अक्टूबर 2018

‘बुलेट ट्रेन के बदले हमें गांधी दे दो'

काओरी कुरिहारा

जापान की काओरी कुरिहारा लगभग साढ़े सात वर्ष तक भारत में रही हैं। इस दौरान उन्होंने गुजरात विद्यापीठ में दाखिला लेकर पहले गुजराती भाषा सीखी और फिर गांधीवादी दर्शन में एमए भी किया। गांधीवादी दर्शन की पढाई करते हुए ही वे महात्मा गांधी के विचारों से इतनी प्रभावित हो गईं कि अपने देश लौटकर वहां गांधीवादी मूल्यों के प्रचार प्रसार में जुट गईं।

मेरा नाम काओरी कुरिहारा है। मैं एक जापानी नागरिक हूं जिसने साढ़े सात साल भारत में बिताए और यहीं से पढ़ाई की और जो गांधीवादी दर्शन के साथ जुड़ने का प्रयास कर रही है। उनके दर्शन को जापान में अलग-अलग जगहों पर फैलाने के दौरान मैंने कई लोगों से मुलाकात की। मेरे प्रधानमंत्री शिंज़ो आबे जब अहमदाबाद में बुलेट ट्रेन परियोजना का शिलान्यास करने और जापानी तकनीक देने के लिए आए थे तो मेरी इच्छा थी कि वह मेरे देश के नागरिकों के लाभ के लिए बदले में गांधीवादी मूल्य और दर्शन यहां से वापस ले जाएं। 'विकास' दोनों राष्ट्र की बातचीत का केंद्र बिंदु है। गांधीवादी दर्शन के अनुसार, विकास केवल आर्थिक शर्तों में पूरी तरह परिभाषित नहीं होता है। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो इसका मक़सद केवल अधिक पैसा, शक्ति या शोहरत कमाना नहीं होना चाहिए। हम विकास की गति किस तरह चुनते हैं, यह पूरी तरह हम पर निर्भर है। इस संबंध में गांधी ने न केवल विकास को परिभाषित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई बल्कि यह कैसे प्राप्त किया जा सकता है इसकी रूपरेखा भी तैयार की। गुजरात विद्यापीठ से 2009 में जब गांधीवादी अध्ययन में मैंने एमए करने का फ़ैसला किया तब मुझ में बेहद जिज्ञासा और उत्साह था। जब ऐसा फ़ैसला मैंने लिया, तब मुझसे पूछा गया कि कैसे किसी जापानी के लिए गांधीवादी दर्शन की प्रासंगिकता है। साथ ही गुजराती जैसी नई भाषा सीखने की जगह मुझे अंग्रेज़ी सुधारने की सलाह दी गई। विचित्र लेबल लगाने के अलावा लोगों की प्रतिक्रिया बहुत अलग थी। हालांकि, मैं यह समझ गई थी कि इस तरह की प्रतिक्रिया केवल इसलिए आ रही हैं कि जिस निर्णय को मैंने लिया है, उसके पीछे की मंशा को वे समझने में असमर्थ हैं। एक बाहरी शख़्स को इस तरह का मौक़ा मिलना और एमए की डिग्री हासिल करना एक ख़ास अधिकार से कम नहीं था। यहां तक कि गुजरात विद्यापीठ को मुझे यह मौक़ा देने के लिए मैं उनकी बेहद आभारी हूं। मैं गुजराती में गांधीवादी विचारधारा को पढ़ सकती हूं और उससे जुड़ी हुई हूं। मुझे इस बात पर विश्वास हो चुका है कि उन्होंने जो कुछ कहा है, उसे गुजराती में पढ़ना ज़रूरी है। हालांकि, कई गांधीवादी उपदेश हैं, जो अंग्रेज़ी में मौजूद हैं, लेकिन मेरे लिए उनके कई शब्द, व्यवहार और यहां तक कि चुटकुले और टिप्पणियां जो गुजराती में मौजूद हैं, वह बेमिसाल हैं। जनवरी 2017 में मैंने अपनी एमए की थीसिस जमा की, जिसके बाद मैं वापस जापान चली गई। महात्मा गांधी की अहिंसा की विचारधारा को समझने और जापान में उसे फैलाने का प्रयास किया। अपने देश में रहने के दौरान मैंने कई लोगों से बातचीत की, जिन्होंने गांधी में अपनी रुचि दिखाई। उदाहरण के लिए मैं बताऊं तो पश्चिमी जापान के एक हाई स्कूल के वाइस चांसलर से मुझे मिलने का मौका मिला, जो गांधी के साथियों, भारत के स्वतंत्रता आंदोलन और साथ ही अहिंसा के महत्व पर बात कर रहे थे। टोक्यो से 800 किलोमीटर दूर रहने के बावजूद हम हर 2 महीने में गांधी को समझने के लिए मिलने का प्रयास करते हैं। गुजरात में रहने के दौरान मुझे उन लोगों से मिलने का मौका मिला, जो गांधी के जीवित रहने के दौरान उनसे परिचित थे। इस संबंध में गुजरात विद्यापीठ के चांसलर नारायण देसाई का ख़याल मेरे दिमाग में आया, जिनसे मुझे सीखने का ख़ास मौका मिला। जापान के लोगों में गांधीवादी विचार और दर्शन फैलाने में अहम रोल निभाने के दौरान मैं अपनी डायरी पर निर्भर रही हूं, जिसमें मैंने गांधी के उद्धरणों उनकी तस्वीरों को रखा हुआ था। पश्चिमी जापान हाई स्कूल के वाइस चांसलर से लेकर एक्यूपंक्चर की प्रैक्टिस कर रहे डॉक्टर तक मैंने गांधी के बारे में विस्तृत बातचीत की है। हालांकि, वे अभी तक विचारों की जटिलता को समझ नहीं पाए हैं, लेकिन मैं अपनी कोशिश लगातार जारी रखूंगी। गांधीवादी विचारों का विरोध करने वाले लोगों के साथ भी मैं समय बिताती हूं और जब हमारे बीच किसी बात को लेकर बहस होती है तो मुझे महात्मा गांधी और जे।बी। कृपलानी के बीच हुई बहस याद आती है। मुझे इस बात की ख़ुशी है कि गांधीवादी विचार और दर्शन अपने देश में विस्तार की शुरुआत करने में मेरी भूमिका है। आख़िर में मैं यह दुआ करूंगी कि विकास को पाने का मार्ग जो केवल जापान ने नहीं दिखाया है, उसके अलावा दुनिया के सभी लोग गांधी के जीवन और उनके दर्शन से प्रेरणा लें।