अक्टूबर 2018

ऐसे ही नहीं मिल पाएगा समलैंगिकों कोबराबरी का दर्जा

पुष्परंजन

जो लोग समलैंगिक संबंधों को कानूनी मान्यता देने को यूरोप की साजिश बता रहे हैं, उन्हें मालूम होना चाहिए कि सेंट्रल और पूर्वी यूरोप के 18 ऐसे देश हैं, जहां के लोग समलैंगिक विवाह के विरोध में हैं। सिर्फ पांच फीसदी रूसी और 9 प्रतिशत यूकेन के लोग हमजिंसी विवाह के समर्थन में खड़े हैं। दुनिया में 73 देशों में समकामियों को अवैध मानते हुए हिकारत की दृष्टि से देखा जा रहा है। इनमें ज़्यादातर मध्य-पूर्व, अफ्रीका, एशिया के मुल्क हैं।

जिधर नजर डालिए, 'एलजीबीटी' (लेस्बियन, गे, बाइसेक्सुअल, ट्रांसजेंडर) की विजय पर हर्ष का मंजर। जो भी टीवी चैनल खोलिए झूमते-गाते, विजय गाथा सुनाते थर्ड जेंडर के समर्थक। अखबारों के पन्ने 'विक्टरी' से सराबोर! गोया, देश को दूसरी आजादी हासिल हुई हो। मगर, क्या यह सब काफी है? यह तो सुप्रीम कोर्ट का फैसला भर था। संविधान संशोधन का काम अभी बाकी है। या तो 377 रद्द हो, या फिर संशोधित! सरकार की ओर से अभी इस बारे में स्पष्ट बयान नहीं आया है। सरकार की डोर संभालने वाले मोहन भागवत या उनके निचले वाले पायदान पर खड़े हिंदू नेता खामोश से हैं। दिसंबर 2017 में ऑस्ट्रेलिया 26वां देश था, जहां समलैंगिक विवाह को मान्यता दी गई। भारत की राह में अभी रुकावटें हैं। जर्मनी, बरमूडा, फिनलैंड, माल्टा ने पिछले वर्ष ही प्रकारांतर से 'सेम सेक्स मैरेज' को मान्यता दी है। 2015 में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने सभी 50 राज्यों में समलैंगिक विवाह को अमली जामा पहनाने का आदेश दिया था। 2 अक्टूबर 2018 को अवकाश से पहले जस्टिस दीपक मिश्रा कुछ ऐसा ही इतिहास रच रहे हैं। ऐसा इतिहास, जिस पर पूरी दुनिया की नजर पड़े। विरोधी इसे पश्चिम की साजिश बता रहे हैं। इस देश में जनगणना वाले एलजीबीटी की आधिकारिक संख्या नहीं बताते। मगर, 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने जानकारी मांगी, तो बता दिया गया कि 25 लाख के आसपास हैं। एक अरब, 32 करोड, 42 लाख की जनसंख्या वाले देश में एलजीबीटी मात्र 25 लाख? कैसे मान लें? सही से गिनिये। इतनी संख्या तो मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र जैसे प्रांत में ही होगी। 32 करोड़ 67 लाख 66 हजार की जनसंख्या वाले अमेरिका में एलजीबीटी की आबादी 90 लाख हो सकती है, तो उससे चार गुना अधिक आबादी वाले भारत में 25 लाख कैसे? अमेरिका में 3.5 प्रतिशत लेस्बियन व गे हैं। 0.3 फीसदी ट्रांसजेंडर (उभयलिंगी) हैं। अमेरिकी शोध संस्था 'गॉलअप' के अनुसार, '2015 तक 7 लाख 80 हजार समकामी जोड़ियां विवाहित थीं। 20 लाख ऐसे लोग लिव इन रिलेशनशिप में थे।' अमेरिका की एक और शोध संस्था 'विलियम इंस्टिट्यूट' ने जानकारी दी है कि 2010 में 70 हजार लेस्बियन, गे और ट्रांसजेंडर अमेरिकन फोर्स में थे। 2014 में इनकी संख्या घटकर 15,500 रह गई है। अपने यहां डबल स्टैंडर्ड शुरू से रहा है। यूपी के आईपीएस अधिकारी डी.के. पांडा याद हैं आपको? 2005 से पग घुंघरू बांध नाच रहे थे। आईजी की वर्दी, मगर नाक में नथुनी, माथे पर सिंदूर, कान में टॉप्स, होंठों पर लिपस्टिक जैसे सोलह श्रृंगार में ऑफिस जाते थे। जूनियर पीठ पीछे मजाक उड़ाते, और सामने सैल्यूट दागते। उत्तर प्रदेश शासन उनके रिटायर होने तक मौन होकर सबकुछ देखता रहा। यह सिलसिला 1991 से चल रहा था। उस साल जन्माष्टमी के समय कान्हा डीके पांडा के सपनों में आये। अगले दिन इस जांबाज पुलिस अधिकारी ने कान्हा के नाम की चूड़ियां पहन लीं। पहले घर की चहारदीवारी तक यह प्रसंग चलता रहा, 2005 में वे राधा बनकर मंच पर अवतरित हुए। पांडा के परिवार ने उनसे दूरियां बना लीं। हिंदू धर्मगुरुओं ने कभी नहीं कहा कि आईपीएस पांडा 'मानसिक विकृति' के शिकार हैं। 'कृष्ण की खाकी वर्दीधारी राधा' ने सर्विस की पूरी पारी खेली, और समय पर सेवानिवृत्त हुई। दिलचस्प है कि पांडा लखनऊ के गोमतीनगर के विभूति खंड स्थित जिस पुलिस एन्कलेव के फ्लैट नंबर 2/5 में रहते थे, उसे मनहूस मान लिया गया। एक बात मान कर चलें कि आईपीएस पांडा एलजीबीटी वाली सूची में नहीं होंगे। यह जांच का विषय है कि सुरक्षा बलों और सरकार के सभी निकायों में 'एलजीबीटी' की संख्या कितनी है। राजनीतिक-सामाजिक क्षेत्रों में बहुत से गणमान्य लोग इसे बताने में शर्म महसूस करते हैं कि वे 'शौकीन' हैं। 2007 में सरकार ने ही सर्वे के जरिये पता कराया था कि देश में कितने बच्चों से दुष्कर्म किये जाते हैं। उस समय संख्या थी 2 करोड़ 20 लाख। तब की सरकार के सर्वे के मुताबिक, उस साल 52.9 फीसदी बालक कई बार हवस के शिकार हुए थे। इस कुकर्म को रोका नहीं जा सका है। बल्कि ताजा आंकड़े बताते हैं कि बालकों से बलात्कार के मामले में 2018 आते-आते 53 फीसदी इजाफा हो चुका है। सोचिये, इनमें से कितने बच्चे बाद में चलकर एलजीबीटी बनेंगे? सरकार ने बालिकाओं से बलात्कार की सजा को आजीवन कारावास और मृत्युदंड तक में बदलकर सुर्खाब का पर लगा तो लिया है, मगर बालकों से दुष्कर्म की अधिकतम सजा वही दस साल! ऐसा क्यों? एलजीबीटी अधिकारों के वास्ते लड़ने वाले चंद लोगों में हरीश अय्यर आज की तारीख में एक बड़ा नाम है। कुछेक साल पहले हरीश का इंटरव्यू करने का आदेश ब्रसेल्स स्थित मेरे कार्यालय से आया। मेरे जेहन में एक बात घूमती रही कि एक 'गे राइट्स एक्टीविस्ट' का इंटरव्यू यूरोप के लिए इतना महत्वपूर्ण क्यों है? मुंबई के ट्राइडेंट होटल में मैं ठहरा था, वहीं हरीश अय्यर अपनी मां के साथ आये। मेरे पास डेढ़ सौ से अधिक सवाल पहले से तैयार थे। हरीश गे कैसे बना? इसके जवाब में उसने अपनी मां के सामने बचपन की जो परतें खोलीं, मैं दंग था। उसके सगे मौसा ने स्कूल जाने वाले छह साल के बच्चे से सालों दुष्कर्म किया था। नतीजतन वह 'गे' बन गया। हरीश को अपनी आत्मकथा सार्वजनिक करने में कोई हिचक नहीं थी। संभवत: वह संदेश देना चाहते थे कि बच्चा अपने परिवार के सदस्यों, सगे रिश्तेदारों के बीच भी महफूज नहीं है। इस देश में ऐसे मां-बाप की संख्या 90 फीसदी से भी अधिक है, जो अपने बच्चे के यौन शोषण की बातें सार्वजनिक नहीं करते। गुजश्ता दिनों हरीश अय्यर का लेख मैंने इंडियन एक्सप्रेस में पढ़ा। उसने बड़ी शाइस्तगी से उन मुश्किलों का जिक्र किया है, जो राजनीति व अदालतों के गलियारे में जगह-जगह खड़े किए गए थे। सुब्रमण्यिम स्वामी जैसे हार्वर्ड रिटर्न राजनेता होमोसेक्सुअलिटी को मानसिक विकार मानते हैं। इस देश में प्रधानमंत्री पद की दावेदार रहीं सुषमा स्वराज ने कभी कहा था, 'गे लोग सरोगेसी नहीं कर सकते, क्योंकि यह भारतीय लोकाचार के विरुद्ध है।' संघ के सह सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबले ने कहा था, 'ठीक है अपराध की श्रेणी में न रखें, किंतु इसका महिमामंडन भी नहीं करें।' योगी आदित्यनाथ, राजनाथ सिंह को भी हरीश अय्यर ने उद्धृत किया है, जिन्होंने कहा था,'यह अप्राकृतिक व्यवहार है, जिसका हम समर्थन नहीं कर सकते।' हरीश अय्यर ने अपनी भावनाओं को सार्वजनिक करते हुए लिखा, 'हां, हमारे पर लग गये हैं। हमें इस नये उग आये पर को लेकर अभिमान है। मगर, हमें बराबरी का हक क्यों नहीं? शासन कौन होता है, हमें बराबरी का स्थान नहीं देने वाला? हरीश अय्यर का यह लेख उन लाखों दबी-कुचली भावनाओं का इजहार है, जिसका उत्तर संविधानविदों व संसद को देना बाकी है। यह संशोधन के जरिये ही संभव है। उसी संसद में 2013 में शशि थरूर ने दो बार प्राइवेट मेंबर बिल के जरिये संशोधन की कोशिश की थी, मगर उन्हीं की सरकार में इसे सीरियसली नहीं लिया गया। प्रिया दत्त और मिलिंद देवड़ा भी 377 को बदलने के वास्ते साथ खड़े थे। मनमोहन सरकार में यह विषय नक्कारखाने में तूती की आवाज जैसी थी। दीगर सवाल हमारे दोहरे मापदंडों को लेकर भी है। विवादित मुद्दों पर लड़ने वाले दारूल उलूम के मौलाना, पादरी, हिंदू धर्माचार्यों का बड़ा हिस्सा समलैंगिकता के विरोध में एकमत दिखता है। सुब्रमणियम स्वामी जैसे लोग कोर्ट के फैसले से असहमत हैं। उन्हें सामाजिक बुराइयों के साथ एड्स जैसी बीमारियों के बढ़ने की आशंका है। हमारे धर्माचार्य शिखंडी, अर्द्धनारीश्वर पर बहस करना नहीं चाहते। अग्नि ने देवताओं का वीर्य क्यों स्वीकार किया था? कार्तिकेय की उत्पति कैसे हुई? भगवत पुराण में विष्णु का मोहिनी अवतार, दक्षिण में सबके श्रद्धेय अयप्पा की समलैंगिता पर चर्चा निषिद्ध विषय है। इसी तरह ईसाईयत समलैंगिकता को गलत मानता है, पर बालकों से सबसे अधिक दुष्कर्म के आरोप में दुनिया भर के पादरी ही फंसे हैं। इस्लाम में समलैंगिकता कुफ्र है। मगर, ऑटोमन साम्राज्य के मिनियेचर पुरुष के साथ सामूहिक यौन लीला की चुगली करते हैं, जो इस्तांबुल के म्यूजियम में उपलब्ध हैं। 2004 में पाकिस्तान सरकार ने स्वीकार किया था कि अकेले लाहौर में 10 हजार खोजा सेरा हैं। पाकिस्तान में समलैंगिक संबंध व बालकों से बलात्कार सौ कोड़े लगाने से लेकर मौत की सजा तक थी। इसे धीरे-धीरे नरम किया गया है। 2008 में लाहौर हाईकोर्ट ने नौरीन नामक शख्स को सेक्स चेंज की इजाजत दी। 2018 में पाक सरकार ने 'ट्रांस जेंडर एक्ट' बनाकर एलजीबीटी समुदाय को सुरक्षा प्रदान की है। यानी, पाकिस्तान जैसे बंद समाज ने भी धीरे-धीरे एलजीबीटी के हुकूक को समझा है। पाकिस्तान की राह में इंडोनेशिया भी है। वहां कानून में बदलाव की प्रक्रिया आरंभ है। दुनिया में इस समय आठ देश हैं, जहां हमजिंसिया संबंधों को लेकर मौत की सजा का प्रावधान है। इनमें ईरान, सूडान, सऊदी अरब, यमन, सोमालिया, उत्तरी नाइजीरिया, सीरिया और इराक हैं। कुछ ऐसे इस्लामिक देश हैं, जहां सिद्धांतत: हमजिंसिया को सजा-ए-मौत है, मगर व्यवहार में ढील दी गई है। उनमें अफगानिस्तान, पाकिस्तान, कतर, यूएई, उत्तरी अफ्रीकी देश मारीतानिया है। जो लोग समलैंगिक संबंधों को कानूनी मान्यता देने को यूरोप की साजिश बता रहे हैं, उन्हें मालूम होना चाहिए कि सेंट्रल और पूर्वी यूरोप के 18 ऐसे देश हैं, जहां के लोग समलैंगिक विवाह के विरोध में हैं। सिर्फ पांच फीसदी रूसी और 9 प्रतिशत यूकेन के लोग हमजिंसी विवाह के समर्थन में खड़े हैं। दुनिया में 73 देशों में समकामियों को अवैध मानते हुए हिकारत की दृष्टि से देखा जा रहा है। इनमें ज़्यादातर मध्य-पूर्व, अफ्रीका, एशिया के मुल्क हैं। भारत समेत पूरी दुनिया में लड़ाई कानून से अधिक सोच के स्तर की है। उस सोच को बदलना बड़ी चुनौती है। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और लंबे समय तक जर्मनी में रहकर जर्मन रेडियो डायचेवेले से जुडे रहे हैं)