अक्टूबर 2018

देश को चाहिए जेएनयू जैसे कई बगीचे

अनिल सिन्हा

जेएनयू के छात्रों ने भारतीय लोकतंत्र में जो अच्छा है, उसके पक्ष में मत दिया है। छात्रसंघ चुनाव में जिन मुद्दों पर चर्चा हो रही थी, वे राष्ट्रीय थे। इसमें लिंचिंग और अभिव्यक्ति की आजादी से लेकर बेरोजगारी, शिक्षा के व्यापारीकरण से लेकर काला धन और उदारीकरण की अर्थव्यवस्था के सारे मुद्दे शामिल थे। अगर सच कहें तो उन्होंने उन छात्रों और युवकों के मुंह पर तमाचा मारा है, जो आम सभाओं और गोष्ठियों में मोदी-मोदी का भोंडा नारा लगाते रहते हैं। यह जेएनयू को गाली बना देने वालों को तमाचा है। यह साम्प्रदायिक नफरत के खिलाफ एक बयान है।

आखिरकार, जेएनयू के विद्यार्थियों ने वाम, एसफआई, एआईएसएफ ,आईसा और डीएसएफ उम्मीदवारों को अपना नुमाइंदा चुन लिया। उन्होंने एक ऐसे समय में एबीवीपी को अपना नेता मानने से इंकार किया है, जब आरएसएस और भाजपा वाले खुद को देश का स्वाभाविक नेता बता रहे हैं । वे 2019 में देश की सत्ता फिर से हाथ में लेने की कोशिश में हैं। उनका सिर्फ राजनीतिक नेतृत्व का ही दावा नहीं है, वे देश का बौद्धिक, सामाजिक और सांस्कृतिक नेतृत्व भी करना चाहते हैं। जेएनयू के छात्रों ने बता दिया कि आरएसएस उनका गुरु नहीं हो सकता है। ठीक बगल के ही दिल्ली विश्वविद्यालय में विपरीत परिणाम आए। इन दो परिणामों का अंतर ही जेएनयू की खासियत साबित कर देता है। काफी हमलों और साजिश के बाद भी छात्रों ने ज्ञान की आजादी की रक्षा कर ली है। यह कम बड़ी बात नहीं है। पिछले दिनों जेएनयू पर हर तरह के हमले हुए। भाजपा की पार्टी और सरकार, दोनों ने इसके चरित्र को बदलने की कोशिश की। छात्र तूफान के सामने खड़े रहे। ऐसा करिश्मा वे किस तरह कर पाए? कुछ लोग इसका श्रेय संगठन को देंगे। लेकिन यह अधूरा सच है। संगठन के हिसाब से देखें तो एबीवीपी ज्यादा संगठित है। इसके पीछे सत्ता और पैसे की ताकत भी है। कुछ लोगों को लगेगा कि यह वाम विचारधारा की वैचारिक दृढ़ता के कारण संभव हो पाया। उन्हें लगेगा कि वामपंथी विचारों में कट्टर होते हैं और उन्होंने इसी ताकत से संघियों को हरा दिया। वे भी गलत हैं। उन्हें समझना चाहिए कि कट्टरपंथ में आरएसएस को कोई मात नहीं दे सकता है। फिर क्या था, जिसने वाम को जिताया? जाहिर है, वामपंथी पार्टियां इसे वामपंथ के विचारों की विजय बताएंगी। उन्हें ऐसा करना भी चाहिए। लेकिन यह सच्चाई से दूर है। जिन छात्र संगठनों ने मिल कर यह चुनाव लड़ा है, उनके बीच ही विचारों की कभी न पाटी जाने वाली खाई है। अगर आप उनके दस्तावेजों को पढ़ें या उनके कार्यक्रमों पर गौर करें तो आपको समझ आ जाएगा कि वे एक-दूसरे से कितने दूर हैं। इसलिए वाम संगठनों की इस एकता को वैचारिक एकता मानना कठिन है। यही नहीं, हम इन संगठनों के इस दावे को भी नहीं मान सकते कि यह उनकी रणनीति की जीत है। हमें पता है कि इससे भी अच्छी वाम-रणनीति बाकी चुनावों में फेल होती रही हैं। जेएनयू के चुनाव-नतीजों को समझने के लिए इस विश्वविद्यालय की बनावट को देखना पड़ेगा। इस विश्वविद्यालय के ढांचे को बनाने का श्रेय हमें आपातकाल के पहले के कांग्रेस नेतृत्व को देना पड़ेगा, जिसने इसे तैयार किया। उसने इसकी बनावट ऐसी रखी कि यह ज्ञान की खोज मुक्त ढंग से कर सके। यह बगल के ही और ज्यादा पुराने विश्वविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय के मुकाबले ज्यादा गंभीर और कुशलता से शिक्षण का काम करने में सफल हुआ। हमें यह मानने में कोई एतराज नहीं होना चाहिए कि सत्ता को अपनी मुट्ठी में रखने वाली कांग्रेस ने जेएनयू को अपनी गिरफ्त में लेने की कोशिश नहीं की । लेकिन, वर्तमान की भाजपा सरकार ने कोई कसर नहीं छोड़ी। जेएनयू के छात्रों ने बता दिया कि सरकार विश्वविद्यालय को कब्जे में कर सकती है, उनके मानस को नहीं। ऐसे समय में जब लोगों को लोकतंत्र और खुली सोच से अलग करने का संगठित प्रयास हो रहा है, जेएनयू के छात्रों ने बता दिया कि उन्हें यह मंजूर नहीं है। जेएनयू के छात्रों ने भारतीय लोकतंत्र में जो अच्छा है, उसके पक्ष में मत दिया है। वहां इस पक्ष को वाम संगठनों ने नेतृत्व दिया है। चुनाव में जिन मुद्दों पर चर्चा हो रही थी, वे राष्ट्रीय थे। इसमें लिंचिंग और अभिव्यक्ति की आजादी से लेकर बेरोजगारी, शिक्षा के व्यापारीकरण से लेकर काला धन और उदारीकरण की अर्थव्यवस्था के सारे मुद्दे शामिल थे। अगर सच कहें तो उन्होंने उन छात्रों और युवकों के मुंह पर तमाचा मारा है, जो आम सभाओं और गोष्ठियों में मोदी-मोदी का भोंडा नारा लगाते रहते हैं। जेएनयू के चुनावों में देश में हो रहे सामाजिक परिवर्तन और अस्मिता की राजनीति का असर दिखाई दे रहा है। आदिवासी दलित और पिछड़ों का संगठन बापसा पहले से चुनाव लड़ रहा है। इस बार भी पिछड़ों की राजनीतिक ताकत दिखाने के लिए आरजेडी का उम्मीदवार भी सामने आ गया। वाम संगठनों को इन परिवर्तनों पर भी ध्यान देना पड़ेगा। इस सामाजिक उभार को प्रगतिशील धारा में शामिल करने और दक्षिणपंथी ताकतों को इसका इस्तेमाल करने से रोकने के लिए उन्हें जिग्नेश मेवानी जैसे नेताओं को आगे लाना होगा। उन्हें इस बात पर ध्यान देना होगा कि इन तबकों को प्रतिनिधित्व के लिए प्रतिनिधित्व नहीं, बल्कि उन्हें वास्तविक नेतृत्व दिया जाए। अवसरवाद और व्यक्ति केंद्रित पार्टियों को विचारधारा की लड़ाई नहीं लड़नी है। यह काम छात्रों के संगठन और विचारधारा के लिए संघर्ष करने वाले छोटे संगठनों को करना है। देश में सांप्रदायिक और जातिवादी ध्रुवीकरण को रोकने के लिए लोगों को विचारधारा के आधार पर संगठित करना जरूरी है। देश में फैली विषमता से यही राजनीति लड़ सकती है। सच मानिए तो जेएनयू देश में फैल रहे बौद्धिक रेगिस्तान में एक बगीचे की तरह उभर आया है। यह घोर अंधकार में एक लैंपपोस्ट की तरह नजर आ रहा है। यह भारत की आजादी से निकली रोशनी है। इसे बुझाने के प्रयास लगातार हो रहे हैं। लेकिन देश में जेएनयू जैसे एक बगीचे से काम नहीं चलेगा। हमें देश में ऐसे अनगिनत बगीचों की जरूरत है। लोकतंत्र और सेकुलरिज्म में विश्वास करने वाले छात्र संगठनों को देशभर के शिक्षण संस्थानों में शिक्षा के कॉरेपोरेटीकरण और सरकार-कॉरपोरेट गठबंधन के खिलाफ लड़ाई शुरू करनी चाहिए। इसमें समाज के हर तबके के छात्रों को शामिल करना चाहिए। देश को सांप्रदायिकता और लूट की अर्थव्यस्था के दलदल से निकालने का यही तरीका है। (लेखक द्रोहकाल संपादक मंडल के सदस्य हैं)