अक्टूबर 2018

भाजपा के गले की हड्डी बना एट्रॉसिटी एक्ट

हिदायत उल्लाह खान

शाहबानो की जो कीमत कांग्रेस ने चुकाई, वही एससी-एसटी पर भाजपा चुकाती दिख रही है। शाहबानो का इस्तेमाल भाजपा ने हिंदुओं को एक करने के लिए किया था और वहीं से राम मंदिर आंदोलन खड़ा हुआ था। अब वही कांग्रेस कर रही है। वोट बचाने के लिए राजीव गांधी ने अदालत का फैसला बदल दिया था और हिंदू वोट बरकरार रखने के लिए बाबरी मस्जिद के ताले खोल दिए थे। ये वो भूल थी, जिसको आज तक कांग्रेस भुगत रही है।

ऐसा ही सब एससी-एसटी पर भाजपा से भी हो गया है और यहां भी वजह वोट ही बने हैं, पर जो खालिस वोट था, वो नाराज हो गया है और सड़क पर है, यानी जिस मोड़ पर कभी भाजपा थी, अब कांग्रेस आ गई है और उसके पास शाहबानो का जवाब भी आ गया है। भाजपा को समझ नहीं आ रहा है किस तरह अपना वोट बचाए, क्योकि इस बार ‘आगे-वाले’ नाराज हैं और वो भाजपा की ताक़त रहे हैं। उसे उन्हीं की पार्टी कहा जाता है। उनकी नाराजगी से कांग्रेस को ज्यादा फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि उनके पास इस खेमे के वोट नहीं हैं। यही वजह है वो खामोश है, लेकिन आग में घी जरूर डाल रही है। उसको मौका मिल गया है और वो भी चुनाव से पहले, जिसे छोड़ा तो नहीं जा सकता है। हालांकि कांग्रेस इससे इनकार कर रही है, पर भाजपा इसे उसी की साजिश कह रही है और इसे फूट डालो-राज करो बता रही है। इसे देश का नुकसान भी कहा जा रहा है। वैसे भी अभी सरकार का विरोध देश का विरोध बन ही जाता है। इसे भी बनाने की कोशिश है और बार-बार कहा जा रहा है देश को नुकसान पहुंचाया जा रहा है। क्या देश का नुकसान सिर्फ सवर्णों और दलितों की लड़ाई से ही हो रहा है। क्या इसे फूट डालो राज करो कहा जा सकता है? बात ठीक हो सकती है, पर सियासत में ऐसा होता है। यहां रहम की गुंजाइश नहीं रहती है, लेकिन क्या हिंदू-मुस्लिम की लड़ाई से देश को नुकसान नहीं होता? क्या वहां फूट डालकर राज नहीं किया जाता? जात-पात की हिंसा अगर देश के लिए ठीक नहीं है तो सांप्रदायिक हिंसा भी अच्छी नहीं है, पर एक हिंसा को देश के लिए नुकसान बताया जाए और दूसरी को बढ़ाने में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया जाए तो फिर कैसे सुधार आ सकता है। असल में भाजपा अपने ही जाल में फंस गई है। दलितों के पास जो है, वो तो बरसों से था और दूसरों ने उसे कुबूल भी कर लिया था। सब कुछ ठीक चल रहा था, लेकिन जब से मोदी सरकार आई है, सवर्णों को सपना दिखाया गया हक देंगे और दलितों के हक में कटौती करेंगे। इस तरह के बयान लगातार सत्ता और भाजपा की तरफ से आ रहे थे। संघ के कुछ नेताओं ने भी ऐसी बात कही थी और आरक्षण को खत्म करने के नारे भी घूमने लगे थे। जब मोदी को आगे किया गया था, तब खामोशी से आरक्षण खत्म करने के वादे हुए थे। अपने वोट बैंक से कहा गया था, सरकार आने दीजिए सवर्णों की बात सुनी जाएगी। जाहिर है, मंसूबे के तहत इस बात को उठाया गया था, लेकिन उसकी गरमी को पहचानने में सरकार चूक कर गई। यही वजह है जब सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया तो सरकार के साथ वाले नाराज हो गए और देश में उसका विरोध होने लगा। दलितों की जमात ने सड़क पकड़ ली। मोदी सरकार घबरा गई और उसने ताबड़तोड़ एक्ट फिर से लागू कर दिया। फिर वही तस्वीर सामने थी। मुसलमानों से घबराकर कांग्रेस ने शाहबानो पर अदालत का फैसला बदला था और यहां मोदी सरकार ने भी वही कर दिया, क्योंकि रामविलास पासवान सहित जितने भी साथी थे, बोरिया-बिस्तर बांधने की धमकी देने लगे थे। भाजपा को लगा जो अपने हैं, उन्हें समझा लिया जाएगा, पर जो बखेड़ा हो रहा है, उसे संभालना जरूरी है, लेकिन जो चिंगारी उसने लगाई थी, उसे नजरअंदाज कर दिया गया और सियासत में अकसर चिंगारियां आग में तब्दील हो जाती हैं और अगर विरोधियों के हाथ लग जाए तो वही आग दिखती है, जहां से चिंगारी आती है। सरकार को लगा, जिस तरह उसने अदालत से तीन तलाक पर फतह हासिल की, यहां भी अदालत से ही आसानी लाई जा सकती है, लेकिन दोनों की गरमी में फर्क था। तीन तलाक पर मुसलमानों ने सड़क नहीं पकड़ी। कोई दंगा नहीं हुआ, किसी को गाली नहीं दी गई, बल्कि खुद को सुधारने की बात होने लगी, जबकि एससी-एसटी पर तो आग लग गई थी, जिसकी चपेट में सरकार आ रही थी। उसने फौरन खुद को बचाया, लेकिन उनको समझा नहीं पाई, जिनके दम पर वो यहां तक आई है। कहा जा रहा है कानून का गलत इस्तेमाल किया जाता है। बेकसूरों पर मुकदमे हो जाते हैं और ये ठीक नहीं है। इसमें सुधार होना चाहिए। यही बात तो अदालत ने कही थी, लेकिन बात सिर्फ इस कानून की नहीं है। जितने भी कानून भलाई के लिए बनाए गए हैं, उनका गलत इस्तेमाल हुआ है। दहेज से निपटने के लिए सख्त कानून बनाया गया तो कई बहुओं ने ससुराल ही बंद करा दिए। अब बलात्कार पर सख्ती है तो उसका भी गलत इस्तेमाल किया जा रहा है। रपट से पहले जांच का मामला भी गड़बड़ ही है, क्योंकि जिन्हें जांच करना है, उन पर जांच बैठी हुई है और क्या सारे मामलों में जांच के बाद ही रपट लिखी जाती है। किसी भी थाने में चले जाइए, बिना जांच के मुकदमे दर्ज किए जा रहे हैं। दोनों तरफ से मुकदमे दर्ज किए जाते हैं। कोई पड़ताल नहीं होती है, अगर जांच के बाद मुकदमे दर्ज किए जाते तो फिर अदालत में ये मुंह की क्यों खाते हैं। जाहिर है, ऐसा कुछ भी नहीं है और जो बड़ा सवाल उठ रहा है, अगर किसी महिला के साथ ज्यादती हुई है, बलात्कार हुआ है तो क्या उसकी भी जांच की जाएगी, जबकि बलात्कार में तो सीधे मुकदमे की बात है। क्या उसे इसलिए रोक दिया जाएगा कि एसटी-एससी की है तो पहले जांच होगी। इसलिए सिर्फ गलत इस्तेमाल के नाम पर कानून तो नहीं बदला जा सकता है और अगर वहां बदलाव है तो फिर सारे कानून बदलना चाहिए, लेकिन अभी तो वो एकजुट हो गए हैं, जो बिखरे रहते थे और उसका फायदा सरकार लेती थी। भाजपा और मोदी सरकार फिलहाल उलझन में है। इसमें सवाल कांग्रेस पर भी लग रहे हैं, क्योंकि जवाब उसके पास भी नहीं है, लेकिन वो सरकार में नहीं है, इसलिए पीछे है और मोदी आगे हैं, क्योंकि प्रधानमंत्री हैं, उनकी सरकार है और सवर्ण उनसे सवाल पूछ रहे हैं, हमें हक कब मिलेगा, हमारे साथ कब तक ज्यादती होगी, जिसका जवाब किसी के पास नहीं है, क्योंकि इधर जवाब देने का मतलब उधर झगड़ा मोल लेना है और अभी तो अपनी ही चिंगारी से लगी आग की चपेट में सत्ता आ गई है। उसे कुछ सूझ नहीं रहा है और जो नई पैंतरेबाजी की जा रही है, उससे बिगाड़ का अंदेशा ज्यादा है। ये सब चुनाव के वक्त हुआ है। तीन बड़े राज्यों में चुनाव हैं और उसके बाद देश को भी सरकार चुनना है। ऐसे में लगता नहीं सवर्ण की नाराजगी को खत्म होने दिया जाएगा। हालांकि सरकार कोशिश में लग गई है, लेकिन विरोधियों को यहीं से सत्ता में जाने का रास्ता दिखाई दे रहा है। अब वो रास्ता बड़ा करेंगे या फिर सत्ता रास्ता काट देगी, इसके लिए इंतजार करना पड़ेगा, लेकिन अभी तो घर के चिराग से घर को आग लग गई है और उसकी लपट दूर तक जाती दिखाई दे रही है।