बनारस में सार्वजनिक रूप से दो सौ ब्राह्मणों के पैर धोए। सार्वजनिक रूप से किसी के पैर धोना अश्लीलता है, इस अश्लील काम को ब्राह्मण जाति तक सीमित करना दंडनीय अपराध माना जाना चाहिए, इसे विशेषाधिकार प्राप्त जाति में अधिकांशतः ऐसों को सम्मिलित करना, जिनमें न योग्यता हो न ही चरित्र, विवेक-बुद्धि का पूरा परित्याग है, जो कि जाति-प्रथा और पागलपन का अवश्यंभावी अंग है। राष्ट्रपति इस अश्लीलता का प्रदर्शन कर सके, यह मुझ जैसे लोगों पर बड़ा अभियोग है, जो सिर्फ नपुंसक गुस्से में ही उबल सकते हैं। मैं बतला दूँ कि इस घिनौने काम का पूरा किस्सा मुझे एक ब्राह्मण ने ही बतलाया। उसे उन दो सौ में सम्मिलित किया गया था। वही अकेला था, जो अपने देश के राष्ट्रपति द्वारा पैर धुलवाने के नीच कर्म का अपराधी बनने के पहले ही येन मौके पर ग्लानी से भरकर अलग हो गया। उसकी जगह फ़ौरन दूसरे आदमी को दे दी गई। संस्कृत के इस गरीब अध्यापक को मैं हमेशा शृद्धा से याद रखूँगा। इस भयंकर राक्षसी नाटक में वही तो एक मात्र मनुष्य था। ऐसे ही नर और नारियां, जो हालाँकि जन्म से ब्राह्मण हैं, दक्षिण के विकृत ब्राह्मण विरोध से समूचे देश को डूबने से बचा रहे हैं। बनारस और दूसरी जगहों के ऐसे ब्राह्मणों को मैं चेतावनी देना चाहता हूँ, जो मानवी आत्मा और भारतीय गणतंत्र के इस पतन से फूले नहीं समाते। बुरे कर्मों और उनमें मजे लूटने से पलटकर थप्पड़ लगता है। इस आधार पर कि कोई ब्राह्मण है, उसके पैर धोने का मतलब होता है जाति-प्रथा, गरीबी और दुःख-दर्द को बनाये रखने की गारंटी करना। वह आत्मा, जिससे की ऐसे बुरे कर्म उपजते हैं, कभी भी न तो देश के कल्याण की योजना बना सकती हैं न ही ख़ुशी से जोखिम उठा सकती है। वह हमेशा लाखों-करोड़ों को दबे और पिछड़े बनाए रखेगी। जितना वह उन्हें आध्यात्मिक समानता से वंचित रखती है, उतना ही वह उन्हें सामाजिक और आर्थिक समानता से वंचित रखेगी। वह देश की खेती या कारखाने नहीं सुधार सकती, क्योंकि वह कूड़े के ढेर और गंदे तालाबों की मामी-मौसी है, जहाँ कीड़े और मच्छर पैदा होते हैं, भले ही वह ऊँची जाति के बड़े लोगों के घरों के चारों तरफ ‘डी.डी.टी' का इस्तेमाल करें। खटमल, मच्छर, अकाल और सार्वजनिक रूप से ब्राह्मणों के पैर धोना एक-दूसरे के पोषक हैं। वे मन में भी एक प्रकार के व्यभिचार का पोषण करते हैं, विचार-क्षेत्र में एक प्रकार का अंतर्जन होता है, क्योंकि अलग-अलग धंधों में लगे और विभिन्न स्तरों पर जन्मे लोगों के बीच खुलकर बातचीत करने की बात ख़त्म हो जाती है। उस देश में जिसका राष्ट्रपति ब्राह्मणों के पैर धोता है, एक भयंकर उदासी छा जाती है, क्योंकि वहां कोई नवीनता नहीं होती, पुजारिन और मोची, अध्यापक और धोबिन के बीच खुलकर बातचीत नहीं हो पाती है। कोई अपने राष्ट्रपति से मतभेद रख सकता है या उसके तरीकों को विचित्र समझ सकता है, पर वह उनका सम्मान करना चाहेगा, पर इस तरह के सम्मान का अधिकारी बनने के लिए राष्ट्रपति को सभ्य आचरण के मूलभूत नियमों का उल्लंघन नहीं करना चाहिए। नर और नारी के बीच सामाजिक संबंधों के बारे में राष्ट्रपति के विचारों पर एक अप्रकाशित आलोचना लिखने का इससे पहले भी मुझे अवसर मिला था, किन्तु तब वे पूरी तौर पर मेरे आदर से वंचित नहीं हुए थे। भाई-भाई को मारने वाले इस अकाट्य काम से वे अब मेरे आदर से वंचित हो गए हैं, क्योंकि जिसके हाथ सार्वजनिक रूप से ब्राह्मणों के पैर धो सकते हैं, उसके पैर शूद्र और हरिजन को ठोकर भी तो मार सकते हैं। श्री राजेंद्र प्रसाद भले ही आज इसकी चिंता न करें कि मेरे जैसे लोगों का उन्हें आदर प्राप्त है या नहीं, क्योंकि अगर समाजवाद और जनतंत्र तक आज हिन्दुस्तान में इतना नपुंसक न होता जितना कि है, तो बनारस के युवजन अपने समूचे अस्तित्व में इस चोट से तड़प उठते और इतने बड़े पैमाने पर प्रदर्शन करते कि ऐसी अश्लीलता करना असंभव हो जाता। राष्ट्रपति के सार्वजनिक रूप से इस तरह अपने-आप को गिरने की इजाजत देने के लिए मैं प्रधानमंत्री और उनकी सरकार को दोषी नहीं ठहराऊंगा। उन पर तो मेरा आरोप और भी बड़ा है। वह आदमी, जो जाति-प्रथा की समस्या पर अपनी छाप चालाकी से छिपा सकता है, वह और अधिक घातक है। यह बात तो लिखी हुई मौजूद है कि पंडित नेहरू ने ‘ब्राह्मणों की सेवा-भावना' की तारीफ़ की है। डॉ. राजेंद्र प्रसाद जो कुछ अपने काम से करना चाहते हैं पंडित नेहरू उसे कुछ न करके हासिल कर लेते हैं। एक बहुत ही मामूली कसौटी पर उसे परखा जा सकता है। जिस दिन प्रशासन और फौज में भर्ती के लिए, और बातों के साथ-साथ, शूद्र और द्विज के बीच विवाह को योग्यता और सहभोज के लिए इंकार करने पर अयोग्यता मानी जायेगी, उस दिन जाति पर सही मायने में हमला शुरू होगा। वह दिन अभी आना है। मैं यह साफ़ कर दूँ कि शूद्र और द्विज के बीच विवाह को बनिए और ब्राह्मण इत्यादि के बीच विवाह नहीं समझ लेना चाहिए, क्योंकि ऐसे विवाह काफी आसानी से हो जाते हैं और जाति-प्रथा के अंग ही हैं। नागरिक अधिकारों के ऐसे हनन पर पवित्र विरोध का झूठा हल्ला मचाया जा सकता है, जैसे कि पैदाइशी समूहों से आदमी को चुनने के इस गंदे रिवाज से नागरिक अधिकारों का हनन नहीं होता। सरकारी नौकरी के लिए अंतर्विवाह को एक योग्यता बनाने का मजाक भी उड़ाया जा सकता है। अपनी सुरक्षा और एकता के लिए प्रयत्न करने का और उस भयंकर उदासी को, जिनमें नवीनता रह ही नहीं गई है, दूर करने का अधिकार प्रत्येक राज्य को है। यहाँ आदमी से औरत के अलगाव की बात आ गई। जाति और योनि के ये दो कटघरे परस्पर सम्बंधित हैं और एक-दूसरे को पालते-पोसते हैं। बातचीत और जीवन में से सारी ताजगी ख़त्म हो जाती है और प्राणवान रस-संचार खुलकर नहीं होता। कॉफ़ी हाउस में बैठकर बातें करने वालों में एक दिन मैं भी बैठा था, जब किसी ने कहा कि कॉफ़ी के प्यालों पर होने वाली ऐसी बातचीत ने ही फ्रांस की क्रांति को जन्म दिया था। मैं गुस्से में उबल पड़ा। हमारे बीच एक भी शूद्र नहीं था। हमारे बीच एक भी औरत न थी। हम सब ढीले-ढाले, चूके हुए और निस्तेज लोग थे, कल के खाए चारे की जुगाली करते हुए ढोर की तरह। देश की सारी राजनीति में- कांग्रेसी, कम्युनिस्ट अथवा समाजवादी-चाहे जानबूझ कर अथवा परंपरा के द्वारा राष्ट्रीय सहमति का एक बहुत बड़ा क्षेत्र है, और वह यह कि शूद्र और औरत को, जो पूरी आबादी के तीन-चौथाई हैं, दबाकर और राजनीति से अलग रखो। औरतों की समस्या निःसंदेह कठिन है। उसकी रसोई की गुलामी तो वीभत्स है, और चूल्हे का धुआं तो भयंकर है। खाना बनाने के लिए उसका वाजिब समय बाँध देना चाहिए और ऐसी चिमनी भी लगानी चाहिए कि जिसमें से धुआं बाहर निकल जाए। उसे अपर्याप्त भोजन और बेकारी के खिलाफ आन्दोलन में जरूर हिस्सा लेना चाहिए, किन्तु उसकी समस्या इससे भी आगे है। भारतीय नारी की स्थिति पर श्रीमती शकुंतला श्रीवास्तव ने इधर बहुत ही सुन्दर लेखमाला लिखी है और यह जानकर मुझे प्रसन्नता हुई कि वे प्रायः स्त्रियों का सारा दोष पुरुषों के मत्थे मढ़ने की प्रवृत्ति से उबर गई हैं और अब यह मानने को तैयार हैं कि औरत और मर्द दोनों अलग-अलग मात्रा में दोषी हैं, लेकिन उन्हें और भी आगे जाना होगा। वह दिन मुझे याद है, जब एक महत्वपूर्ण सम्मेलन में उन्हें मंच पर बुलाया जा रहा था और उन्होंने नीचे से उठने से इंकार कर दिया था, पर उनका इलाज मेरे पास था। मुझे सिर्फ धमकी देनी पड़ी कि मैं उनकी बांह पकड़कर ले जाऊँगा और वे चुपचाप नीचे से उठकर मंच पर आ गर्इं। पुण्य क्या है और पाप क्या है? अब इस सवाल से बचा नहीं जा सकता। मैं मानता हूँ कि आध्यात्मिक निरपेक्ष है, किन्तु नैतिकता सापेक्ष है, और हरेक युग और आदमी तक को अपनी-अपनी नैतिकता खोजनी चाहिए। एक औरत जिसने अपनी सारी जिन्दगी में सिर्फ एक बच्चे को जन्म दिया हो, चाहे वह अवैध ही क्यों न हो, और दूसरी ने आधे दर्जन या ज्यादा वैध बच्चे जने हों, तो इन दोनों में कौन ज्यादा शिष्ट और ज्यादा नैतिक है ? एक औरत जिसने तीन बार तलाक दिया और चौथी बार वह फिर शादी करती है, और एक मर्द चौथी बार इसलिए शादी करता है कि एक के बाद एक उसकी पत्नियां मर गई हैं, तो इन दोनों में कौन ज्यादा शिष्ट और ज्यादा नैतिक है? मैं इस बात से इंकार नहीं करता कि तलाक और अवैध बच्चे इत्यादि एक मायने में असफलता है और एक पत्नी, एक पति किन्तु पारस्परिक विश्वास शायद वह आदर्श है, जो नर-नारी संबंधों में प्राप्त हो। किन्तु, जैसे कि अन्य मानवी क्षेत्रों, इसमें भी प्रायः आदर्श से चूक जाते हैं, जब मर्द या औरत सम्पूर्णता का प्रयास करते हैं। तब, मेरे मन में कोई शक नहीं है कि सिर्फ एक अवैध बच्चा होना आधे दर्जन वैध बच्चे होने से कई गुना अच्छा है। उसी तरह इसमें भी कोई शक नहीं कि तीन पत्नियों या पतियों की, सभी की मृत्यु आकस्मिक हो, और अपेक्षा और गरीबी जरूर ही रही होगी, और इस तरह की अपेक्षा उन झगड़ों से कहीं ज्यादा बुरी है, जिनकी वजह से तीन बार या और ज्यादा तलाक हुए हों। इन निर्णयों का अब छिटपुट महत्व नहीं। इनका व्यापक प्रभाव हो गया है क्योंकि आज विवाह और उसके बाद से सम्बंधित परिस्थितियां, अगर किसी को पाप कहा जा सकता है तो वे पापपूर्ण हैं। बिना दहेज़ के लड़की किसी मसरफ की नहीं होती, जैसे बिन बछड़े वाली गाय। कई माँ-बाप ने आँखों में आंसू भरकर मुझे बताया है कि अगर निश्चित दहेज़ पूरा न दिया तो किस तरह उनकी बेटियों को सताया गया और कभी-कभी मार भी डाला गया। खेती में ऐसी स्थितियां होती हैं, जिनमें खुद मेहनत करने के बजाय खेत पट्टे पर दे देने से ज्यादा लाभ होता है। ठीक इसी तरह एक कम पढ़ी-लिखी लड़की ज्यादा पढ़ी-लिखी लड़की से अच्छी मानी जाती है, क्योंकि उस पर दहेज़ कम मिलेगा। हिंदुस्तान आज विकृत हो गया है; यौन पवित्रता- यौन पवित्रता की लम्बी चौड़ी बातों के बावजूद, आम तौर पर विवाह और यौन सम्बन्ध में लोगों के विचार सड़े हुए हैं। दहेज़ लेने और देने पर निःसंदेह, सजा मिलनी चाहिए, किन्तु दिमाग में और उसके मूल्यों में परिवर्तन होना चाहिए। नाई या ब्राह्मण द्वारा पहले जो शादियाँ तय की जाती थीं, उसकी बनिस्बत फोटू देखकर या सकुचाती, शर्माती लड़की द्वारा चाय की प्याली लाने के दमघोंटू वातावरण में शादी तय करना हर हालत में बेहूदा है। यह ऐसा ही है जैसे किसी घोड़े को खरीदते समय घोड़ा ग्राहक के सामने तो लाया जाए, पर न उसके खुर छू सकते हैं न ही उसके दांत गिन सकते हैं। आधे रास्ते में कुछ आना-जाना नहीं। हिंदुस्तान को अपना पुराना पौरुष पुनः प्राप्त करना होगा; यानी, दूसरे शब्दों में, यह कहना हुआ कि उसे आधुनिक बनना चाहिए। लड़की की शादी करना मां-बाप की जिम्मेदारी नहीं; अच्छा स्वास्थ्य और अच्छी शिक्षा दे देने पर उनकी जिम्मेदारी ख़त्म हो जाती है। अगर कोई लड़की इधर-उधर घूमती है और किसी के साथ भाग जाती और दुर्घटनावश उसके अवैध बच्चा होता है, तो यह औरत और मर्द के बीच स्वाभाविक सम्बन्ध हासिल करने के सौदे का एक अंग है, और उसके चरित्र पर किसी तरह का कलंक नहीं। लेकिन समाज क्रूर है और औरतें तो बेहद क्रूर बन सकती हैं। उन औरतों के बारे में, विशेषतः अगर वे अविवाहित हों और अलग-अलग आदमियों के साथ घूमती-फिरती हों, तो विवाहित स्त्रियाँ उनके बारे में जैसा व्यवहार करती हैं और कानाफूसी करती हैं, उसे देखकर चिढ़ होती है। इस तरह के क्रूर मन के रहते मर्द का औरत से अलगाव कभी ख़त्म नहीं होगा। श्री विनोबा भावे को जन्म निरोध पर और जाति-प्रथा पर या कम से कम उसका बढ़ा-चढ़ाकर हवाला देने के अपवित्र विचारों से अपने सामान्य भू-दान आन्दोलन को भ्रष्ट करने का लोभ हुआ है। मैं मानता हूँ कि हरेक जोड़ों का, जिसने तीन बच्चे पैदा कर लिए हैं, अनुर्वरीकरण कर देना चाहिए और कि प्रत्येक मर्द और औरत को विवाहित अथवा अविवाहित जो गर्भधारण की जोखिम नहीं उठा सकते, उन्हें अनुर्वरीकरण की, या कम से कम गर्भनिरोध की सुविधा मिलनी चाहिए। ब्रह्मचर्य प्रायः कैदखाना होता है। ऐसी बंदी लोगों से कौन नहीं मिला, जिनका कौमार्य उन्हें जकड़े रहता है और जो किसी मुक्तिदाता की उत्सुकता से प्रतीक्षा करते हैं? समय आ गया है कि जवान औरतें और मर्द ऐसे बचकानेपन के विरुद्ध विद्रोह करें। उन्हें यह हमेशा याद रखना चाहिए कि यौन आचरण में केवल दो ही अक्षम्य अपराध हैं : बलात्कार और झूठ बोलना या वादों को तोड़ना। दूसरे को तकलीफ पहुँचाना या मारना एक और तीसरा भी जुर्म है, जिससे जहाँ तक हो सके बचना चाहिए। जीवन कितना स्थूल हो गया है? समाज के नेताओं ने विवाह की निमंत्रण-पत्रिका छापने में पचास हजार रुपए खर्च किए हैं। उनकी शादियों का वैभव आत्मा के मिलन में नहीं है, जिसे प्राप्त करने का नवदंपति प्रयत्न करते, बल्कि 20 लाख की कंठियों और 50 हजार से भी ज्यादा कीमती साड़ियों में है। एक बार चाय की दावत में एक ऐसे करोड़पति से मेरी भेंट हो गई, जिसने मुझसे यह कहने की हिमाकत भी की कि ऐसी साड़ियां कहीं नहीं होतीं और मेरी इच्छा हुई कि उसे मिंक कोट के स्कूल में भेज दूँ। मिंक नामक छोटे से पशु की खाल से बने ये कोट लाखों रुपयों में बिकते हैं। कई वर्ष पहले सिर्फ एक बार मैं इस आदमी से मिला था, वह मेरे पास आकर पूरे दो घंटों तक मेरी खुशामद करता रहा, क्योंकि किसी शरारती आदमी ने उसे टेलीफोन कर दिया था कि उसके घिनौने कामों के कारण मेरे आदमी उसे कारखाने में उड़ा देंगे। वह इतना अभद्र था कि मुझसे यह कहने से भी नहीं चूका कि वह मेरे दल की कुछ मदद कर सकता है और मैं इतना अभद्र न था कि उसकी काली करतूतों के बदले में कुछ लेकर चुप बैठ जाता, बाद में उसने कभी भी अपनी उदारता नहीं दिखलाई। ऐसे ही क्षणों में आदमी कुछ देर के लिए बम और तेजाब की बोतलों के इस्तेमाल के चक्कर में आ जाता है। धर्म, राजनीति, व्यापार और प्रचार सभी मिलकर उस कीचड़ को संजो कर रखने की साजिश कर रहे हैं, जिसे संस्कृति के नाम से पुकारा जाता है। यथास्थिति की यह साजिश अपने-आप में इतनी अधिक शक्तिशाली है कि उससे बदनामी और मौत होगी। मुझे पूरा यकीन है कि मैंने जो कुछ लिखा उसका और भयंकर बदला चुकाया जाएगा, चाहे यह लाजमी तौर पर प्रत्यक्ष या तात्कालिक भले ही न हो। जब जवान मर्द और औरतें अपनी ईमानदारी के लिए बदनामी झेलती हैं तो उन्हें याद रखना चाहिए कि पानी फिर से निर्बंध बह सके, इसलिए कीचड़ साफ़ करने की उन्हें यह कीमत चुकानी पड़ती है। आज जाति और योनि के इन वीभत्स कटघरों को तोड़ने से बढ़कर और कोई पुण्य कार्य नहीं है। वे सिर्फ इतना ही याद रखें कि चोट या तकलीफ न पहुंचे और अभद्र न हों, क्योंकि मर्द और औरत के बीच का रिश्ता बड़ा नाजुक होता है। हो सकता है, हमेशा इससे न बच पाएं, किन्तु प्रयत्न करना कभी नहीं बंद होना चाहिए। सर्वोपरि, इस भयंकर उदासी को दूर करें और जोखिम उठाकर ख़ुशी हासिल करें। -1953 जनवरी