अक्टूबर 2018

यह भी अपमान है गांधी-स्मृति का

मीनू जैन

अध्यात्म की दुकानदारी चलाने वाले इन दोनों बेहद भ्रष्ट-निकृष्ट और धूर्त चेहरों को गांधी कथा के वाचन का जिम्मा सौंपना न सिर्फ इस कथा के प्रणेता और सर्वश्रेष्ठ वाचक नारायण भाई देसाई का, बल्कि राष्ट्रपिता की प्रेरक स्मृति का भी अपमान है।

मैं इस कथा के माध्यम से गाँधी को रहस्य की गुफा से मुक्त करना चाहता हूं गांधी कोई भगवान नहीं थे। उन्होंने अनेक बार स्वयं अपने ही बनाए नियमों को तोड़ा था। सामान्य मानव की भांति उनमें भी अनेक कमजोरियां थीं। सार रूप में कथा का सन्देश यह है कि समय–समय पर आत्मशोधन के ज़रिए उन्होंने अपनी कमजोरियों पर विजय पाई थी... यह ‘मोहनदास’ से ‘महात्मा’ बनने की कथा है, जिसे मैंने ‘गांधी-कथा’ की संज्ञा दी है। मुझसे अक्सर यह सवाल पूछा जाता है कि मेरे बाद ‘गांधी-कथा’ की विरासत को कौन संभालेगा? मुझे देश के युवाओं से बहुत आशाएं हैं और मैं समझता हूँ कि वे अपनी पीढ़ी के लिए स्वयं ही गांधी की व्याख्या करेंगे। फिर भी इतना कहना चाहूँगा कि गांधी-कथा का वाचन करने वाले में ये तीन खूबियाँ होना आवश्यक है– 1. हेतु के प्रति संवेदनशीलता, 2. गांधी के जीवन और दर्शन का सम्यक् ज्ञान एवं 3. वक्तृत्व ‘कला’ नारायण महादेव देसाई, ‘गांधी कथा’ के प्रणेता । इस विषय में दो राय नहीं हो सकती कि 'गांधी-कथा' पर स्वर्गीय नारायण महादेव देसाई का अघोषित ‘कॉपीराइट’ है! महात्मा गांधी की 150वीं जयंती पर सरकार अन्य कार्यक्रमों के अलावा पूरे देश में ‘गांधी-कथा’ का भी आयोजन करने जा रही है। श्रीश्री रविशंकर और जग्गी वासुदेव गांधी कथा का वाचन करेंगे! अध्यात्म के दुकानदारों को ‘गांधी-कथा’ का जिम्मा सौंपना बापू की स्मृति के साथ खिलवाड़ है। गांधीवादी नेता और महात्मा गांधी के निजी सचिव महादेव भाई देसाई के सुपुत्र स्वर्गीय नारायण भाई देसाई ने बापू के जीवन और दर्शन को जन-जन तक पहुंचाने के लिए देश–विदेश में घूम-घूमकर 'गांधी-कथा' के वाचन की अनूठी शुरुआत की थी। गांधी-कथा पर नारायणभाई देसाई का अघोषित ‘कॉपीराइट’ है। धूर्त कुगुरुओं को गाँधी कथा वाचन का अधिकार कैसे दिया जा सकता है! समय रहते इसका पुरजोर विरोध कर इसे रोका जाना चाहिए। श्री श्री रविशंकर और जग्गी वासुदेव गांधी-कथा का वाचन करने की अर्हता क्यों नहीं रखते? - प्रस्तुत आलेख की प्रारम्भिक पंक्तियों में ही गांधी-कथा के प्रणेता नारायण देसाई ने स्पष्टतया गांधी-कथा की अपनी विरासत युवाओं के हाथों में सौंपने की बात कही थी। दोनों तथाकथित धर्मगुरु उम्र के उस तीसरे पडाव पर पहुंच चुके हैं, जब इतिहास या किसी व्यक्ति विशेष की विवेचना को लेकर व्यक्ति के विचार एवं सोच इतने परिपक्व हो चुके होते हैं कि कई बार उनके एकांगी होने का भी खतरा पैदा हो जाता है। जीवन को एकमात्र धर्म के नज़रिए से देखने वाले तथाकथित धर्मगुरु गांधी के लचीले विचारों के वाहक कदापि नहीं हो सकते। 2. श्री देसाई ने गांधी-कथा के वाचक की जो योग्यता बताई, उनमें हेतु के प्रति वाचक की संवेदनशीलता और गांधी जी के जीवन एवं दर्शन का सम्यक् ज्ञान सर्वोपरि हैं। अध्यात्म के चोले में धर्म और धर्मान्धता की दुकानदारी करने वाले ये गुरु सर्वधर्म-समभाव की अवधारणा में गहरी निष्ठा रखने वाले गांधी के दर्शन के प्रति संवेदनशील होंगे, यह सोचना भी मूर्खता होगी। जिस धार्मिक कट्टरता के विरुद्ध संघर्ष में गांधी ने अपने प्राणों की आहुति दे दी, ये तथाकथित धर्मगुरु आज उसी विषैली विचारधारा के पृष्ठपोषक बने हुए हैं। धार्मिक कट्टरवाद के पोषक गुरुओं के मुख से गांधी-कथा का श्रवण बापू की स्मृतियों के साथ छल करना है। गांधी एक वर्ग-रहित समाज की परिकल्पना करते थे। ये धनपशुओं के गुरु गांधी के वर्ग– रहित समाज का सन्देश जन–जन तक पहुंचाएंगे, यह उम्मीद करना भी व्यर्थ है। क्या ऐशोआराम की ज़िन्दगी जीने वाले ये गुरु पूंजीपतियों की सरकार द्वारा प्रायोजित गांधी-कथा के माध्यम से गांधी के ‘ट्रस्टीशिप’ के विचारों को जन–जन तक पहुंचाएंगे? कदापि नहीं! गांधी मितव्ययितापूर्ण जीवनशैली का एक जीता–जागता उदाहरण रहे। करोड़ो रुपए की लक्ज़री कारों में सफ़र करने वाले ये तथाकथित गुरु रेल के थर्ड क्लास के डिब्बे में सफ़र करने वाले गांधी के संदेशवाहक कदापि नहीं हो सकते। आज इस देश अधिकाँश ‘धर्मगुरुओं’ की विश्वसनीयता भारी संदेह के घेरे में है। उनकी चारित्रिक दुर्बलताएं सार्वजनिक चर्चा का विषय बनी हुई हैं। तो फिर क्या कारण है कि इन्हें गांधी–कथा के वाचन का जिम्मा दिया गया है? क्या है ‘गांधी कथा’ का इतिहास - जब वर्ष 2002 में अहिंसा के अग्रदूत महात्मा गांधी की धरती गुजरात में हिंसा का वीभत्स तांडव हुआ तो स्वनामधन्य गांधीवादी विचारक स्वर्गीय नारायण भाई देसाई ने व्यथित होकर इस हिंसा का सकारात्मक प्रतिकार करने का निश्चय किया। श्री देसाई के इसी निश्चय की कोख से ‘गांधी–कथा’ नि:सृत हुई। कथा का उद्देश्य था गांधी के जीवन- दर्शन से सामान्य जन, खासकर नई पीढ़ी, का एक बार फिर परिचय करवाना, ताकि इस देश का सामाजिक ताना–बाना गुजरात जैसी साम्प्रदायिक हिंसा की आग में जलकर ख़ाक न हो जाए। नारायण देसाई ने वर्ष 2004 में अहमदाबाद स्थित ‘गुजरात विद्यापीठ’ के परिसर में पहली बार ‘गांधी-कथा’ का वाचन किया और इस प्रकार एक पूरी पीढ़ी बापू की गोद में खेलकर बड़े हुए नारायण देसाई के मुख से गांधी के जीवन, सन्देश और दर्शन के बारे में सुनकर कृतार्थ हुई। गांधी-कथा का यह अनूठा स्वरूप परम्परागत धार्मिक कथावाचन से बिलकुल भिन्न था। न कोई शंखनाद, न ही कोई मंत्रोच्चार! लगातार पांच/ सात दिनों तक प्रतिदिन बिना रुके तीन घंटे गांधी-कथा के वाचन के दौरान श्री देसाई महात्मा के जीवन के ज्ञात अंशों के अलावा कई ऐसे अनछुए पहलुओं से श्रोताओं को रूबरू करवाते थे, जिनका उल्लेख शायद ही कहीं मिले। कथा के प्रत्येक सत्र की विषयवस्तु गांधीजी के जीवन के भिन्न–भिन्न पहलुओं को स्पर्श करते हुए ‘महात्मा’ को ‘सामान्य मानव’ के रूप में प्रस्तुत करने से भी नहीं चूकती थी। श्री देसाई ने न केवल स्वदेश में बल्कि यूएसए, यूके, कनाडा सहित अनेक देशों में भी हिंसा और विद्वेष से त्रस्त मानवता को इस कथा के माध्यम से शान्ति और अहिंसा के उस भूले–बिसरे मार्ग से रूबरू करवाया, जिसकी पैरोकारी महात्मा गांधी आजीवन करते रहे। साबरमती आश्रम और उसके बाद सेवाग्राम में बापू की छत्रछाया में जिए अपने 23 वर्षों के संस्मरणों का पिटारा, जब वह एक–एक कर खोलते थे तो श्रोता मंत्रमुग्ध हुए बिना नहीं रहते थे। उनके मुख से गांधी-कथा का श्रवण वाकई एक आध्यात्मिक अनुभव होता था! (लेखिका 'डिग्निटी डॉयलॉग’ की पूर्व संपादक हैं)